बदलते मौसम में निरंतर सूखते हिमालयी जल स्रोतों (झरनों) के पुनरुद्धार हेतु वैज्ञानिक समाधान 

Submitted by HindiWater on Wed, 01/08/2020 - 16:19
Source
राष्ट्रीय जलविज्ञान संस्थान क्षेत्रीय केंद्र, जम्मू, राष्ट्रीय जलविज्ञान संस्थान रुड़की और बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी

सारांश

एक अनुमान के अनुसार हिमालयी क्षेत्र की 50 मिलियन जनसंख्या हिमालयी क्षेत्रों में निकलने वाले स्थानीय प्राकृतिक जल स्रोतों (झरनों) पर प्रत्यक्ष रूप से तथा देश की 200 मिलियन आबादी अप्रत्यक्ष रूप से इन प्राकृतिक जल स्रोतों पर निर्भर है। ये प्राकृतिक जल स्रोत पहाड़ी क्षेत्रों के लोगों की प्यास तो बुझाते ही हैं, साथ ही हिमालयी क्षेत्रों से निकलने वाली महत्वपूर्ण नदियों में शुष्क काल में सतत जलप्रवाह बनाये रखने में अहम भूमिका निभाते हैं। पिछले दो दशकों में हिमालयी राज्यों में स्थित शहरों में तेजी से फैलाव हुआ है, जिसके कारण इन क्षेत्रों में अंधाधुंध नयी इमारतों का निर्माण, सड़कों का कटान, टनलों का निर्माण, बिजली उत्पादन हेतु बांधों का निर्माण, इत्यादि गतिविधियां तीव्र गति से बढ़ी हैं। जिस कारण भूमिगत जल के जलविज्ञान तंत्र को काफी क्षति पहुंची है। परिणामस्वरुप इन हिमालय क्षेत्रों के जल स्रोतों के जल प्रवाह में काफी कमी आयी है। काफी बारहमासी स्रोत तो बरसाती बन कर रह गए हैं, जबकि कुछ तो पूर्ण रूप से सुख गए हैं।

राष्ट्रीय जलविज्ञान संस्थान, रुड़की पिछले कुछ वर्षों से इन हिमालयी क्षेत्रों के परंपरागत जल स्रोतों के भूमिगत जल-विज्ञान को समझने हेतु गहन शोध कर रहा है। ताकि इनके पुनरुद्धार हेतु एक व्यवस्थित वैज्ञानीय आधार की ठोस रणनीति विकसित की जा सके। वर्तमान समय में राष्ट्रीय जलविज्ञान संस्थान, रुड़की के जम्मू स्थित पश्चिम हिमालय क्षेत्रीय केंद्र द्वारा जम्मू और कश्मीर एवं हिमाचल प्रदेश हिमालयी राज्यों के परमपरागत जलस्रोतों के पुनरुद्धार हेतु विभिन्न परियोजनाएं चलायी जा रही हैं। इन परियोजनाओं में संस्थान द्वारा विकसित की गयी। हिमालयी प्राकृतिक जल स्रोतों (झरनों) के पुनरुद्धार हेतु छह कदम प्रणाली को कार्यन्वित किया जा रहा है। इसके मुख्य कदम ‘‘जल स्रोतों का मानचित्रण’’, निगरानी एवं आकड़े सृजन, संवेदनशील झरनों का चिन्हीकरण, झरना जलग्रहण क्षेत्र का मानचित्रण, मौसम परिवर्तन हेतु अनुकूल उपाय एवं क्षमता निर्माण हेतु पैरा-हाइड्रोलॉजिस्ट तैयार करना है। अब तक हिमाचल प्रदेश में बहने वाली रावी नदी के जलग्रहण क्षेत्र में निकलने वाले लगभग 400 जलस्रोत जियोटैग कर लगभग 40 से ज्यादा मापदंडो, जो कि जलस्रोत के जलविज्ञान, भौगोलिक, जल उपभोग प्रकार, आश्रित मानवों एवं पशुओं की संख्या, जलस्रोत का भूमि उपयोग, जल गुणवत्ता मापदंड, जलस्रोत की वर्तमान स्थति, इत्यादि तैयार कर लिए गए हैं।

