बाढ़ नियंत्रण की कोसी यात्रा

Submitted by admin on Fri, 05/17/2013 - 16:12
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जयप्रभा अध्ययन एवं अनुसंधान केंद्र द्वारा प्रस्तुत पुस्तक 'जब नदी बंधी'

बड़े बांधों की अवधारणा पर आज देश के लगभग हर इलाके में सिर्फ उसके विनाशकारी परिणामों के संदर्भ में ही नहीं, बल्कि उसके निर्माणगत उद्देश्यों की सफलता-विफलता पर भी गंभीर और तीखी बहसे चल रही है। अनुभवों से विकसित इन बहसों ने बड़े बांधों द्वारा बाढ़ नियंत्रण पर कई महत्वपूर्ण आपत्तियां खड़ी की है। नदियों की सामान्य बाढ़ की तुलना में बांधों के टूटने, रिसने से आने वाली बाढ़ों के कारण कई गुना ज्यादा लोग मारे जाते हैं और बहुत अधिक सम्पत्ति का नुकसान होता है। बड़े बांधों से पैदा होने वाली दलदल और जलजमाव की कीमत बाढ़ नियंत्रण से मिली राहत की तुलना में ज्यादा होती है।

उत्तर बिहार इस राज्य का ही नहीं देश का सबसे सघन बाढ़ ग्रस्त इलाक़ा है। इस इलाके का औसतन 76 प्रतिशत हिस्सा हर बाढ़ में डूबता है। देश की कुल बाढ़ प्रभावित आबादी में 56 प्रतिशत बिहार के लोग शामिल हैं। उत्तर बिहार की वर्तमान दुर्गति के लिए तटबंध निर्माण का वह गलत राजनीतिक फैसला मुख्य तौर पर जिम्मेवार है, जो स्वतंत्रतापूर्व की तटबंध विरोधी बहस को नकार कर लागू किया गया। 1937 में पटना के सिन्हा लाइब्रेरी में लगभग 10 से 12 नवंबर तक एक महत्वपूर्ण सम्मेलन हुआ था। यह सम्मेलन 19वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में शुरू हुए बाढ़ नियंत्रण के उपायों की चर्चा की व्यापक अभिव्यक्ति था। बाढ़ की रोकथाम के लिए तटबंध निरर्थक हैं। बल्कि तटबंध बाढ़ बढ़ाने के मूल कारण हैं। नदियों पर तटबंध निर्माण को विनाशकारी प्रयोग की संज्ञा देते हुए डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने बाढ़ नियंत्रण के लिए उत्तर बिहार की नदियों का ‘उचित इलाज’ (रिजनेबल ट्रीटमेंट) करने की आवश्यकता पर जोर दिया। बिहार में सातवीं पंचवर्षीय योजना तक 231 बड़ी एवं मध्यम परियोजनाओं के रूपरेखा सामने आयी है इनमें से करीब 43 बड़े बांधों की परियोजनाएं हैं। बूढ़े पुराने लोगों का कहना है कि कलमा जिधर अपनी बाढ़ की चुनरी लहरा देती है उधर की उसर भूमि भी नई वधू की तरह घूटने तक धानी रंग का घूंघट काढ़ लेती है। कमला की बाढ़ में नहाये खेतों से यहां के किसान प्रति बीघा 75-80 मन की फसल काटते थे।

उत्तर बिहार में बाढ़ की विभीषिका पिछले डेढ़ दशक से उत्तरोत्तर अधिक विनाशकारी होती जा रही है। साथ ही बाढ़ नियंत्रण लिए पिछले चार दशकों में किये गये सारे प्रयास विफल हो गये हैं। इसलिए अब यहां बाढ़ समस्या के स्थायी समाधान के लिए हिमालय के गले में “बड़े बांधों का हार” डालने की मांग उठ रही है।

राजनीतिक हलके से उठी इस मांग में यह कहा जा रहा है कि उत्तर बिहार की कोसी, कमला, अधवारा, महानंदा, बागमती, गंडक, बूढ़ी गंडक आदि लगभग सभी नदियां, चूंकि हिमालय के हिमखंडों से निकलती हैं, इसलिए नेपाल की तराई में इन नदियों की बाढ़ का अतिरिक्त जल रोक लेने पर ही उत्तर बिहार की बाढ़ का स्थायी समाधान हो सकेगा। बड़े बांधों के बड़े-बड़े जलाशयों में ही नदियों की अकूत जल राशि वाली बाढ़ों के भंडारण की क्षमता के साथ साथ उस जल राशि के नियमित और नियंत्रित निकास की सुनिश्चित व्यवस्था निहित होती है। यानी, बाढ़ के विनाश को रोकने के लिए बाढ़ को ही रोक लेना उत्तर बिहार की समस्या का कारगर हल है।

बड़े बांधों का मिथक


कोसी सिर्फ एक नदी का नाम नहीं है बल्कि यह एक प्रतीक भी है। यह प्रतीक है बिहार में आज़ादी के बाद शुरू हुई तमाम बाढ़ नियंत्रण परियोजनाओं का जो आज भी कोसी की तरह उच्छृंखल और दृष्टिहीन हैं।

