अब के बरस सावन में......फिर वृक्षारोपण

Submitted by Hindi on Wed, 08/24/2011 - 08:50
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हस्तक्षेप डॉट कॉम, 3 जुलाई 2011

लखनऊ में लगभग सभी प्रमुख मार्गों के विस्तार और चौड़ीकरण के नाम पर सौ-सौ साल पुराने इमली, पीपल, बरगद, गूलर आदि के हजारों पेड़ों को बेरहमी से काट डाल गया। लखनऊ शहर की जो सड़के किसी जमाने में ‘ठण्डी सड़क’ के नाम से जानी जाती थी आज उन्हीं सड़कों पर गर्मी और तपिश के कारण आम आदमी का चलना दुश्वार हो चुका है।

अब के बरस सावन में…….गीत के बोल रिमझिम फुहार और प्यार की बौछार की बरबस ही याद दिलाते हैं। ऐसा नहीं है कि सावन के महीने की प्रतीक्षा केवल प्रेमी-प्रेमिका ही करते हैं सावन के महीने का बेसब्री से इंतजार देश में वन विभाग और एनजीओ भी करते हैं। मानसून की आहट लगते ही केन्द्र और राज्यों में वन विभाग और पर्यावरण से जुड़ी अनेक संस्थाएं एक साथ सक्रिय हो जाती हैं। सरकारी अमले के अलावा स्वयं सेवी संस्थाएं (एनजीओ) भी सुप्तावस्था से निकलकर ‘ऐक्टिव’ भूमिका में दिखाई देने लगती हैं। असल में मानसून और सावन के आते ही देश भर में वृक्षारोपण का फैशन चरम सीमा पर पहुंच जाता है। मौसम के हिसाब से भी वृक्षारोपण के लिए बरसात का मौसम मुफीद होता है, लेकिन सावन के महीने में देश भर में सरकारी और गैर सरकारी स्तर पर वृक्षारोपण का जो उफान दिखाई देता है, सावन खत्म होने के साथ ही वो सारी सक्रियता ऐसे गायब हो जाती है जैसे गधे के सिर से सींग। समस्या, तकलीफ और नाराजगी इस बात को लेकर नहीं है कि हर साल सावन पर वृक्षारोपण की रस्म अदा की जाती है नाराजगी का कारण यह है कि एक बार पौधा लगाने के बाद उसे देख-रेख और उसको संभालने की जिम्मेदारी उठाता कोई नजर नहीं आता है। ये सच्चाई है कि सावन आते ही देश भर में सरकार और गैर सरकारी संस्थाओं द्वारा देश भर में लाखों वृक्षों को लगाया जाता है लेकिन तस्वीर का काला पक्ष यह है कि अगला सावन तो क्या एक दो महीनों में ही लगभग अस्सी से नब्बे फीसदी तक पौधे मुरझा कर खत्म हो जाते हैं और बेशर्मी का आलम यह है कि पर्यावरण संरक्षण और धरती को हरा-भरा बनाने की कवायद में जुटे चंद तथाकथित नेता, पर्यावरणविद्, सामाजिक कार्यकर्ता और संस्थाएं अगले सावन में पुनः पुरानी जगह पर नया पौधा लगाकर अपनी फोटो खिंचवाते और अखबार में लंबी-चौड़ी खबरें छपवाते हैं।

