बांधों का मालिकाना हक हमारा है: मध्य प्रदेश

Submitted by Hindi on Thu, 08/11/2011 - 10:12
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बुन्देलखंड डॉट इन

बांधों के बकाये राजस्व की राशि 2007 तक 71 करोड़ 82 लाख 32 हजार पांच सौ ससत्तर रुपए हैं बाकी..।
• उत्तर प्रदेश सरकार ने अभी तक नहीं किया राजस्व का भुगतान।
• हर साल लाखों घर होते हैं बेघर बाढ़ की तपिश में।

 

उत्तर प्रदेश के इन अधिकांश बांधों की समय सीमा अब लगभग समाप्त हो चुकी है। इनसे निकलने वाली नहरों के रख-रखाव पर न ही सरकारों ने कोई ध्यान दिया और न ही जल प्रबन्धन के सकारात्मक समाधान तैयार किये हैं। रनगुंवा बांध से मध्य प्रदेश को अब पानी भी नहीं मिल पाता है।

बांदा ब्यूरो: मध्य प्रदेश की जमीन पर बने उत्तर प्रदेश के आधा दर्जन बांधों के कारण पिछले कई दशक से मध्य प्रदेश हर साल बाढ़ से तबाही झेल रहा है। इन बांधों से मध्य प्रदेश को दोहरी मार पड़ रही है। एक तो यहां जमीनें खराब हो रही हैं और साथ ही बांधों के बकाये राजस्व की राशि 2007 तक 71 करोड़ 82 लाख 32 हजार पांच सौ ससत्तर रुपए पहुंच चुकी है। मध्य प्रदेश सरकार को होने वाली इस राजस्व की क्षति की वसूली के लिये प्रदेश की सरकारों ने कभी पहल नहीं की जबकि दूसरी ओर एक बड़े रकबे में भूमि सिंचित करने और बकाया भू-भाटक कोई जमा न करने से उत्तर प्रदेश सरकार के दोनों हाथों में लड्डू हैं। ऐसा मानना है मध्य प्रदेश के बिहड़ों में बसने वाले उन हजारों बासिंदों का जो साल दर साल बांधों की पैबन्द में बाढ़ की तपिश के साथ घर से बेघर हो जाते हैं। इस बीच केन-बेतवा नदी गठजोड़ परियोजना पर भी सवालिया निशान उठ रहे हैं। इन बांधों के कारण मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश की सीमा से लगा हुआ छतरपुर जिला अरसे से बाढ़ त्रासदी को झेल रहा है। जंगल और जमीन मध्य प्रदेश की है लेकिन उसका दोहन उत्तर प्रदेश कर रहा है। मध्य प्रदेश की आवाम का कहना है कि बांधों का मालिकाना हक हमारा है। गौरतलब है कि आजादी से पहले एकीकृत बुन्देलखण्ड में सिंचाई की व्यवस्था थी लेकिन प्रदेशों के गठन के बाद मध्य प्रदेश को इन बांधों के कारण दोहरी मार झेलनी पड़ रही है।

बांधों का निर्माण तो मध्य प्रदेश की जमीन पर हुआ है लेकिन व्यवसायिक उपयोग उत्तर प्रदेश कर रहा है। मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले में कुल 6 बांध निर्मित हैं जो उत्तर प्रदेश की सम्पत्ति हैं। लहचुरा पिकअप वियर का निर्माण सन् 1910 में ब्रिटिश सरकार ने कराया था। इसमें मध्य प्रदेश की 607.88 एकड़ भूमि समाहित है। तत्कालीन अलीपुरा नरेश और ब्रिटिश सरकार के बीच अलीपुरा के राजा को लीज के रकम के भुगतान के लिये अनुबन्ध हुआ था। आजादी के बाद नियमों के तहत लीज रेट का भुगतान मध्य प्रदेश सरकार को मिलना चाहिए था लेकिन उत्तर प्रदेश सरकार ने कोई भुगतान नहीं किया। नियम कायदों के हिसाब से लहचुरा पिकअप वियर ग्राम सरसेड के पास है इसलिये 15.30 रुपया प्रति 10 वर्गफुट के मान से 607.88 एकड़ का 40 लाख 51 हजार 318 रुपया वार्षिक भू-भाटक संगणित होता है। इस लिहाज से सन् 1950 से बीते साल 2007 तक 23 करोड़ 9 लाख 25 हजार 126 रुपए की रकम उत्तर प्रदेश पर बकाया है। इसी तरह पहाड़ी पिकअप वियर का निर्माण 1912 में ब्रिटिश सरकार ने कराया था। अनुबन्ध की शर्तों के मुताबिक दिनांक 01 अप्रैल 1908 से 806 रुपया और 1 अप्रैल 1920 से 789 रुपया अर्थात 1595 रुपया वार्षिक लीज रेट तय किया गया था। पहाड़ी पिकअप वियर के डूब क्षेत्र 935.21 एकड़ का वार्षिक भू-भाटक 62 लाख 32 हजार 875 रुपया होता है।

