अंतर्राष्ट्रीय प्रवासी पक्षी दिवसः दलदलीय क्षेत्रों के साथ खतरे में सारस पक्षी

Submitted by HindiWater on Sat, 05/09/2020 - 09:54

सारस पक्षी। फोटो - Wikipedia

सारस उत्तर प्रदेश का राज्य पक्षी है। इसे सारस क्रेन भी कहा जाता है। वैज्ञानिक भाषा में इसका नाम Grus antigone  है। संयोगवश यह विश्व के उड़ने वाले पक्षियों में सबसे बड़ा पक्षी है। वयस्क नर की ऊंचाई लगभग 156 सेंटीमीटर तक होती है। नर एवं मादा देखने में एक समान होते हैं। यह अकेला पक्षी है जो हिमालय के दक्षिणी भाग में प्रजनन करता है। पर्यावरण संतुलन में सारस पक्षी का महत्वपूर्ण योगदान है।
सारस पक्षी का अपना विशिष्ट सांस्कृतिक महत्व भी है। संसार के प्रथम ग्रंथ रामायण की प्रथम कविता का श्रेय सारस पक्षी को जाता है। रामायण का आरंभ एक प्रणयरत सारस-युगल के वर्णन से होता है। प्रातःकाल की बेला में महर्षि वाल्मीक इसके द्रष्टा हैं। तभी एक आखेटक द्वारा इस जोड़े में से एक की हत्या कर दी जाती है। जोड़े का दूसरा पक्षी इसके वियोग में प्राण दे देता है। ऋषि उस आखेटक को श्राप देते हैं।
पूरे विश्व में इसकी कुल आठ जातियां पाई जाती हैं। इनमें से चार भारत में पाई जाती हैं। पांचवी साइबेरियन क्रेन भारत में से सन् 2002 में ही विलुप्त हो गई।  सारस पक्षी भारत , पाकिस्तान,  बांग्लादेश,  म्यांमार , नेपाल के मैदानी क्षेत्रों में पाय जाते हैं।  शनै: - शनै: इस पक्षी की संख्या में काफी कमी आई है और यह विश्व स्तर पर संकटग्रस्त पक्षी की श्रेणी में आ गया है।

एक अनुमान के अनुसार भारतीय उपमहाद्वीप में इसकी संख्या लगभग 8000 से 10000 है । संयोगवश उत्तर प्रदेश में ही इनकी संख्या विश्व की कुल संख्या का लगभग 40% है। वैसे तो यह पक्षी उत्तर प्रदेश के समस्त मैदानी क्षेत्रों में देखा जाता है, इनको इटावा, मैनपुरी, औरैया, अलीगढ़ तथा लखीमपुर खीरी आदि जिलों में बड़े-बड़े जलीय एवं दलदली क्षेत्र (वेटलैंड) होने के कारण वहां उसकी अपेक्षाकृत बड़े झुंड दिखाई
पढ़ते हैं। किसी भी जलीय एवं दलदली क्षेत्र में सारस पक्षी का पाया जाना उस स्थान के स्वस्थ पर्यावरण का सूचक है,  जिस पर इनका अस्तित्व निर्भर करता है। सामान्य रूप से ग्रामवासी सारस पक्षी को आदर भाव से देखते हैं तथा इसका शिकार नहीं करते।  सारस का जोड़ा प्रेम एवं निष्ठा का प्रतीक है। बहुत सारे किसानों के बीच यह धारणा है कि उनके खेतों में सारस की उपस्थिति शुभ लक्षण के संकेत हैं। सारस घने वनों व वृक्षों का पक्षी नहीं है। यह मुख्यतः जलीय एवं दलदली क्षेत्रों का निवासी है।

हाल ही में जलीय व दलदली क्षेत्रों में भू परिवर्तन, खेती के मशीनीकरण तथा कृषि फसलों में कीटनाशकों के अत्यधिक प्रयोग के कारण सारस के जीवन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है तथा सामान्यरूप से उनके प्राकृतिक वास में विघटन हुआ है। इसके अतिरिक्त खेतों के ऊपर से जाते हुए उच्च शक्ति के बिजली के तारों से टकराना, शिकार, वयस्क सारस को व्यापार हेतु पकड़ा जाना तथा इनके अंडों की चोरी, कुत्तों और कौवा द्वारा इनके अंडों और बच्चों को नुकसान पहुंचाना भी कुछ कारण है, जिनके कारण इनकी संख्या में कमी आई है। वैश्विक स्तर पर इसकी संख्या में हो रही कमी को देखते हुए IUCN (International Union for Conservation of Nature) द्वारा इसे संकटग्रस्त प्रजाति घोषित किया गया है। इसका अर्थ यह है कि वैश्विक स्तर पर इस पक्षी की संख्या में तेजी से कमी आ रही है और अगर इसकी सुरक्षा के समुचित उपाय नहीं किये गए तो यह प्रजाति विलुप्त हो सकती है। यहां यह उल्लेखनीय है कि मलेशिया, फिलीपींस और थाईलैंड में सारस पक्षी की यह जाति पूरी तरह से विलुप्त हो चुकी है। भारत वर्ष में भी कथित रूप से विकसित स्थानों में से अधिकांश स्थानों पर सारस पक्षी विलुप्तप्राय हो चुके हैं।

वैसे तो सारस पक्षी वर्षभर प्रजनन करते हैं , लेकिन अगस्त व सितंबर महीने इनके प्रजनन का शीर्ष समय होता है। सामान्य रूप से यह जून-जुलाई में किसी झील या जलमग्न धान के खेतों के बीच टापूनुमा स्थान को चुनकर वहां घास- फूस, पुआल का एक बड़ा सा घोंसला बनाते हैं,  जिसमें मादा औसतन एक बार में 2 अंडे देती है। मादा सारस अपने बच्चों को लगभग 2 वर्षों तक अपने साथ रखती है, जब तक कि बच्चे अपना भोजन स्वयं खोजने में सक्षम नहीं हो जाते हैं। इनका भोजन मुख्यतः मेंढक,  मछली,  कीड़े - मकोड़े एवं जलीय पौधे के तने व जड़ हैं। सारस पक्षी का संरक्षण आवश्यक है,  क्योंकि सारस संरक्षण से उन जलीय क्षेत्रों का भी संरक्षण होता है जिन पर विभिन्न जलीय पौधे एवं जीव पनपते हैं। वनस्पति युक्त जलीय एवं दलदली क्षेत्र एक आवश्यक जल शोधक के रूप में कार्य करते हैं, इसलिए सारस पक्षी का संरक्षण आवश्यक है। सारस का पर्यावरण संतुलन में महत्वपूर्ण योगदान है। अतः सारस पक्षी को बचाया जाना अत्यंत आवश्यक है।


हिमांशु भट्ट (8057170025)

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