जग में को पानी की सानी

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जग में को पानी की सानी, सब चीजें हरयानी।
ई पानी से प्रगट भये हैं, ऋषि मुनि और ज्ञानी।
पानी की तरवार सीसते, तरवा जाय समानी।
बेपानी बेकार होत हैं, मानुस की जिन्दगानी।
पानी से सब होत नरायन, वहाँ से पैदा पानी।

इस संसार में पानी का बड़ा महत्व है। जल ही तो जीवन है। जल से ही पौधे हरे भरे रहते हैं। इसी से हमारा जीवन है। बिना पानी के मनुष्य के जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती। पानी से ही सब है तो यह पानी कहाँ से आता है?

कैसी करी कृष्ण ने कैंके,
कारी के संग रैकें।
कर गये दाय सखिन के हिरदे,
कीरत कला सिखेकें।
करे करार कान ने कैयक,
कालिन्दी जल लैंके।
काकी हीरालाल कथत हैं,
अधर रंग खां लैके।

कृष्ण ने बड़ी अनहोनी कर दी, वे कुब्जा के साथ रहने लगें। वे तो वहाँ मजे से रहते हैं और यहाँ पर हम गोपियों के हृदय जले जा रहे हैं। उन्होंने हम सबसे जमुना जल को साक्षी मानकर यह कसम ली थी कि सदैव साथ रहेंगे, लेकिन फिर यह क्यों? हीरालाल जी अपनी रचना के माध्यम से कृष्ण की बात कहते हैं।

ललता तुम तो हो चतुर सयानी,
सुनों हमारी बानी।
यह दुनियां झूठी है तीसें,
ईसें क्यों लिपटानी।
ओलन कैसे रूप समझ लो,
फिर पानी को पानी।
है कछु और दिखात और कछु
परत नहीं पहचानी।

हे ललिता सखी! तुम तो समझदार हो, लेकिन फिर भी मेरी बात ध्यान देकर सुनों। यह संसार तो बड़ा झूठा है फिर हम इसमें लिप्त क्यों हैं? इसे तो ओले के जैसा समझो। ओले बर्फ के रूप में होते हैं, और थोड़े समय बाद पानी में परिवर्तित हो जाते हैं, ऐसा ही परिवर्तनशील यह संसार है। यह दिखता कुछ है लेकिन वास्तविकता कुछ और ही है। इसे समझा नहीं जा सकता।

यो तन सदा न तोरो रैहे, एक दिना मिट जैंहे।
ज्यों जल बीच मिटन बलबूला, पवन लगे ढुर जैहे।
पिजड़ा छोड़ उड़े जब पंछी, फिरना तुमें दिखेहें।
है जा वस्तु बिरानी मथुरा, आहै सो लै जैहें

यह शरीर सदैव तेरा नहीं रहेगा, एक न एक दिन तो इसे मिट जाना होता है अर्थात क्षणभंगुर है। जिस तरह से पानी का बुलबुला हवा के लगते ही विलीन हो जाता है। उसी तरह शरीर का अंत होता है। जब तेरे शरीर से जीव निकलेगा तो फिर यह किसी को नहीं दिखता कि कहाँ चला जाता है। यह तो पराई अमानत है। कवि मथुरा कहते हैं कि जो इस संसार में आया है उसे तो जाना ही होता है।

हम तौ कहिये आजुल बरहे को पानी जित मोरो तित जाय
हम तों कहिये बाबुल अंगना की चिड़िया रूग-चुग के उड़ जाय

हे पितामह! मैं तो किसान द्वारा बनाये गये उस बरहे के पानी के समान हूं जिसे वह जिस दिशा में चाहे मोड़ देता है। मैं आपके घर-आँगन की चिड़ियाँ जैसी हूँ जो कि आँगन में आकर अपना दाना चुगकर उड़ जाती है।

