बायोडीजल से बढ़ती रोजगार की संभावनाएं

Submitted by birendrakrgupta on Tue, 09/16/2014 - 10:43
Source
कुुरुक्षेत्र, जनवरी 2011

क्या है बायोडीजल?


हमारे देश में पेट्रोलियम पदार्थों की मांग दिन प्रतिदिन बढ़ती जा रही है जिसके कारण हमारा देश 70 प्रतिशत पेट्रोलियम पदार्थों को अन्य देशों से आयात करता है जिसमें प्रतिवर्ष 1600 बिलियन रुपये खर्च किये जाते हैं जो हमारी देश की आर्थिक स्थिति को कमजोर कर रहे हैं। आज पेट्रो पदार्थों के मूल्य के कारण पूरा विश्व चिंतित है। भारत जैसे विकासशील देश में जहां विकास की गति बढ़ रही है, वहां ऊर्जा की आवश्यकता और ऊर्जा आपूर्ति का प्रश्न देश के लिए अहम हो गया है। अतः हमें चाहिए कि हम हमारे ग्रामीण क्षेत्रों में अन्य ईंधनों की अपेक्षा बायोडीजल के उत्पादन करने हेतु प्रेरित करें जिससे ग्रामीण रोजगार की समस्या का भी समाधान हो सके और बायोडीजल की उत्पादकता को भी बढ़ाया जा सके।बायोडीजल जैविक गतिविधियों के द्वारा जैविक मूल पदार्थों के उपयोग से बनाया गया ईंधन है जिसमें सेलुलोज पदार्थों का किण्व या शुष्क जीवाणुओं एवं एंजाइमस की क्रियाविधि का उपयोग किया जाता है। इस विधि को ट्रांसस्टरीफिकेशन (वसा व स्नेहक) एवं फरमेंटेशन (सेलुलोज सबस्ट्रेट) के रूप में प्रयोग किया जाता है। इस विधि से प्राप्त बायोडीजल का अपने मूल स्वरूप व डीजल के साथ मिश्रण (गैसोलीन) के रूप में उपयोग किया जा सकता है।

चूंकि बायोडीजल सेलुलोज सभी पदार्थों से बनाया जा सकता है किंतु अधिक बायोडीजल का उत्पादन करने हेतु हम फसल के दानों जैट्रोफा, करंज, गन्ना, सूर्यमुखी, सोयाबीन एवं कृषि उत्पादों से प्राप्त त्याजों द्वारा बायोडीजल प्राप्त कर सकते हैं।

कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों के परिणामस्वरूप हर देश ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोतों की तलाश में है। हमारे देश में जिन स्रोतों पर तेजी से विचार एवं कार्य हो रहा है उनमें सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा आदि कई विकल्प शामिल हैं। संभावनाओं की दृष्टि से देखने पर बायोडीजल सबसे प्रमुख रूप में उभरता है क्योंकि यह किसानों के हाथ में है और देश के दस करोड़ से भी अधिक किसान बायोडीजल से लाभ पा सकते हैं और हम स्वयं आत्मनिर्भर बन सकते हैं। जैट्रोफा द्वारा बायोडीजल उत्पादन में 17 से 19 रुपये प्रति लीटर आय प्राप्त कर सकते हैं तथा इसी के साथ हम इससे सह उत्पाद जैसे बीजों के खल, गिलसरीन, नेलपॉलिश भी प्राप्त कर सकते हैं।

ग्रामीण रोजगार की संभावनाएं


भारत में 142 करोड़ हेक्टेयर भूमि पर कृषि होती है। 69 करोड़ हेक्टेयर भूमि पर वन हैं। भारत में 39 करोड़ हेक्टेयर पर घने वन हैं और 31 करोड़ हेक्टेयर पर संग्रहित वन हैं। इनमें भी वनों का 14 करोड़ हेक्टेयर क्षेत्र संयुक्त वन प्रबंधन के अधीन है। जंगल की लगभग 3.0 करोड़ हेक्टेयर (अनुमानित) भूमि पर जैट्रोफा की खेती सरलता से की जा सकती है। इस खेती पर आने वाले व्यय का 62 प्रतिशत अप्रशिक्षित श्रमिकों के सीधे वेतन के रूप में खर्च होगा। बाकी का 38 प्रतिशत विचारणीय अनुपात वेतन पर खर्च होगा। बीज उत्पादन प्रारंभ होने के समय प्रत्येक हेक्टेयर पर 311 व्यक्तियों के लिए रोजगार उत्पन्न होगा। बीज को एकत्र करना भी श्रमाधारित कार्य है। एक बार खेती का कार्य अच्छी तरह स्थापित हो जाने के बाद प्रत्येक हेक्टेयर पर प्रतिदिन 40 लोगों की आवश्यकता होगी। खेती और बीज एकत्र करने में रोजगार उत्पत्ति के अतिरिक्त बीजों को संग्रहित करने और तेल निष्कासन में भी रोजगार उपलब्ध होगा।

