आंकड़ों में छुपा है पानी

Submitted by birendrakrgupta on Mon, 09/01/2014 - 13:04
Source
जनसत्ता, 27 जून 1985
महोबा के मदन सागर का प्रदूषित पानी बीमारियां बांट रहा है। बीते पांच सालों में जल निगम ने 950 हैंडपंप चलवाने की बात कही लेकिन महज 463 हैंडपंप जल संस्थान को हस्तांतरित किए गए हैं। 281 हैंडपंप तकनीकी गड़बड़ियों से बेकार पड़े हैं। खारा पानी सप्लाई करने के कारण ...योजना के 2 और राठ योजना का एक नलकूप बेकार हो गया है। अर्जुनसागर बांध से चरखारी के लिए पेयजल योजना अधर में ही लटकी है तथा अभी 76 गांव योजना के लाभ की प्रतीक्षा में हैं जिसमें से 60 समस्याग्रस्त हैं। आधा उत्तर प्रदेश सूखे की चपेट में है। हालत यहां तक पहुंच चुकी है कि 20 जिलों में तो पीने के पानी की भी समस्या मुंह बाए खड़ी है। उत्तराखंड के 8, बुंदेलखंड के 5 और पूर्वांचल के इलाहाबाद, मिर्जापुर, जौनपुर, गाजीपुर, बनारस, आजमगढ़ और देवरिया जिलों में पानी इतना नीचे पहुंच गया है कि कुओं में सिवाए गंदले कीचड़ के कुछ नहीं आता। पर जल निगम के आंकड़े कहते हैं कि इन जिलों में पानी का इंतजाम तो पर साल ही पूरा कर लिया गया था।

इलाहाबाद और मिर्जापुर में तो हालत काफी खराब हो गई है। 14 मई को तूफान ने काफी बदइंतजामी फैला दी। हजारों लोग भुखमरी के कगार पर पहुंच गए हैं। और गांवों के 60 प्रतिशत से ज्यादा कुएं सूख गए हैं। मेजा के 160 गांवों में तो तबाही का आलम है पर जल निगम इन गांवों को बाकायदा सिंचित करार दे रहा है। जल निगम के मुताबिक मार्च 1985 तक 1291 गांवों में पीने के पानी का इंतजाम दिया गया। 1058 गांवों में पाइप लाइन द्वारा और 233 गांवों में इंडिया मार्क-2 हैंडपंप के जरिए पेयजल की व्यवस्था की गई। जल निगम ने गांवों में 22000 से ज्यादा जल कनेक्शन दिए हैं फिर भी तबाही है। असल में राहत की कागजी योजनाओं के चलते ही यह स्थिति आई है। अन्यथा अब तक हर गांव को पीने के पानी का ठोस जरिया दिया जा सकता था।

हंडिया तहसील के दो दर्जन गांवों में पानी का हाहाकार मचा है। पूरा दोआबा पीने के पानी के संकट से त्रस्त हैं। धनावल, करमा, जसरा, नारीगरी तथा दाइपुर सामूहिक पेयजल योजनाओं की लापरवाही से सैकड़ों गांवों के लोग बूंद-बूंद को मुहताज हैं। प्यास से तड़पते पागू गांव के सैकड़ों लोग गड्ढे खोद कर प्रदूषित पानी पी रहे हैं। मऊआइमा, मलकिया तथा गेरापुर की पेयजल योजनाएं भी बेकार हैं।

बनारस के 325 गांवों में जल संकट मौजूद है। 50 प्रतिशत से ज्यादा कुएं सूख गए हैं। खुद जिला प्रशासन मान रहा है कि 320 गांवों के तालाब और 2577 कुएं सूख चुके हैं। नलकूपों का आलम यह है कि 1154 नलकूपों में 944 ही काम कर रहे हैं शेष रामभरोसे हैं। इनके बूते लगभग पौने सात लाख लोगों को पानी मिलता है। कुल 2205 हैंडपंप हैं जो इतनी आबादी के लिए नाकाफी हैं। सरकार ने ज्यादा हैंडपंप लगवाने के लिए हाल में 11 लाख रुपए जिला प्रशासन को दिए हैं। प्यासे गांवों को अभी टैंकर पर निर्भर रहना पड़ रहा है। जौनपुर के गांवों में स्थितियां कम खराब नहीं हैं। अकेले रामपुर तथा बरसठी विकास खंड में 110 गांव भीषण जल संकट से जूझ रहे हैं।

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक गाजीपुर के 100 से ज्यादा गांवों में जल संकट है। सरकार ने 12 लाख रुपए सहायता के लिए मंजूर किए हैं। जल निगम से जिले के 2510 गांवों में से महज 1274 गांवों को ही पेयजल योजनाओं का लाभ मिल रहा है। शेष के लिए योजना अधर में लटकी है या 1236 गांवों में सार्वजनिक पेयजल की व्यवस्था ही नहीं है। वैसे प्रशासन द्वारा दिया गया 100 तबाह गांवों का आंकड़ा बहुत ही भ्रामक है क्योंकि अकेले मुहम्मदाबाद तहसील में ही पेयजल संकट से घिरे गांवों की तादाद 88 से ज्यादा है। गाजीपुर के कई हिस्से बीते साल भी सूखे के चपेट में रहे हैं।

