अंटार्कटिका-दुनिया का सबसे ठंडा महाद्वीप

Submitted by Hindi on Mon, 01/31/2011 - 09:37
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कुदरतनामा

सातों महाद्वीपों में से सबसे ठंडा महाद्वीप अंटार्कटिका महाद्वीप है। वह सबसे दुर्गम तथा मानव-बस्तियों से सबसे दूर स्थित जगह भी है। वह साल के लगभग सभी महीनों में दुनिया के सबसे अधिक तूफानी समुद्रों और बर्फ के बड़े-बड़े तैरते पहाड़ों से घिरा रहता है। उसका कुल क्षेत्रफल 1.4 करोड़ वर्ग किलोमीटर है। क्षेत्रफल की दृष्टि से वह आस्ट्रेलिया से बड़ा है। अंटार्कटिका में बहुत कम बारिश होती है, इसलिए उसे ठंडा रेगिस्तान माना जाता है। वहां की औसत वार्षिक वृष्टि मात्र 200 मिलीमीटर है।

सन् 1774 में अंग्रेज अन्वेषक जेम्स कुक अंटार्कटिका वृत्त के दक्षिण में किसी भूभाग की खोज में निकल पड़ा। उसे बर्फ की एक विशाल दीवार मिली। उसने अनुमान लगाया कि इस दीवार के आगे जमीन होगी। उसका अनुमान सही था, वह अंटार्कटिका की दहलीज तक पहुंच गया था। पर स्वयं अंटार्कटिका पर पैर रखने के लिए मनुष्य को 75 साल और लगे।

आर्कटिक (उत्तरी ध्रुव) और अंटार्कटिका (दक्षिणी ध्रुव) में काफी अंतर है। सबसे महत्वपूर्ण अंतर यह है कि अंटार्कटिका में आर्कटिक से छह गुणा अधिक बर्फ है। यह इसलिए क्योंकि अंटार्कटिका एक महाद्वीप है, जबकि आर्कटिक क्षेत्र मुख्यतः एक महासागर है। अंटार्कटिका की बर्फ की औसत मोटाई 1,6 किलोमीटर है। अंटार्कटिका महाद्वीप का अधिकांश भाग पर्वतों के उभरे हुए कंधों और चोटियों से बना हुआ है।

अंटार्कटिका का मौसम बिरले ही पाले और बर्फीली हवाओं से मुक्त रहता है। इस महाद्वीप में शायद मात्र 2,000 वर्ग किलोमीटर खुली जमीन है। साल में केवल 20 ही दिन तापमान शून्य से ऊपर रहता है। पृथ्वी की सतह पर मापा गया सबसे कम तापमान भी अंटार्कटिका में ही मापा गया है। सोवियत रूस द्वारा स्थापित वोस्टोक नामक शोधशाला में 24 अगस्त 1960 को तापमान -88.3 डिग्री सेल्सियस मापा गया।

अंटार्कटिका के बारे में सही ही कहा गया है कि वह पवनों की राजधानी है। कभी-कभी 320 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार वाली हवाएं चल पड़ती हैं, जो जमीन से मिट्टी के कणों को काट कर उड़ा ले जाती हैं।

