बारिश की एक-एक बूँद है बेशकीमतीः वर्षा जल संचयन

Submitted by HindiWater on Thu, 01/09/2020 - 11:56
Source
जलविहार कॉलोनी राजसं., रुड़की और राष्ट्रीय जलविज्ञान संस्थान, रुड़की

सारांश

जल द्वारा प्रदत्त बहुत से उपहारों में से एक अनमोल एवं महत्वपूर्ण भेंट है और सभी प्राणियों के जीवन का मुख्य आधार है। बढ़ते औद्योगीकरण, जनसंख्या विस्फोट और बदलती जीवनशैली के कारण वर्तमान युग में मनुष्य जल का अंधाधुंध दोहन कर रहा है तथा उसे लगातार दूषित कर रहा है, जिसकी वजह से भयावह स्थिति उत्पन्न हो गयी है। वर्तमान प्रति व्यक्ति उपयोगी मीठे पानी की उपलब्धता के आधार पर हमारे देश को IPCC ने वाटर स्ट्रेस्ड श्रेणी में रखा है। अगर पानी की गुणवत्ता को उपलब्धता के साथ जोड़ दिया जाए तो वर्तमान स्थिति अकल्पनीय हो जाती है। अतः जल संरक्षण वर्तमान समय की मांग ही नहीं जरूरत भी है और अगर हमने इस विषय को गंभीरता से नहीं लिया, तो वह दिन दूर नहीं जब हमें पीने का पानी भी नसीब नहीं होगा। जल के बहुत से स्रोतों में से वर्षा जल एक मुख्य स्त्रोत है तथा इसके संरक्षण को वर्षा जल संचयन कहा जाता है। वर्षा जल संचयन को ही  "वर्षा जल संग्रहण" या रेन वाटर हार्वेस्टिंग (Rain Water Harvesting) कहा जाता है। वर्षा जल संचयन एक सरल तकनीक है जो कि बहुत लाभकारी है और इसमें बहुत कम लागत लगती है। वर्षा के जल का अधिक से अधिक संचयन करके ही हम जल की समस्या से निज़ात पा सकते हैं। इस तकनीक में वर्षा जल को एकत्र कर, उसे नलियों के द्वारा एक भंडारण क्षेत्र में ले जाया जाता है, जहां से ये जल या तो घरेलु उपभोग के काम आता है या भूजल पुनर्भरण के लिए उपयोग किया जाता है।

Abstract

"Water" is one of the most valuable gift among many offered by God and is the mainstay of the lives of all beings. In the present era, humans are exploiting water indiscriminately and continuously polluting it. Then in such a terrible situation, if we do not think about water conservation, then the day is not far, when there would not be water for drinking. Of the many sources of water, rainwater is a major source and its conservation is called rainwater harvesting. The process of storing or using rainwater through a particular means is called "rainwater harvesting". Rainwater harvesting is done in various ways through roof top rainwater harvesting, small scale dams, bunds,  trenches, etc. In rainwater harvesting, the rainwater falling on the roofs of houses, schools and offices is collected in the tanks made of aluminum, iron or concrete and used for domestic use or is connected to the groundwater recharge structure for enhancing the groundwater level. A small dam or "check dam" is a barrier made of mud, stone or  cement-aggregate, which is constructed across a drainage ditch/channel to lower the velocity of flow and tie up the excess water in the rain, so that this water can be used during or after the rainy season and this will also increase the ground water level. Implementing rainwater harvesting techniques directly benefits our country and ultimately citizens by reducing the demand on the municipal and public water supply, along with reducing run-off, erosion, and contamination of surface water.

