आसमां में सुराख से कम नहीं यह जीत

Submitted by admin on Mon, 02/08/2010 - 09:51
Source
हरिद्वार, दैनिक जागरण, 7 फरवरी 2010


गंगा में खनन के कुछ मुद्दों पर मातृसदन के आंदोलन के आगे शासन झुका


मातृसदन का आंदोलन अखिरकार रंग लाया। तमाम सख्ती के बाद शासन को अखिरकार झुकना पड़ा। शासन ने अधिसूचना जारी कर कुंभ क्षेत्र को मातृसदन की मांग के अनुसार जियापोता तक बढ़ाने का ऐलान कर दिया। इसके साथ ही 6 फरवरी को एडीएम ने मातृसदन के प्रमुख स्वामी शिवानंद व उनके शिष्य यजनानंद ब्रह्मचारी का अनशन तो तुड़वा दिया, लेकिन क्षेत्र को खनन मुक्त कराने की मांग लेकर स्वामी दयानंद का अनशन अभी जारी है। ज्ञातव्य है कि सैकड़ों ट्रैक्टर, ट्रक, जेसीबी मशीन के भयंकर खनन से गंगा भयानक रूप से प्रदूषित हो रही है। गंगा के सुन्दर तटों एवं द्वीपों का विनाश हो रहा है। और यह खनन लगातार जारी है। हरिद्वार के अजीतपुर, मिसारपुर और आसपास के क्षेत्रों की गंगा में 20 से 30 फीट तक खोदा जा चुका है। आसपास के क्षेत्र और द्वीप नष्ट किए जा रहे हैं। गंगा के विनाश के खिलाफ मातृ सदन और उनके ब्रह्मचारी पिछले कई सालों से खनन माफिया के खिलाफ सत्याग्रह शुरू कर रखा था।

मातृसदन पिछले लंबे समय से कुंभ क्षेत्र को बढ़ाकर जियापोता तक किये जाने और इस पूरे क्षेत्र को खनन मुक्त करने की मांग कर रहा है। इसके लिए सदन के संतगण लंबे समय से अनशन कर रहे हैं। इस आंदोलन को तोड़ने के लिए पहले तो प्रशासन ने सख्ती का रुख अपनाकर मुकदमे दर्ज किए और जेल भी भेजा। इसके बावजूद मातृसदन के प्रमुख स्वामी शिवानंद के निर्देशन में उनके शिष्यों का अनशन जारी रहा। अखिरकार कुंभ शुरू होने के बाद भी जब शासन ने मातृसदन की मांग नहीं मानी तो बीस जनवरी 2010 से खुद स्वामी शिवानंद भी अनशन पर बैठ गये। आखिरकार डीएम ने कुंभ क्षेत्र बढ़ाये जाने को शासन से संस्तुति की। इस पर 5 फरवरी को शासन ने कुंभ क्षेत्र को जियापोता तक बढ़ाने की अधिसूचना जारी कर दी। शनिवार को यह अधिसूचना संबंधी पत्र लेकर अपर जिलाधिकारी रणवीर सिंह चौहान मातृसदन पहुंचे। उन्होंने और अग्नि अखाड़े के महामंडलेश्वर रामकृष्णानंद ने अनशनकरी स्वामी यजनानंद को जूस पिलाकर उनका अनशन तुड़वाया। इसके बाद स्वामी शिवानंद ने भी अपना अनशन समाप्त किया। इस मौके पर गंगा सेवा प्रधान आनंद पांडेय भी मौजूद रहे। स्वामी शिवानंद ने प्रशासन के मौजूदा रुख पर संतोष जताया और इसे गंगा की जीत करार दिया। हालांकि उन्होंने कहा कि जिला अस्पताल में भर्ती स्वामी दयानंद ब्रह्मचारी का अनशन तक जारी रहेगा, जब तक शासन इस पूरे क्षेत्र की खनन मुक्त करने का शासनादेश जारी नहीं करता।

 

 

आसमां में सुराख से कम नहीं यह जीत


महीनों कठोर अनशन प्रशासन की सख्ती, जेलयात्रा, तमाम लांछन व आरोप झेलने के बावजूद मातृसदन अडिग रहा। यही वजह रही कि आखिरकार शासन-प्रशासन को भी सदन के आगे झुकना पड़ा। जिस काम को लोग असंभव करार दे रहे थे, वह कुंभ क्षेत्र बढ़ाने का काम खुद शासन को करना पड़ा। ऐसे में यदि मातृसदन के प्रमुख स्वामी शिवानंद कहते हैं कि वह ब्रह्मसत्ता में हैं, तो यह दावा फीका नहीं लगता।