अधजल गगरी छलकत जाय।
भरी गगरिया चुप्पे जाय।

आधे जल से भरी गागर छलकती जाती है और अगर पूरी भरी हो तो वह बिना छलके जाती है।

मोरे राजा किवरियां खोल, रस की बूंदें परी
पहली बूंद गिरी अरूणाई, मोरे माथे आई जुन्हाई
मोरी देह भई सरवोर, रस की बूंदे परीं।

हे प्रिय! आप किवाड़ खोल दें क्योंकि बाहर बूँदा-बाँदी हो रही है। पहली बूँद मेरे माथी पर आकर गिरी तो मुझे कुछ ताजगी सी आई और अब तो मैं सराबोर हो गई हूँ।

बरसो भटरिया पै पानी,
सिजरिया पै भींज गई राजा।
गद्दा भी भींजे सुपेती भी भींजीं,
भींज गई अंगिया हमारी।

मेरी अटरिया पर पानी गिरा उससे मेरा बिस्तर भींग गया। गद्दा-रजाई सब भीग गये और मैं भी भींग गई।

मोरे आये नहीं सजनवा,
बैरिन आय गई बरसात।
रिमझिम-रिमझिम बरसत पानी,
मोरे घर की भीत पुरानी।

मेरे पति नहीं आये हैं, और यह बिरही जनों को त्रास देने वाली बरखा आ गई। पानी रिमझिम करता हुआ गिर रहा है। मेरे घर की दीवाल पुरानी है, कहीं कोई अनहोनी न हो जाये।

ऐसी छत्रसाल ने ठानी,
कैवे रई कहानी।
चुगलन-मुगलन सीख सिखाकें,
कर दओ पानी पानी।

महाराज छत्रसाल ने दुश्मन से बदला लेने का पक्का विचार कर लिया और वह इतिहास बन गया। उन्होंने चुगलखोरों तथा मुगलों को सबक सिखाकर पानी-पानी कर दिया।

देखो तौ जल-तल के ऊपर,
कमल लहरिया खा रये।
पावन परस पवन कौ पाकें,
मंद-मंद मुस्कारये।।

जल के ऊपर कमल खिले हुए हैं, वे हवा के झोकों से लहरा जाते हैं। उनका लहराना ऐसा प्रतीत होता है कि वे मानों मुस्कुरा रहे हों।

ढीमर घर लरका भये, धरें मुड़ीसें जाल
जल की मछरिया जा कहे, मोरे आ गये जी के काल

ढीमर के यहाँ पुत्र का जन्म हुआ तो पेशे के अनुसार उसके सिरहाने मछली पकड़ने का जाल रखा गया। जल में रहने वाली मछलियाँ विचार करती हैं कि अब एक और हमारी जान का दुश्मन पैदा हो गया।

मेहा में भींजे चुनरिया गोरी तोरी.........
करहन करहन आ गई नरबदा जू आ गई तरबदा
उमड़ घुमड़ बरसे बदरिया
कारे-कारे बदरा तुम ऐसे बरसियो रे ऐसे बरसियो
पिया छोड़ पांय ने मढ़ैया
साहुन महीना गोरी मेंदी रचा लो री मेंदी रचा लो
नैनों डार लो कजरवा
अमुआ की डार तरें झूला डरो है रे झूला डरो है
दूर कहीं बाजे मुरालिया

अरी ओ बावली! तेरी चूनर पानी से भींग रही है। बरसात अपने चरम पर है, नर्मदा में पूर आया है उनका प्रवाह लगातार बढ़ता जा रहा है। वह बादलों को संबोधन करके कहती है कि- हे मेघों! तुम इतना बरसना की हमारे पति बाहर न निकल सकें। श्रावण का महीना लगा है तो उसका पति कहता है कि- हे प्रिय! तुम अपने हाथों में मेंहदी लगा लो तथा अपनी आँखों में काजल लगा लो। एक आम की डाली पर झूला डला है और कहीं दूर से बाँसुरी की मनमोहक ध्वनि सुनाई पड़ती है।