सरकारी स्तर पर प्रत्येक वर्ष वृक्षारोपण के लिए जितना बजट पास होता है अगर ईमानदारी से उसका दस फीसदी भी जमीन पर लगा दिया जाए तो देश में हरियाली का संकट आने वाले दो-तीन सालों में लगभग खत्म हो जाएगा। लेकिन सावन के महीने में वृक्षारोपण सरकारी रस्म, समारोह और फैशन का हिस्सा बनकर रह गया है जिसमें वृक्ष लगाना तो अपनी सामाजिक जिम्मेदारी और उत्तरदायित्व समझा जाता है लेकिन एक बार वृक्ष लगाने के बाद कोई उसका पुरसाहाल नहीं बनता है। वर्ष 2007 में उत्तर प्रदेश सरकार ने एक ही दिन में प्रदेश भर में 1 करोड़ पौधे लगाकर गिनिज बुक ऑफ रिर्काडस में अपना नाम दर्ज करवाया था, आज लगभग चार सालों के बाद उन एक करोड़ पौधे में से बामुश्किल एक लाख पौधे भी शायद जीवित नहीं होंगे। असलियत यह है कि हमारे देश में पर्यावरण और उससे जुड़ी समस्याओं को न तो सरकार और न ही नागरिक गंभीरता से लेते हैं ऐसे में पर्यावरण संरक्षण और सुधारने के लिए जो भी कवायद की जाती है वो महज ‘पब्लिसिटी स्टंट’ और ‘कागजी कार्रवाई’ तक सिमट जाता है और फिर हर साल सावन आने पर कुकरमुत्ते की भांति सैंकड़ों सामाजिक संस्थाएं और बरसाती मेंढक रूपी सरकारी तंत्र देश की गली-गली में वृक्षारोपण के गीत टर्राने लगते हैं।

ऐसा नहीं है कि वृक्षारोपण रूपी रोग और फैशन से केवल उत्तर प्रदेश ही ग्रसित है। देश के हर छोटे-बड़े राज्य मे वन विभाग हर साल बरसात के मौसम में वृक्षारोपण के लिए भारी-भरकम बजट की व्यवस्था करता है और जिलेवार सभी वन अधिकारियों और कर्मचारियों को वृक्षारोपण का ‘टारगेट’ दिया जाता है। असली खेल यहीं से शुरू हो जाता है। पौधा खरीदने से लेकर वृक्ष रोपने और ट्री-गार्ड लगाने तक सरकारी मशीनरी लाखों-करोड़ों का वारा-न्यारा कर चुकी होती है। हड्डी पर बचा-खुचा मांस एनजीओ और पर्यावरण को समर्पित संस्थाएं नोंच लेती हैं। वृक्षारोपण के खेल में सरकारी तंत्र और एनजीओ मिलकर एक साथ दूध-मलाई का मजा लूटते हैं। वृक्ष, हरी-भरी धरती, वन क्षेत्र का विस्तार एवं फैलाव, पृथ्वी बचाने की जितनी कवायद और कार्यवाही सरकारी फाइलों में हर दिन की जाती है अगर ईमानदारी से उसका दसवां हिस्सा भी सही स्थान पर लग जाए तो देश में पर्यावरण संरक्षण की दिशा में बड़ी कामयाबी हमें मिल सकती है। सरकारी और गैर सरकारी स्तर पर वृक्षारोपण के पीछे जो काली कमाई की कहानी है उसमें बड़े-बड़े सफेदपोश शामिल हैं। हरियाणा राज्य में महात्मा गांधी राष्ट्रीय रोजगार गारंटी योजना के तहत वन विभाग द्वारा करोड़ों के बजट से वृक्षारोपण पिछले दो-तीन सालों में करवाया गया था लेकिन जब एक ईमानदार वन अधिकारी संजीव चतुर्वेदी ने वन विभाग की पोल पट्टी और काले कारनामों को कच्चा-चिट्ठा खोलना शुरू किया तो वन मंत्री से लेकर विभाग के आला अधिकारी तक इस युवा, ईमानदार भारतीय वन सेवा के अधिकारी के पीछे हाथ धोकर पड़ गए। पांच साल की नौकरी में नौ बार तबादला और अन्ततः निलबंन की मार संजीव को झेलनी पड़ी। हरियाणा की भांति देश के हर राज्य में वृक्षारोपण के नाम पर जो मोटी काली कमाई का खेल जारी है, वो किसी से छिपा नहीं है लेकिन संजीव जैसी हिम्मत कितनों में है।

