बिहार में 2019 ई. का अभूतपूर्व जल संकट-एक विश्लेषण

Submitted by RuralWater on Wed, 02/26/2020 - 15:40
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मिथिला विश्वविद्यालय, दरभंगा, विवेकानन्द टीचर्स ट्रेनिंग कॉलेज दरभंगा, एम.के. कॉलेज, लहेरियासराय

सारांश

2019 ई0 में बिहार राज्य, विशेषतः उत्तर बिहार के मिथिला क्षेत्र, ने अभूतपूर्व जल संकट का सामना किया। शहरी क्षेत्रों की कौन कहे, ग्रामीण क्षेत्रों में भी टैंकर से पेयजल की आपूर्ति करनी पड़ी। अप्रैल-मई में इस क्षेत्र में सरकार द्वारा बनाये घाटों से सुसज्जित किन्तु पूर्णतः जलविहीन पोखरों में क्रिकेट खेलते बच्चों को देखना एक सामान्य दृश्य बन गया था। कमला एवं जीवछ सदृश नदियों में अप्रैल-मई के महीने में एक बूँद पानी के दर्श न होना दूभर हो गया। पूर्वजों द्वारा कभी लोक परलोक साधने की दृष्टि से खुदवाए गए पोखरों को आज उनके वारिस ही मिट्टी से भरकर अस्तित्व समाप्त करने में तनिक भी शर्म अनुभव नही कर रहे हैं। जलाशयों के सूखने का सर्वाधिक दुष्प्रभाव मछली-सह मखाना के उत्पादन के साथ-साथ पालतू पशुओं हेतु हरे चारे की उपलब्धता पर पड़ा है। जल की कमी से जलीय जैवविविधता विशेष रूप से दुष्प्रभावित हुयी है। इस परिस्थिति को बदलने के लिए आज बिहार में स्वयंसेवी संस्थाओं द्वारा एवं सरकारी स्तर पर भी कई उपाय किए जा रहे हैं राज्य में व्यापक स्तर पर वृक्षारोपण अभियान चलाया जा रहा है। लुप्त एवं अतिक्रमित जलाशयों की खोज की जा रही है।

बिहार सरकार ने जल-जीवन-हरियाली अभियान चलाकर आम लोगों को भी इसमें शामिल करने की मुहिम चलायी है। इस जन अभियान में सोख्ता निर्माण, वर्षा जल संग्रहण (रेनवाटर हार्वेस्टिंग) सदृश कार्यक्रमों को जोड़ा गया है। 2019 के जल संकट ने एक बार पुनः पारम्परिक कुंओं (जिन्हें इनार या इण्डा नाम से भी जाना जाता है) को पुनर्जीवित करने की ओर आम जनता को भी प्रेरित किया है। विभिन्न प्रकार की रोजगार योजनाओं को जल संचयन अभियान से जोड़ा जा रहा है।

प्रस्तुत आलेख में 2019 ईसवी के मिथिला क्षेत्र (उत्तर बिहार) के अभूतपूर्व जलसंकट एवं इससे निदान की संभावनाओं का विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है।

Abstract

The state of Bihar, especially the Mithila area in north Bihar, witnessed an unprecedented water crisis in the year – 2019. What to tell of the town areas, even the rural areas had to be served with water tankers for about three to four months in the summer season. Children playing cricket in parched ponds, that boasted of pucca ghats raised over them under Govt. schemes, became a common scene. Rivers like Kamla and Jiwachh got dried and at several places not a drop of water was to be witnessed therein.

 People today are not at all ashamed with getting the ponds filled up that were excavated by their forefathers with a pious aim to attain eternal bliss. Fish – cum- Makhana cultivation and availability of green fodder for pet animals suffered a major casualty. Water crisis affected the aquatic biodiversity. Govt. as well as voluntary agencies took up ways to ameliorate the situation. Massive plantation drives have been launched. Dead and encroached water bodies are being relocated.

