अमरकंटक से डिंडौरी

Submitted by Hindi on Tue, 08/04/2015 - 10:11
Source
शिवमपूर्णा, अप्रैल-मई 2015

क्या गार्गी और कान्ता मेें कोई दैवी शक्ति आ गई है? आज पहले ही दिन हम प्राय: 18 कि.मी. चले थे और उन्होंने जरा भी थकान महसूस नहीं की। बल्कि आते ही खाना बनाने में जुट गईं। इतना चलने के बाद जो पहला गाँव पड़ा, वह था पकरीसोंढ़ा- नर्मदा किनारे पसरी छोटी-सी बस्ती। रात को पाठशाला के बरामदे में सोए और ठंड में ठिठुरे।

दूसरे दिन रास्ते में किंरगी पड़ा। पहली यात्रा के दौरान मैं यहाँ दो दिन रहा था। जिनके घर रहा था, उनका नाम था केहर सिंह। सोचा, उनसे मिलते चलें। वे तो कहीं बाहर गए थे लेकिन उनकी पत्नी मिलीं। थोड़ी देर बैठकर आगे बढ़े और तीसरे पहर तक पचधार (भीमकुंडी) पहुँच गए। रात यहीं रहेंगे।

कोई डेढ़-दो घंटे बाद प्रसन्नता और उल्लास से भरी एक किशोरी आई और लगी हम सभी के पैर पड़ने। हम कुछ समझे नहीं। तब उसने कहा,‘‘मैं केहर सिंह जी की बेटी हूँ। जब वे घर आए तो माँ ने उन्हें आप लोगों के बारे में बताया। बहुत खुश हुए और मुझ से कहा कि जाओ, उन लोगों को हमारे घर लिवा लाओ। आज आप हमारे घर रहेंगे। आपको चलना ही होगा।’’

वह धूप में कोई 4 कि.मी. पैदल चलकर आई थी और इतना ही वापस जाना होगा। परायों से ऐसा प्यार! हम गहरे तक प्रभावित हुए।

केहर सिंह की बेटी का नाम मुहती है। ग्यारहवीं की परीक्षा दी है। पढ़ने में तेज है। उसके साथ एक युवती और है जो रिश्ते में उसकी मामी लगती है। श्यामल, सुंदर चेहरे वाली वह युवती इतनी लज्जालु है कि पूछने पर सिर भर हिलाती है। मुहती अपनी भावपूर्ण स्वर में बार-बार एक ही बात कह रही है- आप लोगों को हमारे घर चलना ही होगा!

गार्गी और कान्ता का दिल भर आया। कान्ता से रहा न गया। उसने मुहती के कपोलों को चूमा, माथे को सूँघा और उसे दोनों भुजाओं से बाँध लिया। मैं माँ-बेटी को ठगा-सा देखता रहा। फिर उसे स्नेह-भाव से समझाया कि जिस प्रकार नदी वापस नहीं जा सकती, उसी प्रकार परकम्मावासी भी वापस नहीं जा सकता।

कान्ता ने कहा, ‘‘बेटी, खाना खाकर जाना।’’
किन्तु अभी नवरात्र चल रहे हैं और उन दोनों का व्रत है। हमारे पास फलाहार की व्यवस्था थी। वह उन्होंने लिया।
उन्हें निराश लौटाना हमारे लिए कम कष्टप्रद नहीं रहा।

यहाँ के लोकगीत-रीना और सुआ गीत-सुनने की ललक रहती ही है। भाग्य से यहाँ की लड़कियाँ हमें वे गीत सुनाने को तैयार हो गईं। आसानी से तैयार नहीं हुई। यहाँ खुशमिजाज, हरफनमौला शरद का कौशल काम कर गया। उसे कोई लोकगीत आता था। उसने उसे गाना शुरू कर दिया और इसी के साथ लगा नाचने! हमारे दल की महिलाओं ने भी गीत गाए। अब तक उन लड़कियों की झिझक दूर हो गई थी और अपनी सुरीली आवाज में उन्होंने सुआगीत शुरू किया-

सीता ला हरके लैगे रावण, सीता ला हरके रावण
दे माई मोला भिक्खा मोर सुआ हो, दे माई मोला भिक्खा।
भिक्खा लेके निकले सीता, रावण चुरा के लैगे मोर सुआ हो।
दौड़ो-दौड़ो बचाव लछमन, दौड़ो-दौड़ो बचाव लछमन
रावण चुराके लैगे मोर सुआ हो...

