आखिर हिमालय की चिंता किसको है ?

Submitted by Hindi on Fri, 05/16/2014 - 14:04
Source
सिद्ध, 2001
हमारे लिए चुनौती यह है कि हिमालय से उभरी चुनौतियों को हम राष्ट्रव्यापी ही नहीं विश्वव्यापी भी बनाएं और उसी स्तर पर जनान्दोलनों को उभारने की ओर बढ़ें, चुनौती यह भी है कि हम अपने शिक्षण-सरोकारों में और व्यवहारों में भावी पीढ़ी को ‘हिमालय से अवगत‘ कराएं। हिमालय तभी बचेगा जब उसकी चिंताएं देश की चिंता बनेगी।‘हिमालय से अब जल-स्राव नहीं होता, यह तो रक्त-स्राव है। विगत सहस्त्राब्दियों में जो ग्लेशियर कभी पिघले नहीं, उनके नामों-निशान अगले पच्चीस-तीस वर्षों में मिट जाएंगे अगर कार्बन के वर्तमान उत्सर्जन की दर में जबरदस्त गिरावट पश्चिमी देश, खासकर अमेरिका ने नहीं की’ - हिमालय-दिवस (9 सितम्बर 2009) के अवसर पर हिमालय-क्षेत्र से आए लोगों का यह कहना था।

हिमालय जैव-विविधताओं के समन्वय व संचयन का अद्भुत व विशाल स्रोत है और बहुत हद तक अभी भी है। यहां के बाशिंदे भी रूप,रंग, कद-काठी तथा प्रकृति आदि में विविधताओं से भरे हैं। यह धरती पर दुनिया के अन्य क्षेत्रों के मुकाबले भूमि-संग्रहण का नया उभरता क्षेत्र है, इसलिए सहज ही प्राकृतिक तौर पर जल,जंगल और जमीन की दृष्टि से संभावनाओं से भरा एक विरल क्षेत्र है। धरती की रचना की दृष्टि से हिमालय एक मेरूदंड की तरह है। केवल हिमालय और उसके तराई वाले क्षेत्रों का ही संपोषण हिमालय के विभिन्न स्रोतों से नहीं होता, बल्कि यह समूचे एशिया और पूर्वी यूरोप के साझा जल-स्रोत का भी आधार है और यूरेशिया की जलवायु का एक प्रमुख कारक भी है।

लेकिन अब हिमालय खतरे में है। उत्पादन की प्रचलित तरीकों के कारण कार्बन का अत्यधिक उत्सर्जन हिमालय को हिमालय नहीं रहने देने पर आमादा है। ध्रुवीय क्षेत्रों को अगर हम छोड़ दें तो दुनिया में सबसे अधिक बर्फ निर्माण हिमालय में ही होता है लेकिन वैज्ञानिकों को ऐसी आशंका है कि कार्बन-उत्सर्जन की तीव्र गति के कारण अगले बीस से तीस बरस में हिमालय के ग्लेशियर पूरी तरह पिघल जाएंगे। नतीजतन सौ करोड़ से ज्यादा लोग पानी के लिए तरस कर अपना घर-बार छोड़कर अन्यत्र जाने को मजबूर होंगे और यह इस शताब्दी की असामान्य हृदय विदारक त्रासदी होगी।

जिन कवियों ने हिमालय-गाथा कभी रची थी, उन्होंने कभी सोचा नहीं होगा कि हिमालय कभी हिम विहीन भी हो सकता है। अब जो हिमालय में हो रहा है, उसे ‘भौतिक व वास्तविक आक्रमण से कम कभी भी नहीं कहा जा सकता। जल, जंगल, जमीन और खनिज से भरपूर हिमालय पर अब उन विकासवादियों की नजर है जो प्राकृतिक संसाधनों को बिकाऊ माल भर समझते हैं और मानव को भी बिकाऊ माल बनाने के लिए संसाधन समझतेहैं जब ऐसे ‘समझदारों‘ का पूंजी और राजनैतिक नेतृत्व से जोड़ बैठ जाता है (जो अब निःसंदेह पूरी दुनिया में बैठ चुका है) तो दृष्टि सिर्फ इतनी बच जाती है कि कब कितनी क्षिप्र गति से सहस्त्राब्दियों में सृजित व संचालित संसाधनों को भीमकाय व स्वचालित मशीनें लगाकर बिकाऊ माल बनाकर बेच दिया जाए। इसी दृष्टि से हिमालय के जल-स्रोतों पर और भूमि, जंगल व खनिजों पर बहुराष्ट्रीय कंपनियों की नजर है।