The State Govt. has launched the Jal-Jeevan-Hariyali campaign for associating people with the drive. Under this scheme soak-pits and rainwater harvesting structures are being raised. 2019 water crisis has made people aware of the need of revitalizing the traditional wells. Different types of employment schemes are being linked with the water harvesting mission.

The paper provides an analysis of the unprecedented 2019 water crisis in Mithila area of northern Bihar and discusses the possible steps to ameliorate the situation.

क्रिया विधि

कभी बाढ़ग्रस्त इलाके के रूप में विख्यात बिहार के मिथिला क्षेत्र में 2019 ईसवी के ग्रीष्मकाल में व्याप्त अभूतपूर्व जल संकट की स्थिति का विश्लेषण किया गया। पिछले प्रायः एक दशक से पर्यावरणीय समस्या के समाधान हेतु नागरिक समूहों द्वारा किए जा रहे प्रयास की इस शोध पत्र में चर्चा की गयी है। समस्या के निदान हेतु राज्य एवं केन्द्र सरकारों द्वारा चलाए जा रहे अभियानों पर प्रकाश डाला गया है। दो सारणीयों में एतत्सम्बंधी महत्त्वपूर्ण सूचना का समावेश किया गया है। समाचार पत्रों एवं पत्रिकाओं में छपी सूचना के सन्दर्भों का समावेश अन्त में किया गया है।

स्थिति विश्लेषण

2019 के ग्रीष्मकालीन मौसम में बिहार राज्य एवं विशेषकर इसके उत्तरी भाग के मिथिला क्षेत्र ने अभूतपूर्व जल संकट का सामना किया। शहरी क्षेत्र की कौन कहे, देहाती क्षेत्रों में भी प्रशासन को टैंकरों से पानी की आपूर्ति करनी पड़ी। आमतौर पर 150 फीट पर जिन चापाकलों से पानी (पेयजल) मिल जाता था वे सभी फेल हो गए। जिनके पास सामर्थ्य थी उन्होंने 70-80 हजार रूपये खर्च कर सबमर्सिबल पम्प लगवाये। लेकिन आमलोंगो की तकलीफें देखने लायक थी। टैंकरों के सामने लोगों की भीड़ को देखकर स्थिति का सहज अन्दाजा लगाया जा सकता था। दक्षिण बिहार में भी स्थिति ऐसी ही थी। परन्तु उत्तर बिहार के मिथिला क्षेत्र के लोगों ऐसी स्थिति के अभ्यस्त नहीं थे। इस क्षेत्र को नदीमातृक (अर्थात् हिमालय क्षेत्र से निकलने वाली सदानीरा नदियों का क्षेत्र) एवं “देवमातृक“ (अर्थात प्रचुर वर्षा वाला आमतौर पर 1000 से 1200 मिलीमीटर वर्षा का क्षेत्र) कहा जाता है। आमतौर पर इसे बाढ़ का क्षेत्र माना जाता रहा है। इसलिए यदि कभी वर्षा नहीं हुयी तो सतही जल भले न रहे, भूगर्भीय जल की कमी कभी नहीं रहती थी। पिछले प्रायः दस वर्षो से ठीक से वर्षा नहीं हो रही थी। वर्षा पात में इतनी कमी का कारण ढूँढने की जरूरत है। देश के परम्परागत रूप से कम वर्षा वाले क्षेत्रों में अब प्राय़ः हर वर्ष बाढ़ आती हैं जबकि मिथिला सदृश बाढ़-प्रवण क्षेत्र में अब आमतौर पर सुखाड की स्थिति बनती है।

