बेहतर जल प्रबन्धन से ही हल होगा जल संकट

Submitted by Hindi on Fri, 03/11/2016 - 12:44
Source
जल चेतना - तकनीकी पत्रिका, जुलाई 2014

.पृथ्वी पर जीवन के लिये दो प्राथमिक चीजें हैं : हवा और पानी। इन दोनों के अभाव में जीवनयापन सम्भव नहीं हो सकता। पानी हमारे जीवन के लिये हवा के बाद सर्वाधिक आवश्यक तत्त्व है। मानव शरीर का 70 प्रतिशत भाग पानी से ही निर्मित है। प्रकृति ने भी पृथ्वी पर और उसके नीचे तीन चौथाई भाग में पानी संग्रहित किया हुआ है। फिर भी आज न तो घर में पानी है और न खेत में तथा जो थोड़ा-बहुत पानी उपलब्ध भी है तो वह इतना अधिक प्रदूषित हो चुका है कि उसे उपचारित किये बगैर पीना खतरे से खाली नहीं है। वास्तव में आज हमारे देश में जल संकट की स्थिति इतनी गम्भीर हो चुकी है कि इसने हमारे समक्ष राष्ट्रीय आपदा का रूप ले लिया है। पेयजल संकट किस कदर बढ़ता जा रहा है इसका नमूना हे बोतलबन्द पानी का फलता-फूलता संसार। नगरों तथा महानगरों में बोतलबन्द पीने के पानी की बिक्री आम होती जा रही है। रेलवे स्टेशनों, रेल डिब्बों, बस अड्डों और दर्शनीय स्थलों पर तो यह आम बात है। हालांकि बोतलबन्द पानी की शुद्धता पर भी कई सवालिया निशान लगे हुए हैं।

देश के महानगरों के कई परिवार 1200 से 2000 रुपए तक प्रति माह पानी खरीदने पर खर्च करते हैं। अर्थात पानी बिजली से कई गुना अधिक महंगा हो गया है जबकि यह सर्वाधिक मात्रा में उपलब्ध प्राकृतिक संसाधन है।

एक तरफ देश के कई शहरों में पीने लायक पानी के लिये एकदम सुबह से ही जगह-जगह लम्बी-लम्बी कतारें देखने को मिलती हैं, वहीं दूसरी तरफ देश के कई हिस्सों में पीने के पानी के लिये आपस में तथा सरकार और आम जनता के बीच हिंसात्मक घटनाएँ होने की खबरें आये दिन देखने-सुनने को मिलती रहती हैं। आज देश के अनेक शहरों में एक दिन के अन्तराल में पीने के पानी की आपूर्ति की जाने लगी है।

आज पानी का संकट केवल शहरों में ही नहीं, बल्कि ग्रामीण क्षेत्रों में भी है। देश के अनेक ग्रामीण इलाके ऐसे हैं जहाँ प्रतिवर्ष सूखा पड़ता है। हालत यह है कि देश में खाने के लिये अनाज तो है किन्तु पीने के लिये शुद्ध पानी पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध नहीं है। यदि यही स्थिति रही तो जो कुछ भी शुद्ध पानी आज उपलब्ध है, उसके भी अगले दो-तीन दशकों में ही समाप्त हो जाने के आसार हैं। इसके बावजूद हम न केवल पानी की कमी की समस्या के प्रति उदासीन हैं, बल्कि आज उपलब्ध पानी की भी निर्ममता से दोहन कर इस समस्या को गम्भीर से गम्भीरतम बना रहे हैं। इसका सबसे बड़ा कारण है विगत कई दशकों से देश के जल प्रबन्धन पर ईमानदारी से ध्यान न दिया जाना। अर्थात समस्या जल की कमी की नहीं, बल्कि समुचित जल प्रबन्धन की है।

‘जल ही जीवन है’ यह कहावत कहीं युद्ध का कारण न बन जाये


.जल संकट की वर्तमान स्थिति को देखते हुए आज ऐसा प्रतीत होने लगा है कि तीसरा विश्व युद्ध जमीन के टुकड़े के लिये नहीं, बल्कि पानी के लिये लड़ा जाएगा।

दरअसल आज हम इतिहास के ऐसे मोड़ पर पहुँच गए हैं कि हमे यह आशंका सताने लगी है कि जरूरत भर पानी हम सबको मिल पाएगा या नहीं।

