बेमेतरा जिला, छत्तीसगढ़ में भूजल गुणवत्ता का मूल्यांकन

Submitted by HindiWater on Sun, 03/29/2020 - 12:37
Source
राष्ट्रीय जलविज्ञान संस्थान, रुड़की

सांराश

भूजल महत्वपूर्ण संसाधनों में से एक है, जो विशेष रूप से भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में दैनिक आजीविका की आवश्यकताओं को पूरा करता है। विभिन्न क्षेत्रों जैसे कृषि, औद्योगिक और घरेलू क्षेत्रों में पानी की बढ़ती मांग ने, भूजल संसाधन के अति-दोहन, भूजल स्तर में लगातार गिरावट, तटीय क्षेत्रों में समुद्र के पानी के प्रवेश, और देश के विभिन्न हिस्सों में भूजल प्रदूषण की समस्याओं को पैदा किया है। छत्तीसगढ़ लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग, दुर्ग की एक रिपोर्ट के अनुसार बेमेतरा जिले का भूजल, सल्फेट संदूषण से प्रभावित है। भूजल में सल्फेट की उच्च सांद्रता गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल जलन की समस्या उत्पन्न करती है। इसलिए, बेमेतरा जिले का चयन भूजल गुणवत्ता के मूल्यांकन के लिए किया गया है। पूर्व एवं पश्च मानसून (2018-19) के दौरान 53 भूजल नमूनों को अध्ययन क्षेत्र से एकत्र किया गया और भौतिक-रासायनिक मापदंडों के लिए विश्लेषण किया गया। पेयजल के लिए भूजल की उपयुक्तता की जांच करने के लिए भारत मानक ब्यूरो (बी.आई.एस.) और विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यू.एच.अ¨.) के मानकों के अनुसार पूर्व एवं पश्च मानसून के जल रासायनिक आंकड़ों को संसाधित किया गया। आयनिक संबंधों को विकसित किया गया और पानी के प्रकार की पहचान की गई। स्थानिक वितरण नक्शे समोच्च आरेखों के रूप में, विकृत जल गुणवत्ता क्षेत्रों, प्रदूषण के संभावित स्रोतों और पीने एवं सिंचाई जल की गुणवत्ता मानकों के अनुरूप नहीं पाए जाने वाले विशिष्ट मापदंडों की पहचान करने के लिए तैयार किए गए। सिंचाई के उपयोग के लिए भूजल की उपयुक्तता का मूल्यांकन कुल घुलनशील लवण, एस0ए0आर0 और आर0एस0सी0 के आधार पर किया गया और सिंचाई के लिए उपयुक्त पाया गया। पानी का वर्गीकरण पाइपर ट्राइलिनिअर आरेख और यू0एस0 सैलिनिटी प्रयोगशाला वर्गीकरण का उपयोग करके बनाया गया। अध्ययन क्षेत्र के अधिकांश नमूने Ca-Mg-CI-SO4 या Ca-Mg-CO3HCO3 जल रासायनिक संकायों के हैं और पानी के प्रकार अधिकांशतया C3-S1 के अंतर्गत आते हैं। C3-S1 प्रकार के पानी (उच्च लवणता और कम एस0ए0आर0) का उपयोग प्रतिबंधित जल निकासी वाली मिट्टी पर नहीं किया जा सकता है।

Abstract

Groundwater is one of the vital resources, which meets the requirements of daily livelihood especially in rural areas of India. Growing demand of water in various sectors viz; agriculture, industrial and domestic sectors, has brought problems of over-exploitation of the groundwater resource, continuously declining groundwater levels, sea water ingress in coastal areas, and groundwater pollution in different parts of the country. The groundwater of Bemetara district is affected by sulphate contamination reported by Public Health Engineering Department, Durg, Chhattisgarh. Higher concentration of sulphate in ground water causes gastrointestinal irritation. Therefore, Bemetara district is selected for the evaluation of groundwater quality. Fifty three ground water samples were collected during pre- and post-monsoon (2018-19) from the study area and analyzed for physico-chemical parameters. Hydro-chemical data for pre- and post-monsoon seasons was processed as per BIS and WHO standards to examine the suitability of ground water for drinking purpose. Ionic relationships were developed and water types identified. Spatial distribution maps were prepared in the form of contour diagrams to identify degraded water quality zones, possible sources of pollution and specific parameters not conforming to drinking/ & irrigation water quality standards. Suitability of ground water for irrigation purpose has been assessed on the basis of total soluble salts, SAR and RSC and found to be fit for irrigation. Classification of water was made using Piper trilinear diagram and U.S. Salinity Laboratory Classification. Majority of the samples of the study area belong to Ca-Mg-Cl-SO4 or Ca-Mg-CO3-HCO3 hydrochemical facies and fall under water types C3-S1. The C3-S1 type water (high salinity and low SAR) cannot be used on soils with restricted drainage.