पूरे अंटार्कटिका महाद्वीप में मात्र 70 प्रकार की जीवधारियां खोजी गई हैं। इनमें से 44 कीड़े-मकोड़े हैं। सबसे बड़ा कीड़ा एक प्रकार का पंखहीन मच्छर है। जोंख, खटमल, मक्खी, जुए आदि भी वहां काफी संख्या में पाए जाते हैं। अंटार्कटिका में कोई स्थलीय स्तनधारी प्राणी नहीं है, पर बहुत से समुद्री स्तनधारी उसके तटों पर विश्राम करने आते हैं, या उसके आसपास के समुद्रों में आहार खोजते हैं। इनमें शामिल हैं कई प्रकार की ह्वेलें और दक्षिणी ध्रुव के आसपास रहने वाले पांच प्रकार के सील – केकड़ा भोजी सील, तेंदुआ सील, रोस सील, वेडेल सील और गजसील। रोस सील अत्यंत दुर्लभ प्राणी है, जबकि वेडेल सील तटों के नजदीक ही रहता है। सभी सीलों में बड़ा गजसील है। वह प्रजनन तो अंटार्कटिका के निकट के द्वीपों में करता है, लेकिन अंटार्कटिका के आसपास भोजन की तलाश करने आता है। अंटार्कटिका के पास के समुद्रों में बिना दांतवाली ह्वेलें काफी मात्रा में पाई जाती हैं। उन्हें एक समय मांस, चर्बी आदि के लिए बड़े पैमाने पर मारा जाता था। आज उनके शिकार पर अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध लगा हुआ है। अंटार्कटिका में पाए जानेवाले पक्षियों में शामिल हैं दक्षिण ध्रुवीय स्कुआ तथा अडेली और सम्राट पेंग्विन।

अंटार्कटिका में शाकाहारी प्राणी अत्यंत दुर्लभ हैं, कारण कि वनस्पति के नाम पर वहां शैवाक (लाइकेन), काई आदि आदिम पौधों की कुछ जातियां और केवल दो प्रकार के फूलधारी पौधे ही हैं।

अंटार्कटिका इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि वहां अनेक प्रकार के वैज्ञानिक प्रयोग किए जा सकते हैं। वैज्ञानिकों ने वहां पृथ्वी की चुंबकीय विशेषताओं, मौसम, सागरीय हलचलों, जीवों पर सौर विकिरण के प्रभाव तथा भूगर्भ विज्ञान से संबंधित अनेक प्रयोग किए हैं।

भारत सहित अनेक देशों ने अंटार्कटिका में स्थायी वैज्ञानिक केंद्र स्थापित किए हैं। इन देशों में शामिल हैं चीन, ब्राजील, अर्जेन्टीना, कोरिया, पेरू, पोलैंड, उरूग्वे, इटली, स्वीडेन, अमरीका, रूस आदि।

भारत द्वारा स्थापित प्रथम पड़ाव का नाम था दक्षिण गंगोत्री। जब यह पड़ाव पानी के नीचे आ गया, तो मैत्री नामक दूसरा पड़ाव 1980 के दशक में स्थापित किया गया।

सदियों से अंटार्कटिका प्रदूषण के खतरे से मुक्त था, पर अभी हाल में वैज्ञानिकों ने वहां की बर्फ में भी डीडीटी, प्लास्टिक, कागज आदि कचरे खोज निकाले हैं, जो वहां स्थापित वैज्ञानिक शिविरों से पैदा हुए हैं।

वैज्ञानिकों का मानना है कि अंटार्कटिका में 900 से भी अधिक पदार्थों की महत्वपूर्ण खानें हैं। इनमें शामिल हैं सीसा, तांबा और यूरेनियम।

अंटार्कटिका पर अभी किसी देश का दावा नहीं है, न ही विभिन्न देशों के कुछ वैज्ञानिक शिविरों के सिवा वहां कोई मानव बस्तियां ही हैं। पर क्या यह स्थिति हमेशा ऐसी बनी रह पाएगी? जैसे-जैसे मानव आबादी बढ़ती जाएगी, अमरीका, अफ्रीका, आस्ट्रेलिया आदि महाद्वीपों के समान इसके उपनिवेशीकरण के लिए भी होड़ मच सकती है। यदि वहां किसी महत्वपूर्ण खनिज (जैसे, सोना, पेट्रोलियम, आदि) की बड़ी खानों का पता चले, तो भी उन पर अधिकार जमाने के लिए अनेक देश आगे आएंगे। पृथ्वी के गरमाने से अंटार्कटिका की काफी बर्फ पिघल सकती है, जिससे वहां काफी क्षेत्र बर्फ से मुक्त हो सकता है और मनुष्य के रहने लायक बन सकता है। इससे भी अंटार्कटिका में मनुष्यों का आना-जाना और बसना बढ़ सकता है। पर्यटन भी इसमें योगदान कर सकता है। जैसे-जैसे प्रौद्योगिकीय विकास होगा, ऐसे उपकरण उपबल्ध होने लगेंगे जो अंटार्कटिका जैसे अत्यंत ठंड वाले इलाकों में भी सामान्य जीवन बिताने को सुगम बनाए।