देश में लाखों हेक्टेयर बेकार पड़ी जमीन पर बायोडीजल के लिए ऊर्जा फसलों की खेती का भी प्रावधान है। भारत सरकार की उम्मीद है कि 2017 तक वह जैव ईंधन से हमारी यातायात की 10 प्रतिशत जरूरतों को पूरा कर लें। इसके तहत 12 मिलियन हेक्टेयर जमीन ऊर्जा फसलों की खेती में लाई जाएगी और ये वह जमीन है जोकि बंजर व अनुपजाऊ है।किसानों और ग्रामीण रोजगार की दृष्टि से देखने पर बायोडीजल की कई खूबियां नज़र आती हैं। बायोडीज़ल को संग्रहित किया जा सकता है जबकि सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा आदि को संग्रहित नहीं किया जा सकता है। जैट्रोफा की खेती को बढ़ावा देने के लिये किसानों को अनुदान (सब्सिडी) देना तथा उत्पादन होने पर उचित मूल्य पर खरीदना आवश्यक है। विदेशों में जहां खाद्य तेल के बीजों से बायोडीजल बनाया जाता है वहां उनके पास सोयाबीन, राई, मूंगफली, सूरजमुखी आदि कई विकल्प हैं किंतु अधिक बायोडीजल का उत्पादन करने हेतु हमारे यहां बायोडीजल उत्पादन के लिये जैट्रोफा (रतनजोत) के पौध सर्वदा उपयुक्त हैं क्योंकि इसे हम अकृषित भूमि तथा कम जल मांग वाले क्षेत्रों में भी उगा सकते हैं। इस पौधे को जानवरों द्वारा किसी भी प्रकार की हानि नहीं पहुंचाई जाती है। जैट्रोफा की फसल जल्दी (करीब 3 साल में) आ जाती है तथा एक बार इसकी सघन खेती कर लेने पर तीस-चालीस वर्षों तक इसके फल-बीज उगते रहते हैं। जैट्रोफा दोनों तरह से उपयुक्त प्रजाति है। यह खेतों की मेड़ों पर भी लगाया जा सकता है तथा पूरे खेत में भी लगाया जा सकता है। प्रथम व द्वितीय वर्ष अंतः सस्य क्रिया विधि से भी की जा सकती है। जैट्रोफा करीब तीन-चार मीटर ऊंचा होता है, जिससे फल तोड़ना या छांटना आसान हो जाता है। हर गांव में जो भी बंजर जमीन है उस पर लगाने के लिये यह अत्यंत उपयोगी है। टिशू कल्चर के माध्यम से इसकी पहली फसल तीन के बजाय डेढ़ साल में पाई जा सकती है।

गांव में इस प्रकार के जो अखाद्य बीज पैदा होंगे, उनके छिलका उतारने व घानी से तेल निकालने का व्यवसाय गांव या कस्बे में ही किया जा सकता है। बायोडीजल की शुद्धता परखने का कार्य भी कस्बे स्तर पर किया जा सकता है। आज हमारे देश में एक सौ पचास करोड़ रुपये का कच्चा तेल आयात किया जाता है। इसमें से पांच प्रतिशत यानी साढ़े सात हजार करोड़ रुपये का फायदा किसान को होगा तो किसान के घर खुशहाली आ जाएगी। इस प्रकार बायोडीजल किसान की समृद्धि के साथ-साथ वैकल्पिक ऊर्जा का अच्छा साधन है। ग्रामीण जनता को रोजगार दिलाने में इसका महत्वपूर्ण योगदान हो सकता है।

जैट्रोफा की कृषि विधियां


जैट्रोफा अथवा रतनजोत की विधिवत खेती भारत के मुख्यतः राजस्थान, कर्नाटक, महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश तथा पंजाब राज्यों में की जाती है। संपूर्ण देश में इसकी खेती के लिए भारत सरकार की ओर से कई प्रोत्साहन योजनाएं प्रारंभ की गई हैं एवं इसकी खेती को विशेष बढ़ावा दिया जा रहा है। भारत सरकार, योजना आयोग, तेल मंत्रालय तथा कृषि विभाग इसके तेल को भविष्य के डीजल के रूप में देख रहा है। जैट्रोफा को न सिर्फ बायोडीजल की खेती के रूप में बल्कि और भी कई उपयोगों के लिए उगाया जा सकता है जिनमें दो महत्वपूर्ण रूप निम्नलिखित हैः-