जल प्रबन्धन की कमी का ही नतीजा है प्रतिवर्ष आने वाली बाढ़


प्रकृति ने हमारे देश को ढेर सारी नदियों, झीलों, झरनों आदि जलस्रोतों का जो वरदान दिया है, हम उनका सही उपयोग नहीं कर पा रहे हैं। यही कारण है कि बिहार, पश्चिम बंगाल, असम व ओड़िशा आदि प्रान्त प्रति वर्ष बाढ़ से बुरी तरह त्रस्त होते रहते हैं। दरअसल बारिश के दिनों में हमें जो अथाह जलराशि प्राप्त होती है, वह बिना किसी उपयोग के समुद्र में जाकर खड़े पानी में तब्दील हो जाती है। तथाकथित तमाम योजनाओं के बावजूद बारिश के दिनों में जल की अधिकता हमारे लिये संकट ही बनती है।

जल संकट के कारण वन क्षेत्रों में हुई भारी कमी


कृषि मंत्रालय द्वारा प्रकाशित आँकड़ों के अनुसार आज हमारे देश के केवल 21.5 प्रतिशत भू-भाग पर ही जंगल है जबकि उपग्रह द्वारा लिये गए चित्रों से पता चलता है कि भारत के केवल 16-17 प्रतिशत भू-भाग पर ही जंगल है। लेकिन जब आबादी कम थी और देश के 40-45 प्रतिशत भू-भाग पर जंगल थे, तब जल की उपलब्धता को लेकर चिन्ता की कोई बात नहीं थी ऐसा इसलिये कि :

1. जंगलों की बदौलत वर्षा के पानी का अच्छा खासा अंश रिस-रिस कर स्वत: जमीन के अन्दर चला जाता था। दरअसल जहाँ वन अधिक होते हैं, वहाँ वृक्षों से गिरी पत्तियाँ, छाल व छोटी-छोटी टहनियों आदि की मात्रा बहुत अधिक होती है जो सड़-गलकर मिट्टी की उर्वरा शक्ति के साथ-साथ उसकी भौतिक दशा भी सुधारती है यानी मिट्टी की छिद्रिलता बढ़ा देती है। इस कारण वर्षा से प्राप्त जल अधिक मात्रा में रिस-रिस कर जमीन के भीतर चला जाता है जिससे भूगर्भ के जलस्तर में कमी नहीं होने पाती है।

2. वन क्षेत्र की तमाम भूमि घास, खरपतवार, झाड़ी सहित विभिन्न प्रकार के छोटे-बड़े पौधों से अच्छादित रहती है। वनस्पति अच्छादित क्षेत्रों में पानी का बहाव वनस्पति रहित क्षेत्रों की तुलना में 125 गुना कम रफ्तार से होता है जिससे वर्षा के पानी को रिस-रिस कर जमीन के अन्दर पहुँचने के लिये अधिकाधिक समय मिल जाता है। उदाहरणार्थ हिमाचल प्रदेश के फर, स्प्रूस और देवदार के वनों में किये गए अध्ययन से पता चलता है कि वहाँ प्रथम 10 मिनटों में 38.0 से 44.8 सेमी. प्रति घंटे की दर से वर्षा का पानी जमीन के अन्दर चला जाता है जबकि बिना जंगल वाले स्थानों पर यह दर केवल 18 सेमी. प्रति घंटे है।

3. वन क्षेत्रों में वृक्षों के वितान (छतरी) वर्षा और भूमि के बीच क्षैतिज आड़ बना देते हैं जिसके कारण वर्षा की बूँदों का प्रहार धरातल पर बहुत ही धीमी गति से होता है। पेड़-पौधे अपनी छोटी-बड़ी, मोटी-पतली असंख्य जड़ों द्वारा जमीन की मिट्टी को बाँधे रहते हैं। ये दोनों ही बातें भूमि संरक्षण में सहायक होती हैं, वरना हमारी जीवनदायी उपजाऊ मिट्टी (जमीन की ऊपरी परत की मिट्टी), जो एक अत्यन्त मूल्यवान प्राकृतिक सम्पदा है, वर्षा के पानी के साथ बह जाती है।

इतना ही नहीं, पौधे अपनी जड़ों द्वारा संग्रहित वर्षा के पानी को छोटी-छोटी धाराओं अथवा झरनों के रूप में मनुष्यों तथा जानवरों को वर्ष पर्यन्त पीने के लिये शुद्ध जल उपलब्ध कराते हैं।