जब वे अपने कोमल करूणाद्र स्वर में ‘दौड़ो दौड़ो बचाव लछमन’ कहतीं तो श्रोता भाव-विह्वल हो जाते। रामायण-महाभारत का यह कैसा राष्ट्रव्यापी प्रभाव है कि दूर-दराज के लोकगीत भी उनसे अछूते न रहे। लोकगीतों के जादू को ग्रामीण परिवेश-चाँदनी रात, अलाव, पेड़-पौधों और ढोर-डंगर से अलग नहीं किया जा सकता। वहाँ उनका माधुर्य कुछ और ही होता है। परिवेश से कटकर वे अपना बहुत-कुछ सौंदर्य खो बैठते हैं।

दल में सदस्य ज्यादा हैं, इसलिए सामान भी ज्यादा है। अकेले छोटू के बस की बात नहीं। हमें एक सहायक की जरूरत है। पता करने पर एक की जगह दो चलने को तैयार हो गए। सवेरे आ जाएँगे।

थोड़ी देर में उनमें से एक की पत्नी आकर बोली, ‘‘हमारे चार बच्चे हैं और घर में खाने को कुछ नहीं। अगर आप हमें पेशगी देते जाएँ, तो मैं खाने की कोई व्यवस्था कर सकूँ।’’ उसे सौ रूपए पेशगी के रूप में दे दिए गए।

ठंड कल से भी ज्यादा है।

दूसरे दिन शाम को सिवनी-संगम पहुँचे। यहाँ सिवनी नदी नर्मदा से मिलती है। यहाँ कोई गाँव नहीं है। छोटा-सा मंदिर और धर्मशाला है लेकिन बड़ और पीपल के विशाल पेड़ हैं और बड़े-बड़े चबूतरे हैं। यहाँ का नीरव एकांत मुझे इतना भा गया था कि पिछली यात्रा में यहाँ चार दिन रहा था। यहाँ के रतिराम तिवारी का स्नेहपगा आतिथ्य आज 24 साल बाद भी भूला नहीं था। लेकिन इस बार उन्होंने जो स्वागत किया, उसने तो उस प्रथम स्वागत को कहीं पीछे छोड़ दिया। उनकी पत्नी, बेटा, बहू-पूरा परिवार हम लोगों की आवभगत में लग गया। हम लोगों ने अपने को आत्मीयता के एक ऐसे घेरे में पाया, जहाँ प्यार ही प्यार था। दिल्ली के अखिल और मुंबई की गार्गी चकित हैं कि सर्वथा अनजान लोगों का ऐसा आत्मीय स्वागत हो सकता है।

साथ भोजन बना और साथ बैैठकर खाया। पिछले गाँव से बोझा उठाने के लिए जो दो ग्रामीण साथ चल रहे थे, वे आपस में कह रहे थे, ‘‘कितने दिनों बाद आज भरपेट खाना खाया।’’

इधर गाँवों में दाने-दाने को तरसते नर-कंकाल, उधर शहरों में वेग से बढ़ता मोटापा-ओबेसिटी। ओबेसिटी सार्थक शब्द है- वह सिटी की उपज है। गाँवों में मुझे शायद ही कोई मोटा या थुलथुल मिला हो।

हम लोग चबूतरे पर बैठे बातें कर रहे थे तभी अँधेरे को चीरती और तेज रोशनी फेंकती एक बड़ी कार आकर रूकी और उसमें से उतरे मेजर जनरल रह चुके मेरे बालबंधु प्रेमदास शर्मा। हम लोगों की खोज- खबर लेने सुदूर दिल्ली से आए थे। मेरी समझ में नहीं आया कि उसे सलामी दूँ या गले से लगाऊँ। कल हम लोगों के साथ पैदल चलेंगे, परसों वापस जाएँगे।

सुबह चलने लगे तो तिवारीजी के पूरे परिवार ने रूकने का बड़ा आग्रह किया पर जाना जरूरी था। तीसरे पहर के मध्य तक पथरकुचा पहुँच गए। नर्मदा- तट पर बनी रामकली बाई और उसके बेटों की झोंपड़ियाँ इतनी भा गई कि वहीं रह गए। पदयात्रा का यह बहुत बड़ा सुख है- जहाँ मन करता, वहीं डेरा डाल देते।