प्रस्तावना

भूजल महत्वपूर्ण संसाधनों में से एक है, जो विशेष रूप से भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में दैनिक आजीविका की आवश्यकताओं को पूरा करता है। विभिन्न क्षेत्रों जैसे कृषि, औद्योगिक और घरेलू क्षेत्रों में पानी की बढ़ती मांग से भूजल संसाधन के अति-दोहन, भूजल स्तर में लगातार गिरावट, समुद्र तटीय क्षेत्रों में समुद्री जल का भूजल में प्रवेश और देश के विभिन्न हिस्सों में भूजल प्रदूषण की समस्याओं को पैदा किया है। भू-पर्यावरणीय परिस्थितियाँ भूजल की गुणवत्ता को प्रभावित करती हैं। जल की गुणवत्ता के लिए प्रासंगिक हाइड्रोकेमिकल अध्ययन जलभृत लिथोलॉजी और जल रसायन विज्ञान के संबंध की व्याख्या करते हैं। इस तरह के संबंध न केवल भूजल में घुले हुए तत्वों की उत्पत्ति और वितरण की व्याख्या करने में मदद करते हैं, बल्कि भूजल रसायन विज्ञान को नियंत्रित करने वाले कारकों की भी व्याख्या करते हैं। छत्तीसगढ़ लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग, दुर्ग की एक रिपोर्ट के अनुसार बेमेतरा जिले का भूजल सल्फेट संदूषण से प्रभावित है। जिले के बेरला ब्लॉक के भूजल में इस प्रकार के सल्फेट संदूषण की संभावना है। इसलिए, बेमेतरा जिले को भूजल में सल्फेट संदूषण के अध्ययन के लिए चुना गया है। भूजल में सल्फेट की उच्च सांद्रता मनियारी शेल विन्यास में मौजूद जिप्सम वेंस के विघटन के कारण होती है। सल्फेट की उच्च सांद्रता वाले भूजल को पीने से शरीर में गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल जलन की समस्या उत्पन्न होती है।

अध्ययन क्षेत्र

बेमेतरा जिला भारत के छत्तीसगढ़ राज्य के नवगठित जिलों में से एक है, और इसका क्षेत्रफल 2854.81 वर्ग किमी है (चित्र1)। यह अक्षांश 21° 22’ से 22° 03’ N और देशांतर 81° 07’ से 81° 55’ E तक सीमित है। छत्तीसगढ़ में बेमेतरा जिला चूना पत्थर के भंडार के लिए महत्वपूर्ण जिला है। लाइमस्टोन, सैंडस्टोन, क्वार्टजाइट, मिट्टी, नदी की रेत भी भारी मात्रा में पाए जाते हैं। पूरे जिले में सीमेंट ग्रेड चूना पत्थर/डोलोमाइट होता है। विभिन्न प्रकार की मृदा जिले में पाई जाती है; जैसे लाल मृदा (भाटा) एंटिसोल, सैंडी लोम (मटासी) इनसेप्टिसोल, डोर्सा (अल्फिसोल्स), ब्लैक (कन्हार) वर्टिसोल और जलोढ़ मृदा (कछार)। इस क्षेत्र में उष्णकटिबंधीय आद्र्र और शुष्क जलवायु है। मार्च से जून को छोड़कर, पूरे वर्ष तापमान मध्यम रहता है। गर्मियों में तापमान 50°C तक भी चला जाता है। शहर में लगभग 1300 मिमी बारिश होती है, जो ज्यादातर मानसून के मौसम में जून के अंत से अक्टूबर की शुरुआत तक होती है। भौतिक रूप से, बेमेतरा जिले के क्षेत्र में लगभग सपाट स्थलाकृति है। जिले की सामान्य ढलान उत्तर-पूर्व दिशा में है, जहां जिले की प्रमुख धाराएँ बहती हैं। जिला बेमेतरा में, शिवनाथ, खारुन, हाफ़, सकरी, सुरही और फोने नाम की छह नदियाँ हैं। भूगर्भीय रूप से, जिले में छत्तीसगढ़ सुपरग्रुप के अंतर्गत मेसो-नियो-प्रोटेरोज़ोइक अनुक्रम की चट्टानें शामिल हैं और रायपुर समूह में चंडी गठन, तरेंगा गठन, हिरी गठन और मनियारी गठन शामिल हैं। बेमेतरा जिले के खनिज भंडार में डोलोमाइट, चूना पत्थर, साधारण पत्थर, रेत और मिट्टी आदि शामिल हैं (CGWB रिपोर्ट, 2015)।