घरर-घरर नदिया बहै अरे रैया
गोरीधन पनियां खों जांय
घिरी रे बदरिया फूहर पानी चली अरे रैया
आ गई बैरन बरसात
सूनी मढ़ैया मोहे डर लगे अरे रैया
गरजत घन आधी रात
भादों में पंछी घर छोड़े नहीं अरे रैया
बनजारे बन जिन जांय
जूझों को डंका रन खेतन बजो अरे रैया
सजना लड़न खों जांय
सजना बसत परदेश में अरे रैया
नैनन नीर बहांय

नदी घरर-घरर ध्वनि के साथ प्रवाहित हो रही है। उसी समय एक युवती पानी भरने जाती है, ठीक उसी समय आसमान में बादल घिर आते हैं। और वृष्टि होने लगती है। उस नवयौवना का योद्धा पति युद्ध क्षेत्र में गया है। वह घर में अकेली है, सूने घर में वह भी जल काली घटायें घिरती हैं। बादलों का गर्जन, बिजली की कड़क तथा उसी के अनुरूप वृष्टि हो रही हो तो अकेली स्त्री डर ही जाती है। वह सोचती है कि भाद्र मास में पक्षी भी अपना घोंसला नहीं छोड़ते तथा न ही बनजारे वन को जाते हैं, लेकिन इस बैरिन ऋतु में मेरे पति मुझे छोड़ गये। अपने प्रवासी पति की याद में उसके नयनों से अश्रु रूपी जल प्रवाहित हो रहा है।

बदला रे तू जल भर ल्याओ
पपइया रे पिव की बानी न बोल

अरे बादलों! तुम जल भरकर लाओ और वर्षा करो क्योंकि यह पपीहा पीव-पीव की आवाज करता है, तुम बरसोगे तो इसकी प्यास बुझ जायेगी।

तुमने पैल कही ना मानी, जाहिर भई जग जानी।
हटकी हती भरन न जईयो, ई कुसंग में पानी।
कै लै लेव ननदिया संगे, कै लै लेव जिठानी।
गा-गा गीत धरें गंगाधर, बुलवा लई भवानी।

आखिर तुमने मेरी बात नहीं मानी और उसका परिणाम यह हुआ कि बात सबमें फैल गई। मैंने तुम्हें अकेले पानी भरने जाने से रोका था। क्योंकि जिनके साथ तुम गयी थी वह ठीक नहीं हुआ। मैंने तुमसे यह भी कहा था कि जाओ तो अपनी ननद को या जेठानी को साथ ले जाना। अब घर में कुहराम मचा है।

चिंटी तो बैठी अरे मौवा तरें,
नौ खरिया भुस खाय।
सात-समद कौ अरी पानी पिये,
बातों भूंकई-भूंक चिल्लाय।

एक चींटी बड़ी अनोखी है उसके जैसी दुनिया में कोई न होगी, वह एक महुआ के पेड़ के नीचे बैठी है उसने नौ डला भर भूसा खा लिया। वह सात समुद्रों का पानी पीती है इतना खाने पीने के बाद भी वह भूखी है।

डरिया को पानी बड़ेरी लो जाय
गली गुन्डो की ज्वानी, अखारत जाय।

जिस तरह से पानी का बहाव ऊँचाई से निचाई की ओर होता है। उसी तरह गली कूचों में घूमने वाले छैल-छबीले युवकों के उद्देश्य की पूर्ति कभी नहीं होती।

दौरत आवै अरे नदी बेतवा,
डूबत आवै कछार
आदी नदीं में अरे पानी बहे,
आदि बहे रकत की धार।

बेतवा नदी का पूर बड़े बेग से आ रहा है जिससे उसका कछार जलमग्न हो रहा है। आधी नदी में तो पानी बह रहा है, और आधे में रक्त बहता है। लगता है कि कहीं आगे बड़ा भारी युद्ध हुआ होगा।

दो-दो गगरिया अरे अब जल भरें हो,
हुलकों गुबर की हेल।
नौवा पठै दे अरे अपने मायके के,
गोरी हो गई गौने जोग।