इसलिए 17वीं 18वीं सदी में श्वेत जातियों द्वारा अफ्रीका, द. अमरीका आदि में जो लूट-खसोट और विनाश लीला मचाई थी, उससे इस अनोखे परिवेश को बचाने और इस महाद्वीप के अधिक संतुलित और समस्त मानव-जाति के हित में उपयोग को बढ़ावा देने के लिए 1959 में 12 देशों ने अंटार्कटिका संधि में हस्ताक्षर करके इस महाद्वीप को सैनिक गतिविधियों और खनन से मुक्त रखने का निर्णय लिया। अब इस संधि में 46 देशों ने हस्ताक्षर कर दिए हैं, जिसमें भारत भी शामिल है।

 

 

अंटार्कटिक महाद्वीप


अंटार्कटिक महाद्वीप दक्षिणी ध्रुव प्रदेश में स्थित विशाल भूभाग को अंटार्कटिक महाद्वीप अथवा अंटार्कटिका कहते हैं। इसे अंध महाद्वीप भी कहते हैं। झंझावातों, हिमशिलाओं तथा ऐल्बैट्रॉस नामक पक्षी वाले भयानक सागरों से घिरा हुआ यह एकांत प्रदेश उत्साही मानव के लिए भी रहस्यमय रहा है। इसी कारण बहुत दिनों तक लोग संयुक्त राज्य अमरीका तथा कनाडा के संमिलित क्षेत्रफल की बराबरी करने वाले इस भूभाग को महाद्वीप मानने से भी इनकार करते रहे।

खोजों की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि- 17वीं शताब्दी से ही नाविकों ने इसकी खोज के प्रयत्न प्रारंभ किए। 1769 ई. से 1773 ई. तक कप्तान कुक 71 10’ दक्षिण अक्षांश, 106 54 प. देशांतर तक जा सके। 1819 ई. में स्मिथ शेटलैंड तथा 1833 ई. में केंप ने केंपलैंड का पता लगाया। 1841-42 ई. में रॉस ने उच्च सागरतट, उगलते ज्वालामुखी इरेवस तथा शांत माउंट टेरर का पता पाया। तत्पश्चात्‌ गरशेल ने 100 द्वीपों का पदा लगाया। 1910 ई. में पाँच शोधक दल काम में लगे थे जिनमें कप्तान स्काट तथा अमुंडसेन के दल मुख्य थे। 14 दिसंबर को 3 बजे अमुंडसेन दक्षिणी ध्रुव पर पहुँचा और उस भूभाग का नाम उसने सम्राट हक्कन सप्तम पठार रखा। 35 दिनों बाद स्काट भी वहाँ पहुँचा और लौटते समय मार्ग में वीरगति पाई। इसके पश्चात्‌ माउसन शैकल्टन और बियर्ड ने शोध यात्राएँ कीं। 1950 ई. में ब्रिटेन, नार्वे और स्वीडन के शोधक दलों ने मिलकर तथा 1950-52 में फ्रांसीसी दल ने अकेले शोध कार्य किया। नवंबर, 1958 ई. में रूसी वैज्ञानिकों ने यहाँ पर लोहे तथा कोयले की खानों का पता लगाया। दक्षिणी ध्रुव 10,000 फुट ऊँचे पठार पर स्थित है जिसका क्षेत्रफल 50,00,000 वर्ग मील है। इसके अधिकांश भाग पर बर्फ की मोटाई 2,000 फुट है और केवल 100 वर्ग मील को छोड़कर शेष भाग वर्ष भर बर्फ से ढका रहता है। समतल शिखर वाली हिमशालाएँ इस प्रदेश की विशेषता हैं।

