ब्रह्मपुत्र

Published on
2 min read

नील-नीर-परिधान सुशोभित हलधर-सा कृषि का उत्थान-
करता हूं निष्प्राण ऊसरों को उर्वर में जीवन-दान।
आ-आकर मिलती है मुझमें सरिताएं बहुसंख्य-सहास;
सरस-नवीन कल्पनाएं ज्यों आती सिद्ध सुकवि के पास।

तुषाराद्रि ने आयोजित की, नद-नदियों में जो कि अनन्य-
लंबी दौड़ प्रतिस्पर्धा, मैं उसमें सर्वजयी हूं धन्य।
मेरे धावन की लंबाई, धारा की चौड़ाई और-
कोई पा न सका, फिर क्यों मैं कहलाऊं न सरिच्छिरमौर?

ब्रह्मदेश की इरावती का, मुझमें जिन्हें हुआ आभास-
उनका मोहभंग करता मैं इरावान्-सा लिए विकास।
ऐरावत-से गिरिखंडों को अंतराल में भरे प्रवाह-
पीछे मुड़कर नहीं देखता, चाह बनाती चलती राह।

स्वाभिमान से, आन-खान से, ज्ञान-ध्यान से हो संयुक्त-
पिघलाई हिमशिला अहम् की, उगा विनय-भासकर उन्मुक्त।
रहते खड़े किनारों पर जो पहले जर्जर छांव-कुचैल,
उन रूखे रूखों को देती जल-समाधि धारा गुस्सैल।

रज-राजस-रंजित होते जो मेरा समझ मंद संचार-
प्रखर धार के कट जाते वे, रहते अक्षत विरज कगार।
तम-रज गुण बांधते न मुझको, सदा सतत्वगुण में अनुरक्त,
पाकर तट साधना-समन्वित रहे साधु-जीवन संसक्त।

शरत्काल में महामना मुनि के मन-सा मै शोभन-शांत-
करता हूं संचरण, न रहता जीवन चटुल ऊर्मि-आक्रांत।
तब मेरे उस सौम्य रूप को आदर देते हुए अतुच्छ-
बरसाने लगते तट के तरु सुरभिधनिक पुष्पों के गुच्छ।

तरुणी धाराएं सज्जितकर वीनि-वेणियों में वे फूल-
प्रिय कूलों से जाकर मिलती, रखतीं उन्हें प्रणय-अनुकूल।
भंवर-थालियों में रख-रखकर मैं सब कोमल कांत लतांत-
नित्य चाहता-जाकर पूंजूं शेषशयन हरि के पदप्रांत।

कभी बृहत्तर भारत का था मैं अब हूं अंतर-राष्ट्रीय-
‘नील’ - ‘अमेजन’-सदृश दीर्घतम नदी-तंत्र में परिगणनीय।
बर्मा, अरुणाचल प्रदेश हो या कि चीन, तिब्बत, नेपाल-
सबकी लोक-कथाओं में हैं रोपित मेरे सुयश-रसाल।

लिया ज्यों सत्यवती ने तीर भानुजा के फिर से अवतार।
देख तेरी धारा का रूप, झूम-झुक पड़ता बॉस अवाक्,
मनोरम हरियाली के अंक उतरना चाह रहा है काक,
किंतु वह युवक विरह से दग्ध, अस्थिपंजर तन दुखी अपार-
किसी से नहीं कहीं मुंह खोल मांग पाता है ‘स्नेह’ उधार,
देवता! है क्या तेरे तीर, तरुण-पीड़ाओं का उपचार?
लुइत! जो है तेरे उस पार झोंप प्रिय ‘बर्हमथूरी’ चारु-
युग्म मिलकर खाते हैं पान, वहां से लाते चुनकर दारु,
बहाना मत कृपया वह झोंप, बने रहना उसके अनुकूल-
अन्यथा देगा तुमको कौन पहुंचकर निर्जन में तांबूल
लहराता तेरे जल पर बाँस, पंथ पर मेरा कृशकटि प्यार।
फूल तेरे तट सरसों ज्यों कि कीट मधुआ से होती ग्रस्त-
हुआ यों ही मेरा भी प्रेम-पुष्प है अन्य किसी से व्यस्त,
नैश नभ की सुषमा नक्षत्र बने तेरी छवि रजकण कांत-
प्रियतमा-प्रीति-पल्लवित मंजु रहे मेरा पथार-मन शांत,
आंख में जीवन रहे सजीव और जीवन में तुझ-सी धार।
दुकूलों में तेरे लौहित्य! ढले हैं लोकगीत सुकुमार।

‘ब्रह्मपुत्र’ नदी काव्य में से दो अंश, कवि की पुस्तक ‘पंचगंगा’ में संकलित

लेटेस्ट अपडेट्स के लिए हमारे व्हाट्सऐप चैनल को फॉलो करें

संबंधित कहानियां

No stories found.
India Water Portal - Hindi
hindi.indiawaterportal.org