4. न केवल अपने ऊपर से गुजरती बारिश भरी हवाओं यानी बादलों को रोककर, बल्कि दूर से गुजरते बादलों को भी अपनी ओर आकर्षित कर वृक्षों से आच्छादित जंगल अपने क्षेत्र में वर्षा करा लेते हैं जिस कारण उस क्षेत्र विशेष में अधिकाधिक वर्षा का पानी रिस-रिस कर जमीन के अन्दर संग्रहित हो जाता है।

5. वृक्षों के समूह अपने ऊपर से गुजरने वाले हिमकणों से आच्छादित बादलों में सेंध लगाकर उनके हिमकणों को पत्तों के द्वारा चुराकर जड़ों में संग्रहित कर लेते हैं जो रिस-रिस कर जमीन के अन्दर संग्रहीत होता रहता है। वर्षा के पानी का जो अंश जमीन सोखती है उसमें से कुछ तो मिट्टी की ऊपरी परत में रह जाता है और पेड़-पौधों की जड़ों को सींचता रहता है, परन्तु अधिकांश भाग धीरे-धीरे रिस-रिस कर जमीन के अन्दर उस स्तर तक पहुँच जाता है जहाँ नीचे की चट्टानों की सारी दरारें और गड्ढे पानी से भरे होते हैं।

जमीन पर और जमीन के अन्दर जलचक्र को सन्तुलित कर जल के अनुपात को सदैव स्थिर बनाए रखने के अतिरिक्त और भी कई तरह से जंगल हमें लाभ पहुँचाते हैं इनमें से दो लाभ प्रमुख हैं :

1. वायुमंडल में आॅक्सीजन और कार्बन डाइआॅक्साइड के अनुपात को सदैव स्थिर रखना : हवा का एक प्रमुख अवयव है, आॅक्सीजन यानी प्राणवायु जिसका वायुमण्डल में होना जीवन के अस्तित्व के लिये अत्यन्त अनिवार्य है, क्योंकि वायुमंडल में इसकी मौजूदगी के बगैर हम तीन मिनट से अधिक जीवित नहीं रह सकते हैं। वायुमण्डल में जितनी आॅक्सीजन है वह पेड़-पौधों की बदौलत ही उपलब्ध है। बात यह है कि प्रकाश संश्लेषण की क्रिया के चलते पेड़ पौधे वायुमण्डल से कार्बन डाइआॅक्साइड सोखते हैं और बदले में आॅक्सीजन देते हैं। अनुमान लगाया गया है कि एक हेक्टेयर वन क्षेत्र द्वारा प्रतिवर्ष 3.7 टन कार्बन डाइआॅक्साइड अवशोषित की जाती है और बदले में 2.0 टन आॅक्सीजन प्राप्त होती है। इस तरह पेड़ पौधे समस्त जीवधारियों के कल्याण हेतु दोहरी भूमिका निभाते हैं- एक वायुमण्डल में जीवनदायी आॅक्सीजन के अनुपात को कम होने से रोककर और दूसरा जीवननाशी कार्बन डाइआॅक्साइड की मात्रा को बढ़ने से रोक कर।

2. समस्त जीवधारियों के लिये भोजन उपलब्ध कराना : प्रकाश संश्लेषण द्वारा पेड़-पौधे अपना भोजन तो तैयार करते ही हैं साथ ही समस्त मनुष्य जाति और पशु पक्षियों के लिये भी भोजन का प्रबन्ध करते हैं। शाकाहारी जानवर घास-पात खाकर जीवित रहते हैं, लेकिन मांसाहारी जानवर जिन जानवरों को खाकर जीवित रहते हैं, वे शाकाहारी होते हैं। ऐसे में अगर शाकाहारी जानवर न हों तो मांसाहारी जानवरों का वजूद ही खत्म हो जाएगा।

अनवरत बढ़ती आबादी


.वर्तमान समय में भारत में प्रति मिनट 45 बच्चे पैदा होते हैं और यहाँ प्रति मिनट मृत्यु दर 14 है। यानी कुल मिलाकर हमारे देश की आबादी में प्रति मिनट 31 बच्चों की बढ़ोत्तरी हो रही है। स्वतंत्रता प्राप्ति के समय यानी अगस्त 1947 में जब देश की आबादी 35 करोड़ थी तो प्रति व्यक्ति प्रतिवर्ष पानी की उपलब्धता 5000 घन मीटर थी। फिर सन 2000 में जब देश की आबदी बढ़कर एक अरब हो गई तो प्रति व्यक्ति प्रति वर्ष पानी की उपलब्धता घटकर 1950 घन मीटर रह गई। अनुमान है कि अनवरत बढ़ती आबादी के चलते भविष्य में पानी की उपलब्धता प्रति व्यक्ति प्रति वर्ष 1000 घन मीटर से भी कम रह जाएगी।