प्राचीन भारत में जल संचयन

इतिहास बताता है कि प्राचीन भारत में बाढ़ और सूखा दोनों नियमित रूप से होते थे। शायद इसीलिए देश के प्रत्येक क्षेत्र की अपनी पारंपरिक जल संचयन तकनीक थी, जो क्षेत्रों की भौगोलिक ख़ासियत और सांस्कृतिक विशिष्टता को दर्शाती है। इन सभी तकनीकों में अंतर्निहित मूल अवधारणा यह है कि जब भी और जहाँ भी बारिश हो, वहां उस वर्षा जल को किसी भी माध्यम से संचयित कर लिया जाये। पुरातात्विक साक्ष्य से पता चलता है कि प्राचीन भारत में जल संरक्षण की प्रथा बहुत ही महत्वपूर्ण थी। खुदाई से पता चलता है कि सिंधु घाटी सभ्यता के शहरों में जल संचयन और जल निकासी की बेहतरीन व्यवस्था थी। दो मौसमी नदियों के बीच ढलान पर बसाई गई धोलावीरा की बस्ती जल अभियांत्रिकी का एक बेहतरीन उदाहरण है। इस पुरातन नगर में 16 से ज्यादा अलग अलग परिमाण के जलाशय बनाए गए थे। चाणक्य के अर्थशास्त्र में भी जल संचयन प्रणालियों का उपयोग करते हुए सिंचाई का उल्लेख किया गया है। इलाहाबाद के पास श्रृंगवेरपुरा में एक परिष्कृत जल संचयन प्रणाली थी, जो गंगा नदी के जल प्रवाहकों को संग्रहीत करने के लिए भूमि की प्राकृतिक ढलान का उपयोग करती थी। चोल राजा करिकला ने सिंचाई के लिए पानी निकालने के लिए कावेरी नदी के पार ग्रैंड एनीकट या कल्लनई का निर्माण किया (जो आज भी कार्यात्मक है) जबकि भोपाल के राजा भोज ने उस समय भारत में सबसे बड़ी कृत्रिम झील का निर्माण किया था। इस तरह बहुत सी रचनाएं जैसे तालाब, कुआँ, बांधी, बावड़ी, टंका आदि प्राचीन समय से ही भारत में प्रयोग में लाई जा रही हैं और तब जल संरक्षण का कार्य समुदाय स्तर पर आधारित होता था, परन्तु समय के साथ जैसे-जैसे हम भूजल का इस्तेमाल करने लगे, जल संरक्षण की ये विधाएं धीरे-धीरे हम भूलते चले गए हैं। उचित रखरखाव के अभाव में धीरे धीरे इनका अस्तित्व ही समाप्त हो गया और अतिक्रमण ने रही सही कसर भी निकाल दी। आज हमें जो जल की समस्या से रूबरू होना पड़ रहा है, वह इसी उपेक्षा का नतीजा है। इसलिए बदलते हुए आज के परिपेक्ष्य में प्रत्येक व्यक्ति को अपने स्तर पर जल संरक्षण करने की आवश्यकता है। 

वर्षा जल संचयन प्रणाली के महत्वपूर्ण घटक

वर्षा जल संचयन प्रणाली में विभिन्न चरण के अनुसर उनके घटकों को क्रमबद्ध किया गया है। किसी भी ‘वर्षा जल संचयन‘ या ‘वर्षा जल संग्रहण‘ (Rain Water Harvesting) की डिज़ाइन निम्न कारकों पर निर्भर करती है, जैसे- उस क्षेत्र की जलवायु, औसत वार्षिक वर्षा, उपलब्ध वार्षिक जल तथा उस स्थान पर जल का कितना उपभोग है या उसकी कितनी आवश्यकता है।

1. उपलब्ध वार्षिक जल की गणना (Calculation of available annual water): वर्षा जल संचयन की रचना निर्धारित करने में औसत वार्षिक वर्षा का प्रतिरूप तथा उपलब्ध वार्षिक जल महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। उन स्थानों पर जहां औसत वार्षिक वर्षा बहुत अधिक है, वहां इस तकनीक की आवश्यकता नहीं पड़ती है, वहीं इसके विपरीत उन स्थानों पर जहां औसत वार्षिक वर्षा बहुत कम होती है, आर्थिक दृष्टिकोण से वहां भी बहुत बड़े पैमाने पर इन रचनाओं की योजना उचित नहीं है। इस स्थिती में उपलब्ध वार्षिक जल की मात्रा के अनुसार ही वर्षा जल संचयन की रचना की जाती है तथा इसकी गणना निम्नलिखित समीकरण द्वारा की जाती है ।