कुंजी शब्द: हिमालयी जल स्रोत (झरने), झरना जलग्रहण क्षेत्र, रावी नदी जलग्रहण क्षेत्र, जल गुणवत्ता

Abstract

The undulating topography in the Himalayan region makes it economically nonviable to use water from rivers flowing in deep valleys. Also, glaciers are quite far from the lower Himalayan region (most populated area), and use of melt water from these is infeasible, if not impossible. Thus, people of Himalayan region are completely dependent on natural springs for their water demand. It is estimated that 50 million people of Himalayan region are directly dependent on mountain springs and about 200 million from all over India are also dependent on these natural water sources. Not only does these natural water springs quench the thirst of the people of the mountainous regions, but they also play an important role in maintaining continuous water flow during the lean season in the rivers originating in the Himalayan region. These Himalayan water sources are known by different local names in different Himalayan states like Chashma and Naag in Jammu and Kashmir, Naadu, Panihar, and Baoli in Himachal Pradesh. Naula and Dhara in Uttarakhand and Dhara in North-Eastern states.

In the last two decades, the cities in the Himalayan region have expanded rapidly, leading to  construction  of  buildings and dams, cutting of roads, tunnels, etc. due to which aquifers are severely damaged. As a result, there has been a significant decrease in spring discharge in the Himalayan region and many perennial springs have become seasonal, while some have completely dried up. The intensity of the problem arising from their drying can be gauged from the fact that NITI AAYOG, which is considered as ‘think tank’ of Govt. of India setup a working group in year 2017 to develop strategies for the revival of these critical water resources. National Institute of Hydrology, Roorkee has been engaged in intensive research for the last few years to understand the hydrological system of groundwater of these traditional water resources in Himalayan region to develop a concrete scientific strategy for their revival. At present, various projects are being carried out by the Western Himalayan Regional Centre, Jammu, a regional centre of National Institute of Hydrology, Roorkee for inventorization and revival of these traditional water resources of two Himalayan states i.e. Jammu and Kashmir and Himachal Pradesh. In these projects, a "Six-step methodology for Revival of Himalayan Springs" is  being  implemented by the institute. This methodology involves mapping and geotagging of Himalayan springs, monitoring and data generation, identification of vulnerable springs, mapping of springshed, adaptive measures to combat the climate change and creation of para-hydro-geologist for capacity building. About 350 springs in Ravi River catchment of Himachal Pradesh have been geo-tagged and the information on more than 40 parameters related to hydrology, geology, water use, population of dependent humans and cattle, land use of water sources, water quality, present status of springs, etc. have been collated. Apart of this, recharge areas of select springs in Baanganga River catchment of Jammu & Kashmir have been mapped and adaptive solutions have been prepared for their sustainable development.