शहरीकरण का विस्तार


.ढेर सारी उपलब्ध सुविधाओं के चलते शहरों की आबादी में बेतहाशा वृद्धि हो रही है। तेजी से बढ़ रही आबादी के कारण उत्पन्न दबाव से गाँव, बाजार में, बाजार, कस्बे में, कस्बे, शहरों में, शहर नगरों में और नगर, महानगरों में तब्दील होते जा रहे हैं। परिणामस्वरूप सन 2000 तक डेढ़ करोड़ से अधिक जनसंख्या वाले विश्व के पाँच महानगरों में भारत के दो महानगर शुमार हो चुके थे। ये महानगर हैं कोलकाता और मुम्बई। सन 2000 में कोलकाता की आबादी थी एक करोड़ 66 लाख और मुंबई की आबादी थी एक करोड़ 60 लाख।

शहरी क्षेत्रों में विस्तार के चलते वर्षा का पानी भारी मात्रा में नालियों, नालों से बहकर नदियों में व्यर्थ चला जाता है। ऐसा इसलिये कि शहरों में आवासीय बस्तियों के पक्के मकानों, पक्की सड़कों आदि के निर्माण के बाद बहुत ही कम खुला क्षेत्र बच पाता है। एक सरकारी अनुमान के अनुसार सन 2000 में केवल दिल्ली में सिर्फ मकानों की छतों का क्षेत्रफल 138 वर्ग किलो मीटर था जो वर्षा का 6 से 8 करोड़ घन मीटर पानी प्राप्त करता था और सारा-का-सारा पानी नालियों-नालों से होकर यमुना में बह जाता था। दिल्ली जैसे महानगर में पिछले 10 वर्षों में 9 मीटर से लेकर 30 मीटर तक भूगर्भ का जलस्तर नीचे जा चुका है। कमोबेश लगभग यही स्थिति भारत के अन्य शहरों की भी है।

औद्योगीकरण का विस्तार


कागज, इस्पात, सीमेंट, चमड़ा प्रसंस्करण, वस्त्र, पत्थर, चीनी, कीटनाशी दवाएँ आदि विभिन्न प्रकार के ढेर सारे उद्योगों की उत्पादन क्षमता और संख्या में बढ़ने के साथ-साथ जल का इस्तेमाल भी उतनी ही तीव्र गति से बढ़ता जा रहा है। एक अनुमान के अनुसार, एक पॉण्ड कागज के उत्पादन के लिये 24 गैलन, एक टन इस्पात के उत्पादन के लिये 70 गैलन और एक टन सीमेंट के उत्पादन के लिये 750 गैलन जल की आवश्यकता पड़ती है। एक अनुमान के अनुसार, कुल ताजे पानी की आपूर्ति का करीब 20 प्रतिशत भाग उद्योगों की सेवा में लगता है। फिर उन उद्योगों की संख्या में इजाफा हो रहा है जो पानी की ज्यादा खपत करते हैं। इतना ही नहीं, ये उद्योग कचरे के रूप में अपने संयंत्रों द्वारा जो पानी छोड़ते हैं, वह धरती की सतह और भूजल को जहरीला बना देता है। अर्थात पदार्थों के उत्पादन के बाद जल प्रदूषित होकर व्यर्थ जल बन जाता है। ऐसा जल न तो मनुष्यों द्वारा उपयोग में लाया जा सकता है और न ही पशुओं और पेड़ पौधों के लिये उपयोगी रह जाता है। फलस्वरूप नदियाँ, झीलें और तालाब उत्तरोत्तर अधिकाधिक प्रदूषित होते जा रहे हैं। देश के 22 बड़े औद्योगिक शहरों में भूजल भी प्रदूषित हो चुका है।

सिंचित भूमि क्षेत्र में अनवरत हो रही वृद्धि


पानी की सबसे ज्यादा खपत सिंचाई में होती है। मोटे तौर पर मनुष्य कुल जितना पानी इस्तेमाल करता है उसमें सिंचाई का हिस्सा करीब 65 प्रतिशत है। इसके दो कारण हैं :