यह राशि 1950 से आज तक उत्तर प्रदेश सरकार ने जमा नहीं की। इसके बकाये की रकम 35 करोड़ 52 लाख 73 हजार 875 रुपए पहुंच चुकी है। करोड़ों रुपयों के इस बकाया के साथ-साथ बरियारपुर पिकअप वियर का भी सालाना भू-भाटक 8 लाख 36 हजार 352 रुपया होता है। इस वियर को भी 1908 में अंग्रेजी हुकूमत ने तैयार कराया था। इसमें तकरीबन 800 एकड़ भूमि डूब क्षेत्र में आती है। इस तरह अगर 1950 से इस पिकअप वियर के डूब क्षेत्र की गणना की जाये तो यह रकम 4 करोड़ 76 लाख 72 हजार 64 रुपए होती है। छतरपुर के पश्चिम में पन्ना जिले की सीमा से सटे गंगऊ पिकअप वियर का निर्माण 1915 में अंग्रेजी सरकार ने कराया था। जिसमें 1000 एकड़ डूब क्षेत्र है। 6 लाख 53 हजार 400 रुपया वार्षिक भू-भाटक के हिसाब से यह राशि 3 करोड़ 72 लाख 43 हजार 800 रुपए पहुंच जाती है लेकिन उत्तर प्रदेश सरकार ने अन्य बांधों की तरह इस भू-भाटक राशि को भी आज तक जमा नहीं किया। छतरपुर एवं पन्ना जिले की सीमा को जोड़ने वाले रनगुंवा बांध का निर्माण 1953 में उत्तर प्रदेश सरकार ने कराया था। इसका डूब क्षेत्र भी तकरीबन 1000 एकड़ है। इस प्रकार से वार्षिक भू-भाटक 6 लाख 53 हजार 400 रुपए के हिसाब से पिछले 54 वर्षों में 3 करोड़ 52 लाख 83 हजार 600 रुपए होता है। इस राशि को भी उत्तर प्रदेश सरकार की रहनुमाई का इन्तजार है। वर्ष 1995 में उत्तर प्रदेश सरकार ने प्रदेश की सीमा को जोड़ने वाली उर्मिल नदी पर बांध का निर्माण कराया था। इसके निर्माण के बाद मध्य प्रदेश की 1548 हेक्टेयर भूमि डूब क्षेत्र में आ गयी। इसका सालाना अनुमानित भू-भाटक 9 लाख 86 हजार 176 रुपए बनता है। पिछले 12 साल में यह राशि 1 करोड़ 18 लाख 34 हजार 112 रुपए पहुंच चुकी है।

छतरपुर में गरीबी और उत्तर प्रदेश की सम्पन्नता का कारण बने इन छः बांधों के कुल वार्षिक भू-भाटक की राशि वर्ष 2007 तक 71 करोड़ 82 लाख 32 हजार 577 रुपए पहुंची है पर उत्तर प्रदेश की सरकार समय के साथ बदलती रही और मध्य प्रदेश बाढ़ त्रासदी की चपेट में जल आपदा का शिकार बनता गया। हर बरसात में मध्य प्रदेश के गांवों को भीषण बाढ़ का सामना करने के साथ-साथ पलायन और रोजगार के लिये उत्तर प्रदेश के उद्यमी शहर गाजियाबाद और नोएडा में निर्भर रहने की जद्दोजहद में संघर्ष करना उनके जीवन यापन के हिस्सों का मुलम्मा है। इससे भी बड़ा खतरा यहां की जमीनों का बताया जाता है जिनमें हजारों एकड़ तक भूमि के ऊपर सिल्ट जमा होने से कृषि भूमि खराब हो रही है। उत्तर प्रदेश के इन अधिकांश बांधों की समय सीमा अब लगभग समाप्त हो चुकी है। इनसे निकलने वाली नहरों के रख-रखाव पर न ही सरकारों ने कोई ध्यान दिया और न ही जल प्रबन्धन के सकारात्मक समाधान तैयार किये हैं। रनगुंवा बांध से मध्य प्रदेश को अब पानी भी नहीं मिल पाता है। जल-जंगल और जमीन इन तीन मुद्दों के बीच पिसती उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश की हांसिये पर खड़ी आम जनता की यह पीड़ा कहीं न कहीं उन बांध परियोजनाओं के कारण ही उपजी है। जिसने दो प्रदेशों के बीच वर्तमान में पानी की जंग और भविष्य में बिन पानी बुन्देलखण्ड के अध्याय लिखने की तैयारी कर ली है। बकौल धीरज चतुर्वेदी वरिष्ठ पत्रकार का कहना है कि मध्य प्रदेश के बांधों का मालिकाना हक उत्तर प्रदेश का है। कहीं न कहीं एक पत्रकार की कलम के शब्द भी गाहे-बगाहे जब दो प्रदेशों के बीच जल-जमीन-जंगल के मालिकाना हक की बात बड़ी बेबाकी से लिखते हैं तो यह कहना बिकाऊ खबर नहीं बल्कि जमीन की हकीकत है कि दोनों प्रदेशों की शासन सरकारों को ऐसी बांध परियोजनाओं पर पूर्ण विराम लगा देना चाहिए। जो जनता के करोड़ों रुपया विनाश की शर्त पर विकास के नाम से खर्च होते हैं और उसके बदले मिलती है जल त्रासदी, जल संकट, पलायन और कर्ज में डूबे किसान।
 

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