1. जैट्रोफा पौधे का बाड़ के रूप में प्रयोग।
2. जैट्रोफा का नर्सरी के रूप में प्रयोग।

जैविक ईंधन के लिए जैट्रोफा एक बेहतरीन विकल्प


1. जैट्रोफा का पौधा ऊसर, बंजर, शुष्क, अर्द्ध शुष्क पथरीली और अन्य किसी भी प्रकार की भूमि पर आसानी से उगाया जा सकता है। जलभराव वाली जमीन में इसको नहीं उगाया जा सकता है।
2. पौधे को जानवर नहीं खाते हैं और न ही पक्षी नुकसान पहुंचाते हैं जिससे इसकी देखभाल करने की भी आवश्यकता नहीं है।
3. जैट्रोफा का पौधा बहुत ही कम समय में बढ़कर तैयार हो जाता है और लगाने (रोपाई) के दो वर्ष में उत्पादन प्रारंभ कर देता है।
4. जैट्रोफा के पौधे को बार-बार लगाने (रोपाई) की आवश्यकता नहीं है। एक बार लगाने पर निरंतर 45-50 वर्षों तक फसल (बीज उत्पादन) प्राप्त होती रहती है।
5. जैट्रोफा के बीजों में अन्य पौधों के बीजों की तुलना में तेल की मात्रा भी अधिक होती है। इससे 35-40 प्रतिशत तेल प्राप्त होता है।
6. जैट्रोफा के पौधों को उगाने से वर्तमान खाद्यान्न फसलों का क्षेत्र भी प्रभावित नहीं होगा। इसे देश भर में उपलब्ध लाखों एकड़ बंजर व बेकार पड़ी भूमि में उगाया जा सकेगा।
7. जैट्रोफा की खेती मात्र बायोडीजल उत्पादन की दृष्टि से ही महत्वपूर्ण नहीं है बल्कि इसकी खेती से देश भर में बेकार पड़ी हुई बंजर भूमि का उपयोग कर उसे सुधारा भी जा सकेगा।
8. जैट्रोफा की खेती से बंजर भूमि का कटाव रोका जा सकेगा, साथ ही यह पारिस्थितिकी तंत्र और जैव-विविधता को बचाने में भी महत्वपूर्ण योगदान करेगा।
9. इसके पौधे को खेत की मेड़ों (मुंडेरों) पर लगाने से यह उत्पादन के साथ-साथ बाड़ का काम करेगा।
10. जैट्रोफा की खेती से गरीब और सीमांत किसानों तथा समाज के अन्य कमजोर वर्गों को खासतौर से गरीबी रेखा के नीचे जीवनयापन करने वाले लोगों और महिलाओं को ग्रामीण/स्थानीय स्तर पर रोजगार और कमाई के अवसर प्राप्त होंगे।
11. इसकी खेती जिस भूमि में होगी उस भूमि को दीमक व व्हाइट ग्रब (सफेद लट्) की समस्या से पूर्ण छुटकारा मिल सकेगा।

बायोडीजल के गुण


1. बायोडीजल के भौतिक और रासायनिक गुण पेट्रोलियम ईंधनों से जरा अलग हैं। यह एक प्राकृतिक तेल है जो परंपरागत वाहनों से इंजन को चलाने में पूर्णतः सक्षम है।
2. इसके प्रयोग से निकलने वाला उत्सर्जन कोई प्रभाव नहीं छोड़ता क्योंकि इसमें धुंआं व गंध न के बराबर है।
3. बायोडीजल पेट्रोल की अपेक्षा जहरीले हाइड्रोकार्बन, कार्बन-मोनोक्साइड, सल्फर इत्यादि से वायु को दूषित नहीं करता है।
4. बायोडीजल स्वास्थ्य और पर्यावरण की दृष्टि से सुरक्षित ईंधन है।
5. यह सरल जैव निम्नीकृत, न खत्म होने वाला, स्वच्छ और कार्यदक्ष ऊर्जा स्रोत है।
6. यह जैव ईधन अज्वलनशील होने के कारण सुरक्षित है इसलिए इसके भंडारण और परिवहन में कोई खतरा भी नहीं है।
7. जैट्रोफा व डीजल की अपेक्षा बायोडीजल बेहतर आंकटेन नम्बर देता है और यह गाड़ी के इंजन की आयु सीमा भी बढ़ा देता है।