।

सामग्री और कार्यप्रणाली

जिला बेमेतरा में विद्यमान भूजल स्रोतों (डगवेल, बोरवेल और हैंडपंप) से, जो बड़े पैमाने पर पीने के पानी के उद्देश्य के लिए इस्तेमाल किए जा रहे हैं, 53 भूजल नमूने मानसून के पूर्व और पश्च में एकत्र किए गए और मानक तरीकों (APHA] 2005) का उपयोग करते हुए भौतिक-रासायनिक मापदंडों के लिए विश्लेषण किया गया है।

परिणाम और चर्चा

पीने के उद्देश्य के लिए भूजल की गुणवत्ता का मूल्यांकन

पूर्व-मानसून (मई 2018) और पश्च-मानसून (जनवरी 2019) के दौरान अध्ययन क्षेत्र जिला बेमेतरा से 53 भूजल नमूनों को वर्ष 2018-19 के दौरान जल संसाधन विभाग (डब्ल्यूण्आरण्डी.) रायपुर, छत्तीसगढ़ सरकार के सहयोग से विभिन्न स्रोतों से एकत्र किया गया।

अध्ययन क्षेत्र के भूजल में पीएच मान पूर्व-मॉनसून के दौरान 6.6 से 8.7 तक और पश्च-मॉनसून के दौरान 6.4 से 7.4 तक पाया गया। अधिकांश नमूनों के पीएच मान पीने और अन्य घरेलू आपूर्ति सहित पानी के विभिन्न उपयोगों के लिए (बीण्आईण्एस.) (2012) और (डब्ल्यू.एचण्अ¨.) (2011) द्वारा निर्धारित सीमा के भीतर ही पाए गए। विद्युत चालकता और घुलित नमक सांद्रता पानी में आयनित पदार्थ की सांद्रता से संबंधित हैं और अत्यधिक कठोरता और अन्य खनिज संदूषण की समस्याओं से भी संबंधित हो सकते हैं। पूर्व-मॉनसून मौसम के दौरान अध्ययन क्षेत्र के भूजल नमूनों में चालकता का मान 570 से 4898 माईक्रोसाईमन/सेमी तक पाया गया और पश्च-मॉनसून सीज़न के दौरान 364 से 8944 माईक्रोसाईमन/सेमी पाया गया। ग्राम कुनरा के नमूने में अधिकतम चालकता 8944 माईक्रोसाईमन/सेमी देखा गया। पूर्व-मानसून के मौसम के दौरान भूजल में चालकता वितरण मानचित्र चित्र 2 में दिखाया गया है।

।

अध्ययन क्षेत्र में, पूर्व-मानसून के मौसम के दौरान भूजल में कुल घुलित ठोस (टी0डी0एस0) का मान 399 से 3429 मिलीग्राम/ली और पश्च-मानसून के मौसम के दौरान 255 से 6261 मिलीग्राम/ली तक होता है। लगभग 84ज्% नमूने स्वीकार्य सीमा से ऊपर पाए गए, लेकिन पूर्व-मॉनसून सीज़न में अधिकतम 2000 मिलीग्राम/ली की अनुमेय सीमा के भीतर और स्वीकार्य सीमा से ऊपर लगभग 77% नमूने पाए गए, लेकिन पश्च सीज़न में अधिकतम 2000 मिलीग्राम/ली की अनुमेय सीमा के भीतर पाए गए (तालिका 1)। 500 मिलीग्राम/ली से अधिक टी.डी.एस. का पीने का पानी, आपूर्ति के लिए वांछनीय नहीं माना जाता है, हालांकि जहां बेहतर पानी उपलब्ध नहीं है वहाँ अधिक खनिज युक्त पानी का उपयोग भी किया जाता है। इस कारण से, पीने के पानी के लिए स्वीकार्य सीमा के रूप में 500 मिलीग्राम/ली और अधिकतम अनुमत सीमा के रूप में 2000 मिलीग्राम/ली का सुझाव दिया गया है (बी.आई.एस., 2012)। अध्ययन क्षेत्र में, 500 मिलीग्राम/ली से अधिक टी.डी.एस. युक्त पानी गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल जलन का कारण बनता है (बी.आई.एस., 2012)।

।

प्राकृतिक जल में क्षारीयता मुख्य रूप से कार्बोनेट्स, बाइकार्बोनेट्स और हाइड्रॉक्साइड्स की उपस्थिति के कारण होती है। अध्ययन क्षेत्र के भूजल में क्षारीयता पूर्व मानसून के दौरान 78 से 355 मिलीग्राम/ली और मानसून के बाद 75 से 453 मिलीग्राम/ली तक पायी गई। कोई भी नमूना पूर्व और पश्च मॉनसून सीज़न के दौरान 600 मिलीग्राम/ली की अधिकतम स्वीकार्य सीमा से अधिक नहीं है।