1. खेती की आधुनिक पद्धति : यह खेती को ऐसे बीजों, फसलों, रासायनिक उर्वरकों, कीटनाशी रसायनों और प्रणालियों पर निर्भर बना देने का परिणाम है जो बेतहाशा पानी पीते हैं।

2. सिंचित भूमि क्षेत्र में अनवरत हो रही वृद्धि : जैसे-जैसे देश में सिंचित भूमि का क्षेत्रफल बढ़ रहा है, वैसे-वैसे भूजल स्तर में गिरावट आ रही है। दरअसल देश में सुनियोजित विकास के पहले सिंचित भूमि क्षेत्र 2.26 करोड़ हेक्टेयर था और आज हम लगभग 6.9 करोड़ हेक्टेयर भूमि की सिंचाई कर रहे हैं। सिंचाई क्षेत्र बढ़ने के साथ-साथ जल का इस्तेमाल भी बढ़ रहा है जिसकी पूर्ति हेतु बढ़े हुए जल की मात्रा का 50 प्रतिशत हिस्सा देश भर में फैले लगभग 2 करोड़ ट्यूबवेल्स के माध्यम से पूरा किया जा रहा है। बात यह है कि सन 1970 के बाद ‘ट्यूबवेल लगाओ’ अभियान चलाकर जिस रफ्तार से भूजल का दोहन जमकर किया जा रहा है, उससे भूजल स्तर में तेजी से गिरावट आ रही है। परिणामस्वरूप में देश में प्रतिवर्ष 30 सेमी. की दर से भूजल स्तर में गिरावट आ रही है। फलस्वरूप पिछले 20 वर्षों में ही देश के 18 राज्यों के 286 जिलों में भूजल का स्तर 5 मीटर से भी अधिक गिर चुका है। यही कारण है कि गर्मी आते ही देश के अधिकांश कुएँ और तालाब सूख जाते हैं। ऐसे में यदि वर्षा कम हुई तो जल संकट की यह समस्या और गम्भीर हो जाती है।

प्राकृतिक और कृत्रिम जलस्रोतों की घोर उपेक्षा


.पचास साल पहले तक जो तालाब साफ-सुथरे थे, इतने कम समय में उनमें से आधे-से-अधिक तालाबों का नामोंनिशान तक मिट गया है। ऐसा चन्द भ्रष्ट लोगों के स्वार्थ के कारण हुआ है जो आज भी जारी है। सस्ती दर पर शहरी भूमि प्राप्त करने के लिये तालाबों को रोज पाटा जा रहा है। कई तालाबों को तो कुछ लोगों ने निजी जमीन समझकर और उनको पाटकर उन पर सिनेमा हाल, मकान, दुकान, पार्क, बगीचा आदि लगा दिये हैं। कई तालाबों में कल कारखानों से निकले कचरों के निपटान से उनका पानी इतना प्रदूषित हो गया है कि वह पानी पीना तो दूर, नहाने लायक भी नहीं रह गया है। ऐसे तालाबों में नहाने से चर्मरोग सहित अनेक बीमारियाँ हो जाती हैं।

कई झीलें भी अतिक्रमण का शिकार होने से बच नहीं पाई हैं। इतना ही नहीं कल-कारखानों से निकले व्यर्थ पदार्थों के निपटारन का शिकार झीलें भी हो रही हैं।

शहरी कचरों और औद्योगिक संयंत्रों के व्यर्थ पदार्थों के निपटारन से देश की अधिकांश नदियों का पानी इतना प्रदूषित हो चुका है कि पीने लायक नहीं रह गया है। सच्चाई तो यह है कि हमारे देश की अधिकांश नदियों की गिनती दुनिया की सर्वाधिक प्रदूषित नदियों में होने लगी है।

शहरों में कुएँ का तो लगभग सफाया ही हो चुका है। इसीलिये तो बिजली की आपूर्ति बाधित होने अथवा शहर की जल टंकी में लगे पम्प की मोटर जल जाने पर पानी का हाहाकर मच जाता है।