मिथिला क्षेत्र में नदियों का जाल बिछा हुआ है। इस क्षेत्र में कोसी सहित प्रायः सभी नदियाँ सदियों-सहस्राब्दियों से अपनी धाराओं में परिवर्तन करती रही है। बाढ़ की विभीषिका से बचने के लिए क्षेत्र में प्रायः सभी नदियों पर स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद के वर्षो में तटबन्ध बनाए गए। इसका परिणाम अब यह देखने को मिला है कि गर्मी के दिनों में कई जगहों पर कमला, जीवछ आदि नदियों में एक बूंद भी मयस्र नहीं होता तो दूसरी ओर बरसात के महीने में दोनों तटबन्धों के भीतर के लोग लम्बे जल जमाव का दंश झेलते हैं। नेपाली उद्गम वाली नदियों में धारा बरसात में उफनाती है और तटबन्ध टूटने पर जलप्रलय का दृश्य उपस्थित करती है। दूसरी ओर उसी समय में निकटवर्ती समस्तीपुर जिले के जटमलपुर में बागमती नदी के तटबन्ध के दक्षिण सुखाड़ की स्थिति बनी रहती है। बागमती क्षेत्र के बाढ़ प्रभावित लोगों ने सरकार से तटबन्धों को ऊँचा करने की बजाय नदी की पेटी से गाद निकालकर बाढ़ की समस्या के स्थायी समाधान की पुरजोर माँग की हैं।

एक और विकट स्थिति दरभंगा शहर के भीतर प्रायः एक हजार वर्ष पूर्व कणटिवंशीय राजाओं द्वारा खुदवाये खुदवाये हराही, दिग्घी, गंगासागर जैसे वृहदाकार पोखरों के किनारे बसे मोहल्लों में देखने को मिलती है। इन वृहदाकार जलाशयों के इर्द -गिर्द भी पानी का विकट संकट उपस्थित होता है। इस का अर्थ यह हुआ कि इन बड़े जलाशयों की तलहटी पर इतनी गाद जमा हो गयी कि उनका पानी नीचे के भूगर्भीय जल को संभरित नहीं करता। पूरे शहर के नाले बहकर इन जलाशयों में घरेलू अपशिष्ट को जमा करते हैं एवं इनका पानी मनुष्य कौन कहे, पशुओं के भी उपयोग लायक नहीं रहता।

इस अभूतपूर्व जलसंकट का सर्वाधिक दुष्प्रभाव इस इलाके में सिंघाड़ा एवं मखाना तथा हरे पशुचारे की उपलब्धता पर पड़ा है। मिथिला क्षेत्र मखाना (Gofgon/Foxnut) के उत्पादन के लिए जाना जाता है। बड़े किन्तु छिछले जलाशयों में तो इस वर्ष मखाने के पौधे दिखाई दिए किन्तु कम पानी वाले छोटे जलाशय तो पूरी तरह सूख गये थे एवं उनमें मखाना के पौधे झुलसे पड़े थे। यही हाल कमल, कोका, सारूख, कशेरूक आदि का भी था। सरकार द्वारा कुपोषण मुक्ति हेतु इन जल वनस्पतियों का महत्व दिनोंदिन बढ़ता जा रहा है।

जल-जीवन -हरियाली कार्यक्रम

 2019 ई0 में बिहार के अभूतपूर्व जल संकट को देखते हुए जल संरक्षण के तात्कालिक और दूरगामी लक्ष्यों को सामने रखकर राज्य सरकार ने एक महत्वाकांक्षी योजना ‘‘जल-जीवन-हरियाली’’ के नाम से शुरू की है। “जल-जीवन-हरियाली“ अभियान को मिशन मोड में लागू करने, निर्धारित लक्ष्य को प्राप्त करने तथा नियमित अनुश्रवण के लिए इसका निबन्धन सोसाइटी रजिस्ट्रेशन ऐक्ट के अन्तर्गत कराया जा रहा है। अगले तीन वर्षो तक इसके क्रियान्वयन पर 24,524 करोड़ रूपये खर्च किए जायेगें। ग्रामीण विकास विभाग को इस हेतु नोडल विभाग के रूप में नामित किया गया है। केन्द्र सरकार ने भी देश के बिहार सहित 27 राज्यों को क्षतिपूरक वनीकरण योजना में वृक्षारोपण हेतु 47,436 करोड़ रू0 निर्गत किए है।