यहाँ इसी गाँव के एक निवासी ने हमें बताया , ‘‘छह दिन पहले की बात है। 42 परकम्मावासियों को समुद्र पार कराने के लिए एक नाव कतपोर से मीठी तलाई के लिए चली। नाव एक टापू के निकट पहुँची, तभी काले बादल घुमड़ आए, ठंडी हवाएँ चलने लगीं और बिजली भी कड़क जाती। आकाश काला हो गया और तेज बारिश होने लगी। समुद्र में बड़ी-बड़ी लहरें उठने लगीं। तूफान जोर पकड़ता जा रहा था। नाविक ने तुरन्त लंगर डाल दिया और हम लोगों से कहा कि किसी भी हालत में नाव को मत छोड़ना, कुछ नहीं होगा। भूलकर भी टापू पर मत जाना। थोड़ी ही देर में ज्वार आएगा और वह डूब जाएगा। लेकिन कुछ लोग इतना डर गए कि मना करने पर भी तैर कर टापू पर चले गए। हम 21 लोग नाव को कसकर पकड़े रहे और 21 ही टापू पर गए। जो वहाँ गए, उनमें से अधिकांश मर गए, जो नाव को पकड़े रहे, वे सभी सभी बच गए। मैं भी नाव को पकड़े रहा और बच गया। यह 3 अप्रैल 2003 की घटना है और गुजरात के अखबारों में भी छपी थी। वह एक भयंकर दुर्घटना थी और आज भी उसकी याद मुझे कँपा जाती है।’’

‘नौका डूबी ’ की यह कहानी मन को बहुत उदास कर गई। कई बार हम स्वयं अपने दुर्भाग्य का कारण बनते हैं।

नहाने गए। पानी जरा भी गहरा नहीं। पानी में कई चट्टानें हैं। एक जगह सपाट-सी चट्टान पाकर शरद ने नदी के प्रवाह में ही शीर्षासन लगा दिया! सिर पानी में, धड़ बाहर!

रामकली और उसके बहू-बेटे हम लोगों के उनके घर रूकने के कारण पुलकित थे। छाया के लिए किसी ने बाहर आँगन में वृक्षों के बीच में एक बड़ी-सी प्लास्टिक शीट तान दी। इसे देखकर कान्ता ने कहा,‘‘लगता है यहाँ किसी की शादी होने वाली हैं।’’

रामकली मनिहारिन है, आस-पास के गाँवों में चूड़ियाँ बेचती है। शाम घिरते ही उसने कान्ता को लाल चूड़ियाँ पहनाईं, गार्गी को भी पहनाई। सिंदूर देकर कान्ता से कहा-माँग भर लो। उसका मन रखने के लिए कान्ता ने माँग भर ली।

इसी घर से हवन-पात्र मिल गया तो उसमें अग्नि प्रज्वलित की गई। चंदोवे के नीचे, आँगन के मध्य में उसे रखा गया। दो पटे बिछा दिए गए। शरद ने हम दोनों से कहा, ‘‘अभी नवरात्र चल रहे हैं। मैया के तट पर हवन हो जाए। आप दोनों हमारे बुजुर्ग हैं, हम सभी चाहते हैं कि यह कार्य आपके द्वारा सम्पन्न हो।’’

कर्म-कांड से मैं दूर ही रहता हूँ। साफ मना कर दिया। किन्तु जब सभी ने कहा तो कुछ खीझ और कुछ अकुलाहट के साथ पटे पर बैठ गया। पास के पटे पर कान्ता बैठी। शरद ने कहा,‘‘मैं जब ‘स्वाहा’ बोलूँ, तब आप दोनों अग्नि में आहुति दें, बस।’’ मुझे यह देखकर आश्चर्य हुआ कि शरद को अनेक संस्कृत श्लोक कंठस्थ थे। श्लोकों के बीच में ज्यों ही वह ‘स्वाहा’ बोलता तो हम आहुति देते। पास-पड़ोस के ग्रामीण एकत्र हो गए थे और बड़े चाव से देख रहे थे।

तभी हवन रोककर शरद ने घोषणा की, ‘‘शादी की पचासवीं सालगिरह को लोग धूमधाम से मनाते हैं। कई लोग तो उसी शादी को दोबारा रचाते हैं हमारे वेगड़जी की शादी को पचास बरस पूरे होने में बस दो बरस की देर है। क्यों न शादी की उस पचासवीं सालगिरह को माँ नर्मदा के सान्निध्य में हम आज ही मना लें?’’