एक युवती अब सयानी हो गई है वह अपने सिर पर दो-दो घड़े रखकर पानी भरती है तथा गोबर को बड़े-बड़े बर्तनों में भरकर आसानी से उठाती है। अब तो नाई के द्वारा इसकी ससुराल में इसके गौने की खबर भेज दो।

पैले पार की नौरंग गोरी,
हरे-हरे गुन्डा रिझाउन खों
पनियां खों जेहों संग लग जैहे,
गगरी के धोके बलम खों फांस दये।

उस पार रहने वाली स्त्री बड़ी रंगीन मिजाज की है। वह आते-जाते युवकों को इशारे करती है। इससे वह जहाँ जाती है। कुछ मनचले युवक उसके साथ लग जाते हैं एक बार वह पानी भरने गई तो घड़े की जगह अपने पति का गला रस्सी में फाँस लिया।

सरग की पटकीं हैं सीता अभागन,
धरनी ने लई हैं झेल
इक बन लागों, दुज वन लांगो,
तिज वन लागी प्यास।
नें इत ताल न पोखरी,
ने इत जमुन जल नीर
तुम बैठो भौजी कदम की छईयां,
हम जल खोजन जांय।
सीतल चली है पवनियां,
सीता खों आ गई है नींद।
उते सें आये वारे देवरा,
दोनों में भर ल्याये नीर।
नीर तो टांगों कदम सें,
लछमन धर लई घरई की गैल।
चलो है झकोरा लुढ़क गव दौना,
सीता पै परी जल बूंद।
सीता उठी अकुलान बिसूरे,
इते मोरो कोऊ ने दिखाय।

सीता माता ने अपने जीवन में बड़े दुःख झेले। उन्हें स्वर्ग से भेजा गया तो धरती माता ने उन्हें गोद में उठा लिया। विवाह होने पर चौदह वर्ष का वनवास, वहाँ से लौटने पर अग्नि परीक्षा और अब श्रीराम द्वारा उन्हें वनवास दे दिया गया। लक्ष्मण सीता जी के रथ में बैठकर वन की तरफ ले जा रहे हैं। कुछ समय चलने के पश्चात सीताजी को प्यास लगी। यहाँ न तो तालाब है, न कुआँ बावड़ी, न ही यमुना का जल है? लक्ष्मण जी बोले कि भाभी आप कदम के तले बैठें, मैं पानी लेकर आता हूँ। ठंडी-ठंडी हवा चल रही थी सीता जी को नींद आ जाती है। इतने में लक्ष्मण जी दोने में जल भरकर लाते हैं। लक्ष्मण जी ने सीता माता को सोता हुआ देखा तो उन्होंने पानी से भरा दोना कदंब की डाली पर टांग दिया और वापिस चले गये। हवा का झौंका आया उसमें जल से भरा दोना गिर जाता है उसके गिरने से कुछ जल की बूँदे सीताजी के ऊपर गिरती हैं। सीताजी व्याकुल होकर उठती है और जब लक्ष्मण न दिखे तो वे व्याकुल हो जाती हैं। वे रोते हुए सोचती है कि इस वियावन जंगल में मैं अकेली हूँ यहाँ मेरा कोई भी नहीं दिखता।

भरी दुपहरी सरबन गइये,
सोरठ गइये आधीरात।
आल्हा पवाड़ा बादिन गईये,
जा दिन झड़ी लगे दिन रात।

दोपहर के समय श्रवण की गाथा गायी जाती है, तथा आधी रात के समय सोरठ गाते हैं, आल्हा और पवाड़ा उस दिन गाना चाहिए जब मूसलाधार पानी गिर रहा हो।

जो पानी को दोष न देई,
सत्य बात परगासे सोई।
निर्मल चित्त न चितवौ बुरो,
पापनि को न लेह आसरो।

इस पानी को दोष मत देना। इस पानी को पीने वाला सदैव सच बोलता है, अगर हमारा मन पवित्र है तो किसी को भी देखना बुरा नहीं होता क्योंकि हमारे मन में कोई पाप नहीं है।