जल संकट से निजात पाने के उपाय


1. जंगलों का संरक्षण एवं संवर्धन : अच्छे और सघन वन न केवल अपने ऊपर आकाश से गुजरते बादलों को अपनी और आकर्षित कर बरसने के लिये मजबूर कर देते हैं, बल्कि वर्षा के पानी को धरातल से धरा के अन्दर गहराई तक पहुँचाने तथा उस पानी को लम्बे समय तक वहाँ सम्भाल कर रखने में अहम भूमिका निभाते हैं। यही कारण है कि वन आच्छादित पहाड़ और ग्लेशियर्स बारहों महीने नदियों को स्वच्छ तथा मीठे जल की आपूर्ति अनवरत करते रहते हैं। इसलिये वनों के संरक्षण और संवर्धन पर विशेष ध्यान देना होगा जिससे कि जलस्रोतों को उन पर पड़ने वाले प्रतिकूल प्रभाव से बचाया जा सके। इसके लिये योजनाबद्ध तरीके से वन क्षेत्रों का विस्तार करना होगा और साथ ही विरल वन क्षेत्रों को सघन वन क्षेत्रों में तब्दील करना होगा। यह तभी सम्भव है जब निम्नलिखित बातों पर अमल किया जाये :

2. नई वन नीति में सुधार : ऐतिहासिक रूप से यह सिद्ध हो चुका है कि जहाँ आदिवासी हैं, वहीं जंगल बचा है और जहाँ से आदिवासियों को खदेड़ दिया गया या किसी कारणवश विस्थापित कर दिया गया, वहाँ जंगल भी नष्ट हो गया। दरअसल जंगल में या जंगल के आस पास रहने वाले लोग ही जंगल का दर्द सबसे अधिक महसूस करते हैं, क्योंकि जंगल से उनका सीधा, गहरा और अटूट सम्बन्ध होता है। ऐसा इसलिये कि पेड़-पौधे उनके लिये सिर्फ जड़, तना, शाखाओं और पत्तियों का ढाँचा भर नहीं है, बल्कि उनके साथी हैं, उनके सुख-दुख में काम आते हैं लेकिन वन संरक्षण अधिनियम 1980 के लागू होने के बाद प्राचीन काल से प्राप्त आदिवासियों के हक-हकूक छिन गए। फिर वन विभाग की शायद ही कोई योजना है जिससे आदिवासियों को मदद मिलती है। इसलिये आदिम जातियाँ अपने ही इलाके में परदेसी बन गई। फलस्वरूप, आदिम जातियाँ रोजी-रोटी के लिये मौहताज हो गई, परिणामस्वरूप उनका सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन तहस-नहस हो गया। इसलिये जरूरी है नई वन नीति में ऐसे सुधार किये जाये जिससे कि प्राचीन काल से प्राप्त आदिवासियों के अधिकारों की पुन: बहाली हो जाये।

3. सड़कों, रेलवे लाइनों, नहरों इत्यादि के किनारे पड़ी खाली जमीन पर वृक्षारोपण किया जाये। ऐसा हो सकता है कि वृक्ष लगाने के लिये आम जनता के पास जमीन न हो, किन्तु इसका भी हल है। सड़कों, रेलवे लाइनों, नहरों इत्यादि के किनारे पड़ी खाली जमीन पर वृक्षारोपण हेतु वन विभाग द्वारा पट्टे पर जमीन देने का नियम है। फिर यदि आपके पास वृक्ष लगाने हेतु पौधे नहीं हैं तो वे भी वन विभाग द्वारा मुफ्त दिये जाते हैं। इतना ही नहीं, इस प्रकार रोपित वृक्षों के फल, फूल, शाखाओं आदि पर रोपने वाले का अधिकार होता है।

4. पंचायती और गैर मजरूआ जमीन पर वृक्षारोपण करके भी वन क्षेत्र में वृद्धि की जा सकती है।

आबादी की बाढ़ पर रोक


यह ठीक है कि बढ़ी हुई जनसंख्या का बोझ जल संसाधनों पर पड़ा है। देश में जल संकट की गहराती समस्या के मूल में बेतहाशा बढ़ रही आबादी है। इसीलिये हर हालत में आबादी की बाढ़ पर अविलम्ब रोक लगानी होगी अन्यथा पानी के मामले में हम शीघ्र ही अपात स्थिति में पहुँच जाएँगे।

