अगर नहीं मिले सूचना, तो करें अपील

Submitted by Hindi on Sat, 06/08/2013 - 11:23
Source
पंचायतनामा डॉट कॉम
देश भर में पर्यावरण, जल और जंगल को बचाने के लिए सूचना का अधिकार अधिनियम के कई सफल प्रयोग हुए हैं। हम वैसी कुछ सफलताओं की कहानी साझा कर रहे हैं। हम अपने आस-पास पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाले सरकारी या गैर सरकारी कार्यों को सूचनाधिकार के तहत रोक सकते हैं।

हम पिछले 15-16 अंकों में यह बात करते रहे हैं कि आप सरकारी या सरकार के धन से अथवा सरकारी नियमों के तहत चल रहे कार्यालय, संस्थान और संगठन से किस तरह और कैसी सूचनाएं मांगें। कौन-सी सूचना नहीं दी जा सकती है और लोक सूचना पदाधिकारी को ऐसे मामले में क्या करना है, हम इसकी भी चर्चा करते रहे हैं। यहां हम यह बता रहे हैं कि अगर आपको अधूरी, भ्रामक या गलत सूचना मिलती है, तो आप क्या करें? कैसे अपील करें?

प्रथम अपील


अगर लोक सूचना पदाधिकारी आपके सूचना के अनुरोध-पत्र के अनुसार सूचना नहीं देता है या दी गयी सूचना से आप असंतुष्ट हैं, तो आप सूचना मिलने से या सूचना मिलने की निर्धारित तिथि से 30 दिनों के भीतर उसी विभाग के वरीष्ठीय पदाधिकारी के समक्ष सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 की धारा-19(1) के तहत प्रथम अपील दायर कर सकते हैं। दायर करने की तिथि से 30 से 45 दिनों के भीतर प्रथम अपीलीय पदाधिकारी को आपकी अपील का निष्पादन करना है। अगर यहां भी आपको सही और पूरी सूचना नहीं मिलती है, तो आप द्वितीय अपील दायर कर सकते हैं।

द्वितीय अपील


आप सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 की धारा-19(3) के तहत राज्य सूचना आयोग या केंद्रीय सूचना आयोग (जो भी लागू हो) के समक्ष द्वितीय अपील दायर कर सकते हैं। द्वितीय अपील आप उस तिथि से 90 दिनों के भीतर दायर कर सकते हैं, जिस तिथि को लोक सूचना पदाधिकारी से आपको सूचना मिली है या जिस तिथि तक आपको लोक सूचना पदाधिकारी से सूचना मिलनी थी।

शुल्क व दस्तावेज


बिहार में प्रथम और द्वितीय अपील के लिए दस रुपये का शुल्क निर्धारित है। इसलिए अपील दायर करते समय आप दस रुपये का सूचना शुल्क भी जमा करें। आप नकद, पोस्टल ऑर्डर, नॉन ज्यूडिसियल स्टांप, डिमांड ड्राफ्ट या बैंकर्स चेक के रूप में शुल्क जमा कर सकते हैं। बिहार देश के उन छह राज्यों में है, जहां प्रथम और द्वितीय अपील के लिए शुल्क लिया जाता है। बिहार के अलावा अरुणाचल प्रदेश, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, उड़ीसा और सिक्किम में अपील के लिए शुल्क का प्रावधान है। केंद्र सरकार तथा अन्य राज्यों में अपील के लिए कोई शुल्क नहीं लिया जाता है। अपील दायर करते समय आप सूचना के अनुरोध-पत्र तथा लोक सूचना पदाधिकारी द्वारा दी गयी सूचना की छाया प्रति भी संलग्न करें। द्वितीय अपील में प्रथम अपीलीय पदाधिकारी के निर्णय की प्रति भी संलग्न करें।

डाक से भेज सकते हैं अपील


आप हाथों-हाथ भी अपील दायर कर सकते हैं और निबंधित डाक से भी। आप ऑन लाइन अपील भी कर सकते हैं। आप सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 की धारा-5(2) के तहत अपील का आवेदन संबंधित विभाग के सहायक लोक सूचना पदाधिकारी को भी दे सकते हैं। यह उसकी जिम्मेदारी होगी कि वह पांच दिनों के भीतर उसे अपीलीय प्राधिकार या आयोग ( जो भी स्थिति हो) को भेज दे और इसकी सूचना आपको भी दे।

