आज भी खरे हैं महोबा के तालाब और बावड़ियाँ

Submitted by Hindi on Sun, 01/31/2016 - 13:09
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'आल्हा-ऊदल और बुंदेलखण्ड' पुस्तक से साभार

कीरत सागर तालाबवीर आल्हा-ऊदल की नगरी महोबा में यत्र-तत्र सर्वत्र बिखरे सरोवर इसके सौंदर्य में चार चाँद लगाते हैं। महोबा में मानसून का सदियों से अभाव रहा है। यहाँ पर वर्षा केवल 95 सेन्टीमीटर होती है। अत: यहाँ के शासकों ने जनहित को सर्वोपरि मानकर जलाशयों के निर्माण को वरीयता दी और कालांतर में अपने और परिजनों के नाम पर सरोवरों के निर्माण की एक परम्परा ही चल पड़ी और जलाशयों के मध्य या उसके तट पर सुंदर स्मारकों का निर्माण कर उसकी कीर्ति को चिरस्थायी बनाने का स्तुत्य प्रयास किया गया। यहाँ के पठारी धरातल को देखते हुए तालाब निर्माण ज्यादा लोकप्रिय हुआ। चंदेलों ने तड़ागों को निर्मित कर उनका मंदिरों से संयोजन किया।

इस क्रम में रहेलिया सागर सबसे पहले अस्तित्व में आया जिसका निर्माण चंदेल वंश के पाँचवे शासक राहिलदेव वर्मन ने कराया। वर्षा के उपरांत जब यह तड़ाग जल से पूरित हो जाता है तो कमल-कुमुदनियों पर भ्रमर और विदेशी पक्षियों का कलरव देखते ही बनता है। रहेलिया सागर से गोखार पहाड़ का दृश्य मनभावन लगता है। रहेलिया सागर का निकटस्थ सूरजकुण्ड से आंतरिक सम्पर्क है। चंदबरदाई ने लिखा है कि रहेलिया सागर का निर्माण आल्हा के पिता दक्षराज ने कराया था, किन्तु इसकी पुष्टि किसी अन्य स्रोत से नहीं होती।

कीरत सागर का निर्माण राजा कीरत वर्मन ने चंद्राबल की सहायक चंदानौर नदी को रोक कर कराया। तुलसीदास ने त्रिवेणी तीरे बसे प्रयागराज के बारे में लिखा है-

को कहि सकइ प्रयाग प्रभाउ,
कलुश पुंज कुंजर मृगराउ।


कुछ ऐसी ही मान्यता महोबा के कीरत सागर के बारे में भी है। महोबा का कोई भी संस्कार हो- तीर्थ-व्रत, मुंडन-छेदन बिना कीरत सागर के पूरा नहीं होता। यहाँ के लोकगीतों में गाया भी जाता है- ‘अमर भरो कीरत का पानी।’ इस सागर के निर्माण के समय राजा कीरत वर्मन ने आर्यावर्त के सभी तीर्थों का जल लाकर छोड़ा था, इसीलिए इसे बुंदेलखण्ड का तीर्थराज माना जाता है। बुंदेलखण्ड के लोग कीरत सागर के जल को साक्षी मानकर आज थी शपथ लेते हैं -

जितने तीरथ महीलोक में, वेद पुरान बखान
कीरत सागर में परे, तिन-तिन के जल आन
वीर वेदुला का चढ़वइया, छोटा दक्षराज का लाल
रात के सपने साचे कर ले, जब जल पिये किरतुआ ताल


कीरत सागर के किनारे मिट्टी लाल अथवा खूनी रंग की है। मृदाविज्ञानियों के इसके पीछे अपने तर्क हो सकते हैं, लेकिन यहाँ के निवासियों का मानना है कि इस सागर के किनारे लड़े गये रक्तरंजित युद्धों के कारण यह मिट्टी खूनी है। इसमें सबसे भयावह युद्ध कजलियों की लड़ाई थी जो 1181 ई. में पृथ्वीराज चौहान और चंदेलों के बीच लड़ी गई, जिसमें चंदेलों की विजय हुई। कीरत सागर अपने आगोश में ढेरों स्मारक समेटे हैं - जिसमें आल्हा की चौकी, ताला सैयद और झिल्लन खां की मजार, आल्हा का अखाड़ा प्रमुख है। आल्हा का एक अखाड़ा मैहर में भी मान्य है।