उपलब्ध वार्षिक जल = औसत वार्षिक वर्षा x रन ऑफ गुणांक x जलग्रहण क्षेत्र का क्षेत्रफल

2. जलग्रहण क्षेत्र या कैचमेंट क्षेत्र (Catchment area): वर्षा जल संचयन प्रणाली में जलग्रहण क्षेत्र या कैचमेंट क्षेत्र वह स्थान होता है, जो बारिश के जल को सीधे प्राप्त करता है और इस संचयन प्रणाली को जल प्रदान करता है । यह या तो घरों, विद्यालयों, कार्यालयों, व किसी भी इमारत की छत हो सकती हैं या खुला मैदान या बागीचा हो सकता है । यह इस प्रणाली का एक महत्वपूर्ण घटक है क्योंकि संग्रह जल की मात्रा व गुणवत्ता दोनों ही जलग्रहण क्षेत्र या कैचमेंट क्षेत्र के क्षेत्रफल तथा जलग्रहण क्षेत्र की बनावट पर निर्भर करता है । मुख्यतः चिकनी व एकसमान सतह वाला जलग्रहण क्षेत्र श्रेष्ठ होता है, इसलिए जलग्रहण क्षेत्र या कैचमेंट क्षेत्र के डिजाइन में, धातु की चादरें, सिरेमिक टाइलें, रॉक स्लेट और फेरो सीमेंट आदि का प्रयोग किया जाता है। वर्तमान में गैल्वनाइजिंग स्टील की चादरें, उपयोग में लाई जा रही हैं क्योंकि जस्ता यौगिकों के साथ कोटिंग हुई गैल्वेनाइज्ड स्टील की चादरों को जंग से बचाती है ।

3. उपयुक्त स्थानः सामान्यत: वर्षाजल संग्रहण कहीं भी किया जा सकता है, परन्तु इसके लिये वे स्थल सर्वथा उपयुक्त होते हैं जहाँ पर जल का बहाव तेज होता है और वर्षाजल शीघ्रता से बह जाता है। इस प्रकार वर्षाजल संग्रहण निम्नलिखित स्थानों के लिए सर्वथा उपयुक्त होता हैः-

  • कम भूजल वाले स्थल,
  • दूषित भूजल वाले स्थल/प्रदूषित जल वाले स्थल,
  • पर्वतीय/विषम जल वाले स्थल,
  • सूखा या बाढ़ प्रभावित स्थल,
  • अधिक खनिज व खारा पानी वाले स्थल
  • वे स्थान जहाँ पानी व बिजली महंगी है

वर्षा जल संचयन के तरीके (Method of Rainwater Harvesting) 

वर्षा जल संचयन करने के बहुत से तरीके हैं। इनमें से कुछ तरीके वर्षा जल का संचयन करने में बहुत ही कारगर साबित हुए हैं। संचयन किए हुए वर्षा जल को हम घरेलू उपयोग में ला सकते हैं और कुछ तरीकों से बचाए हुए पानी का हम औद्योगिक क्षेत्रो में भी उपयोग कर सकते हैं।