दिल्ली के छात्र ने बचाये दो हजार पेड़


बात सूचनाधिकार से पेड़ों को बचाने की है. दिल्ली के इंद्रप्रस्थ विश्व3विद्यालय के छात्र अंकित ने सूचनाधिकार का इस्तेमाल कर दिल्ली के रोहिणी में करीब 2000 हजार पेड़ों को बचाया। उसने पेड़ों को जीने का हक दिलाया और हमें स्वस्थ पर्यावरण का हक। उसके इस प्रयास ने दिल्ली हाई कोर्ट के फैसले और दिल्ली ट्री प्रीजर्वेशन एक्ट 1994 के प्रावधानों को भी लागू कराया। दिल्ली हाई कोर्ट और इस एक्ट में कहा गया है कि पेड़ों के चारों ओर छह-छह फीट की जमीन होनी चाहिए, लेकिन रोहिणी में ऐसा हो नहीं रहा था। फुटपाथों को कंक्रीट और टाइल्स से सुंदर और पक्का बनाने के चक्कर में पेड़ों के जीवन को संकट में डाल दिया गया था। उनकी जड़ों के आसपास की मिट्टी नहीं रह गयी थी। इससे जड़ों को पानी और हवा नहीं मिल पा रही थी। इससे पेड़ मरने लगे थे। अंकित ने इसे रोकने के लिए सूचना का अधिकार का इस्तेमाल किया। उसने पहले तो पेड़ों के चारों ओर से कंक्रीट और टाइल्स हटाने के लिए एमसीडी और पौधा संरक्षण विभाग को पत्र लिखा। जब जवाब नहीं मिला, तो उसने आरटीआइ के तहत सूचना मांगी। जो जवाब मिला, वह संतोषजनक नहीं था। उसे बताया गया कि पेड़ों को बचाने का काम चल रहा है, लेकिन वास्तविकता इससे भिन्न थी। पेड़ों को बचाने का कोई प्रयास नहीं किया जा रहा था। अंकित ने केंद्रीय सूचना आयोग में अपील दायर की। आयोग ने संज्ञान लिया। तब अधिकारी हरकत में आये और पेड़ों की जड़ों के आसपास से कंक्रीट और टाइल्स हटाने तथा पेड़ों को बचाने का काम शुरू हुआ। अंकित ने करीब 2000 पेड़ों को बचाया है।

प्रोफेसर ने बनाया नैनीताल का जंगल


नैनीताल के जंगल और वहां के पर्यावरण को बचाने में सूचनाधिकार ने बड़ी कामयाबी हासिल की। इसने सुप्रीम कोर्ट के आदेश के उल्लंघन की भी पोल खोली। हुआ यूं कि हिमाचल प्रदेश के नैनीताल का जंगल मशहूर है और पर्यावरण व पर्यटन की दृष्टि से इसकी अपनी अहमियत है, लेकिन वन विभाग की लापरवाही से यहां का पर्यावरण लगातार बिगड़ रहा था। इस मामले को कुमाउं विश्वाविद्यालय के प्रोफेसर अजय सिंह रावल ने सुप्रीम कोर्ट पहुंचाया। कोर्ट ने सरकार और वन विभाग को आदेश दिया कि वह हर हाल में नैनीताल के पर्यावरण एवं पारिस्थितिकी के अनुरूप जंगल की रक्षा करे। कोर्ट के इस आदेश के बाद भी वन विभाग ने हनुमानगढ़ी में बड़ा निर्माण कार्य शुरू किया। प्रो. रावल ने इसे रोकने के लिए सूचनाधिकार का इस्तेमाल किया। उन्होंने वन प्रमंडल पदाधिकारी इस निर्माण परियोजना और पर्यावरण पर उसके प्रभाव की सूचना मांगी। पहले तो यह कहा गया कि निर्माण वन संरक्षण से जुड़ा है और वहां केवल दो छोटे गोदाम बनाये जा रहे हैं, लेकिन जब सूचनाधिकार के तहत लिखित सूचना देने की बारी आयी, तब अधिकारियों को स्वीकार करना पड़ा कि वहां गोदाम के अलावा वन कर्मियों के लिए 37 क्वार्टर बनवाये जा रहे हैं। यह पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाला और सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अवहेलना का मामला था। इसलिए अंतत: इस प्रोजेक्ट को वहां से हटाना पड़ा और नैनीताल जंगल का पर्यावरण बचाया गया।