कीरत सागर की पवित्रता को देखते हुए ताला सैयद ने अपनी वसीयत में लिखा था कि उनका इंतकाल कहीं भी हो, उन्हें कीरत सागर के किनारे ही सुपुर्दे खाक किया जाय। बैरागढ़ के युद्ध में जब ताला सैयद वीरगति को प्राप्त हुए तो आल्हा उन्हें खुद लेकर महोबा आए और कीरत सागर के किनारे धुबनी पहाड़ी पर उन्हें दफनाया गया। ताला सैयद चंदेलों के शस्त्र प्रशिक्षक थे। उन्होंने आल्हा-ऊदल, मलखान-सुलखान, ब्रह्मा, ढेबा, दौगड़ दौआ जैसे रणबांकुरे तैयार किए, जिनकी छाँव में परमाल का स्वर्णिम काल बीता-

कडुवल पानी गढ़ महुबे का, जहाँ नर-नारि करे तरवार
हाथी पैदा कजली वन में, घोड़ पैदा काबुल कंधार
सूर पैदा गढ़ महुबे में, जिनकी छाँव बसे परमार
दौगड़ दौआ गढ़ महुबे के, भारी सूर महोबा क्यार


ताला सैयद के पुत्रों की सूची भी आल्हखण्ड में दी गई है- अली अलामत औ दरियाई बेटा भाले औ सुल्तान। ताला सैयद के दौर में तलवारबाजी ही महोबा का मुख्य व्यवसाय बन गई। आल्हखण्ड में इसका अतिरंजित वर्णन है-

बड़े लड़इया रहे महोबा के, जिनतें काँप रही तरवार
नगर महोबा की जागा में, सातों जात करे तरवार
बनिया बधिया कोउ न लादै, न व्यापारी बनिज को जाए
नगर महोबा की जागा में, सब तरवार तरै का खाए


कीरत सागर के किनारे ही सिंहनाद अवलोकितेश्वर की वह मूर्ति मिली थी जो आजकल लखनऊ संग्रहालय में है और जिसे विश्व की दस सर्वाधिक सुंदरतम मूर्तियों में स्थान दिया गया है। कजली युद्ध की विजय स्मृति में हवेली दरवाजा शहीद स्थल से रक्षाबंधन के पर्व पर एक विजय जुलूस निकलता है जिसका समापन कीरत सागर के तट पर होता है। उस दिन कीरत सागर के तट पर बुंदेलखण्ड का सबसे बड़ा मेला लगता है। आल्हा की चौकी एक मंच का रूप धारण कर लेती है और आल्हा परिषद के संयोजक शरद तिवारी दाउ के सौजन्य से एक सप्ताह तक रात-दिन लगातार बुंदेली नृत्य और गायन होता रहता है। पुष्ट स्रोतों के मुताबिक प्रबोधचन्द्रोदय नाटक का प्रथम मंचन भी कीरत सागर के तट पर हुआ था। मदन सागर का निर्माण मदनवर्मन ने मकरध्वज नदी को रोककर कराया। इस नदी में मगरमच्छों की बहुतायत के कारण इसे मकरध्वज नदी नाम दिया गया। महोबा का मगरिया मुहल्ला आज भी इस नदी के नामकरण का गवाह है। मदनसागर के आगोश में सर्वाधिक ऐतिहासिक स्मारक हैं। इसमें खकरामठ, मझारी द्वीप, इंदल की बैठक, जैन तीर्थकर आदि प्रमुख हैं। सागर का निर्माण 1129-63 ई. माना गया है। पाँच छोटे-छोटे द्वीप इस सागर की शोभा में वृद्धि करते हैं।

मदन सागर के मध्य सर्वाधिक विस्मयकारी निर्माण है- खकरामठ। इसकी लम्बाई 42 फीट और ऊँचाई 103 फीट है। इसका मुख्य द्वार पूर्व दिशा की ओर है जबकि दो अन्य उत्तर और दक्षिण दिशा में हैं। मंदिर का गर्भगृह 12-12 वर्ग फीट है। लगभग 15 फीट की ऊँचाई पर इसमें अलंकृत कोणदार मंडप हैं। खकरा मठ के ऊपर चारों कोनों पर चार शार्दूल रखे गए थे, जो अब विलुप्त हैं। इस मठ तक पहुँचने के लिये किले से एक पथ बनवाया गया था, जो वर्षा काल में डूब जाता है।