  1. छत के पानी का एकत्रीकरण (Roof Top Water Harvesting): वर्षा जल संचयन या वर्षा जल संग्रहण की इस प्रणाली में घर, विद्यालयों व कार्यालयों के छतों पर गिरने वाले वर्षा जल को एल्युमिनियम, आयरन या कंक्रीट की बनी टंकियों में एकत्रित कर घरेलू प्रयोग में लाया जाता है या भूजल रिचार्ज संरचना से जोड़ कर भूजल स्तर को बढ़ाने में प्रयोग किया जाता है। यह पानी स्वच्छ होता है, जो थोड़ा बहुत ब्लीचिंग पाउडर मिलाने के बाद पूर्ण तरीके से उपयोग में लाया जा सकता है। जलग्रहण क्षेत्र के किनारों के एक तरफ़ ढाल पर नाली का निर्माण किया जाता है जो जलग्रहण क्षेत्र में इकट्ठे हुए जल को जाली से होते हुए संग्रहण टंकी (Storage tank) तक पहुँचाने का कार्य करती है। ये नालिया अर्धगोलाकार, आयताकार या किसी भी आकार की हो सकती हैं। प्रायः ये नालियां गैल्वेनाइज्ड आयरन शीट (जीआई) या पॉलीविनाइल क्लोराइड (पीवीसी) PVC की बनी होती हैं। किन्ही किन्ही स्थानों पर बांस या सुपारी के तनों को ऊर्ध्वाधर काट कर नाली का आकार दिया जाता है। वर्षा की तीव्रता, परिमाण, और जलग्रहण क्षेत्र के क्षेत्रफल के अनुरूप ही, वर्षा जल को बाहर निकालने के लिए नालियों के व्यास का निर्धारण करते हैं। कुछ वर्षा जल संचयन तकनीकों में, पानी में उपस्थित प्रदूषकों, मुख्यत: सस्पेंडेड सोलीड्स को हटाने के लिए फिल्टर्स का भी प्रयोग किया जाता है।
  2. बांध/लघु बांध (Small Scale Dam): बांधों के माध्यम से भी वर्षा के जल को बहुत ही बड़े पैमाने में रोका जाता है जिसे गर्मी के महीनों में या पानी की कमी होने पर कृषि, बिजली उत्पादन और नालियों के माध्यम से घरेलू उपयोग में भी प्रयोग में लाया जाता है। लघु बांध या "चेकडैम" मिट्टी, पत्थर या सीमेंट-रोड़ी का बना हुआ एक ऐसा अवरोध होता है, जिसे किसी भी झरने या नाले के जल प्रवाह की आड़ी दिशा में बनाया जाता है। लघु बांध का प्रमुख उद्देश्य बारिश के अतिरिक्त जल को बांधना होता है, जिससे कि यह पानी बरसात के समय या उसके बाद भी प्रयोग में आ सके और इससे भूजल का स्तर भी बढ़ता रहे। जल संरक्षण के मामले में बांध बहुत उपयोगी साबित हुए हैं इसलिए भारत में कई बांधों का निर्माण किया गया है और साथ ही नए बांध भी बनाए जा रहे हैं।
  3. जल संग्रह जलाशय (Water Collection Reservoirs): जमीन पर किसी संरचना का निर्माण कर, जिसमें जल को एकत्र किया जा सके, जल संग्रह जलाशय कहलाता है। इस प्रक्रिया में बारिश के पानी को तालाबों और छोटे- छोटे पानी के स्रोतों में जमा किया जाता है। इस तरीके से जमा किए हुए जल को ज्यादातर कृषि के कार्यों में लगाया जाता है क्योंकि यह जल वर्तमान परिदृश्य में समान्यतः दूषित होता है। इन संरचनाओ में बंड (Bund) व ट्रेंच (Trench) महत्वपूर्ण हैं ।
  4. भूमिगत टैंक (Underground Tanks): भूमिगत टैंक भी वर्षा जल संचयन करने का एक उत्तम तरीका है जिसके माध्यम से हम भूमि के अंदर पानी को संरक्षित रख सकते हैं। इस प्रक्रिया में वर्षा जल को एक भूमिगत गड्ढे में संग्रह किया जाता है जिससे भूमिगत जल की मात्रा बढ़ जाती है। साधारण रूप से भूमि के ऊपर बहने वाला जल सूर्य की गर्मी या आधिक तापमान के कारण भाप बन कर उड़ जाता है और हम उसे उपयोग में नहीं ला पाते हैं, परंतु इस तरीके में हम ज्यादा से ज्यादा पानी को मिट्टी के अंदर बचा कर रख पाते हैं। यह तरीका बहुत ही मददगार साबित हुआ है, क्योंकि मिट्टी के अंदर का पानी आसानी से नहीं सूखता है और लंबे समय तक पंप के माध्यम से हम उसका उपयोग कर सकते हैं।