Key words: Himalayan springs, springshed, Ravi River, catchment, water quality

परिचय

हिमालयी जल स्रोत हिमालयी क्षेत्र के 40 मिलियन से अधिक निवासियों के लिए पीने के पानी का मुख्य स्रोत हैं। इस कारण से, इस क्षेत्र के गाँव प्राकृतिक जल स्रोतों के आसपास बसे हुए हैं (रावत इत्यादि, 2005)। हिमालयी जल स्रोत प्राकृतिक संरचनाएं हैं और इसलिए स्थानीय समुदाय के लिए एक आम जल स्रोत है (महामुनि और उपासनी डी, 2011)। इसके अलावा, ये जल स्रोत कई नदियों का जीवन हैं और शायद ही कोई नदी हो, जिसे प्राकृतिक जल स्रोतों द्वारा नहीं खिलाया जाता है। इसलिए ये जल स्रोत नदी पर निर्भर कई सूक्ष्म आवासों की जीवन रेखा हैं। हालांकि हिमालयी जल स्रोत पहाड़ी क्षेत्रों में एक प्रमुख प्राकृतिक संसाधन हैं, परन्तु पिछले कुछ दशकों से क्षेत्र में तेज़ी से फैलाव और अनियोजित शहरी विकास के कारण इन जल स्रोतों के पुनर्भरण क्षेत्र को बदल दिया है। इन मानवजनित गतिविधियों से आंतरिक हाइड्रोलॉजिकल प्रणाली का विनाश होता है। उदाहरण के लिए, वल्दिया एवं भर्तरिया (1989) ने कुमाऊं हिमालय क्षेत्र में 35 साल की अवधि (1951 से 1986) में जल स्रोतों के जल प्रवाह में 40% की कमी की पहचान की है। महामुनि और कुलकर्णी (2012) के अनुसार पूर्वोत्तर के राज्यों के 8,000 गाँवों में पानी की भारी कमी का सामना करना पड़ रहा है। इस हिमालयी क्षेत्र में पानी की भारी कमी के कारण महिलाओं और बच्चों को पानी के लिए लंबी कतार देखी जा सकती है। पहाड़ी महिलाएं और बच्चे रोजाना लगभग आधे दिन सिर्फ पानी ही एकत्रित करते रहते हैं।

भारत के हिमालयी राज्यों की अधिकांश आबादी ग्रामीण क्षेत्रों में रहती है, क्योंकि ग्रामीण क्षेत्रों में पानी की माँग शहरी क्षेत्रों की तुलना में बहुत अधिक है। इसके अलावा, पानी की आपूर्ति और खपत के बीच असंतुलन है। हिमालयी राज्यों की जल मांग को पूरा करने में पारंपरिक जल संसाधनों के महत्व को ध्यान में रखते हुए, नीति आयोग, भारत सरकार ने पारंपरिक जल संसाधनों के विकास और उचित देखभाल के पूरे हिमालय क्षेत्र में इन प्राकृतिक जल स्रोतों को पुनर्जीवित करने हेतु एक मिशन चलाने पर जोर दिया है। वर्तमान समय में राष्ट्रीय जलविज्ञान संस्थान, रुड़की के जम्मू स्थित पश्चिम हिमालय क्षेत्रीय केंद्र द्वारा जम्मू एवं कश्मीर एवं हिमाचल प्रदेश हिमालयी राज्यों के परमपरागत जलस्रोतों के पुनरुद्धार हेतु विभिन्न परियोजनाएं चलायी जा रही हैं। इन परियोजनाओं में संस्थान द्वारा विकसित की गयी ‘‘हिमालयी प्राकृतिक जल स्रोतों (झरनो) के पुनरुद्धार हेतु छह कदम प्रणाली’’ को कार्यान्वित किया जा रहा है। इसके मुख्य कदम ‘‘जल स्रोतों का मानचित्रण’’, निगरानी एवं आकड़े सृजन, संवेदनशील झरनों का चिन्हीकरण, झरना जलग्रहण क्षेत्र का मानचित्रण, मौसम परिवर्तन हेतु अनुकूल उपाय एवं क्षमता निर्माण हेतु पैरा-हाइड्रोलॉजिस्ट तैयार करना है। 

क्रियाविधि हिमालयी जल स्रोत का पुनरुद्धार समय की आवश्यकता है और इस बहुमूल्य संसाधन के लोक ज्ञान को बढ़ाने वाले वैज्ञानिक अध्ययन के आधार पर ठोस योजना की आवश्यकता है। विभिन्न सरकारी और गैर-सरकारी संगठनों (एनजीओ) के विभिन्न वैज्ञानिकों के पिछले अनुभव के आधार पर, यह महसूस किया जाता है कि पूरे हिमालयी क्षेत्र में जल स्रोतों की स्थिति कमोबेश एक जैसी है। सभी जल स्रोत के जल प्रवाह में निंरतर कमी आ रही हैं, हालांकि सूखने की दर जगह-जगह भिन्न हो सकती है। इसलिए, उनका पुनरुद्धार भी पूरे हिमालयी क्षेत्र में एक ही रणनीति के बाद हासिल किया जा सकता है। वर्तमान अध्ययन में, राष्ट्रीय जलविज्ञान संस्थान, रूड़की संस्थान द्वारा विकसित की गयी ‘‘हिमालयी प्राकृतिक जल स्रोतों (झरनों) के पुनरुद्धार हेतु छह कदम प्रणाली’’ का कदमवार विवरण निम्लिखित है।

