आधुनिक मनोविश्लेषण मनोविज्ञान

Submitted by Hindi on Thu, 07/28/2011 - 12:05
आधुनिक मनोविश्लेषण मनोविज्ञान अपराध को मनुष्य की मानसिक उलझनों का परिणाम मानता है। जिस व्यक्ति का बाल्यकाल प्रेम ओर प्रोत्साहन के वातावरण में नहीं बीतता उसके मन में उनेक प्रकार की हीनता की मानसिक ग्रंथियाँ बन जाती हैं। इन ग्रंथियों में उसकी मन में उसकी बहुत सी मानसिक शक्ति संचित रहती है। डा. अलफ्रेड एडलर का कथन है कि जिस व्यक्ति के मन में हीनता की मानसिक ग्रंथियाँ रहती हैं वह अनिवार्य रूप से अनेक प्रकार के अपराध करता है। यह अपराध वह इसलिए करता है कि स्वयं को वह दूसरे लोगों से अधिक बलवान सिद्ध कर सके। हीनता की ग्रंथि तिस व्यक्ति मे मन में रहती हे वह सदा भीतरी मानसिक असंतोष की स्थिति में रहता है। वह सब समय ऐसे कामों मे अपने को लगाए रहता है जिससे सभी लोग उसकी ओर देखें और उसकी प्रशंसा करे। हीनता की मानसिक ग्रंथि मनुष्य को ऐसे कामों में लगाती है जिनके करने से मनुष्य को अनेक प्रकार की निंदा सूननी पड़ती है। ऐस व्यक्ति स्वयं को सदा चर्चा का विषय बनाए रखना चाहता है। यदि उसके भले कामों के लिए चर्चा नहीं हुई तो बुरे कामों के लिए ही हो। उसकी मानसिक ग्रंथि उसे शांत मन नहीं रहने देती । वह उसे सदा विशेष काम करने के लिए प्रेरणा देती रहती है। यदि ऐसे व्यक्ति को दंड किया जाए तो इससे उसका सुधार नहीं होता, अपितु इससे उसकी मानसिक ग्रंथि और भी जटिल हो जाती है। ऐसे अपराधी के उपचार के लिए मानसिक चिकित्सक की आवश्यकता होती है।

आधुनिक मनोविज्ञान ने हमें बताया है कि समाज में अपराध को कम करने के लिए दंडविधान को कड़ा करना पर्याप्त नहीं है। इसके लिए समाज में सुशिक्षा की आवश्यकता होती है। जब मनुष्य की कोई प्रवृति बचपन से ही प्रबल हो जाती है तो आगे चलकार वह विशेष प्रकार के कार्यो मे प्रकाशित होती है। ये कार्य समाज के लिए हितकर होते हें अथवा समाजविरोधी होते है। समाजविरोधी कार्य ही हमें व्यक्ति के प्रति उचित दृष्टिकोण रखना होगा । जिस बालक को बड़े लाड़ प्यार से रखा जाता है और उसे सभी प्रकार के कामों को करने के लिए छूट दे दी जाती है, उसमें दूसरों के सुख के लिए अपने सुख को त्यागने की क्षमता की नहीं आती। ऐस व्यक्ति की सामाजिक भावनाएँ अविकसित रह जाती है। जीवन सुस्वत्व का निर्माण नहीं होता । इसके कारण वह न तो समाजिक दृष्टि से भले बुरे का विचार कर सकता है ओर न बुरे कामों से स्वयं को रोकने की क्षमता प्राप्त कर पाता है । बालक के माता-पिता और आसपास का वातावारण तथा पाठशालाएँ इसमें महत्व का काम करती हैं। उचित शिक्षा का एक उद्देश्य यही है कि बालक अपने ऊपर संयम की क्षमता आ जाए। जिस व्यक्ति में आत्मनियंत्रण की स्थिति जितनी अधिक रहती है वह अपराध उतना ही कम करता है।

समाज में बहुत से लोग अपने विवेक से प्रतिकूल अपराध करते हैं। इसका कारण क्या है? आधुनिक मनोविज्ञान की खोजों के अनुसार ऐसे लोगों का बाल्यकाल ठीक से व्यतीत नहीं हुआ होता। ये लोग बुद्धि में तो जन्म से ही प्रवीण थे अतएव ये अनेक प्रकार के विचारों को जान सके। परंतु उनके मन में बचपन में ही ऐसे स्थायी भाव नहीं बने जिससे वे स्वयं को अनुचित कार्य करने से रोक सकें। ये स्थायी भाव जब तक मनुष्य के स्वभाव के अंग नहीं बन जाते तब तक वे मनुष्य को दुराचार से रोकने की क्षमता नहीं देते। ऐसे विद्वान्‌ लोग अपराध करते हैं और उनके लिए स्वयं को कोसते भी हैं। इससे वे अपनी मानसिक उलझनें बढ़ा लेते हैं। कभी कभी वे अपने अनुचित कार्यों की नैतिकता सिद्ध करने में अपनी विद्वता का उपयोग कर डालते हैं। इनका सुधार सामान्य दंडविधान से नहीं हो पाता। वे इनसे बचने के अनेक उपाय रच लेते हैं। ऐसे लोगों को सुधारने के लिए आवश्यक है कि शिक्षा का ध्येय आजीविका कमाना अथवा व्यवहारकुशलता प्राप्त कर लेना न होकर मानव व्यक्तित्व का संपूर्ण विकास अर्थात्‌ बौद्धिक और भावात्मक विकास हो । जब मनुष्य दूसरों के हित में अपना हित देखने लगता है और इस सूझ के अनुसार आचरण करने की क्षमता प्राप्त कर लेता है तभी वह समाज का सुयोग्य नागरिक होता है। ऐसा व्यक्ति जब कुछ करता है, वह समाज के हित के लिए ही होता है।

