कहा नदी ने

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चट्टानों से चूर-चूर होने का नाटक
चट्टानों को बहलाने के लिए नहीं है

पाला पड़ा
जनम लेते ही
चट्टानों से

पानी की चट्टानें भी
चट्टाने ही हैं

फिर आते गिरि-गह्वर, समतल
और विषम भी

आएगी फिर कोख
कंदरा-मग्न कपिल भी
फिर आएँगे सगर-पुत्र
फिर पछताएगी
पूरी वंशावली...और फिर
दुहराएगी वही कथा

फिर?
फिर क्या होगा?

मत पूछो यह
कहा
नदी ने।

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