कनिंघम ने इसे अपने यात्रा वृतांत में शैव मंदिर बताया है। उनके अनुसार दक्षिणी भारत के शैव मंदिरों में काकरा आरती होती है। उसी काकरा से इसका नाम खकरा पड़ा। जल राशि के मध्य होने के कारण यह मुस्लिम आक्रमणों से सुरक्षित बचा रहा। किंतु 1934 ई. में आए भूकम्प से इसे कुछ हानि अवश्य पहुँची है।

मदन सागर के बीच में 5 छोटे-छोटे द्वीप हैं जिसमें मुख्य को मझारी द्वीप कहा जाता है। कनिंघम ने मझारी द्वीप को विष्णु मंदिर बताया है। द्वीप के चारों तरफ बिखरे पड़े हाथी कनिंघम के इस मत की पुष्टि करते हैं, क्योंकि विष्णु मंदिर के द्वार पर हाथियों को द्वारपाल के रूप में रखने की परम्परा आज भी विद्यमान है। ऐसे आठ हाथी मंझारी के चारों तरफ आज भी बिखरे पड़े हैं, और इनका अलंकरण आज भी स्पष्ट है। स्थानीय निवासियों के अनुसार बाढ़ में जब ये हाथी डूबने लगते हैं तो इनसे बचाओ-बचाओ की आवाज आती है। खकरामठ की तरह मझारी भी एक संरक्षित स्मारक है।

चंदेल नरेश मझारी द्वीप का प्रयोग अपनी गोपनीय मंत्रणा के लिये भी करते, जहाँ वो नौका के माध्यम से आते थे। इस समय वीरभूमि महोबा को जलापूर्ति मदन सागर से ही की जाती है। आल्हखण्ड में लिखा है कि मदन सागर में नित्य स्नान करने से कायर भी वीर हो जाता है-

जो नहाय निसदिन मदनसागर में
तो मेहरा सूर होइ जाय


महोबा- कबरई मार्ग पर रेलवे क्रॉसिंग के पास एक सागर है जिसे किड़ारी तालाब कहा जाता है। यह स्थल चंदेल काल में क्रीड़ागिरि था जहाँ पर युवकों को मल्ल युद्ध आदि का प्रशिक्षण दिया जाता था। इसी क्रीड़ागिरि के नाम पर इस तालाब को किड़ारी सागर कहते हैं।

किड़ारी सागर से थोड़ी दूर पर दिसरापुर सरोवर है। आल्हा-ऊदल के बाबा घोसरदेव को इस जगह राजा परमाल ने जागीर दी थी। घोसरदेव के नाम पर ही इस स्थान का नाम दिसरापुर पड़ा। इस तालाब के किनारे ही आल्हा के महलों के अवशेष हैं।

आल्हा-ऊदल के एक भाँजे सियाहरि थे। उनका गाँव उन्हीं के नाम पर सिजहरी कहा जाता है। सिजहरी में एक बहुत बड़ा तालाब है। तालाब के किनारे ही सिजहरी का चंदेल कालीन मठ है।

कीरत सागर तालाबकुल पहाड़ में कुछ तालाब बहुत सुंदर अवस्था में है। कुल पहाड़ का गहरा ताल आज भी सबको आकर्षित करता है और कुल पहाड़ में जलापूर्ति का मुख्य साधन है। छत्रसाल कालीन गढ़ी टौरिया के किनारे एक तालाब है, जिसे चौपड़ा कहा जाता है। इस तालाब में स्नान हेतु कक्ष बने हैं। गढ़ी में रहने वाले विशिष्ट वर्ग के लोग यहाँ आकर स्नान करते थे। चौपड़ा से गढ़ी को एक बंद मार्ग द्वारा जोड़ा गया है। यह मार्ग आज भी उतनी ही मजबूती से विद्यमान है। इस आंतरिक मार्ग की विशेषता है कि इसमें छत पर जालियाँ बनायी गई हैं ताकि नीचे मार्ग पर प्रकाश रहे। स्थापत्यकार की इस बात के लिये प्रशंसा करनी होगी कि उसने सुरक्षा, प्रकाश और शील का एक साथ ध्यान रखा।

सूपा में कन्हैया जू के चबूतरे के पास एक खूबसूरत बावड़ी है, जिसकी मरम्मत अभी हाल में ही की गई है। महोबा में मिली सभी बावड़ियों में यह सबसे विशाल है। इसकी भव्यता देखते ही बनती है।