हर साल की भांति इस मानसून सीजन में भी देश के कोने-कोने में करोड़ों पौधे रोपे जाएंगे लेकिन अगर सावन बीत जाने के बाद अगर तथाकथित जिम्मेदार संस्थाओं और सरकारी मशीनरी से जिंदा पौधों का हिसाब मांगा जाए तो ऐसे-ऐसे बहाने बनाए जाएंगे कि आप चौंक जाएंगे। हमारे यहां समस्या सिस्टम की है कहने को तो चाहे कोई कितनी लंबी चौड़ी बातें करें, दावें ठोंके या बयानबाजी करे लेकिन जब जिम्मेदारी लेने का समय आता है तो स्वयं को जिम्मेदार बताने वाले दूसरों के कंधों पर जिम्मेदारी का टोकरा डालने की कोशिश करते नजर आते हैं। वृक्षारोपण और धरती को हरा-भरा बनाने के पीछे चंद ईमानदार और निःस्वार्थी प्रयासों की बदौलत ही बचे-खुचे पौधे आपको धरती पर दिखाई दे रहे हैं। जहां तक वन क्षेत्र के विस्तार की है तो वहां वृक्षारोपण फेल समझा जाता है। कुदरत ने वनों के विस्तार का अपना ही सिस्टम बना रखा है। जीव-जंतु, वनों में विचरने वाले प्राणी, पशु-पक्षी, बरसात और वन का अंदरूनी तंत्र स्वयं वनों का विस्तार करता रहता है। अगर कोई सरकार या संस्था ये दावा करती है कि उसने वनों को बनाया और लगाया है तो वो सरासर झूठ बोलती है। हां थोड़े बहुत क्षेत्र को वन क्षेत्र के रूप में मानव प्रयासों से विकसित किया जाता है लेकिन भारत और दुनिया के जितने भी छोटे-बड़े और घने जंगल हैं उन्हें स्वयं कुदरत ने ही सजाया और संवारा है। हर साल जो वृक्षारोपण शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में किया जाता है वो असल में अव्यवहारिक और राजनीति का शिकार नजर आता है।
 

आज जरूरत इस बात कि है की हम सच्चे मन और कर्म से लाखों-करोड़ों पौधे के स्थान पर एक ही पौधा लगाएं और उसकी तब तक देखभाल करे जब तक वो अपनी जड़ों पर स्वयं खड़ा न हो जाए क्योंकि अपने और अपनी संतानों के लिए धरती को हरा भरा बनाना हमारी जिम्मेदारी से बढ़कर मजबूरी बनती जा रही है।

देश के महानगरों और नगरों में सड़कें चौड़ी करने के नाम पर हर साल लाखों अति विकसित, विशाल वृक्षों की बलि ले ली जाती है। पिछले एक दशक में विकास के नाम पर करोड़ों वृक्ष देश भर में काटे गये हैं। उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में लगभग सभी प्रमुख मार्गों के विस्तार और चौड़ीकरण के नाम पर सौ-सौ साल पुराने इमली, पीपल, बरगद, गूलर आदि के हजारों पेड़ों को बेरहमी से काट डाल गया। लखनऊ शहर की जो सड़के किसी जमाने में ‘ठण्डी सड़क’ के नाम से जानी जाती थी आज उन्हीं सड़कों पर गर्मी और तपिश के कारण आम आदमी का चलना दुश्वार हो चुका है। पिछले साल दिल्ली में कॉमनवेल्थ गेम्स की तैयारी के नाम पर जो वृक्षों की बेरहम कटाई की गई है उससे किसी भी संवेदनशील व्यक्ति के आंसू निकल जाएं। लखनऊ और दिल्ली की तर्ज पर देश के हर छोटे-बड़े कस्बे से लेकर महानगर तक विकास का पहला ठीकरा पर्यावरण पर ही फूटता है। देश में अनियोजित विकास की जो रूपरेखा बड़ी तेजी से खींची जा रही है उसने पर्यावरण के हालात असामान्य बना दिये हैं। लखनऊ, दिल्ली, मुम्बई, मद्रास, बंगलुरू, कोलकाता, चंडीगढ़, पटना, रांची में स्लम ऐरिया बढ़ता जा रहा है। अनियंत्रित आबादी और शहरीकरण का बढ़ता विस्तार देश के पर्यावरण के लिए अत्यधिक जहरीले तत्व साबित हो रहे हैं। किसी जमाने में शहरों में इक्का-दुक्का घरों में फलदार और सजावटी पौधे दिखाई देते थे लेकिन परिवर्तन की लहर और शहरी समाज की मजबूरियों के चलते घरों से वृक्ष लगभग गायब हो चुके हैं। सरकार के पास कागजों में हरित पट्टी (ग्रीन बेल्ट) बनाने, लगाने और विकसित करने के प्रावधान तो हैं लेकिन योजना को मूर्त रूप कैसे दिया जाएगा इसकी जानकारी और नीयत किसी के पास नहीं है।