जलस्रोतों का समुचित रख-रखाव


जल संरक्षण के लिये जलस्रोतों के समुचित रख रखाव पर विशेष ध्यान देना होगा। इसके लिये जर्जर और क्षतिग्रस्त हो गए तालाबों तथा कुओं की मरम्मत करनी होगी। तालाबों और कुओं की तलहटी में जमी गाद को वर्षों तक नहीं निकालने से उनकी सक्रियता पर प्रतिकूल असर पड़ता है इसलिये उनमें से समय-समय पर गाद निकालनी होगी तथा उनको कुछ हद तक गहरा भी करना होगा। ऐसा करने से जो मृत पड़े तालाब और कुएँ हैं, वे पुन: जिन्दा यानी सक्रिय हो जाते हैं।

हर हालत में तालाबों और कुओं को पाटने से रोकना होगा। साथ ही तालाबों और झीलों के अतिक्रमण पर भी रोक लगानी होगी।

शहरों की सीवेज लाइन और कल-कारखानों के प्रदूषित जल को समुचित रूप से उपचारित किये बगैर नदियों, तालाबों और झीलों में बहाने पर सख्ती से रोक लगानी होगी, जिससे कि इनका जल प्रदूषित न होने पाये और हमारे लिये उपयोगी बना रहे।

घर में वर्षाजल का संग्रहण


घरों की छतों से जल-निकासी की ऐसी व्यवस्था करनी होगी कि वर्षाजल को एक स्थान पर संग्रहीत करके रखा जा सके। इस तरह से संग्रहीत किये गए जल का उपयोग बर्तन और कपड़ा धोने तथा घर के परिसर के अन्दर सब्जी उत्पादन और बागवानी के कार्यों के लिये किया जा सकता है।

छोटे-छोटे चेकडैम द्वारा वर्षा के पानी का संग्रहण


छोटे-छोटे चेकडैम बनाकर वर्षा के पानी को बहुत ही कारगर ढंग से संरक्षित किया जा सकता है। कुछ साल पहले नई दिल्ली स्थित जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) में पानी का संकट था। सेटेलाइट से प्राप्त चित्रों के आधार पर वहाँ यह पता लगाया गया कि जमीन के अन्दर पानी कहाँ ज्यादा मात्रा में है और कहाँ कम मात्रा में। इसके अलावा पथरीली जमीन का भी पता लगाया गया। इसके बाद आसपास के इलाके में छोटे-छोटे चेकडैम बनाए गए ताकि उस इलाके में जमीन के अन्दर पानी का स्तर ऊपर आ सके। इसका असर यह हुआ कि पानी का लेवल चार से छह मीटर बढ़ गया। यह प्रयोग जेएनयू के अलावा चेन्नई, अलवर, जैसलमेर, भुज और अंजार में भी किया गया, जहाँ यह काफी सफल रहा।

खेतों को एकसार समतल करना


.ग्रामीण क्षेत्रों में जल प्रबन्धन का एक सरल तरीका खेतों को एकसार समतल करना भी है। इसके लिये बरसात शुरू होने के पहले ढलवाँ तथा उबड़-खाबड़ खेतों को समतल करना होगा। यह कार्य खेतों की लम्बाई-चौड़ाई के अनुसार चौकोर टुकड़ों में बाँटने के पश्चात मेंड बनाकर किया जाता है। ऐसा करके हमारे किसान भाई न केवल वर्षा एवं सिंचाई के पानी का भरपूर लाभ उठा सकेंगे, वरन अपने खेतों की उपजाऊ मिट्टी को बहकर निकल जाने तथा कटाव द्वारा खेतों को नष्ट होने से बचाने में भी सक्षम हो जाएँगे।

भूजल के अन्धाधुन्ध दोहन पर रोक लगाना


भूजल के अन्धाधुन्ध दोहन पर रोक लगानी होगी जिससे कि ट्यूबवेल्स प्राकृतिक रूप से स्वत: रिचार्ज होते रहें और उनकी उपयोगिता लम्बे समय तक बरकरार रहे।