बड़े बांधों से बाढ़ रोक लेने का हल उत्तर बिहार की बाढ़ समस्या के संदर्भ में सबसे पहले कोसी की बाढ़ समस्या के लिए सुझाया गया था। स्वतंत्रता से पूर्व कई बार कोसी पर बड़ा बांध बनाने के तकनीकी निर्णय हुए। परंतु उन दिनों बाढ़ नियंत्रण के उपायों पर चली बहसों के कारण अंततः इन तकनीकी फैसलों की नींव में अमल का गारा हीं डाला जा सका। प्रथम पंचवर्षीय योजना के दौरान जब कोसी तटबंध परियोजना के लिए मिट्टी पड़ने लगी, तब उत्तर बिहार की दूसरी अन्य नदियों के बाढ़ नियंत्रण के लिए भी कोसी परियोजना का अनुकरण शुरू हुआ और बड़े बांधों का विचार ठंडे बस्ते में डाल दिया गया। इस प्रकार उत्तर बिहार की बाढ़-मुक्ति के संदर्भ में बड़े बांधों के निर्माण की परिकल्पना आज़ादी पूर्व का एक स्वप्न बन कर रह गयी।

बाढ़ नियंत्रण के लिए बड़ा बांध बनाने में यह हिचक आगे भी बनी रही है। आज़ादी के बाद विभिन्न जल संसाधन विकास परियोजनाओं के तहत देश में सैकड़ों बड़े बांध बनाये गये। किंतु उनमें बाढ़ नियंत्रण के उद्देश्य से बने नये बड़े बांधों की संख्या बहुत कम है। सिर्फ बाढ़ नियंत्रण के उद्देश्य से तो एक भी बड़ा बांध नहीं बनाया गया। हालांकि, केंद्रीय जल आयोग बड़े बांधों के लाभकारी गुणों में सिंचाई और पनबिजली उत्पादन के साथ बाढ़ नियंत्रण को भी बराबरी का दर्जा देता है। पिछले दशक तक देश में डेढ़ हजार से अधिक बड़े बांध बने हैं, पर उनमें सिर्फ 17 बड़े बांध सिंचाई और पनबिजली उत्पादन के साथ नियंत्रण के लिए भी बनाये गये हैं।

बिहार में सातवी पंचवर्षीय योजना तक 231 बड़ी एवं मध्यम परियोजनाओं की रूपरेखा सामने आयी है। इनमें से करीब 43 बड़े बांधों की परियोजनाएं हैं। सिंचाई, पनबिजली के साथ साथ बाढ़ नियंत्रण के उद्देश्य से दक्षिण बिहार में चार बड़े बांधों की दामोदर घाटी परियोजना इन सब में ऐसी प्रमुख और अकेली परियोजना है, जिसका निर्माण पूरा हो चुका है। 1948 में यह परियोजना आरंभ हुई थी और 1959 में इसके चौथे और अंतिम बांध “पंचयेत बांध” का निर्माण पूरा हुआ। इस श्रृंखला के पहले बांध “तिलैया डैम” का निर्माण 1954 में पूरा हुआ था। यानी बाढ़ नियंत्रण के लिए बड़े बांधों के इस्तेमाल का 36 साल का अनुभव आज हमारे सामने है।

बड़े बांधों की अवधारणा पर आज देश के लगभग हर इलाके में सिर्फ उसके विनाशकारी परिणामों के संदर्भ में ही नहीं, बल्कि उसके निर्माणगत उद्देश्यों की सफलता-विफलता पर भी गंभीर और तीखी बहसे चल रही है। अनुभवों से विकसित इन बहसों ने बड़े बांधों द्वारा बाढ़ नियंत्रण पर कई महत्वपूर्ण आपत्तियां खड़ी की है। नदियों की सामान्य बाढ़ की तुलना में बांधों के टूटने, रिसने से आने वाली बाढ़ों के कारण कई गुना ज्यादा लोग मारे जाते हैं और बहुत अधिक सम्पत्ति का नुकसान होता है। बड़े बांधों से पैदा होने वाली दलदल और जलजमाव की कीमत बाढ़ नियंत्रण से मिली राहत की तुलना में ज्यादा होती है। नदियों की गाद बांधों के जलाशयों में रह जाती है, जिससे कृषि भूमि की उर्वरता घटने लगती है। इसके अतिरिक्त कई नई बीमारियाँ और कृषि भूमि में लवण पर क्षारीय तत्व बढ़ने की समस्या पैदा होने का खतरा हो जाता है।

कोसी नियंत्रण पर आरंभिक विचार-विमर्श के समय जब इसके लिए बड़ा बांध बनाने का सुझाव दिया गया था, तब उस पर काफी चर्चा हुई थी किंतु आज देश में बड़े बांधों के अनुभवों से विकसित बहस के बावजूद एक सन्नाटे की-सी स्थिति में उत्तर बिहार के लिए बड़े बांधों की मांग हो रही है। उत्तर बिहार में बाढ़ की खास परिस्थितियों के संदर्भ में बड़े बांध के औचित्य पर कोई बहस नहीं चल रही है। 50 वर्ष पुराने तकनीकी फैसले को लागू करने का राग अलापा जा रहा है। पिछली आधी शताब्दी में हुए तकनीकी विकास के आलोक में बाढ़ नियंत्रण के इस समाधान पर न कोई पुनर्चिंतन चल रहा है और न ही संवादहीनता की स्थिति में किसी गलत परिणाम पर पहुंचने की आशंका से इस पर पुनः विचार-विमर्श करने की जरूरत महसूस की जा रही है।

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