बिहार में चिन्ताजनक है भूजल स्तर की स्थिति

Submitted by editorial on Tue, 07/10/2018 - 17:54
Source
इंडिया साइंस वायर, 10 जुलाई, 2018


वर्ष 1984 से 2013 के दौरान मानसून से पहले और बाद में भूजल स्तर की स्थितिवर्ष 1984 से 2013 के दौरान मानसून से पहले और बाद में भूजल स्तर की स्थिति नई दिल्ली। बिहार के कई जिलों में भूजल स्तर की स्थिति पिछले 30 सालों में चिन्ताजनक हो गई है। कुछ जिलों में भूजल स्तर दो से तीन मीटर तक गिर गया है।

एक ताजा अध्ययन के अनुसार, भूजल में इस गिरावट का मुख्य कारण झाड़ीदार वनस्पति क्षेत्रों एवं जल निकाय क्षेत्रों का तेजी से सिमटना है। आबादी में बढ़ोत्तरी और कृषि क्षेत्र में विस्तार के कारण भी भूजल की माँग बढ़ी है।

कानपुर स्थित भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) और काठमांडू स्थित इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटिग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट के शोधकर्ताओं द्वारा उत्तरी बिहार के 16 जिलों में किये गये इस अध्ययन के अनुसार, जल निकाय सिमटने के कारण प्राकृतिक रूप से होने वाला भूजल रिचार्ज भी कम हुआ है।

शोधकर्ताओं के अनुसार, बेगूसराय, भागलपुर, समस्तीपुर, कटिहार और पूर्णिया जैसे जिलों के भूजल स्तर में 2-3 मीटर की गिरावट दर्ज की गई है। भूजल में गिरावट से समस्तीपुर, बेगूसराय और खगड़िया सबसे अधिक प्रभावित हुए हैं। इन जिलों के भूजल भंडार में तीस वर्षों के दौरान क्रमशः 57.7 करोड़ घन मीटर, 39.5 करोड़ घन मीटर और 38.5 करोड़ घन मीटर गिरावट दर्ज की गई है।

मानसून से पहले और उसके बाद के महीनों में भूजल भंडार के मामले में इसी तरह का चलन समस्तीपुर, कटिहार और पूर्णिया जिलों में देखने को मिला है। मानसून से पूर्व भूजल भंडार में सबसे अधिक गिरावट 63.6 करोड़ घन मीटर और 63.1 करोड़ घन मीटर दर्ज की गई है। वहीं, मानसून के बाद भूजल भंडार में सबसे अधिक गिरावट 28.9 करोड़ घन मीटर और 21.6 करोड़ घन मीटर दर्ज की गई है। इस अध्ययन में भूजल भंडार, भूमि उपयोग एवं भू-आवरण सम्बन्धी तीस वर्षों के आँकड़े (1983-2013) उपयोग किये गये हैं। भूजल सम्बन्धी आँकड़े केन्द्रीय भूजल बोर्ड और राज्य भूजल बोर्ड से लिये गये हैं। वहीं, भूमि उपयोग और भू-आवरण सम्बन्धी आँकड़े हैदराबाद स्थित नेशनल रिमोट सेंसिंग सेंटर से प्राप्त किये गये हैं।

शोधकर्ताओं ने पाया कि इस दौरान एक ओर कृषि क्षेत्र के दायरे में 928 वर्ग किलोमीटर की बढ़ोत्तरी हुई है तो दूसरी ओर जल निकायों का क्षेत्र 2029 वर्ग किलोमीटर से सिमटकर 1539 वर्ग किलोमीटर रह गया है। इसी के साथ झाड़ीदार वनस्पतियों के क्षेत्रफल में भी इस दौरान 435 वर्ग किलोमीटर की गिरावट दर्ज की गई है।

आईआईटी, कानपुर के पृथ्वी विज्ञान विभाग से जुड़े प्रमुख शोधकर्ता डॉ राजीव सिन्हा ने इंडिया साइंस वायर को बताया कि “यह अध्ययन महत्त्वपूर्ण है क्योंकि उत्तरी बिहार को दूसरी हरित क्रान्ति के सम्भावित क्षेत्र के रूप में देखा जा रहा है। इस तरह की कोई भी पहल करते वक्त भूजल के टिकाऊ प्रबन्धन से जुड़ी योजनाओं को ध्यान में रखना होगा ताकि भविष्य में गम्भीर जल संकट से बचा जा सके।”

डॉ सिन्हा के मुताबिक, “हरित क्रान्ति के कारण पंजाब जैसे राज्यों में भूजल के अत्यधिक दोहन को बढ़ावा मिला है और यह क्षेत्र अब दुनिया के सर्वाधिक भूजल दोहन वाले इलाकों में शुमार किया जाता है। कृषि उत्पादन में वृद्धि के लिये अत्यधिक जोर देने और भूजल प्रबन्धन के लिये चिन्ता नहीं होने के कारण वहाँ ऐसी स्थिति उत्पन्न हुई है। बिहार के उत्तरी क्षेत्र में भूजल तेजी से गिर रहा है और भविष्य में बदलती सामाजिक-आर्थिक स्थितियों के साथ जल के दोहन को बढ़ावा मिलने की सम्भावना से इनकार नहीं किया जा सकता है।”

अध्ययन में शामिल लगभग सभी जिलों में वर्ष 1990 से 2010 के बीच ट्यूबवेल से सिंचाई में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। शिवहर, सीतामढ़ी, मधुबनी, दरभंगा, मुजफ्फरपुर, समस्तीपुर और बेगूसराय में ट्यूबवेल से सिंचाई 48 प्रतिशत से बढ़कर 75 प्रतिशत हो गई है। सुपौल, खगड़िया, सहरसा, मधेपुरा, पूर्णिया और कटिहार में यह बदलाव सबसे अधिक देखने को मिला है और 20 वर्षों में लोग यहाँ सिंचाई के लिये पूरी तरह भूजल पर आश्रित हो गये हैं।


वर्ष 1984 से 2013 के दौरान मानसून से पहले और बाद में जल भंडार की स्थितिवर्ष 1984 से 2013 के दौरान मानसून से पहले और बाद में जल भंडार की स्थिति बिहार के उत्तरी इलाकों से होकर हिमालय की कई नदियाँ निकलती हैं और हर साल लगभग 1200 मिलीमीटर वर्षा इस क्षेत्र में होती है। यह क्षेत्र सतह पर मौजूद जल और भूजल सम्पदा के मामले काफी समृद्ध माना जाता है। इसके बावजूद बिहार के इस मैदानी क्षेत्र में 80 प्रतिशत सिंचाई भूजल से ही होती है, जिसके कारण भविष्य में यहाँ गम्भीर जल संकट खड़ा हो सकता है।

अध्ययनकर्ताओं के अनुसार, “भविष्य में जल संकट से बचने के लिये टिकाऊ भूजल प्रबन्धन योजनाओं को तत्काल विकसित किया जाना जरूरी है। इस कछारी क्षेत्र में जलभृतों की सटीक मैपिंग, भूजल सम्बन्धी आँकड़ों का एकीकरण, कृषि एवं भूमि उपयोग प्रक्रिया में सुधार और भूजल के विवेकपूर्ण उपयोग के लिये प्रभावी नियमन महत्त्वपूर्ण हो सकता है।” यह अध्ययन शोध पत्रिका करंट साइंस में प्रकाशित किया गया है। अध्ययनकर्ताओं में डॉ. सिन्हा के अलावा सूर्या गुप्ता और संतोष नेपाल शामिल थे।

Twitter : @usm_1984@

 

 

 

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