आजादी के समय भारत में 32 करोड़ 90 लाख हेक्टेयर भाग में से 7 करोड़ 50 लाख हेक्टेयर क्षेत्र वनों से ढका हुआ था। असंतुलित औद्योगीकरण, शहरीकरण और अंसतुलित जनसंख्या वृद्धि से वनों की अंधाधुंध कटाई हुई और अब 22 प्रतिशत के स्थान पर केवल 10 प्रतिशत भू-प्रदेश ही वनों से ढंका हुआ है। वनों का महत्व, हमारे जीवन में विभिन्न प्रकार से आंका जा सकता है। जहां एक ओर पर्यावरण संतुलन बना रहता है,, वहीं दूसरी ओर वनवासियों की अनेक आवश्यकताएं वनों से ही पूरी होती हैं। हमारी समूची संस्कृति व हिन्दू धर्म वृक्ष पूजन से जुड़ी हुई है। देहरादून स्थित फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इण्डिया रिपोर्ट 2003 के अनुसार देश में कुल 7,78,229 वर्ग किमी वन एवं वृक्ष आच्छादित क्षेत्र में वन क्षेत्र 6,78,333 वर्ग किमी (कुल भौगोलिक क्षेत्र का 20.64 प्रतिशत) है। वृक्षों की घटती संख्या से वायुमण्डल में कार्बन डाइऑक्साइड और आक्सीजन गैस का अनुपात बुरी तरह प्रभावित हुआ है। पर्यावरण में असंतुलन का ही नतीजा है कि पिछले कुछ वर्षों में औसत तापमान में वृद्धि, सूखा, बाढ़, ऋतु-परिवर्तन जैसी अनेक समस्याएँ जन्म ले रही हैं। ज्ञातव्य है कि कार्बन डाइऑक्साइड गैस सूर्य की पराबैगनी किरणों को भी वापस जाने से रोकती है। वायुमण्डल में पराबैगनी किरणों की अधिकता के परिणामस्वरूप ही आँखों एवं श्वास संबंधी रोग फैलते जा रहे हैं।