कुंभ क्षेत्र की रक्षा के लिए मातृसदन ने जो आंदोलन चलाया, वह लगभग ‘एकला चलो’ की तर्ज पर था। चंद ग्रामीणों को छोड़ मातृसदन के संतों के साथ कोई नहीं था, जबकि विरोध व्यापक था। खुद प्रशासन भी मातृसदन के खिलाफ कठोर रुख अपनाये हुए था। ऐसे में मातृसदन के संत स्वामी यजनानंद और दयानंद को झूठे मुकदमों में जेल भी जाना पड़ा। पुलिस जबरन उन्हें आश्रम से उठाकर ले गई और मुकदमे लाद दिये।

एक दूसरे के कपड़े फाड़ने पर आमादा रहने वाले राजनैतिक संगठन भी इस मुद्दे पर सदन के खिलाफ एकमत थे। इसके बावजूद मातृसदन के प्रमुख स्वामी शिवानंद की अगुवाई में उनके शिष्यों ने धैर्य नहीं खोया। न कोई धरना, न प्रदर्शन और न आंदोलन।

बिना किसी शोर शराबे के वे खामोशी के साथ अपना सत्याग्रह चालू रखे थे। आंदोलन जैसे-जैसे आगे बढ़ता गया, गंगा रक्षा और पर्यावरण रक्षा से जुड़े लोगों का समर्थन भी मातृसदन को मिलने लगा। ऐसे में शासन और प्रशासन पर दबाव भी बढ़ा। मातृसदन के विषय में शासन को गलत फीडबैक देने वाले अधिकारी दरकिनार हुए और हकीकत शासन के सामने पहुँची।

इस दौरान गंगा रक्षा व पर्यावरण संरक्षण से जुड़े कई संगठन व बड़े नाम भी मातृसदन के समर्थन में आए। खुद केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश भी मातृसदन पहुंचे।

इसके बावजूद शासन और प्रशासन के रुख में बदलाव नहीं आया। ऐसे में शिष्यों के खिलाफ प्रशासन की सख्ती और अपने ऊपर लग रहे आक्षेपों के चलते खुद स्वामी शिवानंद भी बीस फरवरी को अनशन पर बैठ गये। उन्होंने इसके साथ ही यह भी ऐलान कर दिया कि उनके बारह वर्ष के आंदोलन में अब ‘पूर्णाहुति’ का समय आ गया है। यह ऐलान सुन शासन और प्रशासन में खलबली मची। महाकुंभ के चलते हरिद्वार में देशी-विदेशी मीडिया की मौजूदगी ने प्रशासन को और विचलित किया। प्रशासनिक अधिकारियों ने यह विचार किया कि यदि इस दौरान स्वामी शिवानंद के साथ कोई घटना घटित हो जाती है, तो शासन और प्रशासन को जवाब देना भी मुश्किल हो जाएगा। ऐसे में प्रशासन का रुख लचीला हुआ।

जिलाधिकारी आर मीनाक्षी सुंदरम और अपर जिलाधिकारी रणवीर सिंह चौहान ने खुद इस मामले में पहल की। संतों से वार्ता की और डीएम ने कुंभ क्षेत्र बढ़ाने की संस्तुति शासन को भेज दी। जिसका प्रतिफल शुक्रवार को कुंभ क्षेत्र बढ़ाने की अधिसूचना के रूप में सामने आया। गंगा सेवा अभियान के गंगा रक्षा प्रधान आनंद पांडेय कहते हैं कि मातृसदन के सत्याग्रह ने सत्य की ताकत को फिर से साबित किया है।

तमाम झंझावतों से गुजर कर यह मुकाम हासिल करने पर मातृसदन के संत स्वामी शिवानंद कहते हैं कि ‘उन्हें अपने शिष्यों पर नाज है। जिन्होंने अपने प्राणों की बाजी लगा दी। वे कहते हैं कि यह जीत बताती है कि वे और उनके शिष्य सत्य पर थे।’ हालांकि मातृसदन की एक मांग अभी पूरा होना बाकी है। और स्वामी शिवानंद की मानें, तो गंगा रक्षा के लिए अभी लंबी लड़ाई लड़ी जानी है। इसके बाद भी यदि समस्या का समाधान नहीं होता तो कोई भी आंदोलन करेगा।

लेकिन जिस तरह मातृसदन ने आम लोगों के लिए ‘असंभव’ माने जाने वाले काम को कर दिखाया, शायद ऐसी ही नजीर देखकर शायर दुष्यंत कुमार ने कहा होगा- ‘कैसे आकाश में सूराख नहीं हो सकता। एक पत्थर तो तबियत से उछालो यारों।।’
 

 

 

 

 

 

 

Disqus Comment