शरद का षड्यंत्र अब जाकर समझ में आया! इसकी जानकारी केवल हम दो को ही नहीं थी। यही नहीं, उन्होंने रामकली बाई को भी इसमें शामिल कर लिया था। तभी तो उसने कान्ता को चूड़ियाँ पहनाई थी और माँग भरवाई थी। अब तो हम भी इस नाटक में खुशी-खुशी शामिल हो गए। संयोग से कान्ता ने उस दिन जो साड़ी पहनी थी, उसमें वह दुलहन जैसी लग भी रही थी। और मैं..मैं कितना अंड-बंड दिखाई दे रहा था!

तभी शरद ने घोषणा की, ‘‘अब दूल्हे की पगड़ी-रस्म होगी।’’

मैंने घबराकर कहा, ‘‘पगड़ी-रस्म तो मरने के बाद होती है, मैं तो अभी जिन्दा हूँ!’’

‘‘क्षमा करें, दूल्हे को साफा बाँधा जाएगा।’’

गार्गी बहन की रंगीन चूनर से डॉ. मिश्र ने साफा बाँधना शुरू किया। उन्हें यह काम यह सोचकर सौंपा गया था कि उन्हें मरीजों को पट्टी बाँधने का अनुभव होगा ही। लेकिन उनसे अकेले जब यह नहीं बना, तो दो-तीन लोगों ने मिलकर कसकर बाँधा। कान्ता ने कहा, ‘‘खूब फब रहे हो!’’

शरद ने कहा, ‘‘अब परिहारजी दूल्हे का टीकाकरण करेंगे।’’

मैंने फिर टोका, ‘‘टीकाकरण तो डॉक्टर करते हैं। फिर शादी का कोई टीका निकला हो, ऐसा सुना तो नहीं।’’

‘‘क्षमा करें ,परिहारजी दूल्हे को तिलक लगाएँगे।’’

शरद का संस्कृत श्लोकों का पाठ भी निरंतर चलता रहता। गनीमत थी कि वे गायत्री-मंत्र थे। अगर उसे गरुड़-पुराण याद होता , तो उसी से हम दोनों की शादी करवा देता।

इसके बाद उसने जबर्दस्त घोषणा की,‘‘दिल्ली से पधारे प्रेमदास शर्मा कन्यादान करेंगे।’’

कन्यादान की रस्म पूरी होने पर कान्ता ने कहा, ‘‘शर्माजी, आज से आप मेरे वालिद हुए।’’

परिहारजी के अंगोछे से वर-वधू का गठबंधन हुआ। गार्गी ने गुजराती विवाह गीत गाया। स्थानीय महिलाओं ने वहाँ के गीत गाए, हमने एक-दूसरे को मालाएँ पहनाईं और विवाह सम्पन्न! नर्मदा इतनी पास बह रही थी कि लगा यह विवाह नर्मदा के बैठकखाने में सम्पन्न हुआ हो। शरद ने पुरोहित और उद्घोषक की दुहरी भूमिका बड़ी जुगत से निभाई। वह गाँववालों को न्यौता देना भी नहीं भूला था। पास-पड़ोस के काफी लोग आ गए थे। सभी को चना-चिरौंजी का प्रसाद दिया गया।

प्रीतिभोज शर्माजी की ओर से था। वे अपने साथ दिल्ली से एक नेपाल रसोइया ले आए थे और नाना प्रकार के व्यंजन भी। उस नेपाली ने क्या ही स्वादिष्ट पुलाव बनाया था! हमने उसे ठूँस-ठूँस कर खाया। खीर भी बनी लेकिन अविस्मरणीय तो बस पुलाव था।

दूसरे दिन सबेरे चलने लगे तो रामकलीबाई ने मुझसे कहा,‘‘हम अपनी बेटी का गौना अभी ने करेंगे, बाद में लेने आना।’’

