विवशता

Published on
1 min read

कितना चौड़ा पाट नदी का, कितनी भारी शाम,
कितने खोए-खोए-से हम, कितना तट निष्काम,
कितनी बहकी-बहकी-सी दूरागत-वंशी-टेर
कितनी टूटी-टूटी-सी नभ पर विहगों की फेर,
कितनी सहमी-सहमी-सी क्षिति की सुरमई पिपासा,
कितनी सिमटी-सिमटी-सी जल पर तट-तरु-अभिलाषा,
कितनी चुप-चुप गई रोशनी, छिप-छिप आई रात,
कितनी सिहर-सिहर कर अधरों से फूटी दो बात,
चार नयन मुस्काए, खोए, भीगे, फिर पथराए,
कितनी बड़ी विवशता जीवन की कितनी कह पाए।

लेटेस्ट अपडेट्स के लिए हमारे व्हाट्सऐप चैनल को फॉलो करें

India Water Portal - Hindi
hindi.indiawaterportal.org