कार्बोनेट, सल्फेट्स और क्लोराइड के साथ कैल्शियम और मैग्नीशियम की उपस्थिति पानी में कठोरता का मुख्य कारण है। पीने के पानी के लिए स्वीकार्य सीमा के रूप में 200 मिलीग्राम/ली की सीमा और अनुमति के रूप में 600 मिलीग्राम/ली की सीमा की सिफारिश की गई है (बी0आई0एस0, 2012)। पूर्व-मॉनसून सीज़न के दौरान कुल कठोरता मान 182 से 2098 मिलीग्राम/ली तक और पश्च-मॉनसून के दौरान 119 से 1983 मिलीग्राम/ली होता है। अध्ययन क्षेत्र के लगभग 55% नमूने 200 मिलीग्राम/ली की स्वीकार्य सीमा को पार करते हैं, लेकिन 600 मिलीग्राम/ली की अनुमेय सीमा के भीतर हैं और 45% नमूना पूर्व-मानसून के मौसम के दौरान 600 मिलीग्राम/ली की अनुमेय सीमा को पार करते हैं (तालिका-1)। मानसून के बाद के मौसम में 4% नमूने 200 मिलीग्राम/ली की स्वीकार्य सीमा के भीतर आते हैं और 31% नमूने 600 मिलीग्राम/ली की अनुमेय सीमा को पार कर जाते हैं। पूर्व-मानसून सीज़न के लिए कठोरता वितरण मानचित्र चित्र 3 में दिखाया गया है।

।

अध्ययन क्षेत्र के भूजल में, पूर्व-मॉनसून के दौरान कैल्शियम का मान 58 से 587 मिलीग्राम/ली तक और मानसून के बाद में 28 से 601 मिलीग्राम/ली पाया गया। पूर्व-मॉनसून सीज़न के दौरान मैग्नीशियम का मान 9.39 से 201 मिलीग्राम/ली तक और मानसून के बाद के मौसम में 8.5 से 144 मिलीग्राम/ली तक पाया गया। पीने के पानी के लिए कैल्शियम और मैग्नीशियम की स्वीकार्य सीमा क्रमशः 75 और 30 मिलीग्राम/ली है (बी0आई0एस0, 2012)। भूजल में, कैल्शियम आमतौर पर चट्टानों में उनके सापेक्ष प्रचुरता के अनुसार मैग्नीशियम से अधिक होता है। पूर्व-मानसून सीज़न में, 55% नमूने कैल्शियम की अधिकतम अनुमेय सीमा से अधिक है और 8% नमूने मैग्नीशियम की अधिकतम अनुमेय सीमा से अधिक है। पूर्व-मॉनसून में सोडियम की सांद्रता 8.4 से 274 मिलीग्राम/ली तक और मानसून के बाद के मौसम में 7.8 से 180 मिलीग्राम/ली तक पायी गयी। अध्ययन क्षेत्र में उच्च सोडियम सांद्रता को बेस-एक्सचेंज के लिए जिम्मेदार ठहराया जा सकता है। उच्च सोडियम सांद्रता के साथ भूजल सिंचाई के लिए उपयुक्त नहीं है। अध्ययन क्षेत्र के भूजल में पोटेशियम का मान पूर्व-मानसून में 1.2 से 163 मिलीग्राम/ली और पश्च-मानसून के दौरान 0.3 से 169 मिलीग्राम/ली तक पाया गया।

पूर्व-मानसून सीज़न के दौरान क्लोराइड की सांद्रता 10 से 324 मिलीग्राम/ली तक और पश्च-मॉनसून के दौरान 4.2 से 780 मिलीग्राम/ली तक पायी गयी। पूर्व- और पश्च-मॉनसून दोनों मौसमों के दौरान अध्ययन के 90% से अधिक नमूने 250 मिलीग्राम/ली की स्वीकार्य सीमा के भीतर आते हैं। भूजल में सल्फेट की मात्रा आमतौर पर कैल्शियम, मैग्नीशियम और सोडियम के घुलनशील लवण के रूप में होती है। अध्ययन क्षेत्र में सल्फेट की सांद्रता पूर्व-मानसून सीज़न के दौरान 4.0 से 2031 मिलीग्राम/ली तक और मानसून के बाद के मौसम में 4.9 से 3257 मिलीग्राम/ली तक पायी गयी। भारतीय मानक ब्यूरो ने पेयजल में सल्फेट के लिए स्वीकार्य सीमा 200 मिलीग्राम/ली और अनुमेय सीमा 400 मिलीग्राम/ली निर्धारित की है। अध्ययन क्षेत्र में, 52% नमूने 200 मिलीग्राम/ली की स्वीकार्य सीमा के भीतर, 13% नमूने स्वीकार्य सीमा से अधिक, लेकिन अनुमेय सीमा के भीतर और 34% नमूने अनुमेय सीमा से भी अधिक सांद्रता के पाए गए। मानसून के बाद के मौसम में लगभग इसी तरह की प्रवृत्ति देखी गई। पूर्व-मानसून सीज़न के लिए सल्फेट वितरण मानचित्र चित्र 4 में दिखाया गया है।