बड़ी तेज सास निकली यह तो! मैंने कहा, ‘‘विदा की क्या जरूरत है, मैं तो घर जमाई बनने के लिए तैयार हूँ।’’

दो बरस बाद हमारी शादी की 50 वीं सालगिरह आएगी। उस अवसर पर हमारे घर में कोई न कोई आयोजन होगा ही। लेकिन वह वैसा ही होगा, जैसे हजारों होते हैं -जाना बूझा औपचारिक आयोजन। उसमें कौतूहल का भाव न होगा। उसमें न तो शरद जैसा अनाड़ी पुरोहित होगा (जिसने बगैर भाँवरों के ही हमारी शादी करवा दी) और न रामकली बाई जैसी स्नेहमयी सास। न पगड़ी रस्म होगी, न टीकाकरण और न ही प्रेमदास जैसा कन्या का पिता। उसमें नाटकीयता का कोई तत्व न होगा। तब उसमें रस ही कहाँ रह जाएगा? वह होगा आयोजन, यह था उत्सव -नर्मदा-तट पर सहसा उग आया प्यारा -सा उत्सव!

रामकलीबाई को कान्ता से ऐसा नेह हो गया है कि करबेमट्टा तक वह साथ चलेगी। वहाँ उसका मायका और दो बेटियों की ससुराल है। करबेमट्टा ज्यादा दूर नहीं। एक टीले पर देवी-स्थान है। और वहाँ नाना प्रकार के त्रिशूल गड़े हैं। जैसे तने में से डगालें निकलती हैं और उनमें से छोटी डगालें और फिर टहनियाँ, उसी प्रकार एक बड़े त्रिशूल में से कई छोटे-छोटे त्रिशूलों को निकलते देखकर चकित रह गया था। आज उन्हें दोबारा देखूँगा और अपने साथियों को भी दिखाऊँगा।

किन्तु जब ऊपर गए तो देखा उन कलात्मक त्रिशूलों में से एक भी न था। कुछेक छोटे-छोटे त्रिशूल जरूर थे लेकिन बड़े आकार के सर्वांग सुंदर त्रिशूल गायब थे। विदेश के किसी संग्रहालय की शोभा बढ़ा रहे होंगे।

यहाँ से प्रेमदास अपनी गाड़ी में चले गए। उनके साथ गार्गी, डॉ.मिश्र और परिहारजी भी चले गए। जाते समय डॉ.मिश्र बहुत भावुक हो उठे। रामकलीबाई अपने मायके गई। जाने से पहले बार-बार कहती रही, ‘‘माया-ममता बनाए रखना।’’ हम पाँच आगे बढ़े।

तीसरे पहर तक लिखनी पहुँच गए। नर्मदा-तट पर छोटी लेकिन दो मंजिल वाली धर्मशाला है, उसी में रहे। गाँव पास में ही है। शाम को कुछ स्त्रियाँ जवारे सिराने आईं। उनमें से एक ने कान्ता से कहा,‘‘बहन, मेरे घर टीवी है। चाहो तो देखने चले आना।’’

कान्ता ने कहा,‘‘हमें टीवी की नहीं, ढिबरी की जरूरत है।’’

टीवी बनाम ढिबरी! मुझे यह देखकर बड़ी खुशी हुई कि टीवी पर ढिबरी भारी पड़ी। शाम तक ढिबरी आ गई।

अगले दिन चरकुटिया में कबीरपंथी मुन्ना सिंह के घर रहे। उस दिन रामनवमी थी। उसके यहाँ पूजा-पाठ और भजन-कीर्तन का आयोजन था। इसमें हम लोग भी शामिल हुए। सबेरे चल दिए। मड़ियारास में नर्मदा का किनारा काफी ऊँचा है और मंदिर और धर्मशाला भी है। सबेरे से लेकर तीसरे पहर तक स्नानार्थियों की भारी भीड़ रहती है। यहाँ हमने दोपहर का विश्राम किया और आगे बढ़े।