यही कारण है कि हिमालय क्षेत्र में जो जगह-जगह पानी के स्रोत थे, वे सूखते जा रहे हैं, टिहरी-डैम का पानी दिल्ली को तो मिला लेकिन वहां के लोग इस कारण कृषि व पेय-जल से वंचित होते चले गए कृषि का जो लोक-पेय-जल से वंचित होते चले गए। लेकिन दूसरी ओर यह भी है कि हिमालय क्षेत्र में पानी की कमी आने से पर्वतीय क्षेत्र के मुकाबले दिल्ली ही पहले झुलसेगी, लेकिन तब भी भारत, नेपाल और चीन की सरकारें हिमालय की नदियों पर अपनी-अपनी राजनीति के अनुसार, डैम बनाने के लिए तत्पर है। एक तरफ कई विकसित देशों में डैमों की विफलता देखकर उन्हें तोड़ा जा रहा है लेकिन दूसरी और भारत की सरकार डैम-निर्माण के क्रेज से पीछे हटने को तैयार नहीं है। किस मानवीय गलती से सरस्वती सूख गई- इस पर आज तक कोई शोध नहीं हुआ। नदियों को टनेल बनाकर बहाना क्या विज्ञान सम्मत और युक्ति संगत है? अगर सूर्य ऊर्जा से कैलिफोर्निया में लोहे के तवों को 12000 डिग्री सेंटीग्रेट पर लगाकर उसे भाप बनाया जा सकता है तो उससे घर-घर बिजली क्यों नहीं दी जा सकती ? नदियों में जल-प्रवाह कम हो रहे हैं और गंगा सिकुड़ती जा रही है। ऐसे यह कल्पना ही कल्पनातीत होगा कि नदियों के सूखने के क्या परिणाम होंगे। यह बज्रपात से कम नहीं होगा, और हम धीरे-धीरे उस ओर उन्मुख हो रहे हैं।

दिखाने का फैशन सामाजिक संगठनों में है। लेकिन सच्चाई यह है कि यह अंतर्विरोध तभी मिटेगा जब हिमालय-क्षेत्र के विकास के केंद्र में वहां के लोग होंगे और संसाधनों के दोहन के लिए सिर्फ उन्हीं टेक्नोलाॅजी पर निर्भरता होगी जो कम से कम कार्बन का उत्सर्जन करते हों, कम पूंजी से सम्मानजनक रोजगार देते हों और आज के पूंजीवादी बाजार की केंद्रीयता में अपने को न रखते हों। इस पूरी प्रक्रिया में स्थानीय लोक-ज्ञान और उसकी गुणवत्ता में संवर्धन एक मुख्य आधार बना रहेगा। आज तो जनजातीय लोग अपने हिस्से के प्राकृतिक संसाधनों से भी सर्वथा वंचित होते जा रहे हैं। हिमालय में प्राकृतिक संसाधनों के बावजूद वहां के लोगों के लिए समता व सम्मानमूलक जीविकोपार्जन को केंद्र में रखकर कोई सरकारी हस्तक्षेप नहीं है। नतीजतन युवा जन तराई व अन्य शहरों में आकर छोटे-मोटे काम करने को बाध्य हैं ताकि किसी तरह जीवन तो चल सके। एक और बहुराष्ट्रीय कंपनियों की मार और भरमार, दूसरी और किसी भी तरह जीवन जी लेने की संभावना का कमतर होते जाना-आखिर यह क्या दर्शाता है ?