जल संकट को देखते हुए राज्य सरकार के नगर विकास विभाग ने 100 वर्गमीटर से ज्यादा क्षेत्रफल वाले सभी निजी मकानों में रेनवाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम लगाना अनिवार्य कर दिया है। ऐसा नहीं करने वाले भवनों को सील किया जायेगा। परन्तु इससे पहले हार्वेस्टिंग सिस्टम लगाने के लिए 30 दिनों का समय दिया जायेगा। नये भवनों का नक्शा पास कराने के लिए रेनवाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम का प्रावधान अनिवार्य होगा। यह नया आदेश सरकारी निजी एवं वाणिज्यिक सभी तरह के भवनों पर लागू होगा। 15 मीटर ऊँचे व 500 वर्गमीटर क्षेत्रफल वाले वाणिज्यिक भवनों के लिए यह प्रावधान अगस्त 2019 से लागू किया गया है। जल जीवन हरियाली अभियान के तहत शुरू की गयी इस योजना के अंतर्गत नगर विकास विभाग ने बिल्डिंग बाइलॉज में संशोधन कर सभी निर्मित एवं निर्माणाधीन भवनों के लिए यह अनिवार्य किया है। सरकार ने रेनवाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम लगाने वाले मकानों को सम्पति कर में-पांच प्रतिशत छूट देने का भी निर्णय किया हैं जो सभी नगर निकायों पर लागू होगा।

भूगर्भीय एवं वर्षाजल को बचाने के दृष्टिकोण से राज्य की प्रमुख छोटी नदियों पर “चेक डैम“ व वीयर सदृश जल संरचनाएँ बनायी जायेंगी। चेक डैम वह संरचना है जिसे किसी भी झरने नाले या छोटी नदी के जल प्रवाह की उल्टी दिशा में खड़ा किया जाता हैं। इसका प्रमुख उद्देश्य वर्षा के अतिरिक्त जल को बांधना होता हैं। यह पानी बरसात के दौरान या उसके बाद भी इस्तेमाल हो सकता है एवं इससे भूजल का स्तर बढ़ता है। पहाड़ी-पठारी इलाकों में नदी-झरनों, नालों आदि पर ऐसी संरचनाएँ बनाने पर विशेष जोर है। वन क्षेत्रों के लिए वन प्रमण्डल पदाधिकारी कार्ययोजना बनायेंगे और कार्यान्वयन पर्यावरण, वन, एवं जलवायु परिवर्तन विभाग करेगा। समतल क्षेत्रों में यह काम लघु जल संसाधन, कृषि व ग्रामीण विकास विभाग द्वारा किया जायेगा, जिलों में उपलब्ध सर्वे मानचित्र एवं गूगल मैप के सहारे सभी जल संरचनाओं की पहचान की जायेगी। इसके साथ ही राज्य भर में सभी शहरों एवं गावों में तालाबों, आहर, पइन तथा कुओं समेत ऐसे सभी जलस्रोतों को अभियान चलाकर अतिक्रमण मुक्त कराने का निर्णय किया गया है। यह भी सुनिश्चित किया जायेगा कि सभी कुएँ एवं चापाकल ठीक से काम करें। इनके आसपास सोख्ते बनाए जायेंगे।

बिहार सरकार प्रतिवर्ष 9 अगस्त को बिहार पृथ्वी दिवस के रूप में मनाती है। इस वर्ष इस अवसर पर लोगों को पर्यावरण संरक्षण से जुडे़ 11 सूत्री संकल्प दिलाए गए (सारणी-1)। इस दौरान मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने जीविका दीदियों की ओर से तैयार किए गए जल जीवन हरियाली के प्रतीक चिह्न (स्वहव) एवं जलजीवन हरियाली, तभी होगी खुशहाली नामक नारा का लोकार्पण किया।

