गोमती से प्यार

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मुझको गोमती से प्यार।
चूमती मन-पुलिन उसकी दूधिया रस-धार।।
गोमती की कोख से पैदा हुआ,
साँवली माटी उसी की, रचा जिससे तन,
शिराओं में रक्त बनकर बह रहा
गोमती का नीर माँ के दूध-सा पावन,
मैं कहूँ कैसे कि वह केवल नदी है
एक ममता-मूर्ति मुझमें हो रही साकार।
मुझको गोमती से प्यार।।
हिंडोले-सी गोमती की मृदु लहर,
झूलते जिसमें गए दिन बीत बचपन के,
सजल आँचल में जुड़े सुख स्वप्न के मेले
अजूबे-से खेल खेले छुअन-फिसलन के
गोमती है बालपन की सहेली मेरी
रेत-कण में उड़ा जाती अमित प्यार-दुलार।
मुझको गोमती से प्यार।।
गोमती के कछारों के बाँसवन,
उतरती सुरमई-नीली साँझ की चिड़ियाँ,
किनारों पर झूमती फसलें नई,
फूल सरों के-मटर के बैजनी कलियाँ,
मधुर कितने चित्र जो अंकित हुए दृग में
फिरिहरी-से घूम जाते स्वयं बारंबार।
मुझकों गोमती से प्यार।।
भरे भादों गोमती में बाढ़ है,
अश्रु-वदना उमड़ फैली है दिशाओं में,
गोमती का दुःख मुझ बिन कौन जाने
सहस्त्र धारा बह रही सुधि की शिराओं में,
दूर हूँ मैं, दूर मेरी वल्लभा
विरह तपकर हो न जाए पंक, काँस-सेवार।
मुझको गोमती से प्यार।।

‘साहित्य धर्मिता’ (पत्रिका) जौनपुर के नदी काव्य विशेषांक में प्रकाशित

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