इस प्रकार, हिमालय में सड़कें और मकान भी वहां की भू-सरंचना और ढाल को देखकर नहीं बनाए जा रहे हैं। सड़कों के धंसने का क्रम वहां लगातार जारी है। आज दृष्टिकोण यही है कि कम से कम समय पर निवेश लगाकर वहां के संसाधनों का अधिकाधिक दोहन कर लिया जाए। हिमालय की प्रकृति-विशेष की सरंचना को ध्यान में रखकर लोक-ज्ञान के संदर्भ में नवीनतम वैज्ञानिक खोजों के आधार पर सरकार हस्तक्षेप करने को सोचतीही नहीं है।

हिमालय के संसाधनों का उपयोग इस तरह से होना चाहिए कि वह भावी पीढ़ी के लिए ही सुरक्षित रहे न कि इसका दोहन इस तरह हो कि अगले कुछ दशकों में ही हम करोड़ों लोगों के अस्तित्व पर ही खतरा पैदा करने का अक्षम्य अपराध करें। लेकिन फिर भी हम आज भी यह मानने को तैयार नहीं हैं कि आधुनिक ज्ञान के भ्रम पर आधारित आधुनिक विकास ने पूरी प्रकृति को ही खतरे में डाल दिया है। अभी तक यह समझ नहीं बन सकी है कि हिमालय के बर्बाद होने से हम सभी बर्बाद हो जाएंगे और यह भी कि प्रकृति का दोहन सुख-सुविधा और अमीरी बढ़ाने के लिए नहीं है। मुख्य समस्या यह है कि श्रम-बल आधारित पूंजी व उत्पादन की सरंचना स्वीकारने को हम तैयार नहीं हैं और यह अस्वीकार्यता ही गरीबी-अमीरी की खाई को समाज में बढ़ाती है । आज हिमालय में जो हो रहा है, वह उसी का प्रतिफलन है।

हिमालय की समस्या को क्षेत्रीयता या राष्ट्रीयता की दृष्टि से नहीं, बल्कि भू-गर्भीय सरंचना को ध्यान में रखकर पूरी समग्रता में देखा जाना चाहिए। हिमालय के प्रभाव-क्षेत्र में भारत, नेपाल, चीन, तिब्बत, पाकिस्तान और बंगला देश सभी आते हैं। इतना ही नहीं मानवीय आघातों के कारण इसके क्षरण का प्रभाव पूरी धरती पर पड़ेगा क्योंकि हिमालय जैसी सरंचना धरती का कोई अतिसामान्य घटक नहीं है बल्कि वह धरती का पूरी ताकत से उसका अविभाज्य हिस्सा है।

हिमालय में जैव-विविधता सर्वाधिक होने के कारण वहां जैविक खेती के माध्यम से खाद्य-उत्पादन बढ़ाकर खाद्य-सुरक्षा की वैकल्पिक कार्य-योजना बनाई जा सकती है। इस संदर्भ में भूटान ने अभिनव पहल की है उसके राष्ट्रीय खुशी को विकास का मेरूदंड बनाया है और जैविक खेती पर सर्वाधिक बल दिया है। अन्य सभी राष्ट्रीय सवालों की तरह हिमालय के सवाल पर भी देश के सांसद कुछ नहीं कर सकेंगे। हिमालय क्षेत्र के सवालों पर भी अनुभव तो यही है कि राष्ट्रीय सवालों पर सांसदों की अपनी पहल कुछ भी नहीं होती। इस मामले में कारपोरेट की लाॅबिंग करने से कुछ नहीं हो सकेगा क्योंकि वे खुद पर्वतीय क्षेत्र की वर्तमान स्थितियों के लिए जिम्मेदार हैं, अंधाधुंध दोहन में प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष भागीदार भी हैं और उसके लिए जिज्ञासु भी हैं।

कोई भी मुद्दा चाहे वह कितना भी सामयिक, सार्थक व सही क्यों न हो, सरकार उसे तब तक नहीं सुनती जब तक उस पर जन आंदोलन का दबाव न हो। इसलिए पर्वतीय क्षेत्र के मुद्दों पर जनआंदोलन बनाने की और उसी के बदौलत सरकार को दबाव में लाने की जरूरत है। शर्मिला इरोम की चिंता, सही होते हुए भी देश की चिंता नहीं बन सकी और इसलिए सरकारों को अनसुना करने में कोई दिक्कत नहीं हुई। हमारे लिए चुनौती यह है कि हिमालय से उभरी चुनौतियों को हम राष्ट्रव्यापी ही नहीं विश्वव्यापी भी बनाएं और उसी स्तर पर जनान्दोलनों को उभारने की ओर बढ़ें, चुनौती यह भी है कि हम अपने शिक्षण-सरोकारों में और व्यवहारों में भावी पीढ़ी को ‘हिमालय से अवगत‘ कराएं। हिमालय तभी बचेगा जब उसकी चिंताएं देश की चिंता बनेगी।

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