आब की आबरू अब आपके हाथ

Submitted by Hindi on Tue, 08/23/2011 - 11:06
Source
देशबंधु, 1 जुलाई 2011

चुनौती गंभीर है सबको इस आंदोलन से जुड़ना होगा। आज आब की आबरु खतरे में है वह अपने वजूद की भी रक्षा के लिये कितना बेताब है यह नदियों के सूखते होंठ, कुंओं के पपड़ाते कंठ और तालाबों की गिरती सेहत बयां कर रही है। आइये आब को बचायें।

आबोहवा जीवन के लिये जरूरी है। संतोष का विषय है कि हवा बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की गिरफ्त में अभी नहीं आई है। किन्तु आब पर बढ़ता दबाब खतरे के संकेत दे रहा है। आब यानि पानी आम आदमी के जीवन की जंग से जुड़ा है। प्याऊ की जगह पानी के पाउच की खरीददारी शुरू कर दी है। गर्मी के आते ही पानी के ठेकेदार खुश हो जाते है। पाउच, बॉटल से लेकर टेंकर तक पानी का बिकना आज आम बात हो गई है। पानी के बाजारीकरण ने हमारी संस्कृति पर हमला बोल दिया है। जिस देश में प्याऊ कुंए बावड़िया और तालाब पुण्य पाने के लिए बनते हो, बैसाख माह में चिड़ियों को पानी रखा जाता हो, आंगतुक को बिना परिचय के पानी के लिये पूछा जाता हो। वहां के नागरिक पैसा न होने पर आज प्यासे रहने के लिए मजबूर हैं। पानी खुद ब खुद इस हाल पर पानी-पानी हो रहा है। देश की पिछली स्थितियों पर प्रकाश डालें तो पाते हैं कि इस तरह अकाल कभी नहीं रहा। यह मानते हैं कि तब जनसंख्या कम थी जिसमें से ज्यादा आबादी नदी के किनारे निवास करती थी, शेष आबादी के जीवनाधार तालाब या कुएं थे जिनमें बूंद-बूंद का संग्रह कर लिया जाता था, तथा वर्ष भर सब मिलकर उसका उपयोग करते थे। उदाहरण के लिये तलघर राजस्थान, मणिपुर की लोक तक झील, आंध्र का हुसैन सागर, भोपाल का ताल हो, सागर का ताल आदि। संपूर्ण देश में जल के प्रमुख आधार ताल थे।

सन् 1800 में देश में लगभग 39000 तालाब थे। बाद के वर्षों में जन-जन के इस काम को सरकार ने जब अपने हाथों में लिया तब से सहयोग की भावना और अपने क्षेत्र के संसाधनों से प्रेम गायब हो गया। वजह साफ थी, अब इस कार्य में मजदूरी मिलने लगी और भ्रष्टाचार शामिल हो गया जो ज्यादा लुभावना था। आम जन अब पीछे हट गये, तंत्र हावी हो गया। उसने न केवल ग्रामीणों का हक छीना बल्कि गांव की संस्कृति से भाईचारा गायब कर तनाव बढ़ाया। पानी पर बलशाली संपन्न लोगों का कब्जा शुरू हो गया। गाँवों के तालाबों की सफाई एवं निर्माण कार्य की सरकारी राशि में बंदरबांट शुरू हुई। दूसरी ओर मां की तरह पूजी जाने वाली नदियां बेची जाने लगीं, तो कहीं उसे कैद कर लिया गया। जिससे निचले हिस्से के लोग जल के लिये तरसने लगे। उदाहरण के लिये छत्तीसगढ़ की शिवनाथ नदी पर एक पूंजीपति का अधिपत्य है। टिहरी गांव को विस्थापित कर भागीरथी कैद कर ली गई। हरसूद गांव नर्मदा को बलि चढ़ गया। भोपाल की कलिया स्रोत आज जहर उगल रही है।