सारणी संख्या-1

जल-जीवन -हरियाली अभियान के अन्तर्गत 11 सूत्री कार्यक्रम में निर्धारित लक्ष्य

  • तालाब, पोखर, आहर, पइन, आदि सार्वजनिक जल संचयन संरचनाओं की अतिक्रमण से मुक्ति करना।
  • तालाब, पोखर, आहर, पइन, आदि सार्वजनिक जल संचयन संरचनाओं का जीर्णोद्धार।
  • सभी सार्वजनिक कुओं का जीर्णोद्धार करना।
  • सार्वजनिक कुंआ, चापाकल और नलकूपों के किनारे सोख्ता बनाना।
  • छोटी नदियों नालों और पहाड़ी इलाकों में चेकडैम का निर्माण।
  • नए जल स्रोतों का सृजन और सूखाग्रस्त इलाके में पानी की उपलब्धता सुनिश्चित करना।
  • व्यावसायिक भवनों में वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम लगाना।
  • पौधशाला सृजन और सघन पौधरोपण अभियान चलाना।
  • सौर ऊर्जा का उपयोग और बिजली की बचत को बढ़ावा देना।
  • वैकल्पिक फसलों, ड्रिप इरिगेशन, जैविक खेती और अन्य नई तकनीकों के उपयोग को बढ़ावा।
  • जल -जीवन-हरियाली के लिए जागरूकता अभियान चलाना।

जल की उपलब्धता का सीधा सम्बन्ध हरीतिमा से है। बिहार से झारखण्ड के अलग होने के साथ राज्य में प्रायः सात प्रतिशत क्षेत्र में प्राकृतिक जंगली क्षेत्र बच गया था। बाग-बगीचों को मिला देने पर कुल हरित पट्टी 10 प्रतिशत के आसपास थी। बिहार सरकार ने हरित पट्टी के विकास हेतु व्यापक वृक्षारोपण अभियान चलाया जिसे अब और भी तीव्र किया जा रहा है। आज की तिथि में यह हरीतिमा 15 प्रतिशत तक पहुँच गयी है। अगले तीन वर्ष मे इसे बढ़ाकर 17 प्रतिशत तक पहॅुचाने का लक्ष्य रखा गया हैं। अब राज्य का पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन विभाग अपनी सभी 180 नर्सरियों की पौधा निर्माण क्षमता बढ़ाकर 4 करोड़ प्रति वर्ष करने में लगा हुआ है। अभी यह क्षमता मात्र 1.60 करोड़ पौधे तैयार करने की है। विगत 21 जुलाई 2019 को दरभंगा जिले में एक लाख पौधे रोपने का महाअभियान चलाया गया। जिले के सभी सरकारी एवं गैर सरकारी कार्यालयों, शिक्षण संस्थाओं, क्लब एवं पार्क में यह वृक्षारोपण हुआ। जिलें में वन विभाग की चार और 32 निजी नर्सरियों की ओर से पौधे उपलब्ध कराये गए। उधर राज्य स्तर पर वन विभाग की ओर से वर्ष 2019 में एक करोड़ एवं मनरेगा की ओर से 50 लाख पौधारोपण का महत्वकांक्षी लक्ष्य रखा गया है। यह भी निर्णय किया गया है कि सड़कों के चौड़ीकरण एवं अन्य निर्माण के लिए अब पेड़ों को काटने के बदले उन्हें स्थानान्तरित करने का प्रयोग हैदराबाद की एक कम्पनी के सहयोग से किया जा रहा है। 1 से 15 अगस्त 2019 तक वन महोत्सव मनाया गया। पेड़ों के संरक्षण के लिए प्रतिवर्ष प्रतीकात्मक रूप से रक्षाबन्धन के दिन पेड़ों को रक्षासूत्र बाँधकर उन्हें बचाने का भी संकल्प लिया जाता है। झारखण्ड के अलग होने के बाद राज्य के पहले कृषि रोड मैप (2012-17) के दौरान 24 करोड़ पौधारोपण के लक्ष्य के विरूद्ध 18 करोड़ 47 लाख पौधे लगाये गए। समस्तीपुर जिले की हरपुर बोचहाँ पंचायत ने मनरेगा योजना के अन्तर्गत 1.17 लाख पौधे लगाकर राष्ट्रीय स्तर पर ग्रीन पंचायत का दर्जा पाया है। इसी जिले के उजियारपुर प्रखण्ड के चाँदचैर मथुरापुर निवासी अधिवक्ता श्री रामपुनीत चैधरी ने पटना उच्च न्यायालय में जनहित याचिका दायर कर अखिल भारतीय जल योद्धा संग्राम समिति के तत्वावधान में सभी जिलो के तालाबों और कुओं की सूची प्राप्त की।

