जल-चक्र

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जल पृथ्वी पर जीवन के आधार का महत्त्वपूर्ण घटक है। जीवित कोशिका का लगभग तीन चौथाई भाग पानी होता है। मानव के कुल भार का भी लगभग 65 प्रतिशत भाग पानी होता है। जल पृथ्वी के जीवन चक्र व पारिस्थिकी तन्त्र को संचालित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। जल की तीन मुख्य अवस्थाएँ होती है- ठोस (बर्फ), गैस (भाप) व तरल (पानी) जिसमें से केवल पानी ही मनुष्य की समस्त क्रियाओं हेतु महत्त्वपूर्ण संसाधन है। जल विभिन्न अवस्थाओं में वायु मण्डल (एटमोस्फीयर), जल मण्डल (हाइड्रोस्फीयर) व थल मण्डल (लिथोस्फीयर) में पाया जाता है परन्तु पृथ्वी पर मानव के उपयोग हेतु उपलब्ध जल की मात्रा काफी अल्प है। सम्पूर्ण जल का लगभग 97 प्रतिशत भाग समुद्र है जो कि लवणता के कारण उपयोग रहित है। धुव्रीय बर्फ, ग्लेशियर के रूप में 2 प्रतिशत जल उपलब्ध है जबकि पीने योग्य पानी (तालाब, नदियाँ, प्राकृतिक स्रोत) का भाग केवल 0.02 प्रतिशत है।

जल चक्र का चित्रीय वर्णन चित्र - 1 में दिखाया गया है। सूर्य की ऊर्जा से पृथ्वी पर के जल का वाष्पीकरण व पौधों द्वारा वाष्पोत्सर्जन होता है जो कि वायुमण्डल में वायु आद्रता के रूप में पानी के छोटे-छोटे कणों के रूप में जमा होता है। ये कण वायुमण्डल में ठण्डा होने पर बादलों के रूप में परिवर्तित होते हैं और पुनः पानी या बर्फ आदि के रूप में पृथ्वी पर बरस जाते हैं। एक अनुमान के अनुसार कुल बरसात का लगभग 77 प्रतिशत भाग समुद्र में गिरता है जबकि पृथ्वी पर केवल 23 प्रतिशत भाग गिरता है।

पृथ्वी पर हुई कुल बरसात का वितरण निम्न तीन प्रकार से होता है :
1. भूमि द्वारा अवशोषण
2. वाष्पोत्सर्जन व वाष्पीकरण
3. नदी-नालों द्वारा बहाव

हिमालयी क्षेत्र जल चक्र को संचालित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। हर साल जून और सितम्बर के बीच तेज हवायें समुद्र से बादल लाते हैं व इनसे हुई बरसात को मानसून कहते हैं। ये बादल जब भारत के मैदानी क्षेत्रों को पार करके हिमालय के उच्च शिखरों से टकराते हैं तो बरसने लगते हैं। जैसे-जैसे ये बादल पहाड़ों को पार करके आगे बढ़ते हैं, इनका आकार छोटा होता जाता है इसलिए उत्तरांचल के बाहरी ढलानों में भीतरी ढलानों की अपेक्षा अधिक वर्षा होती है।

इस क्षेत्र में कुल वार्षिक वर्षा का दो तिहाई भाग मानसूनी वर्षा के रूप में होती है। जाड़ों की वर्षा उच्च शिखरों में बर्फ के रूप में होती है। हिमालय वर्षा के जल का भण्डारण विभिन्न रूपों में करता है। भूमि द्वारा अवशोषित वर्षा के जल से इस क्षेत्र में लाखों की संख्या में प्राकृतिक जल स्रोत हैं। हिम ग्लेशियरों से अनेक सदाबहार नदियाँ निकलती हैं जो इस क्षेत्र के साथ-साथ मैदानी क्षेत्रों की भी जलापूर्ति करती हैं।

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