असिंचित क्षेत्रों मे गेहूँ कैसे उगाएं?

Submitted by Hindi on Tue, 08/09/2011 - 14:05

राजीव कुमार


गो.ब.पन्त कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, पन्तनगर,


हमारे देश में अब भी लगभग 40 प्रतिशत क्षेत्रफल में असिंचित गेहूँ की खेती की जाती है। असिंचित दशाओं में पानी की कमी रहती है, अधिकतर वर्षा पर निर्भर रहना पड़ता है और वर्षा के पानी का समुचित उपयोग करके अधिक से अधिक पैदावार लेने के प्रयत्न किए जाते है। अधिकांश असिंचित क्षेत्रों में गेहूँ की खेती भूमि की नमी पर निर्भर करती है। औसत रूप से दोमट मिट्टी की नमी धारण करने की क्षमता और स्थाई म्लानि प्रतिशत क्रमश: 19 और 8.0 प्रतिशत होती है। यदि मिट्टी का घनत्व 1.45 ग्राम प्रति मि0मी0 हो तो 100 से0मी0 गहरी मिट्टी में लगभग 16 से0मी प्राप्य जल होगा। यदि मिट्टी की गहराई 100 से0मी0 से कम है और वह हल्की है तो प्राप्य जल की मात्रा और भी कम होगी। यदि मिट्टी की गहराई अधिक है तो प्राप्य जल अधिक होगा। गेहूँ की अच्छी पैदावार के लिए 35-40 से0मी0 तक प्रयुक्त जल की मात्रा की आवश्यकता पड़ती है। इस प्रकार असिंचित क्षेत्रों में जल की उपलब्धता की काफी कमी रहती है। अत: गेहूँ की सफलतापूर्वक खेती करने के लिए आवश्यक है कि उपलब्ध जल का अधिकतम भाग समुचित रूप से काम में लाया जाय तथा पानी का नुकसान भी कम हो।

उन्नत किस्में


असिंचित क्षेत्रों के लिए ऐसी किस्में ठीक रहती है जिनमे सूखा सहने की क्षमता होती है। जैसे पी0बी0 डब्ल्यू 0 65,175,299

खेत की तैयारी


खरीफ की फसल काटने के बाद मिट्टी पलटने वाले हल से एक गहरी जुताई करनी चाहिए। फिर दो-तीन बार देशी हल से खेत की जुताई कर देनी चाहिए। खेत की जुताई के बाद पाटा अवश्य लगा देना चाहिए। जिससे नमी न उड़ सके।

बोआई का समय


खरीफ की फसल काटने के बाद खेत की अच्छी तरह तैयार करके बोआई करनी चाहिए। देर से बोआई करने पर नमी उड़ जाने का डर रहता है और बीज का जमाव अच्छी तरह नहीं होता। असिंचित दशाओं में अक्टूबर के तीसरे या चौथे सप्ताह में जब तापमान 25 डिग्री सेन्टीग्रेड से अधिक न हो गेहूँ की बोआई करनी चाहिए।

बीज की दर व बोआई


परीक्षणों से सिद्ध हो गया है कि 125 कि0ग्रा0 बीज एक हैक्टर के लिए काफी रहता है। बीज को 4 से 5 से0मी0 की गहराई पर नम मिट्टी मे बोना चाहिए। यदि भूमि में नमी की कमी हो तो कुंड कुछ गहरी बनाएं और बीज को नम मिट्टी से ढक दें। ढंकते समय यह ध्यान रहे कि मिट्टी की ऊंचाई 5 से0मी0 से ज्यादा न हो तथा कतार से कतार की दूरी 20 से 22 से0मी0 रखी जाय।

खाद और उर्वरक


कुछ समय पहले लोगों का विचार था कि असिंचित दशाओं में नाइट्रोजन का प्रभाव बहुत की कम पड़ता हैं लेकिन परीक्षणों से यह सिध्द हो गया है कि असिंचित दशाओं में उर्वरको का काफी महत्व है। 60 कि0ग्रा0 नाइट्रोजन तथा 30 कि0ग्रा0 फास्फोरस असिंचित दशाओं के लिए पर्याप्त रहता है। नाइट्रोजन तथा फास्फोरस की पूरी मात्रा बोआई पर या बोआई से पहले डाल देनी चाहिए यदि कम्पोस्ट या गोबर की खाद मिल सके तो उर्वरकों की मात्रा कम कर देनी चाहिए। कम से कम 3 साल में 1 बार 50 से 60 गाड़ी सड़ी हुई गोबर की खाद डाल देनी चाहिए। इससे मिट्टी का गठन सुधर जाता है, जीवाणुओं का कार्य अच्छी तरह होता है तथा नमी रोकने की क्षमता बढ़ जाती है। खाद अच्छी तरह सड़ी होनी चाहिए तथा बोआई से 10-15 दिन पहले खेत मे डाल देनी चाहिए। असिंचित क्षेत्रों के लिए पत्तियों पर छिड़काव भी काफी अच्छा रहता है। इसके लिए 3 प्रतिशत यूरिया का घोल बना कर पत्तियों पर छिड़क दें। नाइट्रोजन का पत्तियों पर छिड़काव बोआई के 45 से 50 दिन बाद से शुरू करना चाहिए और 15-20 दिन के अन्तर पर 2-3 छिड़काव करने चाहिए।

खरपतवारों की रोकथाम


असिंचित दशाओं में खरपतवारों को नष्ट करना अति आवश्यक है क्योंकि यह भूमि की नमी तथा पोषक तत्वों को अपने अन्दर ग्रहण कर लेते है जिससे उपज घट जाती है। खरपतवारनाशक दवाओं से खरपतवारों का नष्ट किया जा सकता है चौड़ी पत्ती वाले खरपतवार नष्ट करने के लिए आधा कि0ग्रा0 2, 4-डी सक्रिय अवयव 400 से 600 लीटर पानी में मिलाकर 35 दिन बाद छिड़काव कर देना चाहिए। यदि खेत में गुल्ली-डंडा (फैलेरिस माइनर) हो तो सल्फ़ोसल्फ़ुरोन् 25 ग्रा0 सक्रिय अवयव 700 ली0 पानी में मिलाकर छिड़काव करना चाहिए।

कटाई और मड़ाई


सिंचित क्षेत्र की अपेक्षा असिंचित क्षेत्र में गेहूँ जल्दी पक जाता है। फसल की समय पर कटाई करना आवश्यक है। कटाई में देर करने से दाने बिखरने का भी डर रहता है। कटाई के बाद गेहूँ को सुखा लेना चाहिए और उसके बाद मड़ाई करनी चाहिए।

उपज


असिंचित क्षेत्रो में वैज्ञानिक विधि से गेहूँ की खेती करने पर 25 से 35 क्विटल उपज मिल सकती है।
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विकिपीडिया से (Meaning from Wikipedia)




अन्य स्रोतों से




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बाहरी कड़ियाँ
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