।

अध्ययन क्षेत्र के भूजल में नाइट्रेट पूर्व-मानसून के दौरान 0.32 से 214 मिलीग्राम/ली और मानसून के बाद के मौसम में 0.0 से 215 मिलीग्राम/ली तक पाया गया। पूर्व-मानसून के दौरान लगभग 77% नमूने 45 मिलीग्राम/ली की अनुमेय सीमा के भीतर आते हैं और 23% नमूने अनुमेय सीमा को पार कर जाते हैं और मानसून के बाद के मौसम में लगभग 85% नमूने अनुमेय सीमा के भीतर आते हैं और 15% नमूने अनुमेय सीमा को पार कर जाते हैं। भूजल में नाइट्रेट की उच्च सांद्रता मेथेमोग्लोबिनाइमिया (ब्लू बेबी) नामक बीमारी का कारण बनता है, जो आमतौर पर बोतल से पीने वाले शिशुओं को प्रभावित करता है। अध्ययन क्षेत्र के भूजल में फ्लोराइड की मात्रा पूर्व-मानसून सीज़न के दौरान 0.07 से 1.03 मिलीग्राम/ली और मानसून के बाद के मौसम में 0.1 से 1.52 मिलीग्राम/ली तक होती है। अध्ययन क्षेत्र के लगभग सभी नमूने 1.0 मिलीग्राम/ली की स्वीकार्य सीमा के भीतर आते हैं।

सिंचाई उद्देश्य के लिए जल की गुणवत्ता का मूल्यांकन

सिंचित कृषि में जल की गुणवत्ता महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। कृषि उपयोग के लिए पानी के अक्षम प्रबंधन के दौरान कई समस्याएं उत्पन्न होती हैं। पानी में घुलित लवणों की सांद्रता और संरचना सिंचाई के उपयोग के लिए इसकी गुणवत्ता निर्धारित करती है। सिंचित क्षेत्र में लवणता या क्षार की स्थिति पानी की गुणवत्ता के किसी भी मूल्यांकन में एक महत्वपूर्ण घटक है। अच्छी मिट्टी और जल प्रबंधन के तहत, अच्छी गुणवत्ता वाले पानी में अधिकतम उपज पैदा करने की क्षमता होती है। सिंचाई जल की गुणवत्ता का आकलन निम्नलिखित मापदंडों द्वारा किया जाता है :-

  • लवणता
  • सोडियम का अन्य समूहों (एस.ए.आर.) के सापेक्ष अनुपात
  • अवशिष्ट सोडियम कार्बोनेट (RSC)
  • भारी धातुएं

लवणता

कुल घुलित ठोस (टी0डी0एस0) और विद्युत चालकता (ई0सी0) के रूप में लवणता व्यक्त की जाती है। पानी में मौजूद लवण, पौधों की वृद्धि को सीधे प्रभावित करने के अलावा, मिट्टी की संरचना, पारगम्यता और वातन को भी प्रभावित करते हैं, जो अप्रत्यक्ष रूप से पौधे की वृद्धि को प्रभावित करते हैं। आसमाटिक दबाव के कारण मिट्टी का पानी जड़ क्षेत्र से होकर गुजरता है। जैसे ही जड़ क्षेत्र में मिट्टी के पानी की घुलित ठोस सामग्री बढ़ती है, पौधे के लिए आसमाटिक दबाव को दूर करना मुश्किल होता है और पौधों की जड़ झिल्ली पानी और पोषक तत्वों को आत्मसात करने में सक्षम हो जाती है। इस प्रकार, रूट ज़ोन में अवशिष्ट जल की घुलित ठोस सामग्री को भी उचित लीचिंग द्वारा सीमा के भीतर बनाए रखना होता है।