यह प्रदेश पर्मोकार्बोनिफेरस समय की प्राचीन चट्टानों से बना है। यहाँ की चट्टानों के समान चट्टानें भारत, आस्ट्रेलिया, अफ्रीका तथा दक्षिणी अमेरिका में मिलती हैं। यहाँ की उठी हुई बीचियाँ क्वाटरनरी समय में धरती का उभाड़ सिद्ध करती हैं। यहाँ हिमयुगों के भी चिह्न मिलते हैं। ऐंडीज़ एवं अंटार्कटिक महाद्वीप में एक सी पाई जाने वाली चट्टानें इनके सुदूर प्राचीन काल के संबंध को सिद्ध करती हैं। यहाँ पर ग्रेनाइट तथा नीस नामक शैलों की एक 1100 मील लंबी पर्वत श्रेणी है जिसका धरातल बलुआ पत्थर तथा चूने के पत्थर से बना है। इसकी ऊँचाई 8,000 से लेकर 15,000 फुट तक है।
जलवायु-ग्रीष्म में 60दक्षिण अक्षांश से 78 द. अ. तक ताप 28 फारेनहाइट रहता है। जाड़े 71 30’ द. अ.में 45 ताप रहता है और अत्यंत कठोर शीत पड़ती है। ध्रुवीय प्रदेश के ऊपर उच्च वायुभार का क्षेत्र रहता है। यहाँ पर दक्षिण-पूर्व बहने वाली वायु का प्रति चक्रवात उत्पन्न होता है। महाद्वीप के मध्य भाग का ताप 100 फा. से भी नीचे चला जाता है। इस महाद्वीप पर अधिकतर बर्फ की वर्षा होती है।

वनस्पति तथा पशु दक्षिणी ध्रुव महासागर में पौधों तथा छोटी वनस्पतियों की भरमार है। लगभग 15 प्रकार के पौधे इस महाद्वीप में पाए गए हैं जिनमें से तीन मीठे पानी के पौधे हैं, शेष धरती पर होने वाले पौधे, जैसे काई आदि।

अंध महाद्वीप का सबसे बड़ा दुग्धपायी जीव ह्वेल है। यहाँ तेरह प्रकार के सील नामक जीव भी पाए जाते हैं। उनमें से चार तो उत्तरी प्रशांत महासागर में होने वाले सीलों के ही समान हैं। ये फ़र-सील हैं तथा इन्हें सागरीय सिंह अथवा सागरीय गज भी कहते हैं। बड़े आकार के किंग पेंगुइन नामक पक्षी भी यहाँ मिलते हैं। यहाँ पर विश्व में अन्यत्र अप्राप्य 11 प्रकार की मछलियाँ होती हैं। दक्षिणी ध्रुवीय प्रदेश में धरती पर रहने वाले पशु नहीं पाए जाते।

उत्पादन–धरती पर रहने वाले पशुओं अथवा पुष्पों वाले पौधों के न होने के कारण इस प्रदेश का आय स्रोत एक प्रकार से नगण्य है। परंतु पेंगुइन पक्षियों, सील, ह्वेल तथा हाल में मिली लोहे एवं कोयले की खानों से यह प्रदेश भविष्य में संपत्तिशाली हो जाएगा, इसमें संदेह नहीं। यहाँ की ह्वेल मछलियों के व्यापार से काफी धन अर्जित किया जाता है। वायुयानों के वर्तमान युग में यह महाद्वीप विशेष महत्व का होता जा रहा है। यहाँ पर मनुष्य नहीं रहते। अंतर्राष्ट्रीय भू-भौतिक वर्ष में संयुक्त राष्ट्र (अमरीका), रूस और ब्रिटेन तीनों की इस महाद्वीप के प्रति विशेष रुचि परिलक्षित हुई है और तीनों ने दक्षिणी ध्रुव पर अपने झंडे गाड़ दिए हैं।

 

 

 

 

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