गंगा जल

Published on
1 min read

जिस तट मुकुलित हुई मनुजता
चलता है जिससे जीवन
विकसित हुई सभ्यता जिससे
आलोकित होता जन-मन

निर्मल शीतल धवल चाँदनी
में कल-कल लहराती है
स्वप्न सजाती है नयनों में
पल-पल जागी बहती रहती है

आँसू बहते रहते माँ के
सागर खारा हो जाता है
तट तट मेले-उत्सव सजते
तन मैला क्यों रह जाता है

सदियों से निर्मलता देता
मुक्त किया संताप से
गदला आज हुआ गंगा जल
मनुज जाति के पाप से !!

लेटेस्ट अपडेट्स के लिए हमारे व्हाट्सऐप चैनल को फॉलो करें

India Water Portal - Hindi
hindi.indiawaterportal.org