सोडियम का सापेक्ष अनुपात

मिट्टी कैल्शियम और मैग्नीशियम आयनों को सिंचाई के पानी से अवशोषित करती है। सोडियम अपनी पारगम्यता को कम करने के लिए मिट्टी के साथ प्रतिक्रिया करता है। सिंचाई के लिए पानी के उपयोग में सोडियम या क्षार का खतरा पूर्ण और सापेक्षिक सांद्रता से निर्धारित होता है और इसे सोडियम अवशोषण अनुपात (SAR) के रूप में व्यक्त किया जाता है। यदि सोडियम का अनुपात अधिक है, तो मृदा क्षारीयता का खतरा अधिक है; और इसके विपरीत, यदि कैल्शियम और मैग्नीशियम की पूर्ति होती है, तो खतरा कम होता है। सिंचाई जल के एस0ए0आर0 मूल्यों और सोडियम द्वारा मिट्टी से अवशोषित होने के बीच एक महत्वपूर्ण संबंध है।

।

जहां सभी आयनिक सांद्रता मिली एक्विवैलेन्ट प्रति लीटर में व्यक्त किए जाते हैं। दिए गए पानी के लिए एस0ए0आर0 की गणना मिट्टी और फसलों के लिए उस पानी के सोडियम खतरे का एक उपयोगी सूचकांक प्रदान करती है। कम एस0ए0आर0 (2 से 10) सोडियम से कम खतरे का संकेत देता है; मध्यम खतरा 7 से 18 के बीच, उच्च खतरा 11 से 26 के बीच, और इससे अधिक में बहुत ज्यादा खतरा होता है। घोल की आयनिक शक्ति जितनी कम होगी, किसी दिए गए एस0ए0आर0 के लिए सोडियम के खतरे उतने ही अधिक होंगे (रिचड्र्स, 1954)।

अवशिष्ट सोडियम कार्बोनेट

कार्बोनेट और बाइकार्बोनेट आयनों की उच्च सांद्रता वाला पानी कैल्शियम और मैग्नीशियम को कार्बोनेट के रूप में अवक्षेपित करता है, अवशिष्ट पानी को सोडियम बाइकार्बोनेट के साथ उच्च सोडियम पानी में बदलता है। नतीजतन, सोडियम का सापेक्ष अनुपात बढ़ता है और मिट्टी में स्थिर हो जाता है जिससे मिट्टी की पारगम्यता कम हो जाती है। इसकी अधिकता को अवशिष्ट सोडियम कार्बोनेट (आर0एस0सी0) द्वारा दर्शाया गया है ओर निम्नलिखित सूत्र द्वारा निर्धारित किया गया हैः RSC = (HCO3-+ CO3-) – (Ca++ + Mg++)

जहां सभी आयनिक सांद्रताएं ईपीएम में व्यक्त की जाती हैं। यदि आर0एस0सी0 2.5 ईपीएम से अधिक हो जाता है, तो पानी आमतौर पर सिंचाई के लिए अनुपयुक्त है। अत्यधिक आर0एस0सी0 मिट्टी की संरचना को खराब करने का कारण बनता है, क्योंकि यह मिट्टी में पानी और हवा के आवागमन को प्रतिबंधित करता है। यदि आर0एस0सी0 1.25 और 2.5 के बीच है, तो पानी सीमांत गुणवत्ता का है, जबकि 1.25 से कम के मानों से संकेत मिलता है कि पानी सिंचाई के लिए सुरक्षित है।

विद्युत चालकता, सोडियम सामग्री, सोडियम अवशोषण अनुपात (एस0ए0आर0) और अवशिष्ट सोडियम कार्बोनेट (आर0एस0सी0) के संबंध में अनुशंसित वर्गीकरण तालिका 2 में दिए गए हैं। विभिन्न स्रोतों से एकत्र भूजल नमूनों के लिए सोडियम प्रतिशत, एस0ए0आर0 और आर0एस0सी0 के मूल्यों की गणना की गई थी। अध्ययन क्षेत्र में विद्युत चालकता मान पूर्व-मॉनसून के दौरान 570 से 4898 μS/cm तक और पश्च-मॉनसून के दौरान 364 से 8944 μS/cm पाया गया।

पूर्व-मॉनसून के दौरान अध्ययन क्षेत्र के भूजल में एस.ए.आर. का मान 0.19 से 2.69 तक और पश्च-मॉनसून के दौरान 0.2 से 3.2 तक पाया गया। पूर्व-मॉनसून सीज़न के दौरान अध्ययन क्षेत्र में सोडियम प्रतिशत 6.5 से 42.8% और पश्च-मॉनसून के दौरान 6.9 से 44.7% तक पाया गया। पूर्व- और पश्च-मानसून दोनों मौसमों के दौरान कोई भी नमूना सिंचाई के लिए 60% सोडियम के प्रतिशत के अनुशंसित मूल्य से अधिक नहीं है और सिंचाई के उद्देश्य के लिए उपयुक्त है। लगभग सभी नमूनों में 10 से नीचे एस0ए0आर0 मान हैं जो सिंचाई के उद्देश्य के लिए उत्कृष्ट गुणवत्ता का संकेत देते हैं। सभी नमूनों में आर.एस.सी. 1.25 से नीचे देखा गया, जो कि सिंचाई के उद्देश्य के लिए उपयुक्तता का संकेत देते हैं।