वर्षा जल संचयन प्रणाली में दूषित पदार्थों

प्रायः वर्षा जल रासायनिक दूषित पदाथो से मुक्त होता है, अगर छत ठीक से स्थापित हो तथा उसे नियमित रूप से साफ किया जाता हो। आमतौर पर पूरी तरह प्रदूषण मुक्त एक छत बनाना मुश्किल है, परन्तु छत और नालियों की नियमित सफाई, सूक्ष्मजीवों की मात्रा को काफ़ी हद तक कम कर देता है। वायुमंडलीय गैसों के वर्षाजल में घुलने के कारण उसका चभ थोड़ा अम्लीय (6 से कम) होता है, जिसके लिए आधा टेबल चम्मच बेकिंग सोडा को प्रति 2000 लीटर में मिलाया जाता है जिससे वर्षा जल का pH ≈ 7 हो जाता है। वर्षाजल कभी कभी बैक्टीरिया, वायरस, प्रोटोजोआ व अन्य हानिकारक सूक्ष्म जीवों से भी दूषित होता है, जिसको क्लोरीन डोसिंग, अल्ट्रा वायलेट (यूवी) शोधन, ओजोन उपचार आदि विधियों से शोधन किया जा सकता है। इसके अतिरिक्त एकत्रित पानी को कम से कम 5 मिनट तक उबालकर भी पीने के उपयोग में लाया जा सकता है।

वर्षा जल संचयन के लाभ 

वर्तमान समय में गंभीर जल संकट की स्थिति में नगरीय एवं ग्रामीण क्षेत्रों में ‘रेन-वाटर हार्वेस्टिंग‘ समान रूप से उपयोगी हैं तथा गहराते जल संकट से मुक्ति पाने का एक प्रमाणित माध्यम हैं। इस तकनीक के बहुत से प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष लाभ हैं,

  1. वर्षा जल संग्रहण के द्वारा भूजल/सरकार द्वारा जलापूर्ति पर निर्भरता कम हो जाती है तथा गिरते भूजल स्तर को ऊपर उठाया जा सकता है।
  2. वर्षा जल संग्रहण से जहाँ जलस्रोत नहीं हैं वहाँ पर भी कृषि कार्य सम्भव हो जाता है।
  3. वर्षा जल संग्रहण से जल के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता आ जाती है व अन्य स्रोतों पर निर्भरता कम हो जाती है।
  4. वर्षा जल संग्रहण से प्राप्त जल हर प्रकार के घातक लवणों आदि से मुक्त होता है और इस तरह से इससे हमे उच्च गुणवत्ता एवं रसायनमुक्त शुद्ध जल की प्राप्ति होती है।
  5. वर्षा जल संग्रहण के द्वारा जलापूर्ति न्यूनतम लागत में संभव हो जाती है।
  6. वर्षा जल संग्रहण के द्वारा बाढ़ के वेग पर नियंत्रण से मृदा अपरदन कम से कम किया जा सकता है।
  7. वर्षा जल संग्रहण, जल के मुख्य स्रोत का काम करता है तथा इसके द्वारा सभी जीवों को समुचित मात्रा में जल उपलब्ध कराया जा सकता है।
  8. ज़मीन के अन्दर संग्रहीत जल का वाष्पीकरण नहीं होता है अतः पानी के समाप्त होने की सम्भावना कम ही रहती है।

    References 

    • Kalimuthu A., 2016. A Practical Guide on Roof Top Rainwater Harvesting. Water Sanitation and Hygiene Institute, Tamil Nadu. 
    • IRICEN, 2006. Rainwater Harvesting. Indian Railways Institute of Civil Engineering, Pune. 
    • U.S.E.P.A., 2013. Rainwater Harvesting: Conservation, Credits, Codes, and Cost. United States Environmental Protection Agency, Washington. 
    • Mechell J., Kniffen B., Lesiker B., Kingman D., Jaber F., Alexander R., Clayton B., 2009. Rainwater harvesting: System planning. Texas AgriLife Extension Service, College Station, Texas. 
    • Gold A., Goo R., Hair L., Arazan N., 2010. Rainwater Harvesting: Policies, Programs, and Practices for Water Supply Sustainability. Low Impact Development 2010: Redefining Water in the City Conference, April 11-14, 2010, San Francisco, California, United States. American Society of Civil Engineers. 

     

    E-mail: sujata.iitr@gmail.com rsingh.nih@gmail.com

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