निर्मल दसन नैन, नख योग बलभद्र।
मानों फैन सोहत सुरसरी के नीर के।

चम्पत्ति क परताप तें, पानिय गयो ससाइ।
पौसेरी भरि रहि गयो, नौ सेरी उमराइ।

चम्पतराय के प्रताप से पानी सूख गया। पानी नौ सेर था और अब पाँच सेर रह गया है।

गढ़ औ पुर बीच बहै,
सरिता जल हूं थल जीवन को सुखदाई
श्री नृपसिंघ उदोत के नींद
न तो दरसै सच दुक्ख नसाई।

किले और नगर के मध्य निर्मल जल युक्त नदी बहती है। जल तो स्थलवासियों को जीवन देता है। महाराज उछोतसिंह को नींद नहीं आती उनके मन में कोई बात दुख पहुँचा रही है।

पांचन पंच इन्दियन जुरकै,
धीरज खंभ गढ़ायो।
काम कलस आनंद नीर भर,
चित कौ चौक पुरायो।

पाँच ज्ञानेन्द्रियों के मत से धैर्य रूपी खम्भ गाड़ा गया। काम रूपी कलख में आनंद रूपी जल भरकर मन रूपी चौक पूरा गया।

सोरहु सुगन्ध में विचुपरे फुलेल तैल
गंगा जल झेल सुअंगोछे सुख पाईकै

सोलह तरह की सुगन्धियाँ उनके साथ तैल, फिर गंगा जल में स्नान करवाकर श्रीकृष्ण ने अपने मित्र सुदामा के शरीर को अपने हाथ से पोंछा। यह सब करके त्रिलोकी स्वामी कृष्ण मन में बड़े प्रसन्न हैं, उन्हें सच्चे सुख की प्राप्ति हो रही है।

ब्यारी भई तयार है, यारी कौ ब्यौहार
झारी गंगा जल भरी, आये कंचन थार।
ब्यारी करी बीरा दिये, होत परस्पर हास
राग होन लाग्यो बहुर, ब्रजवासन कौ रास।

रात्रि का भोजन तैयार हुआ, यह भोजन करना तो संबंधी की निशानी है। लोटों में गंगा जल भरवाकर पाहुनों के समक्ष रखे गये, फिर स्वर्ण के थालों में भोजन परोसे गये। खाना खाकर पान दिये गये और फिर हास-परिहास का दौर चलने लगा। उसी समय विविध राग-रागनियाँ बज उठे और ब्रज में रास की शुरूआत हुई।

कविरा जाय समुद्र के भीतर
अपनो बदन छिपावै
देह छाड़ पानी में मिल गये,
ढूंढ़ कहां से ल्यावे।

एक समय कबीर और गोरखनाथ के बीच एक दूसरे को श्रेष्ठ साबित करने की प्रतिस्पर्धा चल रही थी। अंत में कबीर दास जी ने समुद्र में डुबकी लगाई और अपनी योग विद्या से वे पानी में ही विलीन हो गये, अब गोरखनाथ उन्हें कहाँ ढूँढ़े।

काठ कठौता गंगा जल पानी,
हरि के चरन पखारे
चरन धोय चरणामृत लीनो, सकल परवार पियाये।

केवट ने श्रीराम-लक्ष्मण एवं सीता जी के चरण एक काष्ट पात्र में गंगाजल भरकर धोये। उनकी चरण रज को धोकर वह चरणामृत केवट ने सपरिवार पिया।

तेरे तो मरने में प्यारे, कुछ न लगेगी देर।
पानी का बबूला जेमे, भाप लगे मिटहे फेल।

मृत्यु तो किसी भी क्षण आ सकती है, जब अंत समय आ जाता है तो फिर देरी नहीं लगती। तेरा शरीर पानी के बुलबुले जैसा है जो शीघ्र ही पानी में विलीन हो जाता है।

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