राज्य के सभी 38 जिलों में ‘‘जल जीवन हरियाली’’ योजना के अन्तर्गत कम से कम 10-10 भवनों में भवन निर्माण विभाग द्वारा पानी बचाने की योजना पर काम प्रारंभ किया जा रहा है। गाँधी जयन्ती के अवसर पर 2 अक्टूबर 2019 से यह काम प्रारंभ हो रहा है। तीन हजार वर्गफुट की छत वाले सरकारी भवन में एक यूनिट व इससे अधिक होने पर दूसरी यूनिट बनायी जायेगी। राज्य भर में कुल 7922 यूनिट बनाने में 64.5 करोड़ रूपये खर्च होने का अनुमान है। भवन निर्माण विभाग के अधीन पाटलिपुत्र कार्य प्रमण्डल में प्रयोग के तौर पर एक सरकारी आवास पर इस कार्य को पूरा कर वर्षा पानी के संग्रह का काम प्रारंभ कर दिया है। सहरसा एवं पूर्णिया प्रंमडलों मंे जहाँ जमीन के नीचे बालू मिट्टी है वहाँ बोरिंग करने पर प्रति यूनिट 45 हजार रूपये खर्च होंगे। जमीन के नीचे पानी ले जाने से पहले उसे चार बार साफ किया जायेगा। जहां जमीन के नीचे बालू मिट्टी नहीं है वहां इस पर 85 हजार रूपये प्रति यूनिट खर्च होंगे। छतों पर गिरने वाले वर्षाजल को पानी की पाइप के सहारे पहले एक स्थान पर लाया जायेगा। भवन निर्माण विभाग ने 2014 के बाद जिन भवनो को बनाया है उनमें वर्षा जल संग्रह की व्यवस्था की हुई है। पटना स्थित सरदार पटेल भवन (पुलिस मुख्यालय) में सात रेन वाटर होर्वेस्टिंग यूनिट हैं।

राज्य के नगर विकास एवं आवासन विभाग ने पेयजल उपयोग शुल्क (Water User Charge)नीति 2019 का मसौदा तैयार किया है। मसौदे को घर के क्षेत्रफल के आधार पर तीन वर्गो में बाँटा गया है। पानी के लिए अब सालाना 360 से 1500 रू0 तक देना होगा। इस हेतु कोई मीटर नहीं लगाया जायेगा। राज्य के घरेलू उपभोक्ताओं से पेयजल उपयोग शुल्क प्रोपर्टी टैक्स संग ही वसूला जायेगा।