रासायनिक उर्वरकों की जगह जैविक खादों का प्रयोग किया जाना चाहिए


रासायनिक उर्वरकों के प्रयोग द्वारा मिट्टी की संरचना बिगड़ जाती है, उसकी उर्वरा शक्ति बरकरार नहीं रह पाती, सिंचाई में पानी का खर्च बहुत अधिक बढ़ जाता है और पर्यावरण भी प्रदूषित होता है जबकि जैविक खादों जैसे : गोबर की खाद, हरी खाद, शैवाल की खाद, वर्मीकम्पोस्ट (केचुएँ द्वारा उत्पादित खाद), खली की खाद इत्यादि के प्रयोग द्वारा मिट्टी की भौतिक संरचना में सुधार होता है, उसकी उर्वरा शक्ति बरकरार रहती है, सिंचाई में पानी कम लगता है और पर्यावरण प्रदूषित होने के बजाय स्वच्छ होता है यानी प्रदूषण घटता है। दरअसल जैविक खादों के प्रयोग द्वारा मिट्टी की भौतिक संरचना और रासायनिक दशाओं में आये गुणात्मक बदलाव के चलते मिट्टी में मौजूद सूक्ष्मजीवों की वृद्धि एवं क्रिया-कलापों पर बहुत ही सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। फलस्वरूप, मिट्टी की उर्वरा शक्ति, जल धारण करने की क्षमता, ताप धारण करने की क्षमता और वायु संचार की क्षमता में वृद्धि होती है तथा पर्यावरण भी प्रदूषित होने के बजाय स्वच्छ होता है। मिट्टी की जल धारण करने की क्षमता में इतनी अधिक वृद्धि हो जाती है कि जिससे न केवल सिंचाई में पानी की बचत होती है, बल्कि ये खाद शुष्क क्षेत्र की खेती के लिये भी अत्यधिक कारगर सिद्ध हुई है। फिर जैविक खाद मिट्टी के कटाव को रोकती है क्योंकि ये खाद मिट्टी के कणों को बाँधती है। इतना ही नहीं, जैविक खाद का उत्पादन काफी सस्ता होने के कारण खेती की लागत में बहुत कमी आ जाती है। अत: रासायनिक उर्वरकों की जगह जैविक खादों का इस्तेमाल अधिकाधिक किया जाना चाहिए।

पुराने जमाने के कीटनाशी का प्रयोग किया जाना चाहिए


आधुनिक कीटनाशी रसायनों का उपयोग बन्द कर दें तो पानी को बचाने में पर्याप्त सफलता मिल सकती है। यह देश-विदेश के सभी कृषि वैज्ञानिकों की राय है। फिर आधुनिक कीटनाशी रसायनों के प्रति कीड़ों की बढ़ती प्रतिरोधक क्षमता और पर्यावरण पर पड़ने वाले कुप्रभावों को ध्यान में रखते हुए पुन: प्राचीन जमाने के कीटनाशी पदार्थ जैसे राख, नीम की खली, सबाड़िया और तम्बाकू की जड़ तथा पत्ते का प्रयोग करके फसलों और अनाजों को सुरक्षित रखने पर अमल किया जाना चाहिए। ऐसा इसलिये भी है कि इन पुराने जमाने के कीटनाशी के प्रयोग से मिट्टी की भौतिक और रासायनिक अवस्था पर जरा भी प्रतिकूल असर नहीं पड़ता है तथा सिंचाई में पानी की बचत भी होती है।

पानी के निजीकरण पर रोक लगाई जानी चाहिए


पानी से हमारे दिल की धड़कन चलती है। हमारा अस्तित्व पानी पर निर्भर करता है। सिर्फ हमारे लिये ही नहीं, बल्कि पशु-पक्षी, पेड़-पौधों, फसलों, वनस्पतियों आदि के लिये भी पानी का यही महत्त्व है। फिर पानी का कोई विकल्प भी तो नहीं है। ऐसे में केन्द्र तथा राज्य सरकारों को पानी के निजीकरण पर अविलम्ब रोक लगा देनी चाहिए। फिर भी यदि केन्द्र और राज्य सरकारें धन की कमी के चलते पानी के संचालन और रखरखाव के कार्यों को अंजाम देने में असमर्थ हैं तो पानी का निजीकरण बहुत ही छोटे पैमाने पर कराएँ और अगर लाचारी में ऐसा करना भी पड़े तो सिर्फ देशी कम्पनियों से कराएँ। देशी कम्पनियों (भारतीय कम्पनियों) को भारत के प्रति लगाव है, अपनापन है। ये देश के विकास में धन लगाती हैं और जरूरत पड़ने पर संकट की घड़ी में देश के रक्षार्थ तन, मन और धन से जी खोलकर सहयोग करने के लिये हमेशा तत्पर रहती हैं।

वास्तव में मानव कल्याण हेतु विश्व का हर मानव जल संरक्षण के प्रति जागरूक हो जाये तो किसी भी जल संकट से निपटा जा सकता है।

संपर्क करें
लल्लन कुमार प्रसाद, चौथी गली, पीर मुहानी, कदम कुआँ, पटना - 800003 बिहार

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