।

भूजल का वर्गीकरण

अध्ययन क्षेत्र के भूजल को वर्गीकृत करने के लिए विभिन्न स्वीकृत और व्यापक रूप से इस्तेमाल की जाने वाली चित्रमय विधियाँ जैसे कि पाइपर ट्राइलीनियर आरेख, और यू0एस0 सैलिनिटी प्रयोगशाला वर्गीकरण का उपयोग किया गया है। पाइपर ट्राइलीनियर आरेख (पाइपर, 1944) का उपयोग प्रमुख उद्धरणों और आयनों पर आधारित पानी के रसायन विज्ञान में समानता और असमानता व्यक्त करने के लिए किया जाता है। यू0एस0 सैलिनिटी प्रयोगशाला वर्गीकरण (विलकॉक्स, 1955) का उपयोग सिंचाई के लिए भूजल की उपयुक्तता का अध्ययन करने के लिए किया गया है।

पाइपर ट्राइलीनियर वर्गीकरण

पाइपर (1944) ने ट्राइलीनियर आरेख का एक रूप विकसित किया है, जो भूजल में घुले हुए घटकों के स्रोतों के संबंध में विश्लेषण करने में प्रभावी है। पाइपर ट्रिलिनियर आरेख के तीन क्षेत्रों, दो त्रिकोणीय क्षेत्रों (ऋणायन और धनायन) और एक हीरे के आकार के क्षेत्र (संयुक्त क्षेत्र) को जोड़ती है। इस आरेख का उपयोग करके पानी को अलग-अलग हाइड्रोकेमिकल संकायों में वर्गीकृत किया जा सकता है। पूर्व-मानसून सीज़न के लिए अध्ययन क्षेत्र के भूजल नमूनों के रासायनिक विश्लेषण डेटा को ट्रिलिनियर आरेख पर चित्रित किया गया है (चित्र 5)। परिणामों से यह स्पष्ट होता है कि अध्ययन क्षेत्र के अधिकांश नमूने पूर्व-मानसून सीज़न में Ca-Mg-CI-SO4 या Ca-Mg-CO3.HCO3 हाइड्रोकेमिकल संकायों के हैं।

यू.एस. सेलिनिटी प्रयोगशाला वर्गीकरण

सोडियम सांद्रता सिंचाई-जल वर्गीकरण में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है क्योंकि सोडियम मिट्टी के साथ क्रिया करके सोडियमजन्य खतरों का कारण बनता है। इस प्रतिस्थापन की सीमा को सोडियम अवशोषण अनुपात (SAR) द्वारा अनुमानित किया है। यू0एस0 सेलिनिटी प्रयोगशाला ने सोडियमजन्य खतरों के लिए सूचकांक के रूप में एस0ए0आर0 और लवणता के लिए सूचकांक के रूप में विद्युत चालकता को लेकर सिंचाई के प्रयोजनों के लिए भूजल की उपयुक्तता के लिए एक आरेख विकसित किया है।

अध्ययन क्षेत्र के भूजल नमूनों का भूजल गुणवत्ता विश्लेषण यू0एस0 सेलिनिटी प्रयोगशाला वर्गीकरण के अनुसार किया गया है (चित्र 6)। परिणामों से यह स्पष्ट होता है कि अध्ययन क्षेत्र के पूर्व मानसून के मौसम में अधिकांश भूजल के नमूने C3-S1 के अंतर्गत आते हैं, इसके बाद C2-S1 के अंतर्गत। C3-S1 प्रकार का पानी (उच्च लवणता और कम एस0ए0आर0) का उपयोग प्रतिबंधित जल निकासी वाली मिट्टी पर नहीं किया जा सकता है। यहां तक कि पर्याप्त जल निकासी के लिए लवणता नियंत्रण के लिए विशेष प्रबंधन की आवश्यकता हो सकती है और अच्छी सहनशीलता वाले पौधों का चयन किया जाना चाहिए। C2-S1 प्रकार के पानी (मध्यम लवणता और कम एस0ए0आर0) का उपयोग किया जा सकता है यदि मध्यम मात्रा में लीचिंग होती है। लवणता नियंत्रण के लिए विशेष प्रथाओं के बिना ज्यादातर मामलों में मध्यम नमक सहिष्णुता वाले पौधे उगाए जा सकते हैं।