अपराध एक प्रकार की सामाजिक विषमता है। यह व्यक्तिगत मानसिक विषमता का परिणाम है। इस प्रकार की विषमता का प्रारंभ बाल्य काल में ही हो जाता है। इसके सुधार के लिए प्रारंभ में आदत डालनी पड़ती है कि वह दूसरों के सुख में निज सुख का अनुभव करे। वह ऐसे काम करे जिससे सभी का हित हो और सब उसकी प्रशंसा करें।

हिंदू धर्मशास्त्रों के अनूसार सामान्यतया चलित धर्मशास्त्र के नियम, सामाजिक नियम और राजनियम के विरूद्ध आचरण करना ही अपराध हैं। हिंदू धर्मशास्त्रों का विचारक्षेत्र बहुत व्यापक हे जिसके अंतर्गत आर्थिक, राजनीतिक, सामाजिक आदि सभी प्रकार के नियमों के उल्लंधन का विचार मिलता हैं। इसी के अनुसार हिंदू धर्मशास्त्रों में सामान्य रूप से 32 प्रकार के अपराध बताए गए हैं। इनकी संख्या और अधिक भी हो सकती हैं कयोकि देश, काल और समाज की भिन्नता के अनुसार इन अपराधों के स्वरूप में भी भिन्नता मिलती हैं । इसलिए भिन्न-भिन्न प्रकार के विचार व्यक्त करते दिखाई पड़ते हैं। हिंदू धर्मशास्त्र अथवा स्मृतिग्रंथ अपराधों और उनके दंड के संबंध में भिन्न-भिन्न प्रकार के विचार व्यक्त करते दिखाई पड़ते हैं। हिंदू धर्मशास्त्र के अंतर्गत अपराध के स्वरूप पर विचार करने के लिए मनु, याज्ञवल्क्य, पराशर, नारद, बृहस्पति, कात्यायन आदि को प्रमाण माना जाता हैं।

मन:शारीरिक दृष्टि से अपराध पर विचार करते हुए लांब्रोजो ने काफी पहले कहा था कि अपराधी व्यक्ति के शरीर की विशेष बनावट होती हैं। परंतु उस समय उनके मत को मान्यता नहीं मिली। हाल में अपराधियों को लेकर कुछ प्रयोग किए गए जिनसे निष्कर्ष निकला कि 60 प्रतिशत अपराधियों के शरीर की बनावट असामान्य होती है। रक्तकोशिका में रहनेवाले 23 गुणसूत्र (क्रोमोसाम) युग्मों में से अपराधियों का 21वाँ गुणसूत्र युग्म असामान्य पाया गया। सन्‌ 1968 ई. में अपने चार बच्चों के हत्यारे एक व्यक्ति की ओर सेलेदन की एक अदालत में तर्क उपस्थित किया गया कि मेरे गुणसूत्रों की बनावट अतिपुरुष की है अर्थात्‌ मेरी रक्तकोशिकाओं में गुणसूत्रों का क्रम 'एक्स वाई' हैं (सामान्य पुरुष की रक्तकोशिकाओं मे गुणसूत्रों का क्रम 'एक्स वाई' रहता है) जिसके कारण मेरी अपराध मनोवृति का कारण प्राकृतिक है ओर मैंने असामान्य मानसिक दशा में जिम्मेदारी समाप्त करने के लिए अपने बच्चों की हत्या की है। न्यायालय ने फैसले में यद्यपि उसकी असामान्य मानसिक शारीरिक बनावट का उल्लेख नहीं किया गया तो भी असामान्य दशा के आधार पर अपराधी को छोड़ दिया गया।

सन्‌ 1969 ई. में डा. हरगोविंद खुराना ने आनुवंशिक संकेत (जेनेटिक कोड) सिद्धांत का प्रतिपादन करके नोबेल पुरस्कार प्राप्त किया जिसके अनुसार व्यक्ति का आचरण उसके जीन समूह की बनावट पर निर्भर करता है और जीन समूह की बनावट वंशपरंपरा के आधार पर होती है। फलत: अपराधी मनोवृत्ति रिक्थ में भी प्राप्त हो सकती हैं।

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