गंगा यमुना की सफाई का क्या प्रतिफल मिला सामने है? दामोदर महानदी की गंदगी के तो कहने ही क्या? फरक्का ने कितने गांव लील लिये? सरदार सरोवर और इंदिरा सागर परियोजना क्या गुल खिला रही है ये मेधा पाटकर से जानिये। बंगाल की नदी त्रासदी जलमित्र जया मित्र की जुबानी जानिये। नदी की पीड़ा को इन दो नेत्रियों ने ही समझा है। गौर कीजिये, नदी घाटी में दुनिया की तमाम सभ्यतायें विकसित हुई हैं तब क्यों आज नदी को बड़े शहरों की ओर उलटा जाने के लिये मजबूर किया जा रहा है? आज पानी रोकने बनने वाले बड़े बांधों का दुनिया भर में विरोध हो रहा है। बड़े बांधों से होने वाली त्रासदी भूकंप का वीभत्स रूप ले सकती है। प्रकृति से ज्यादा छेड़छाड़ नुकसानदेह है क्योंकि धरती के ऊपर जल का दबाव कितना हो? यह धरती ही जानती है कि भू-गर्भ के बारे में हमारी जानकारी शून्य है।

हमारे देश में वर्षा से तकरीबन 22 हजार अरब घनमीटर पानी मिलता है। इतना ही पानी हिमपात और ग्लेशियरों के पिघलने से प्राप्त होता है जिसमें 700 अरब घन मीटर पानी का ही इस्तेमाल हो पाता है। शेष समुद्र को लौट जाता है। यही कारण है कि गर्मी के आते ही हर गांव, मुहल्ले में लड़ाई शुरू हो जाती है। हाल में ही झारखण्ड में पानी के लिये तलवारें चलने की खबर है। सतलज यमुना से लेकर पंजाब, हरियाणा, उ.प्र., दिल्ली में तनाव है तो कावेरी जल को लेकर कर्नाटक - तमिलनाडु के बीच उलझन है। सिंधु के पानी पर पड़ोसी पाकिस्तान की आंख लगी है तो बंगलादेश गंगा के पानी पर आपत्ति जता रहा हैं। चीन ब्रह्मपुत्र के पानी को रोक रहा है। इसलिये बुतरस घाली कहते हैं कि तीसरा विश्वयुद्ध तेल के लिये नहीं पानी के लिये होगा।

इसकी वजह गांधी मार्ग के संपादक राजीव वोरा मानते हैं कि भूमंडलीयकरण, बाजार के दबाव और सुविधा के नाम पर हम अपने लोकाचारों को भूलते जा रहे हैं जो पर्यावरण के प्रति समाज के भावनात्मक लगाव को बतलाते हैं। याद कीजिये सन् 1900 में जब नल जल संस्कृति का अंग्रजों के द्वारा बीजारोपण दिल्ली में हो रहा था तब दिल्ली की महिलाओं ने वैवाहिक कार्यक्रम के दौरान गाई जाने वाली गारियों में ''फिरंगी नल मत लगवाय दियो'' गाकर अपना विरोध दर्ज कराया था क्योंकि कुएं, ताल उनके धार्मिक, पारिवारिक आयोजनों से जुड़े थे। आज इसी भावनात्मक लगाव की जरूरत है हर गांव में तालाब बने, तालाबों की सफाई हो। बंगाल, केरल की तरह घरों के आसपास जहां जगह हो, पोखर बनें। खेतों पर मेड़ें हों। कोहिमा नागालैंड की राजधानी के नागरिकों से जल संचय सीखा जा सकता है। यहां वर्षा जल की एक-एक बूंद एकत्रित कर उपयोग करते हैं तथा पहाड़ों पर बहते जल को सीढ़ीदार खेतों में रोकते हैं। भू जल स्तर को सुरक्षित रखने ट्यूबवेल से कृषि सिंचाई की अनुमति नहीं देनी चाहिये क्योंकि इन्हीं से भू-जल को सर्वाधिक नुकसान पहुँचाता है। इस दिशा में सरकारी प्रयास चाहे वह जल रोको अभियान हों, जलाभिषेक अभियान या जल दिवस हो, पर्याप्त नहीं है। चुनौती गंभीर है सबको इस आंदोलन से जुड़ना होगा। आज आब की आबरु खतरे में है वह अपने वजूद की भी रक्षा के लिये कितना बेताब है यह नदियों के सूखते होंठ, कुंओं के पपड़ाते कंठ और तालाबों की गिरती सेहत बयां कर रही है। आइये आब को बचायें।
 

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