जैट्रोफा के अन्य महत्व


1. यह वायुमंडल से कार्बन-डाइ-ऑक्साइड का अवशोषण करता है। उसी प्रकार रेगिस्तान के विस्तार को रोकता है।
2. बीजों से तेल निकालने के बाद बची खली का उपयोग ग्लिसरीन तथा साबुन बनाने में किया जाता है। खली में प्रोटीन प्रचुर मात्रा में पाया जाता है जिसका उपयोग जानवरों के चारे के रूप में किया जाता है।
3. इसके रोपण से सूखे क्षेत्रों का जल स्तर बढ़ाकर पानी की समस्या से निजात पाया जा सकता है।
4. जैट्रोफा की व्यावसायिक खेती को बढ़ावा देकर ग्रामीण बेरोजगारों को रोजगार उपलब्ध कराया जा सकता है तथा उनके जीवन-स्तर को सुधारा जा सकता है।
5. गांवों में इसके बीजों से दीपक जलाकर घरों में रोशनी उपलब्ध करायी जा सकती है।
6. पौधे के लेटेक्स में खरबूजे के मीजेक वायरस को रोकने की अद्भुत क्षमता पाई गई है।
7. इसके रस का उपयोग रंग बनाने में तथा तेल का साबुन निर्माण एवं मोमबत्तियां बनाने में किया जाता है।

जैट्रोफा के औषधीय गुण


1. जैट्रोफा के पूर्ण विकसित तने से निकलने वाले लाल रस का उपयोग घाव, जला, फोड़े आदि के उपचार में किया जाता है। इसे रक्त बहने वाले स्थान पर लगाने से रक्तस्राव तुरंत रुक जाता है।
2. इससे प्राप्त लेटेक्स में कैंसररोधी गुण पाए गए हैं।
3. बीजों का उपयोग पेट के कीड़े मारने तथा पेट साफ करने में किया जाता है।
4. लेटेक्स का उपयोग दांतों की समस्या में भी होता है।
5. ग्रामीण लोग इसकी पतली टहनियों का दातून के रूप में प्रयोग करते हैं।
6. उत्तरी सूडान में इसके बीज तथा फलों का उपयोग गर्भनिरोधक के रूप में किया जाता है।
7. जैट्रोफा के पत्ते के सत् में दस्तकारी गुण पाए गए हैं।
8. इसके लेटेक्स का उपयोग मक्खी के काटने पर भी किया जाता है।
9. पौधे की जड़ों की छाल गठिया तथा बीजों से ड्राप्सी, गाउट, लकवा और चर्मरोगों का इलाज किया जाता है।
10. होम्योपैथी में इसका उपयोग सर्दी में पसीना आने पर, उदर-शूल, ऐंठन तथा दस्त आदि बीमारियों के इलाज में किया जाता है।

जैट्रोफा का विश्व में उभरता दायरा


पौधों में पाए जाने वाले तरल हाइड्रोकार्बन को ईंधन के तौर पर बहुत पहले ही पहचान लिया गया था। प्रसिद्ध जीव शास्त्री मेलविन कालविन जब प्रकाश संश्लेषण पर कार्य कर रहे थे तो उन्होंने अनेक पौधक प्रजातियों को पृथक किया जो प्रकाश संश्लेषण द्वारा बने जैव पदार्थों के एक महत्वपूर्ण भाग को लेटेक्स में बदलने की क्षमता रखते हैं। कालविन के अनुसार इस लेटेक्स में मौजूद हाइड्रोकार्बन में बदले जा सकते हैं। उन्होंने वनस्पति समुदाय को अनेक पेट्रोलियम प्रजातियों से अवगत कराया। एपोसाइनेसी, एस्कलेपियाडेसी, यूफारबायसी आदि कुटुम्ब के सदस्य पेट्रोलियम गुणों से युक्त हैं जो जैव ऊर्जा के उत्तम स्रोत हैं और पेट्रोल व डीजल का श्रेष्ठ विकल्प हैं। 20वीं सदी के प्रारंभ में डीजल इंजन के आविष्कारक रूडोलफ डीजल ने भी बायोडीजल की उपयोगिता को पहचाना था। उन्होंने वनस्पति तेल से गाड़ी चलाने के कई प्रयोग किए तथा साथ ही भविष्य में पेट्रोलियम भंडार खत्म हो जाने पर जैव ईंधन के इस्तेमाल की सलाह भी 1912 में ही दे दी थी।