श्रीनगर अपनी मराठा कालीन बावड़ियों के लिये सर्वाधिक प्रसिद्ध है। यहाँ लगभग 18 बावड़ियाँ मिली है। इसमें एक घुड़बहर है, जो किले के मुख्य द्वार के पास है। घुड़सवार इसमें बिना नीचे उतरे अपने अश्व को पानी पिला सकता था और फिर ढलान से आगे बढ़ जाता था। किले के अंदर दो बावड़ियों में से एक में नीचे सीढ़ियों के पास कक्ष बना है, जिसमें रनिवास की महिलाएँ स्नानोपरांत वस्त्र बदलती थीं। महोबा की किसी अन्य बावड़ी में कक्ष नहीं बना है। श्रीनगर में कुछ बड़े तालाब भी हैं जिसमें दाउ का तालाब और बड़ा ताल मुख्य है।

महोबा नगर के बीच में कल्याण सागर का निर्माण वीरवर्मन ने अपनी पत्नी कल्याणी देवी की स्मृति में कराया। कल्याण सागर का संपर्क विजय सागर से है।

मोबा-कबरई मार्ग पर दाहिनी ओर विजयसागर है, जिसका निर्माण सर्वप्रथम प्रतिहारों के समय हुआ। कालांतर में चंदेलों और बुंदेलों के समय इसका सौंदर्यीकरण किया गया। छत्रसाल के राज्य बँटवारे में महोबा-श्रीनगर का क्षेत्र उनके पुत्र मोहन सिंह के अधिकार में आया। उन्होंने विजयसागर को रमणीक बनाया और इसके किनारे सुंदर घाटों की शृंखला और एक गढ़ी बनाई। विजय सागर यूपी सरकार का राजकीय पक्षी विहार है। यह सैलानियों की सर्वाधिक पसंदीदा जगह है। विजय सागर ने अकाल के समय भी महोबा को जलदान दिया था।

जैतपुर का बेलाताल महोबा के तालाबों में सर्वाधिक विस्तृत है। वर्षा ऋतु में यह झील 9 मील तक विस्तृत हो जाती है। शरद ऋतु में यहाँ साइबेरियन पक्षी बड़ी तादाद में आकर अपना बसेरा बनाते हैं। बेलाताल के किनारे खड़ा गगनचुम्बी बादल महल पेशवा बाजीराव-मस्तानी की स्मृति को संजोए है।

बेलाताल का निर्माण मदनवर्मन के अनुज बैलब्रह्म ने कराया था। किवदंती है कि जब बलवर्मन ने इस झील का निर्माण प्रारंभ कराया तो इसका तटबंध टूट जाता था। एक युगल की बलि दी गई और रामेश्वरम से लाकर झील के बीचों-बीच एक शिवलिंग स्थापित किया गया, तब यह निर्माण पूरा हुआ। यह शिवलिंग झील के मध्य अभी भी विद्यमान है। बेलाताल का नामकरण जहाँ बलवर्मन के आधार पर माना जाता है, वहीं इसे त्रैलोक्यवर्मन द्वारा अपनी पत्नी बेला के लिये भी निर्मित बताया जाता है।

कबरई का ब्रह्मताल अपने घाटों के लिये विशिष्ट है। ये घाट कुछ इस कोण से बने हैं कि इसमें स्नान करने वाले एक दूसरे को देख नहीं पाते इस ताल के किनारे एक मठ बना है, जो ऊँची जगती पर निर्मित है। इसका निर्माण भी मदनवर्मन के अनुज बलवर्मन द्वारा माना गया है।

कबरई से बांदा मार्ग पर रेवई के निकट एक सुकौरा ताल है जिसके निर्माता का नाम अज्ञात है। इससे थोड़ी दूरी पर एक मठ है, जो चंदेल स्थापत्य का एक बेहतरीन नमूना है। इसका निर्माण एक ऊँची जगती पर चूल पद्धति से हुआ है। आकृति में यह रहेलिया के सूर्य मंदिर से मिलता-जुलता है। इसमें एक गर्भगृह है तथा गर्भगृह के समक्ष 24 स्तम्भ हैं। मुख्य द्वार के अतिरिक्त दो बड़ी झांकियाँ हैं, जो किसी अन्य मठ में नहीं मिलती।

चरखारी के तालाब सर्वाधिक सुंदर है। बुंदेला राजाओं द्वारा बनवाये सातों तालाब एक दूसरे से आंतरिक संपर्क से जुड़े हैं, जो हमेशा कमल-कुमुदनियों से सुशोभित रहते हैं। रतन सागर, जय सागर, कोठी ताल यहाँ के मुख्य आकर्षण हैं।

