गंगा की पुकार हर दरिया का आधार

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तुम मेरी धार पर कतार बनके आए हो
मेरी अपनी जिंदगी का आधार बनके आए हो
आज मैं दुखी हूं और तुम भी दुखी हो
अरे अपने घर पर संभालो मुझको
मैं भी सुखी और तुम भी सुखी हो
हां हैं बंधनों से बहुत शिकायत तुम्हारे
फिर भी बताओ कब न आई, सर से लेकर घर तक तुम्हारे
हाय तुमसे मुझको संभाला न गया
कलशों में भरकर ले जाते हो,
मुझे बड़ी श्रद्धा के साथ
जब तुम्हारे घर आती हूं तो बेरूखी का बर्ताव
बड़े-बड़े मेरे रहने के बर्तन झील, तलाब, पोखर घर फोड़ आए हो।
शायद मेरी तुम्हारी परेशानी की वजह है यही
मैं तुम्हारे घर से ठुकराई जाती हूं, कोई समझे तो सही
हिमगिरी से सागर तक अविरल रहूंगी, कभी जुबान से उफ न कहूंगी
तुम बस आकाश की बूंदें सभालों
तो मैं भी उद्गम से संगम तक यूं ही बहती रहूंगी।

बस अब बहुत हुआ इंतजार, अब इंतजाम की बारी है
अमृत जल हो नाली में, नाली का पानी थाली में, ये कैसी लाचारी है?

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