अच्छे भले स्टापडेम को सुधारने पर लाखों का चूना

Submitted by RuralWater on Tue, 10/13/2015 - 16:12

. अच्छे–भले स्टापडेम की मरम्मत करने के नाम पर नगर पंचायत से करीब दो लाख रुपए के टेंडर निकाले जाने का सनसनीखेज मामला सामने आया है। यहाँ नगर के पास से ही होकर गुजर रही एक नदी पर बने स्टापडेम की मरम्मत किये जाने के लिये चुपचाप प्रस्ताव भी पास हो गया और विज्ञप्ति भी जारी हो गई।

इतना ही नहीं मात्र दो घंटों में ही चस्पा की गई विज्ञप्ति हटाकर इसके लिये एक लाख 98 हजार रुपए का टेंडर भी एक फर्म को जारी कर दिया गया। इसी दौरान इसकी भनक नगर के ही कुछ लोगों को पड़ गई तो उन्होंने इस पूरे प्रकरण की शिकायत वरिष्ठ अधिकारियों को भेजी है।

शिकायत के बाद अब अधिकारी फिलहाल जाँच की बात कह रहे हैं लेकिन इस वाकिये से एक बात साफ़ है कि पानी के नाम पर कुछ जनप्रतिनिधि जमकर चाँदी काट रहे हैं। एक तरफ सरकार पानी के लिये बड़ा बजट दे रही है और सार्वजनिक तौर पर भी नगरीय निकायों में इसके लिये भारी–भरकम बजट होता है। लेकिन इससे लोगों को पानी ही नहीं मिल पाता है और ज्यादातर इसके दुरुपयोग की ही खबरें मिलती रहती हैं।

यह मामला मध्य प्रदेश के देवास जिले के करनावद नगर पंचायत का है। यहाँ के एक नागरिक कन्हैयालाल पाटीदार ने बकायदा मुख्यमंत्री सहित वरिष्ठ अधिकारियों को प्रमाण सौंपते हुए शिकायत दर्ज कराई है कि करनावद नगर पंचायत में अध्यक्ष और कुछ अधिकारी मिलकर पानी के नाम पर लाखों रुपए की एक फर्जी योजना को अंजाम दे रहे हैं।

उन्होंने बताया कि इन्दौर–बैतूल राष्ट्रीय राजमार्ग पर इन्दौर से करीब 45 किमी दूर करनावद करीब 50 हजार की आबादी का नगर है। यह नगर सैन्धला नदी के तट पर बसा है और पहले से ही पीने तथा अन्य उपयोग के लिये नदी के पानी पर ही निर्भर रहता आया है। सैन्धला नदी कुछ सालों पहले तक पूरे साल पानी की आपूर्ति करती रहती थी लेकिन बीते करीब 15–20 सालों से बारिश कम होने से यह नदी सर्दियों के दिनों तक तो साथ देती है पर गर्मियों की दस्तक आते–आते सूखने लगती है।

इसलिये करीब 10 साल पहले तत्कालीन राज्यसभा सदस्य कैलाश जोशी की सांसद निधि से नगर के पास ही एक स्टापडेम बनाकर पानी को रोकना शुरू कर दिया। यह तकनीक बहुत कारगर साबित हुई और इसमें लम्बे समय तक पानी टिकने भी लगा। इसी के साथ नगर और उसके आसपास के जल स्रोतों में भी पानी का स्तर अच्छा बनने लगा।

खेती की जमीनों को भी इसका लाभ मिला। लोगों को निस्तारी काम के लिये पानी भी सहज हो सका। इसकी सफलता से खुश होकर नगर के दूसरे सिरे पर भी करीब 1 किमी दूर स्टापडेम बनाने की माँग उठने लगी। यह बात करीब 2004 की बताई जाती है।

नगर पंचायत के पास उस समय इसके लिये बजट नहीं था तो लोग खुद आगे आये और उन्होंने अपने आर्थिक सहयोग और श्रमदान से उसी तरह का एक और स्टापडेम बनाया और इससे भी पानी थमने लगा। लोगों को इनका फायदा मिलने लगा।

इसी बीच बीते महीने स्थानीय नगर पंचायत करनावद की अध्यक्ष कांताबाई तथा मुख्य नगरपालिका अधिकारी ने मिली-भगत करके जनसहयोग से निर्मित स्टापडेम को जीर्ण–शीर्ण बताकर उसकी मरम्मत करने के नाम पर विज्ञप्ति निकाले जाने सम्बन्धी प्रस्ताव पारित कर लिया और दिनांक 08 सितम्बर को इस आशय की विज्ञप्ति जारी भी कर दी।