जिन दिनों ये तालाब अपने शबाब पर थे, उन दिनों महोबा का सौंदर्य अप्रतिम था। सुरम्य घाटों से टकराती अथाह जलराशि, कमल के फूलों पर गूँजते भ्रमर, पक्षियों का कलरव, राजाओं का सायंकालीन नौका विहार, तालाबों के किनारे मंदिरों से गूँजते भजन, इन सब दृश्यों की कल्पना ही एक स्वर्गिक सुख का आभास कराती है। आल्हखण्ड में इस सौंदर्य की एक झलक है-

जैसे इंद्रपुरी मन भावन, सब सुख खानि लेउ पहिचानि
तैसे धन्य धरणि महुबे की, भट निर्मोह वीर की खानि
कंचन भवन विविध रंग रचना, अद्भुत इंद्र मनोहर जाल
रत्नजटित सिंहासन शोभित, तापर न्याय करे परमाल


जैनग्रंथ प्रबंधकोश में वर्णित है कि महोबा नगर का नित्य अवलोकन करने वाला भी गूँगे मनुष्य की भाँति इसके सौंदर्य व विशेषता को अंतर्मन से अनुभव तो कर सकता है, परंतु इसका वर्णन नहीं कर सकता-

किन्तु महोबा के लोग इस सौंदर्य को सहेज कर नहीं रख सके। श्रीनगर की घुड़बहर जो शायद अपने आप में दुनिया की इकलौती रचना हो सकती है, उसे मुहल्ले वालों ने कूड़ेदान बनाकर पाट दिया। उरवारा का रतन सागर जो बेलाताल से आकार में थोड़ा ही छोटा है, उसमें अवैद्य खेती होती है। महोबा का तीर्थराज कीरतसागर भी समाप्त प्राय है। रक्षाबंधन के पर्व पर कजली प्रवाहित करने हेतु उसमें पानी नहीं बचा। मदन सागर अब एक Latrine tank रह गया है। आस पास मुहल्ले के लोग इसका इस्तेमाल शौच के लिये करते हैं।

इन तालाबों और बावड़ियों के मिट जाने से महोबा में भूजल स्तर नीचे चला गया है। पानी के लिये यहाँ गर्मियों में भाई-बंधु एक दूसरे के खून के प्यासे हो जाते हैं। सिर पर घड़ा रख कर पानी के लिये मीलों भटकती औरतें गाती हैं-

गगरी न फूटे खसम मरि जाए,
भौंरा तेरा पानी गजब करि जाए।


इन तालाबों और बावड़ियों के कारण कभी महोबा का सौंदर्य सत्य था, अब इनके पट जाने से चंद्रमा प्रसाद दीक्षित ‘ललित’ के शब्दों में पानी का अकाल सत्य है-

खसम मरे गगरी न फूटे, घटे न धौरा ताल
तैर रही फटी आँखों में, जले सदा ये सवाल
बादल बरसे नदी किनारे, तरसे कोल मड़इया
बिन पानी के सून जवानी, हा दइया हा मइया


महोबा के अभिशप्त नागरिकों ने बेरहमी से अपने ही जंगल काट डाले हैं। फलत: हरियाली विलुप्त हो गई है। आल्हखण्ड की चंदन बगिया अब ढूढ़े नहीं मिलती। महोबा के जंगलों में शेरों की एक प्रजाति पाई जाती थी- शार्दूल। किन्तु जंगलों के साथ यह प्रजाति भी विलुप्त हो गई है। चंदेलों का यह राजकीय चिह्न शार्दूल अब केवल उनके स्मारकों में ही नजर आता है। प्रकृति भी बड़ी निर्दयता से महोबा से बदला ले रही है। कई वर्षों से यहाँ बारिश नहीं हो रही है। गर्मी में तापमान 50 डिग्री तक बढ़ जाता है। चंदेलों का महोबा अब मुसाफिरों को छाँव नहीं दे पाता, फलत: दिन में सड़कें वीरान हो जाती हैं-

घर ते निकसिबे कूँ, चाहत न चित्त नैक
घोर घाम, तप्त धाम सम सरसत है
लुअन की लोय तेज, तीर सी लगत तीखी
जम की बहिन सी, दुपैरी दरसत है
नारी-नर, पंछी-पशु, पेड़न की कहौं कहाँ
ठौर-ठौर ठंडक की नाई तरसत है
छत्तन पे, पत्तन पे, अट्टन पे, हट्टन पे
आजु कल शहर में, आग बरसत है।


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