आगे गोमती (मछरार) पड़ी। उसकी मुख्य धारा में काई के कारण बड़ी फिसलन थी। वह सँकरी ही थी, मैं तो उसे लाँघ गया लेकिन कान्ता के लिए यह सम्भव न था। प्रवाह में पैर रखकर ही वह उसे पार कर सकती थी। उसने हाथ बढ़ाया तो मैंने उसका हाथ थाम लिया। पहले उसने लाठी जमाई, फिर प्रवाह में पैर रखा। रखते ही फिसला और हम दोनों धड़ाम से पानी में गिरे।

पानी गहरा नहीं था। किसी तरह उठे। चोट-वोट तो दूर, खरोंच तक नहीं आई। कान्ता ने कहा, ‘‘मैं तो गिरी ही, आपकों भी गिराया।’’

बात सच थी। लेकिन इस समय सच से ज्यादा जरूरी झूठ था- एक प्यारा-सा झूठ। मैंने कहा,‘‘तुम भले ही गुरूत्वाकर्षण के कारण गिरी हो, मैं तो किसी और ही आकर्षण से गिरा हूँ।’’

तब तक शरद आ गया था। उसने कहा,‘‘रोज आप अलग-अलग नहाते थे, गोमती की इच्छा थी कि आज साथ नहाएँ।’’ कमर तक के कपड़े भींग गए थे। गीले कपड़ों में ही चल दिए। थोड़ी देर में सूख भी गए।

रात लछमनमड़वा में रहे। यहाँ उस साध्वी की सहज ही याद हो आई जिनसे मैंने कहा था कि नौकरी के कारण एक साथ परिक्रमा नहीं कर सकता, छुट्टियों में थोड़ी-थोड़ी करके करता हूँ, तो उन्होंने कहा था,‘‘बेटा, इसकी चिन्ता न करना। बूँदी का लड्डू- पूरा खाओ तो मीठा, चूरा खाओ तो मीठा।’’

यहाँ से डिंडौरी दूर नहीं। दस बजे तक पहुँच गए। घाट पर नीमाबाई और उसकी बहन ने धर्मशाला बनवाई है और परकम्मावासियों को भोजन भी कराती हैं नीमाबाई के साँवले-सलोने मुखड़े पर दूध-से सफेद दाँत ऐसे लग रहे थे मानो मोती जड़े हों। वह बहुत ही भले ढंग से मुसकराती। उसका चेहरा जितना कोमल था, मुसकान उतनी ही पवित्र।

यहाँ यात्रा समाप्त हो गई। शाम को घर चले जाएँगे।

अमरकंटर से डिंडौरी तक की पूरी यात्रा में कान्ता साथ रही। मुझे खुशी कि 67 वर्ष की आयु में वह यह पदयात्रा कर सकी। लेकिन मार्ग सरल था, प्राय: मैदान में से ही चलना हुआ। आगे डिंडौरी से मंडला तक की यात्रा बहुत कठिन होगी। यहाँ नर्मदा पहाड़ों में से बहती है। पगडंडी ऊबड़-खाबड़ और खतरनाक है। ऊँची-नीची राहों पर चढ़ते-उतरते चलना बहुत मुश्किल होगा। पैर भी रपटेगा। यात्रा की कठिनाइयों को देखते हुए मैं चाहता हूँ कि कान्ता न चले। और वह कह रही है कि मैं जरूर चलूँगी। ‘‘मार्ग के खतरों से डरकर न चलूँ- इस भरोसे मत रहना।’’

सच बात यह है कि इस उम्र में वह मुझे अकेले जाने देना नहीं चाहती। घर पर रहेगी तो दिन-रात उसे मेरी ही चिन्ता लगी रहेगी। वह मेरी हिफाजत के लिए चलना चाहती है। यह बात अलग है कि कल ही गोमती में वह खुद तो गिरी ही थी, मुझे भी गिराया था। लेकिन उसे समझाना व्यर्थ है। वह चलेगी जरूर।

एक बार परिक्रमा के दौरान परकम्मावासियों का एक दल मिला था। उसमें दो बहनें भी थीं। युवा ही थी। मैंने उनसे पूछा, ‘‘रास्ते में कोई तकलीफ?’’

‘‘कैसी तकलीफ! मैया ने हमें फूल की तरह रखा है।’’

माँ नर्मदे! इस जिद्दी औरत को भी फूल की ही तरह रखना!

1836 राइटटाऊन, जबलपुर-2 (म.प्र.)
 

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