केन्द्र सरकार द्वारा ‘‘जल जीवन मिशन’’ कार्यक्रम शुरू किया जा रहा है। केन्द्रीय जलशक्ति मन्त्रालय से इसके तहत 55 lpcd ( लीटर प्रति व्यक्ति प्रतिदिन) पानी देने का लक्ष्य रखा है जबकि उत्तर प्रदेश, बिहार, तमिलनाडु सदृश राज्यों ने इसे बढ़ाकर 70 lpcd करने की माँग की है। राज्य सरकार ने 2020 ई. तक हर घर नल का जल पहुंचाने का लक्ष्य निर्धारित किया है। दरभंगा जिले में “तालाब बचाओ अभियान“ क्रियाशील है जिसने लोगो में शहर के शताधिक छोटे-बड़े तालाबों को अतिक्रमण से बचाने हेतु मिथिला ग्राम विकास परिषद के संस्थापक श्री नारायणजी चैधरी के नेतृत्व मे जन जागृति फैलाने का काम किया है। 21 जनवरी 2014 को दरभंगा के हराही पोखरे से लहेरियासराय समाहरणालय तक इस हेतु एक बड़ी रैली निकाली गयी जिसमें प्रसिद्ध रक्षा वैज्ञानिक पद्मश्री मानस बिहारी वर्मा, प्रसिद्ध चिकित्सक डॉ. गणपति मिश्र, सर्वोदयी समाज सेवी हृदय नारायण चैधरी एवं डॉ. सैयद शमीम अहमद सदृश वुद्धिजीवी सम्मिलित हुए थे। हायाघाट विधायक श्री अमरनाथ गामी के प्रयास से राजकिला के भीतर स्थित जलाशय को असामाजिक तत्वों द्वारा भरे जाने पर रोक लगी।

राज्य के लघु जल संसाधन विभाग के तत्वावधान में जल-जीवन-हरियाली अभियान के तहत दरभंगा जिला के 18 तालाबों का जीर्णोद्धार कराया जा रहा है। प्राकृतिक जल स्रोतों को सवंर्द्धित एवं विकसित करने का कार्य प्राथमिकता के तौर पर करने का निर्णय लिया गया है। जिला के सभी 18 प्रखण्डों में एक हेक्टेयर से अधिक रकबा वाले तालाबों को इस हेतु चिह्नित किया गया है जो निम्न प्रकार है-

सारणी संख्या-2

दरभंगा जिला में पुनरूद्धार हेतु चिह्नित  पोखरों की विवरणी

प्रखण्ड का नाम

गांव का नाम   

पोखर का नाम

हायाघाट

पतोर

महादेव पोखर

बहादुरपुर

जलवार

बड़की पोखर

सदर प्रखण्ड

दुलारपुर

रूचैल पोखर

हनुमाननगर

रामपुरडीह

महथा पोखर

जाले

मस्सा        

रजोखर पोखर

सिंहवाड़ा

सनहपुर

कचनारी पोखर

केवटी

केवटी ग्रामर

रजोखर

बहेड़ी     

ठाठोपुर

पुरनी पोखर

मनालीछीना

उजान  

दुर्गास्थान

तारडीह 

कठरा  

महादेव पोखर

बेनीपुर

तरौनी

भटोखर पोखर

अलीनगर तुमौल  

लहटा सूहथ

पुरनी पोखर

बिरौल

रामनगर

नवकी पोखर

गौड़ा बौराम

बघरासी

जीवछ पोखर

घनश्यामपुर

तुमौल

महथा पोखर

किरतपुर

कुबौल ढांगा

ढांगा पोखर

कुशेश्वरस्थान

औराही

औराही पोखर

कुशेश्वरस्थान पूर्वी

धरमपुर

धरमपुर पोखर

अभियान की प्रमुखता में राज्य की बढ़ती जनसंख्या, मानवीय गतिविधि एवं जलवायु परिवर्तन से उत्पन्न पारिस्थितिकीय चुनौतियों से निपटना तथा राज्य में पारिस्थितिकीय संतुलन का संधारण करने का व्यापक एवं बहुआयामी उद्देश्य शामिल है। जल को प्रदूषण मुक्त रखना, उसका स्तर संतुलित रखना तथा पर्याप्त जल उपलब्धता सुनिश्चिम करना जल संरक्षण के लिए अति आवश्यक है। हरित आच्छादन को बढ़ावा देना, नवीकरणीय ऊर्जा के उपयोग एवं ऊर्जा की बचत पर बल देना अभियान का प्रमुख अंग है। जल संचयन के तरीकों और बचाव के संबंध में लोगों को जागरूक किया जा रहा। यह बताया जा रहा है कि कि कम वर्षा होने पर भू-जल ही एकमात्र सहारा है और वर्षा जल इकट्ठा करना ही होगा। पेयजल के दुरूपयोग से बचना होगा। बदलते पारिस्थितिक परिवेश के अनुरूप कृषि एवं उससे संबद्ध गतिविधियों को नए आयाम देने के लिए विभिन्न विभागों और विशेषज्ञों के समन्वय से अभियान क्रियान्वित किया जाना है। पिछले कई वर्षों से जलवायु परिवर्तन के फलस्वरूप वर्षापात में कमी एवं भू-जल स्तर में लगातार गिरावट दर्ज की जा रही है। राज्य के सभी इलाकों में भू-जल स्तर में गिरावट आने की वजह से पेयजल की समस्या के साथ-साथ फसलों के उत्पादन पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है।

