बीच का रास्ता

Submitted by Hindi on Thu, 09/13/2012 - 10:58
Author
डॉ. दिनेश कुमार मिश्र
Source
डॉ. दिनेश कुमार मिश्र की पुस्तक 'दुइ पाटन के बीच में'

परिचय


अभी तक हमने उन सारे पहलुओं का अध्ययन किया है जिनके बीच कोसी नदी क्षेत्रों में लोग रह रहे हैं। हमने यह देखा कि किस तरह से आजादी के बाद वाले समय में कोसी के बाढ़ नियंत्राण और सिंचाई की योजनाएं हाथ में ली गईं और कैसे उनमें से कोई भी अपने कथित उद्देश्यों के नजदीक तक नहीं पहुँच पाई। राजनीतिज्ञों तथा इंजीनियरों ने मिल कर अगर एक समस्या का समाधान करना चाहा तो उसके बदले बहुत सी समस्यायें खड़ी हो गईं जिन पर तुरन्त ध्यान देना जरूरी हो गया है। बहुत सी जगहों पर तो योजना के लाभार्थी पहले से बदतर हालत में पहुँच गये हैं। सवाल यह उठता है कि हालात को बेहतर बनाने के लिए अब कुछ किया भी जा सकता है या नहीं? अगर कोई संभावनाएं बनती हैं तो वह क्या हैं और इन्हें कौन अंजाम देगा?

ऐसे समय चार ऐसी संस्थाएं हैं जो कि तुरन्त ख़्याल में आती हैं, (क) केन्द्र सरकार, (ख) राज्य सरकार, (ग) स्वयंसेवी संस्थाएँ तथा प्रबुद्ध नागरिक और (घ) प्रभावित लोग तथा समाज। इस अध्याय में हम इन सभी सम्बद्ध पक्षों की संभावित भूमिका का अध्ययन करेंगे। हम यह जानने की कोशिश करेंगे कि इन संस्थाओं की वर्तमान भूमिका क्या है और उनके द्वारा भविष्य में की जाने वाली कोशिशों से बाढ़ के क्षेत्र में क्या कोई बेहतरी की गुंजाइश बनती है?

सरकारों की भूमिका


सरकारों को दो मोरचों पर काम करना पड़ता है। एक तो उसे बाढ़ की समस्या के लिए स्थाई समाधान की तलाश करनी है और दूसरे यह कि जब तक स्थाई समाधान की कोई कारगर व्यवस्था नहीं हो जाती तब तक वह हर जरूरी कदम उठाये ताकि बाढ़ से होने वाले नुकसान और परेशानियों को यथासंभव कम किया जा सके। पहले हम यह जान लें कि सरकार बाढ़ के स्थाई समाधान के बारे में क्या सोचती है?

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