आइये, ब्रह्मपुत्र को जानें - भाग-2

Submitted by UrbanWater on Mon, 09/18/2017 - 12:17


ब्रह्मपुत्र नदीब्रह्मपुत्र नदीयह स्थापित तथ्य है कि भारत की ओर से पूर्वी हिमालय की खोज-बीन की कोशिशें 1824 में ही शुरू हो गई थी। लेफ्टिनेन्ट आर. विलकाॅक्स ने दियांग और लुइत समेत कई नदियों का सर्वेक्षण किया। यह लेफ्टिनेन्ट विलकाॅक्स और कैप्टन राॅबर्ट पेमबर्टन का ही निष्कर्ष था कि दियांग और सांगपो एक ही नदी है। आगे चलकर 1879 से 1882 के चार वर्षों के दौरान सिक्किम भूगोलवेत्ता किंथूप (केपी) और सिक्किम माॅनेस्टरी के लामा जे. एफ. नेडम (जीएमएन) की खोज ने सांगपो नदी को ब्रह्मपुत्र के ऊपरी मार्ग के रूप में चिन्हित किया।

एक चीनी लामा की मदद से वे मई, 1881 में सांगपो मूल के स्थान तोंग-जुक-जोंग तक पहुँचने में सफल रहे। किंथूप व लामा कोई पेशेवर सर्वेक्षक तो थे नहीं; लिहाजा, उनके सर्वेक्षण सम्बन्धी तथ्य किसी कागज पर न होकर, उनकी याददाश्त में दर्ज थे। यही कारण था कि वर्ष 1984 में किंथूप की वापसी के दो वर्ष बाद तक उनकी खोज ने किसी का ध्यान आकर्षित नहीं किया। दो वर्ष बाद कर्नल सी.बी.तनर ने किंथूप के सर्वेश्रण को कागज पर उतारा। वर्ष 1911-13 के दौरान कर्नल एस.जी. बर्रान्ड ने किंथूप की खोज की जाँच की और पुष्टि की।

किशन सिंह ने भी चार साला यात्रा कर सांगपो के बारे में जानकारियाँ जुटाईं। स्वामी प्राणवानन्द ने चीमा-यांगदुंग ग्लेशियर को यारलंग यानी ब्रह्मपुत्र के मूल स्रोत के रूप में चिन्हित किया। वर्ष 2011 में चाइनिज एकेडमी आॅफ साइंसेज के वैज्ञानिकों का नया निष्कर्ष सामने आया। उनका निष्कर्ष था कि यारलांग-सांगपो नदी के मूल स्रोत - आंगसी ग्लेशियर है।

खोज आगे बढ़ीं तो यह भी पता चला कि तिब्बती मूल के शब्द ‘सांगपो’ का मायने ‘शुद्ध’ करने वाला होता है। सम्भवतः यही कारण है कि तिब्बत, भूटान और भारत में स्थानीय समुदाय ब्रह्मपुत्र को एक पवित्र प्रवाह मानता है। अशोक अष्टमी को ब्रह्मपुत्र नद में स्नान को विशेष महत्त्व का माना गया है। दिमासा जनजाति का नामकरण ही नद से उत्पन्न हुआ। दि यानी नदी, मा यानी बड़ी तथा सा यानी पुत्र; इस तरह दिमासा का मतलब हुआ - बड़ी नदी का पुत्र।

तिब्बत से लेकर बांग्लादेश तक की अपनी यात्रा में ब्रह्मपुत्र नद इतनी विविध भूमि, वर्षा, हवा, दाब तथा ताप क्षेत्रों से होकर गुजरता है कि इसकी भौतिकी, स्वयंमेव विविधताओं का भण्डार बन गई है। वर्षा की दृष्टि से ही देखिए तो तिब्बत की दक्षिण ओर यानी भूटानी, भारतीय और बांग्लादेशी हिस्से की तुलना में उत्तरी यानी तिब्बती मूल के हिस्से में काफी कम वर्षा होती है।

ब्रह्मपुत्र के मूल तिब्बती यानी उत्तरी भू-भाग में 300 मिलीमीटर का वार्षिक वर्षा औसत है तो दक्षिणी हिस्से में 4000 मिलीमीटर का। दोनो भू-भागों का औसत निकालें तो ब्रह्मपुत्र 2500 मिलीमीटर वार्षिक वर्षा औसत वाली नदी है। जैसे-जैसे उत्तर-पूर्व भारत की ओर जाते हैं, यह औसत बढ़ता जाता है; पश्चिमी ढाल की ओर वर्षा के वार्षिक औसत में घटोत्तरी का आँकड़ा है। तिब्बती क्षेत्र में वर्षा और बर्फबारी का समय दिसम्बर से फरवरी होता है, तो शेष हिस्से में मानसून के महीने - जुलाई और अगस्त हैं। यही कारण है कि बह्मपुत्र नद को उसके सर्वोच्च काल में मानसून से जल मिलता है। शेष महीनों में ब्रह्मपुत्र के प्रवाह में यारलांग की हिस्सेदारी बढ़ जाती है।

वर्षा सम्बन्धी इस विविधता का प्रभाव ब्रह्मपुत्र के प्रवाह में विविधता के रूप देखने को मिलता है। वर्ष 2015 में प्रकाशित एक अध्ययन के दौरान यारलांग का कुल वार्षिक प्रवाह 31 बीसीएम मापा गया, वहीं बांग्लादेश की जमुना के रूप में बहादुराबाद में ब्रह्मपुत्र का अन्तिम छोर पर वार्षिक प्रवाह 606 बीसीएम पाया गया। वर्ष 2004 के अध्ययन के मुताबिक, तिब्बत मूल में नुक्सिया और टेस्ला डिजांग पर सर्वोच्च प्रवाह 5000 से 10,000 क्युमेक्स था न्यूनतम 500 क्युमेक्स दर्ज किया गया; जबकि बहादुराबाद में सर्वोच्च प्रवाह का आँकड़ा 50,000 क्युमेक्स तथा न्यूनतम प्रवाह 5000 क्युमेक्स था।

तिब्बत मूल में कम प्रवाह की वजह से ही यारलंग नदी में मौजूद 30 मिलियन टन तक वजन की गाद को लेकर चलने में समर्थ नहीं होती। जितना विविध ब्रह्मपुत्र यात्रामार्ग का भूगोल है, अलग-अलग स्थानों पर गाद की मात्रा व प्रकार का उतना अधिक विविध होना स्वाभाविक है। नुक्सिया तथा पाण्डु की तुलना में बहादुराबाद के पास ब्रह्मपुत्र में गाद का वजन कई गुना हो जाता है।

यह बात और है कि दक्षिणी हिस्से में बनी जलविद्युत परियोजनाएँ, गाद के इस वजन को रोकने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। ब्रह्मपुत्र जब इस गाद को ढोकर किनारे के स्थानों पर फैलाती है, इससे जिस तरह के मैदान व जैवविविधता का विस्तार होता है; उसका महत्त्व समझकर ही उत्तर-पूर्व भारतीयों के लिये ब्रह्मपुत्र का महत्त्व समझा जा सकता है। इसके लिये समझना बाढ़ और कटान को भी होगा। अगले अंक में इसी को समझने की कोशिश करेंगे।

ब्रह्मपुत्र के भौतिक रूप- स्वरूप के बारे में कुछ अन्य जानकारी

 

 

आइये, ब्रह्मपुत्र को जानें - भाग 01

 

 

 

आइये, ब्रह्मपुत्र को जानें - भाग-2

 

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