एक सर्वेक्षण के अनुसार ही प्रतिवर्ष 4 लाख मिलियन टन कार्बन डाइऑक्साइड पर्यावरण में केवल मानवीय गतिविधियों के कारण बढ़ जाती है। पर्यावरणविदों का कहना है कि यदि वृक्षों की पर्याप्त संख्या बनी रहती है तो कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा इतनी न बढ़ती क्योंकि वृक्ष इस गैस को अपने भोजन के रूप में प्रयोग करते है। भुवनेश्वर स्थित भौतिकी संस्थान के वैज्ञानिक एस. अफसर अब्बास के अनुसार हरियाली तथा जलवायु को संतुलित रखने में अहम् भूमिका निभाते हैं। यदि वनों का अधिकाधिक प्रसार हो जाए तो भीषण गर्मी एवं कड़ाके की ठंड से छुटकारा पाया जा सकता है। मौसम विशेषज्ञों का मानना है कि पर्यावरण में संतुलन के लिए वृक्षों का एक निश्चित अनुपात में होना अति आवश्यक है। किन्तु उपग्रह से प्राप्त चित्र के अनुसार 33 प्रतिशत वन सम्पदा के स्थान पर 16 प्रतिशत वन ही शेष हैं। स्थिति इस कदर गम्भीर हो चुकी है कि प्रति व्यक्ति 0.5 हेक्टेयर जंगल के स्थान पर 0.08 हेक्टेयर इस संबंध में पर्यावरण कार्यकर्ता मेधा पाटकर का कहना है कि अगर पर्यावरण में असंतुलन शीघ्र समाप्त न हुआ तो वह दिन दूर नहीं जब नदियाँ सूख जायेंगी, बाढ़ एवं सूखा जैसी प्राकृतिक आपदाएँ हमारी रोजमर्रा जिन्दगी में शामिल हो जायेंगी। इतना ही नहीं ‘इंटरनेशनल कमीशन फॉर स्नो एण्ड आइस’ एवं ‘वेदर एण्ड वर्ल्ड’ की रिपोर्ट में पर्यावरण विशेषज्ञों ने बताया है कि वृक्षों का कटान इसी प्रकार जारी रहा तो कोई आश्चर्य की बात नहीं जब हिमालय में बर्फ से ढके पहाड़ों के स्थान पर हवा के गर्म थपेड़ों के कारण वहाँ खड़ा होना भी मुश्किल होगा। जबकि शिमला, नैनीताल, मसूरी, कुल्लू-मनाली आदि हिल स्टेशनों में भयंकर गर्मी के कारण कोई जाना पसंद नही करेगा। राजस्थान में जहाँ रेत के ऊँचें टीले हैं। वहाँ दूर-दूर तक पानी ही नजर आयेगा। विश्व का सर्वाधिक वर्षा वाला इलाका चेरापूंजी भयंकर सूखे से ग्रस्त नजर आएगा।

पुराने जमाने में पेड़-पौधे लोगों की जिंदगी का एक अहम हिस्सा थे। जनसाधारण ईश्वर द्वारा दी गई इस अनमोल विरासत को सहेज कर रखने में ही विश्वास रखते थे। अनेक सामाजिक एवं धार्मिक कार्यों में वृक्षों की उपस्थिति अनिवार्य मानी जाती थी। घरों में तुलसी एवं पीपल का पौधा लगाना वृक्षों की उपयोगिता का प्रमाण था। विवाह मंडप को केले के पत्तों से सजाना, नवजात शिशु के जन्म पर घर के मुख्य द्वार पर नीम की टहनियाँ लगाना, हवन में आम की लकड़ियों का प्रयोग आदि ढेरों ऐसे उदाहरण है जिनसे तत्कालीन समाज में वृक्षों की उपयोगिता का बखूबी पता चलता है। किन्तु आज स्थिति इसके ठीक विपरीत है। घरों में वृक्ष लगाने का चलन लगभग दम तोड़ चुका है और सरकार एवं एनजीओ द्वारा हर साल सावन के मौसम में वृक्षारोपण की जो खानापूर्ति और भ्रष्टाचार का खुला खेल होता है वो लगातार पर्यावरण की सेहत को बिगाड़ रहा है। आज जरूरत इस बात कि है की हम सच्चे मन और कर्म से लाखों-करोड़ों पौधे के स्थान पर एक ही पौधा लगाएं और उसकी तब तक देखभाल करे जब तक वो अपनी जड़ों पर स्वयं खड़ा न हो जाए क्योंकि अपने और अपनी संतानों के लिए धरती को हरा भरा बनाना हमारी जिम्मेदारी से बढ़कर मजबूरी बनती जा रही है।

डॉ. आशीष वशिष्ठडॉ. आशीष वशिष्ठलेखक लखनऊ स्थित स्वतंत्र पत्रकार हैं
 

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