मिर्जापुर के सात सौ से ज्यादा गांवों में पीने के पानी का संकट है। उत्तर प्रदेश के इस सबसे बड़े जिले में आदिवासी गांवों को छोड़ कर भाग रहे हैं। जल निगम के 1972 के सर्वेक्षण में 1872 गांवों को अभावग्रस्त घोषित किया गया। इस समय 1674 गांव 33 सामूहिक पेयजल योजना से लाभ उठा रहे हैं। पर 628 तबाह की कोटी में जुड़ गए हैं। जिले में कुल 1828 हैंडपंप लगे हैं जिसमें 190 खराब हैं और 25 प्रतिशत प्रायः तकनीकी गड़बड़ियों से ठप्प ही रहते हैं। 3.50 करोड़ रुपए की लागत की बटौली कुशाही योजना लेटलतीफी के चलते अभी तक नहीं तैयार हो पाई है अन्यथा राजगढ़, घोरावल तथा राबर्ट्सगंज के 153 गांवों में राहत मिलती। जिले के 260 नलकूपों में 12 स्वास्थ्य मंत्री लोकपति त्रिपाठी के निर्वाचन क्षेत्र मचता में हैं। जबकि यहां पेयजल योजनाओं का आलम यह है कि 33 में से 29 ही काम कर रही हैं। सूखे से राबर्ट्सगंज तथा दुही की 50 प्रतिशत खरीफ की फसल को पाला मार गया है। बीते साल साढ़े तीन हजार गांव सूखे की चपेट में थे जिनमें वर्तमान में ढाई हजार के करीब गांवों की हालत निहायत दयनीय है। कई सालों से सूखे ने खेत मजदूरों एवं छोटे किसानों की रीढ़ ही तोड़ दी है तथा वे गांव छोड़ भाग रहे हैं इसके लिए शासन से तीन करोड़ राहत मद में मांगे गए हैं। विडंबना तो यह कि इस वर्ष शीतकालीन वर्षा भी महज 23.5 मि.मी. हुई। जिससे सूखे का निर्दय रूप यहां देखने को मिल रहा है।

बुंदेलखंड पिछले सूखे से ऊबर भी नहीं पाया कि पानी से त्रस्त हो गया। बांदा के नगरीय हिस्सों के साथ ही दो दर्जन गांवों में भीषण तबाही है। पाठा में तो हालात और बदतर हैं। हालांकि यहां पेयजल संकट के बाबत दोहरी जलापूर्ति योजनाएं हैं लेकिन बदइंतजामी से सब ठप्प हैं। इन योजनाओं के अधीन आठ-नौ गांवे में नुमाइश के ले टंकिया (ओवरहैड टैंक) खड़े हुए चलने की प्रतीक्षा में हैं। पाठा क्षेत्र की मारकुंडी योजना भी असफल हो रही है।

हमीरपुर जिले में भी तबाही कर तांडव जारी है और 200 से ज्यादा गांवों के लोग पानी की प्रतीक्षा कर रहे हैं। पेयजल संकट की गिरफ्त में तकरीबन साढ़े चार लाख लोग आए हैं। नदी नाले तथा कुएं सूखने के कगार पर हैं। जिले में 943 गांवों में 573 गांव 72 के सर्वेक्षण में संकटग्रस्त घोषित किए गए थे। अभी भी 322 गांवों की आबादी तबाह है। ढाई करोड़ से ज्यादा की लागत वाली पेयजल योजनाएं बदइंतजामी के चलते ग्रामीणों की प्यास नहीं बुझा सकीं। अभी भी महोबा के मदन सागर का प्रदूषित पानी बीमारियां बांट रहा है। बीते पांच सालों में जल निगम ने 950 हैंडपंप चलवाने की बात कही लेकिन महज 463 हैंडपंप जल संस्थान को हस्तांतरित किए गए हैं। 281 हैंडपंप तकनीकी गड़बड़ियों से बेकार पड़े हैं। खारा पानी सप्लाई करने के कारण ...योजना के 2 और राठ योजना का एक नलकूप बेकार हो गया है। अर्जुनसागर बांध से चरखारी के लिए पेयजल योजना अधर में ही लटकी है तथा अभी 76 गांव योजना के लाभ की प्रतीक्षा में हैं जिसमें से 60 समस्याग्रस्त हैं। पेयजल संकट से तमाम शादी विवाह स्थगित हो गए हैं तथा अब जानवर तक मरने लगे हैं। अगर पेयजल योजनाओं का यही आलम रहा तो आगे के सालों में कुछ ज्यादा ही तबाही मचेगी।

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