नदियाँ, भाग-2

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किसी भी दिशा में जाऊँ
कोई न कोई नदी और कभी-कभी तो कई नदियाँ
रास्ते में मिलती थीं

कितनी ही नदियां थीं जिन्हें मैं उनके पानी के रंग से
घाट के पत्थरों से, अगल-बगल के पेड़ों से
और उनके नाम से जानता था
उनके जन्म लेने की और बाद में जीवन की हजारों कहानियाँ थीं

उनके जीवन में भी हमारी ही तरह दुःख थे
पहाड़ों की ओट होकर वे भी कई बार रोती थीं
हो सकता है कि लोगों ने अपना दुःख ही
नदियों की गाथा में गूँथ दिया हो

नदियाँ अकसर रास्तों में मिलती थीं
बोलने-बतियाने को कभी दो पल भी नहीं होते थे
उनके पास आराम के
थोड़ी दूर तक आती थी उनकी आवाज हमारे साथ-साथ
जैसे पीहर लौटी पड़ोस की लड़कियों की आवाजें
जो किसी दिन एकाएक गायब हो जाती हैं
और तब हम जान पाते हैं कि वे अपनी ससुराल लौट गई हैं

किसी दिन अचानक रास्ते में मिलती है कोई नदी कीचड़ से भरी
हमारी गंदगी और अत्याचार के नीचे कराहती
और बमुश्किल साँस लेती घिसटती हुई
और अचानक ही कौंधती है उसकी कोई याद
और याद आती है स्कूल में साथ पढ़ने वाली एक चुलबुली-सी लड़की
और बेसाख्ता मुँह से निकल पड़ता है
कि हाय! यह तो वही नदी!

और एक दिन अपने पैतृक गांव जाते हुए
जब हम गुजर रहे होते हैं रास्ते में आने वाले पुल से
तो हम अचानक पाते हैं कि हम सिर्फ एक पुल से गुजर रहे हैं
और उसके नीचे कोई नदी नहीं है!

अब हमारे तलवों में धरती के नीचे बहती किसी जल-नाड़ी की
सरसराहट नहीं!

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