  1. जल स्रोतों का मानचित्रण 
  2. डेटा मॉनिटरिंग सिस्टम का विकास 
  3. जल प्रवाह मात्रा एवं गुणवत्ता के दृष्टिकोण से सवंदेनशील जल स्रोतों का चिन्हीकरण 
  4. जल स्रोतों के जलसंग्रहण क्षेत्र की पहचान 
  5. मौसम परिवर्तन हेतु अनुकूली रणनीतियों का विकास 
  6. ग्रामीण स्तर पर स्थानीय जल स्रोतों के प्रबंधन के लिए पैरा-हाइड्रोलॉजिस्ट तैयार करना 

जल स्रोतों का मानचित्रण

हिमालय क्षेत्र में जल स्रोतों पर वैज्ञानिक आकड़ों की कमी के कारण हिमालयी जल स्रोतों को हमारी नीति में अभी तक उचित महत्व नहीं मिल सका है। स्थानीय लोग अपने दैनिक जीवन में उनके महत्व को समझते हैं लेकिन आसानी से उपलब्ध जानकारी की कमी के कारण, इन जल स्रोतों को हमेशा नीति स्तर के साथ-साथ कार्यान्वन स्तर पर भी उपेक्षा का सामना करना पड़ा। मानचित्रण, जल स्रोतों के जिओ-टैगिंग के साथ जल स्रोतों पर प्राथमिक डेटाबेस के निर्माण की दिशा में एक कदम है। विभिन्न जलविज्ञानीय जानकारी जैसे कि अधिकतम और न्यूनतम जल प्रवाह, स्रोत के पानी की रासायनिक विशेषताओं, आश्रितों की आबादी, भूविज्ञान और क्षेत्र का भू-उपयोग, आदि सर्वेक्षणकर्ता द्वारा भरे गए प्रश्नावली के माध्यम से जानकारी एकत्र करना बहुत महत्वपूर्ण है। सभी एकत्रित जानकारी वेब-पोर्टल पर आसानी से उपलब्ध होगी और इसे ऑनलाइन अध्यनन किया जा सकता है। हिमालयी जल स्रोतों की ऐसी मैपिंग हिमाचल प्रदेश की रावी नदी के जलग्रहण क्षेत्र में की गई है और इसे चित्र 1 में दर्शाया गया है।

2.2 डाटा मॉनिटरिंग सिस्टम

हिमालयी जल स्रोतों के दृष्टिकोण से, इनके जल प्रवाह मापन सबसे महत्वपूर्ण है। यह स्रोत को जल आपूर्ति करने वाले जलभृत (aquifer) की प्रकृति पर त्वरित जानकारी देता है। इसलिए, जल प्रवाह बुनियादी आकड़ा है, जिसे समय-समय पर मापा जा सकता है; महीने में कम से कम एक बार तो अवश्य इसके अलावा, मौसम संबंधी मापदंड जैसे कि वर्षा, तापमान, सापेक्षिक आर्द्रता आदि ऐसे अन्य आकड़े हैं, जिनका उपयोग स्रोत की पुनर्भरण और जल निष्कासन प्रक्रियाओं को मॉडल करने के लिए किया जा सकता है। विभिन्न जलवायु क्षेत्रों में निकलने वाले जल स्रोतों की दीर्घकालिक निगरानी, इन जल स्रोतों पर जलवायु परिवर्तन के प्रभाव का अध्ययन करने के लिए काफी सहायक हो सकती है। इसके अलावा, जल स्रोतों के पानी के बेहतर प्रबंधन के लिए आस-पास के क्षेत्रों के जनसांख्यिकीय डेटा की समय-समय पर निगरानी की जानी चाहिए। वर्तमान अध्ययन में, अलग-अलग जलवायु परिवेश में निकलने वाले जल स्रोतों की पुनर्भरण-जल निष्काशन प्रक्रिया की बेहतर समझ के लिए रावी नदी के जलग्रहण क्षेत्र के पांच डेटा संग्रह स्टेशन बनाये गए है।