उपसंहार

जल के बिना जीव जगत के अस्तित्व की कल्पना नहीं की जा सकती। नित्यप्रति की आराधना में बार-बार “पवित्र जल हमारी रक्षा करे“ की प्रार्थना की जाती है। भारतीय जीवन पद्धति में पोखर खुदवा कर उसे विधिवत यज्ञ कर आमजन के हित में अर्पित करने को लोकोत्तर कर्म की संज्ञा दी गयी है। लेकिन यह एक विडम्बना है कि पूर्वजों द्वारा व्यापक लोकहित की कामना से किए कर्म को उनकी सन्तानें ही उलट रही हैं। बढ़ती जनसंख्या सभी कार्यों को तात्कालिक आर्थिक लाभ की दृष्टि से तौलती है जिसका दुष्परिणाम आज सबके सामने है।888 आज यह आवश्यक हो गया है कि हम इस बात का ध्यान रखें कि एक ओर सुखाड़ की विडम्बना है तो दूसरी ओर देश के विभिन्न भागों में वर्षाजल के यूँ ही बहकर समुद्र में चले जाने की स्थिति हैं। हमारी अर्थव्यवस्था की सार्थकता इसमें है कि हम समुचित व्यवस्था कर उस जल को रोकें। विश्व की बढ़ती जनसंख्या की जल की जरूरतों की पूर्ति करने हेतु हमारे पास दूसरा कोई उपाय नहीं बचा है। प्रकृति ने निश्चित रूप से हमारी जरूरतों की पूर्ति के सभी उपाय किए हैं किन्तु हमारी लालच का उसके पास कोई जबाब नहीं हैं।

देश में अभी दूसरी हरितक्रांति का दौर चल रहा है जिसका ध्येय बूँद बूँद खेती (More crop per drop of water) है। यह अत्यन्त आवश्यक है कि पोखरों, कुओं, नदियों से गाद की उगाही कर उन्हें गहरा बनाकर उनकी जल धारण क्षमता को बढ़ाया जाय। मिथिला में नदियों की मृत धाराओं का जाल बिछा हुआ हैं जिनकी उड़ाही कर बहुत हद तक इस समस्या का समाधान किया जा सकता है।

यह एक सुखद संयोग है कि 60 साल में पहली बार 15 दिन की देरी से मानसून लौट रहा है एवं बिहार सहित 20 राज्यों में भारी वर्षा हुई है। मौसम विभाग के अनुसार 15 अक्टूबर तक भी जारी रह सकता है। इससे पहले 1960 में मानसून इतने समय तक सक्रिय रहा था। पहले एक सितम्बर से मानसून लौटना शुरू हो जाता था। देर से ही सही, धान की रोपनी शुरू हो गयी अर्थव्यवस्था पर इसका सकारात्मक प्रभाव होने की उम्मीद है। यह एक सुखद खबर है कि हाल ही में भारत में सम्पन्न 14वें (United Nations Convention to Combat Desertification (UNCCD, COP 14) में देश में 2030 ई. तक 50 लाख हेक्टेयर ऊसर क्षेत्र को हरा भरा बनाने का लक्ष्य निर्धारित किया है। इससे जल संरक्षण की दशा दिशा में क्रान्तिकारी परिवर्तन होने की उम्मीद है।

Reference

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