एक लाख 98 हजार रुपए में इसका ठेका भी कर दिया गया। नियमों के अनुसार इसे आम करने के लिये सात दिनों तक नगर पंचायत के पटल पर सार्वजनिक किया जाता है। लेकिन यहाँ सिर्फ दो घंटे के लिये ही विज्ञप्ति दीवार पर चस्पा कर हटा दी गई ताकि लोगों को इसका पता तक नहीं चल सके।

फिर भी यहाँ–वहाँ से लोगों को किसी तरह इसकी भनक लग गई और नगर के ही एक नागरिक कन्हैयालाल पाटीदार ने इसकी शिकायत की।

शिकायत के बाद अधिकारी जाँच कराने की बात कह रहे हैं लेकिन बड़ा सवाल यही है कि कब तक कुछ जनप्रतिनिधि और अफ़सर मिलकर इस तरह नए–नए रास्ते खोजकर सरकार और समाज की गाढ़ी कमाई का पैसा बर्बाद करते रहेंगे। यह मामला तो सामने आ गया पर कई ऐसे मामले अब भी यहाँ–वहाँ दबे–छुपे चल रहे होंगे, जो अब तक किसी तरह उजागर नहीं हो पाये हैं।

करनावद के ही रहने वाले लालसिंह नायक बताते हैं कि यह नगर सैन्धला नदी के तट पर बसा एक पुरातन नगर है, यहाँ महाभारतकालीन सभ्यता के कई पुरावशेष मिल चुके हैं। सोच भी नहीं सकते कि यहाँ लोगों के चुने हुए जनप्रतिनिधि ही पानी के नाम पर इस तरह की धोखाधड़ी यहाँ के लोगों से ही करेंगे।

सैन्धला नदी में फिलहाल दोनों ही स्टापडेम अच्छी हालत में हैं और हर साल पर्याप्त पानी रोकते हैं। इन दोनों में से किसी को भी कोई मरम्मत की जरूरत नहीं है। यह तो सिर्फ पैसा खाने के लिये ही किया जा रहा है।

यहीं के रहवासी मोईन मंसूरी भी कहते हैं कि पूरा नगर गवाह है कि स्टापडेम में कोई काम नहीं कराना है तो फिर ऐसी विज्ञप्ति निकालने और ठेका देने का क्या औचित्य है।

यह बात हमारे समझ से परे है। हमें तो यही लगता है कि ये सब लोगों को सरेआम बुद्धू बनाकर पैसा ऐंठने के तरीके हैं। इस बार नगर पंचायत चुनाव से पहले नगर में भ्रष्टाचार एक बड़ा मुद्दा बनकर उभरा था और कांताबाई साफ़-सुथरी भ्रष्टाचारविहीन नगर पंचायत के वादे पर ही चुनकर आई थी और अब चुने जाने के बाद यह सब...

युवा व्यवसायी राजेश गोयल बताते हैं कि इलाके में पानी के नाम पर भ्रष्टाचार का यह कोई पहला मामला नहीं है, इससे पहले भी इसी तरह के कई मामले आसपास से सुनने को मिलते रहे हैं। जल संकट के दिनों में तो यह आम बात है।

अधिकांश नगरीय निकायों और ग्राम पंचायतों में भी पानी परिवहन के नाम पर सरकार से जो लाखों रुपए आते हैं, उससे लोगों को पानी पिलाने की जगह इस पैसे की जमकर बन्दरबाँट होती है। एक टैंकर के ही कई–कई फेरे बताकर लाखों का गोलमाल किया जाता है और यही पैसा बाद में चुनावों के समय पानी की तरह बहाया जाता है। घनश्याम बोस भी इन्हीं बातों को दोहराते हुए जोड़ते हैं कि पानी के लिये पहले के लोग तरह–तरह के दान-पुण्य करते थे।

कोई प्याऊ लगवाता था तो कोई तालाब बनवाता था तो कोई कुँआ लेकिन शर्म इस बात की है कि विकास का दावा करने वाले हमारे जनप्रतिनिधि ही चन्द रुपयों के लालच में पानी के नाम पर ही पैसा कमाने में जुटे हैं।

यहाँ के कर्णेश्वर मन्दिर से हमारी नजर सैन्धला नदी के उस विहंगम दृश्य को देख पा रही हैं, जहाँ से दोनों ही स्टापडेम नदी के बीचोंबीच सीना ताने खड़े पानी रोकने के काम में जुटे हैं। इस बात से बेखबर कि उनके नाम पर इधर क्या–क्या हो रहा है।
 

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