2.3 जल प्रवाह मात्रा एवं गुणवत्ता के दृष्टिकोण से सवंदेनशील जल स्रोतों का चिन्हीकरण

पूरे हिमालय में अक्सर हर गाँव एक जल स्रोत के पास स्थित है और कुछ गाँवों में एक से अधिक जल स्रोत हैं। किसी भी गांव की समृद्धि उस पर निर्भर करता है कि उसके पास कितने जल स्रोत हैं। इन जल स्रोतों में जल प्रवाह कम होने से ग्रामीणों के बीच उनके पीने की पूर्ति और कभी-कभी सिंचाई की मांग के बीच संघर्ष भी हो सकता है। जब एक जल स्रोत सूख जाता है, लोग पानी लाने के लिए अधिक दूरी तय करते हैं, जिसके परिणामस्वरूप पहाड़ी क्षेत्रों से प्रवास होता है। इस स्थिति का मुकाबला किया जा सकता है, अगर जल प्रवाह मात्रा एवं गुणवत्ता के दृष्टिकोण से सवंदेनशील जल स्रोतों का चिन्हीकरण समय पर किया जाये। ऐसे जल स्रोतों का पुनरुद्धार संबंधित सरकारी विभाग के लिए प्राथमिकता होनी चाहिए। ऐतिहासिक डेटाबेस के आधार पर, उनके पुनरुद्धार और प्रबंधन के लिए एक उचित योजना और प्रोटोकॉल तैयार किया जा सकता है। वर्तमान अध्ययन स्थानीय पानी की मांग से संबंधित महत्वपूर्ण मुद्दों के आधार पर हिमालयी जल स्रोतों की रैंकिंग की वकालत करता है। एक जल स्रोत जो एक बड़ी आबादी के लिए एकल स्रोत है, निश्चित रूप से वन क्षेत्र में उभरने वाले जल स्रोत की तुलना में सवंदेनशील जल स्रोतों की तालिका में उच्च रैंकिंग होगा। इसके अलावा, जल प्रवाह में परिवर्तनशीलता, पानी की गुणवत्ता के पैरामीटर, जल माँग आदि ऐसे अन्य मुद्दे हो सकते हैं, जिन्हें रैंकिंग के दौरान वरीयता दी जा सकती है।