बंद हुई मौसम विभाग की दुकानदारी


सूचनाधिकार ने भारतीय मौसम विज्ञान विभाग की दुकानदारी बंद करायी। यह विभाग सरकारी धन से चलता है, लेकिन जनता को मौसम संबंधी जानकारी और आंकड़े पैसे लेकर दे रहा था। केंद्रीय सूचना आयोग एक मामले की सुनवाई के बाद इस विभाग की इस दुकानदारी को बंद करा दिया। उसने मौसम संबंधी सभी सूचनाएं और आंकड़े बिना पैसा लिये जनता को उपलब्ध कराने का आदेश दिया। दरअसल दिल्ली की एक संस्था की ओर से विपिन चंद्र ने भारतीय मौसम विज्ञान विभाग से मध्य प्रदेश के बुंदेलखंड इलाके के छह जिलों के पांच साल के लिए वर्षा के मासिक आंकड़ों की मांग की। विभाग यह कह कर आंकड़ा देने से मना कर दिया कि यह सूचनाधिकार के दायरे में नहीं आता है। विपिन चंद्र ने प्रथम अपील दायर की, लेकिन वहां भी सूचना नहीं मिली। तब उन्होंने केंद्रीय सूचना आयोग में द्वितीय अपील दायर की. सुनवाई में भारतीय मौसम विज्ञान विभाग की ओर से दलील दी गयी कि वह आंकड़े उपलब्ध कराने के पैसे लेता है और यह विभाग की आय का जरिया है। आयोग ने इस दलील को खारिज कर दिया और विभाग को देश के सभी जिलों के वर्षा के मासिक और सालाना आंकड़ों को बिना किसी शुल्क के सार्वजनिक करने का आदेश दिया। इसमें बड़ा दिलचस्प मामला यह भी था कि देश की कई राज्य सरकारें अपने वेबसाइट पर प्रखंड वार दैनिक आंकड़े उपलब्ध करा रहे हैं। सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 की धारा-4 भी उन्हें ऐसा करने का आदेश देती है। वहीं भारतीय मौसम विज्ञान विभाग अब तक वर्षा रिपोर्ट और आंकड़े तक बेच रहा था।

झील को नष्ट होने से बचाया


यह कहानी टिहरी बांध निर्माण में हुई भारी लूट और झील को नुकसान पहुंचाने के कृत्य के खुलासे से जुड़ी है। यह खुलासा सूचनाधिकार ने किया। इससे यह बात सामने आयी कि कैसे पुल बनाने के नाम पर करोड़ों रुपये की लूट तो होती ही रही, बांध को क्षति पहुंचाने का काम भी किया गया। ठेकेदार और अफसरों ने मिल कर सुप्रीम कोर्ट के आदेश की भी अनदेखी की और पर्यावरण को भारी नुकसान पहुंचाया। हुआ यूं कि टिहरी बांध बना, तो कई इलाकों के लोगों को यातायात की समस्या पैदा हो गयी। तब सरकार ने प्रताप नगर में पुल बनाने का काम शुरू किया गया, मगर चार साल बाद भी पुल नहीं बना। टिहरी बांध की एक सुरंग को बंद कर देने से टिहरी तथा आस-पास के कई गांव-शहर की सड़कें व पुल पानी में डूब गये। आवागमन के रास्ते बंद हो गये। एक घंटे की दूरी पांच-छह घंटों में पूरी होने लगी। जनता ने आवाज उठायी, तब झील के उपर पुल बनाने की योजना बनी। 90 करोड़ के बजट के साथ इस पुल का काम 2006 में शुरू किया गया। इसे दो साल में पूरा होना था, लेकिन 113 करोड़ रुपये खर्च होने के बाद भी चार साल बाद तक पुल नहीं बना। तब आरटीआइ एक्टिविस्ट मुरारी लाल ने सूचनाधिकार का इस्तेमाल किया। सूचनाधिकार से यह खुलासा हुआ कि जिस कंपनी को पुल बनाने का ठेका दिया गया था, वह इसके योग्य ही नहीं है। ऊपर से एकरारनामे के मुताबिक पुल निर्माण के लिए बोल्डर और रेत हरिद्वार से लाने की बजाय झील के आसपास के उत्खनन कर पत्थर लाये गये। रेत भी आस-पास से निकाल कर पुल में लगाया गया, जबकि भुगतान दूसरी जगह से पत्थर-रेत लाने का लिया गया। सुप्रीम कोर्ट ने झील के आसपास खुदाई करने के लिए रोक लगा रखी है।

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