भारत में अब तक 60,000 हेक्टेयर जमीन आंध्र प्रदेश, राजस्थान, मध्य प्रदेश व छत्तीसगढ़ से जैट्रोफा की खेती में लाई गई है जोकि 0.3-0.5 बिलियन लीटर बायोडीजल उपलब्ध कराएगी।अमेरिका में ऊर्जा और पर्यावरण योजना के अंतर्गत जैव ऊर्जा कार्यक्रम में बायोडीजल की आपूर्ति हेतु ऊर्जा फसलों की खेती और उसके वैकल्पिक बाजार को प्रोत्साहित किया जा रहा है, ताकि आगामी दशकों में परंपरागत ऊर्जा स्रोत पर संयुक्त राष्ट्र की निर्भरता को घटाया जा सके।

ब्राजील में बहुत पहले ही पेट्रोल की जगह गन्ने से मिलने वाले एथेनॉल का प्रयोग हो रहा है। ऑस्ट्रिया ने भी नब्बे के दशक की शुरुआत में रेपसीड तेल से निकले मिथाइल एस्टर को ही बिना बदले डीजल इंजन में प्रयोग करना प्रारंभ कर दिया था। कनाडा और कई यूरोपीय देश अब बायोडीजल अपनाने के लिए विभिन्न जांच प्रक्रिया में लगे हुए हैं। स्पेन में सूर्यमुखी के तेल से मिलने वाला बायोडीजल प्रचलन में आ चुका है। डीजल इंजन पर जैव ईंधन की परख उसकी श्यानता स्फुशंक, अम्ल मूल्य इत्यादि के आधार पर की गई इष्टतम व अनुकूलतम ऊर्जा स्रोत का दर्जा दिया गया है। अमेरिका में सोयाबीन तेल से प्राप्त बायोडीजल को शीत सहनीकरण की प्रक्रियाओं से गुजरने के पश्चात् जैट ईंधन के साथ मिश्रित कर हवाई जहाज उड़ाया गया।

भारत में ऊर्जा फसलों की खेती


बायोडीजल के लिए भारत में भी कार्य प्रगति पर है। सरकारी एवं गैर-सरकारी सहित अनेक संस्थाओं ने इस कार्य का बीड़ा उठाया है। रक्षा मंत्रालय ने भी इस कार्य में रुचि दिखाकर अनेक कदम उठाए हैं। रक्षा मंत्रालय के निर्देश पर रक्षा अनुसंधान तथा विकास संगठन के अंतर्गत रक्षा कृषि अनुसंधान प्रयोगशाला, पिथौरागढ़ (उत्तराखण्ड) ने बायोडीजल और ऊर्जा फसलों पर वृहत अनुसंधान कार्य प्रारंभ कर, जैट्रोफा की दो प्रजातियां डीएआरएल-1 व डीएआरएल-2 पता लगाई जिनमें 34.4 प्रतिशत व 36.5 प्रतिशत तेल मौजूद है। इस डीआरडीओ की पहल से सैन्य बल को वाहनों के लिए भविष्य में तेल उपलब्ध कराया जाएगा। इस अनुसंधान के अंतर्गत कई मिलिट्री फार्म महु, सिकंदराबाद, अहमदनगर में बनाए गए हैं। ये केन्द्र न केवल बायोडीजल (जैट्रोफा) पर अनुसंधान कर हमारे सैन्य बल को आत्मसुरक्षा व आत्मविश्वास देगा बल्कि पर्यावरण के संतुलन में भी एक अहम भूमिका निभाएगा। इसके शीघ्र परिणामों की आशा की जा रही है।

देश में लाखों हेक्टेयर बेकार पड़ी जमीन पर बायोडीजल के लिए ऊर्जा फसलों की खेती का भी प्रावधान है। भारत सरकार की उम्मीद है कि 2017 तक वह जैव ईंधन से हमारी यातायात की 10 प्रतिशत जरूरतों को पूरा कर लें। इसके तहत 12 मिलियन हेक्टेयर जमीन ऊर्जा फसलों की खेती में लाई जाएगी और ये वह जमीन है जोकि बंजर व अनुपजाऊ है। भारत में अब तक 60,000 हेक्टेयर जमीन आंध्र प्रदेश, राजस्थान, मध्य प्रदेश व छत्तीसगढ़ से जैट्रोफा की खेती में लाई गई है जोकि 0.3-0.5 बिलियन लीटर बायोडीजल उपलब्ध कराएगी।

(लेखक सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, मेरठ के कृषि जैव प्रोद्योगिकी विभाग में एसोसिएट प्रोफेसर हैं।)
ई-मेल: rs.svbpatv@gmail.com

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