2.4 जल स्रोतों के जलसंग्रहण क्षेत्र की पहचान

जल स्रोतों के जलसंग्रहण क्षेत्र की पहचान जल स्रोतों के जल विज्ञानीय अध्यनन में सबसे महत्वपूर्ण कदम है। जलसंग्रहण क्षेत्र की पहचान करना एक बहु-विषयक तकनीक है जिसमें मुख्य रूप से हाइड्रो-जियोलॉजिकल, रासायनिक और आइसोटोपिक तकनीक से निर्गत परिणामों का विश्लेषण शामिल हैं। भूमिगत स्तर पर पानी की आवाजाही को समझने के लिए लिथोलॉजी, फ्रैक्चर, डिप और स्ट्राइक, ढलान और लिनियमेंट वाले बहुत ही महीन पैमाने के भूगर्भीय मानचित्र की आवश्यकता होती है। जल श्रोत के पानी का रासायनिक विश्लेषण भूमिगत जल के सम्पर्क में आने वाली चट्टान का एक बहुत स्पष्ट संकेतक है। जल स्रोत के पानी में मौजूद किसी भी रासायनिक पदार्थों का अनुपात जलभृत में पानी के अवधारण समय के बारे में एक अच्छा अनुमान देता है। पुनर्भरण और भूमिगत जल के निवास समय (राय इत्यादि, 2011) को समझने के लिए हाइड्रोलॉजिकल शोध के लिए समस्थानिकों का उपयोग 1960 के दशक में शुरू किया गया था। विश्व स्तर पर, कई अध्ययनों ने अपने शोध उद्देश्य के लिए अलग-अलग समस्थानिक का उपयोग किया है। समस्थानिक तकनीक इस सिद्वांत पर काम करती है कि वायुमंडल में निरंतर वाष्पीकरण और संघनन प्रक्रिया के कारण हल्के एवं भारी समस्थानिक का अनुपात बदलता रहता है। ऊंचाई बढ़ने के साथ जल हल्के समस्थानिक में तो समृद्ध होता रहता, लेकिन भारी समस्थानिक में क्षीण होता रहता है। पर्यावरणीय आइसोटोप (हाइड्रोजन एवं ऑक्सीज़न) से लोकल मेटोरिक वाटर लाइन के माध्यम से भूमिगत जल के स्रोत का पता लगाया जा सकता है (चित्र 2)। जबकि अलटीटुड इफ़ेक्ट से पुनर्भरण क्षेत्र की ऊँचाई का अनुमान लगाया जा सकता है (चित्र 3)। इसके अलावा, ट्रिटियम (3) का उपयोग भूजल की उम्र को मापने के लिए किया जाता है और इस तरह पानी के निवास समय को मैप किया जा सकता है। जल पुनर्भरण क्षेत्र के सीमांकन के लिए भूगर्भीय सर्वेक्षण सबसे अहम् है (चित्र 2)।

2.5 अनुकूली रणनीतियों का विकास

हिमालयी जल स्रोत स्थानीय समुदायों की संपत्ति हैं, इसलिए परियोजना के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए उपयोगकर्ताओं के साथ प्रभावी संचार आवश्यक है। सहभागी ग्रामीण मूल्यांकन, वर्ष भर में उनकी पानी की जरूरतों के पैटर्न को समझने एवं जनसांख्यिकी/मनोवैज्ञानिक प्रोफ़ाइल जानने के लिए एक बहुत ही प्रभावकारी साधन है। एक बार जल मांग का सही मूल्याकंन हो जाने पर स्रोत से जल उपल्बधता एवं स्थानीय जल मांग का मॉडूल तैयार कर स्रोत के सतत विकास हेतु रणनीति तैयार की जा सकती है। इस तरह की मांग-आपूर्ति मॉड्यूल किसी भी जल स्रोत के लिए निर्भर गांव की वर्ष की मांग के दौर से मेल खाने के लिए जल भंडारण की आवश्यकता को जानने के लिए सहायक होगा। भंडारण टैंक को भरने के लिए जल स्रोत की क्षमता का अनुमान परियोजना के तहत निगरानी किए गए आंकड़ों से लगाया जा सकता है। यदि जल स्रोत की कम जल प्रवाह क्षमता के कारण न्यूनतम भंडारण संभव नहीं है, तो जल श्रोत के पुनर्भरण क्षेत्र में अधिक से अधिक वर्षा जल को भूमिगत जल में पहुंचाने हेतु जल संरक्षण उपायों को लागू करने की आवश्यकता है।