निष्कर्ष

भारत के छत्तीसगढ़ राज्य के जिला बेमेतरा के भूजल की उपयुक्तता की जांच पीने के प्रयोजन के लिए बी0आई0एस0 और डब्ल्यू0एच0ओ0 के मानकों के अनुसार पूर्व और पश्च-मॉनसून सीजन के हाइड्रो-केमिकल डेटा का विश्लेषण किया गया। कुल घुलित लवणों की सांद्रता लगभग 84% नमूनों में 500 मिलीग्राम/ली की स्वीकार्य सीमा से अधिक है, लेकिन अनुमेय सीमा के भीतर आती है। पूर्व-मानसून सीज़न में 48% से अधिक नमूनों में क्षारीयता स्वीकार्य सीमा से अधिक है। कठोरता के दृष्टिकोण से, लगभग 55% नमूने स्वीकार्य सीमा से अधिक हैं, लेकिन अनुमेय सीमा के भीतर और 45% नमूने पूर्व-मॉनसून सीज़न के दौरान भी अनुमेय सीमा से अधिक हैं। क्लोराइड सांद्रता लगभग सभी नमूनों में स्वीकार्य सीमा के भीतर है। लगभग 13% नमूने सल्फेट की स्वीकार्य सीमा से अधिक हैं, लेकिन अनुमेय सीमा के भीतर और 34% नमूने पूर्व-मॉनसून सीज़न के दौरान भी अनुमेय सीमा से अधिक हैं। पूर्व- और पश्च-मानसून के मौसम में लगभग सभी नमूनों में फ्लोराइड की सांद्रता वांछनीय सीमा के भीतर पायी गयी। सोडियम और पोटेशियम के लिए बी0आई0एस0 सीमा का उल्लंघन नहीं किया जा सकता है क्योंकि बी0आई0एस0 विनिर्देशों में इन घटकों के लिए कोई स्वीकार्य सीमा निर्धारित नहीं की गई है। स्थानिक वितरण नक्शे, समोच्च जल गुणवत्ता क्षेत्रों, प्रदूषण के संभावित स्रोतों और पीने के अनुरूप नहीं होने वाले विशिष्ट मापदंडों की पहचान करने के लिए समोच्च आरेखों के रूप में तैयार किए गए। सिंचाई के प्रयोजन के लिए भूजल की उपयुक्तता का मूल्यांकन कुल घुलनशील लवण, एस0ए0आर0 और आर0एस0सी0 के आधार पर किया गया है और सिंचाई के लिए उपयुक्त पाया गया है। पानी का वर्गीकरण पाइपर ट्राइलीनियर आरेख और यू0एस0 सेलिनिटी प्रयोगशाला वर्गीकरण का उपयोग करके बनाया गया। अध्ययन क्षेत्र के अधिकांश नमूने Ca-Mg-CI-SO4 या Ca-Mg-Co3-HCO3 हाइड्रो रसायनिक संकायों के हैं और अधिकांश नमूने के पानी के प्रकार C3-S1 के अंतर्गत आते हैं, इसके बाद C2-S1 के अंतर्गत, C3-S1 प्रकार के पानी (उच्च लवणता और कम एस0ए0आर0) का उपयोग प्रतिबंधित जल निकासी वाली मिट्टी पर नहीं किया जा सकता है।

References

• APHA (2005) Standard Methods for Examination of Water and Wastewater, American Public Health Engineering

• BIS (2012) Indian Standard Drinking Water – Specification (Second Revision), IS:10500:2012, Bureau of Indian Standards, New Delhi.

• CGWB and CPCB (2000) Status of Ground Water Quality and Pollution Aspects in NCT-Delhi, January 2000.

• CGWB Report (2015) Ground Water Year Book of Chhattisgarh, 2014-15, North Central Chhattisgarh Region, Raipur, September, 2015, Govt. of India, Ministry of Water Resources, Central Ground Water Board.

• Piper, A.M. (1944) A Graphical Procedure in the Geochemical Interpretation of Water Analysis, Trans. Am. Geophysical Union, Vol. 25, 914-923.

• Richards, L.A. (ed.) (1954) Diagnosis and improvement of saline and alkali soils, Agricultural Handbook 60, U.S. Dept. Agric., Washington, D.C., 160 p.

• WHO (2011) Guidelines for Drinking Water, Recommendations, World Health Organization, Geneva.

• Wilcox, L.V. (1955) Classification and Use of Irrigation Water, U.S. Dept. of Agr. Circular 969, Washington, D.C., 19 p.

Disqus Comment