2.6 ग्राम स्तर पर जल स्रोतों के प्रबंधन के लिए पैरा-हाइड्रोलॉजिस्ट का तैयार करना

प्रत्येक हिमालयी जल स्रोत विकास एवं प्रवन्धन परियोजना में विभिन्न स्तरों पर क्षमता निर्माण अत्यंत ही आवश्यक है। पैरा-हाइड्रोलॉजिस्ट का प्रशिक्षण न केवल सामुदायिक स्वयंसेवकों को मानचित्रण और माप के कौशल को उजागर करता है, बल्कि संबंधित समुदायों के साथ बातचीत को उत्प्रेरित करेगा, और इन स्थानों में जल पुनर्भरण उपायों के कार्यान्वयन पर ज्ञान साझा करने और निर्णयों को प्रोत्साहित करेगा। पैरा-हाइड्रोलॉजिस्ट के निर्माण का उद्देश्य परियोजना के पूरा होने के बाद भी विकसित तकनीकी का प्रसार करना और अन्य इलाकों में लागू करना है। यह वह तरीका है जिसके माध्यम से पूरे हिमालयी जल स्रोतों की देखभाल एवं उनका उचित प्रबंधन किया जा सकता है।

निष्कर्ष

राष्ट्रीय जलविज्ञान संस्थान, रुड़की संस्थान द्वारा विकसित की गयी ‘‘हिमालयी जल स्रोतों (झरनों) के पुनरुद्धार हेतु छह कदम प्रणाली’’ के तहत जल स्रोतों की जिओ-टैगिंग, डाटा मॉनिटरिंग सिस्टम, जल प्रवाह मात्रा एवं गुणवत्ता के दृष्टिकोण से सवंदेनशील जल स्रोतों का चिन्हीकरण, जल स्रोतों के जलसंग्रहण क्षेत्र की पहचान, अनुकूली रणनीतियों का विकास और पैरा-हाइड्रोलॉजिस्ट तैयार करना सहित छह चरण पद्धति शामिल है। जल स्रोतों के प्रभावी प्रबंधन के लिए जल स्रोतों के पुनर्भरण क्षेत्र में जल संरक्षण उपायों को लागू करने के लिए कार्यदायी संस्थाओं का प्रभावी भागेदारी सुनिश्चित करना नितांत आवश्यक है। विकसित पद्धति को हिमालयी राज्य के अन्य हिस्सों में दोहराया जा सकता है क्योंकि इस पूरे हिमालयी राज्य में स्थानीय समुदाय के लिए ये जल स्रोत पानी के एकमात्र स्रोत हैं। पानी के भरोसेमंद स्रोतों के रूप में इन जल स्रोतों को बदलने के लिए अधिक से अधिक अंतर्दृश्टि प्रदान करने का एक प्रयास है। इस प्रकार, यह जल क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण योगदान होगा। जल स्रोतों पर इन्वेंट्री निश्चित रूप से उन्हें बढ़ती पानी की मांग से मेल खाने के लिए दीर्घकालिक जलापूर्ति योजना तैयार करने में मदद करेगी। इसके अलावा, पानी की गुणवत्ता के आंकड़े भी विभाग द्वारा पर्याप्त उपचार गतिविधियों को बनाने में मदद करेंगे। हिमालयी जल स्रोतों (झरनों) के पुनरुद्धार हेतु छह कदम प्रणाली निश्चित रूप से हिमालयी जल स्रोतों के प्रवाह को बढ़ाने के उपायों के बेहतर संयोजन की योजना बनाने में उनकी मदद करेगा। इसके अलावा, परियोजना के पूरा होने के बाद भी जल स्रोतों प्रवाह के आंकड़ों की निरंतर निगरानी से स्थानीय समुदायों को इन क्षेत्रों में कम से कम प्रतिकूल प्रभाव के साथ अपने विस्तार की गतिविधियों की योजना बनाने में मदद मिलेगी। हिमालयी जल स्रोतों डेटा बेस उनके भविष्य के वैज्ञानिक अध्ययन की योजना के लिए विभिन्न संस्थानों/विश्वविद्यालयों/संगठनों के वैज्ञानिकों/शोधकर्ताओं के लिए सहायक होगा। इसके अलावा, गैर-सरकारी संगठन (एनजीओ) और समुदाय आधारित संगठन (सीबीओ) इस परियोजना से प्राप्त ज्ञान का उपयोग करके अपने कार्यक्रमों को प्रभावी ढंग से निष्पादित कर सकते हैं।

References

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