बिन पानी सब सून

Submitted by Hindi on Tue, 08/23/2011 - 10:36
Source
देशबंधु, 24 जून 2011

'यहां तक आते-आते कई नदियां सूख जाती हैं, हमें मालूम है पानी कहां ठहरा हुआ होगा, कवि ने राजनैतिक भेदभाव की तुलना नदियों से कर डाली। ठहरा हुआ पानी सड़ती हुई व्यवस्था का प्रतीक है। जल हमें ताजगी देता है, हमें साफ रखता है तथा सदियों से हमारी प्यास बुझाता आ रहा है। यही जल एक जगह ठहर जाए तो सड़ने लगता है। जल परिवर्तन का दूसरा रूप है।' आदमी ने समूचे सौरमंडल को खंगाल डाला, उसे कहीं जल की छोटी-सी धारा नजर नहीं आई। उसने अन्त में यही निचोड़ निकाला कि ‘जल है तो जीवन है।’ आदमी धरती पर उपलब्ध विशाल जलनिधि को कितनी तेजी से गन्दा कर रहा है, इस बात का उसे होश नहीं है। जिस गति से वह कचरा फेंक रहा है, सागरों में अथाह दलदल हो जाएगी। प्रतिदिन नदियों, झीलों व अन्य स्वच्छ स्रोतों में लगभग 20 लाख टन अपशिष्ट पदार्थ फेंके जाते हैं। विश्व भर में पौने दो लाख घन किमी. प्रदूषित जल है जो दुनिया की दस विशालतम नदियों की कुल जलराशि से भी अधिक है। करीब 25 लाख लोग हर साल प्रदूषित जल से पैदा होने वाली बीमारियों से मरते हैं। पशुओं, वन्य प्राणियों व पक्षियों की संख्या तो करोड़ों में जाती है। जल सृजन अथवा विध्वंस का प्रतीक है। शायर कहता है,

'रिमझिम-रिमझिम बूंदों में जहर भी है और अमृत भी,
आंखें हंस दी दिल रोया यह अच्छी बरसात हुई।'


बरसात हमारे दामन में समा जाए तो ठीक रहता है मगर जब इन्द्र देवता का कहर बढ़ जाए तो चारों ओर हाहाकार मच जाती है। आदमी आलस का मारा जल-प्रबन्धन नहीं करता। जंगल साफ कर रहा है। हर तरफ कारखाने खोल रहा है। शहरों का बड़ी तेजी से विस्तार हो रहा है। हरियाली कहीं नहीं हैं। ऐसे में हवा में उड़ता हुआ बादल भी भटक जाता है। निदा फाजली भी खूब कहते हैं-

'बरसात का बादल तो आवारा है क्या जाने,
किस राह से बचना है किस छत को भिगोना है।'


शायर कहते हैं-

'वह एक अब्र (बादल) का टुकड़ा कहां-कहां बरसे,
तमाम दश्त जंगल ही प्यासा दिखाई देता है।'


बादल गरजते हैं तो किसान की छाती में ठंडक पड़ती है मगर बरसात जब अविराम गिरने लगती है तो किसान का कलेजा दहशत से कांप उठता है। बाढ़ चारों तरफ विशाल सर्वनाश करती हुई खेतिहरों के सपनों पर बुहार लगा जाती है। गरीबी का पहिया रपटता रहता है। सामाजिक अव्यवस्था और राजनैतिक शोषण कितने घरों के चिराग गुल करती है, इस की गिनती करनी मुश्किल है। शायर कहता है,

'हमसे पूछो मिजाज बारिश का, हम जो कच्चे मकान वाले हैं।'

‘घायल की गति घायल जाने।’जल की अतिवृष्टि भी उतनी ही त्रासद और विनाशकारी है जितनी कि उसकी अनावृष्टि। दोनों के बीच एक संतुलन रहे तो विकास का पहिया ठीक चलता है। प्रकृति बहुत बार असंयत हो उठती है। मानव अपने विवेक से जल का सुप्रबन्धन करके धरती स्वर्ग ला सकता है मगर राजनैतिक प्रतिद्वंदिता से उसने अपनी जाति के लिए मुश्किलें और बढ़ाई ही हैं। नेता अपने स्वार्थों के लिए लोगों के हितों को दांव पर लगाते हैं। शायर ठीक कहता है,

'समन्दरों से वो रखता था दोस्ती लेकिन, मरा तो बिरसे में सदियों को प्यास छोड़ गया।'

सियासी करवटें नदियों के बहावों की तरह कब कौन-सा मोड़ ले लें कोई नहीं जानता। कवि कहता है-

'हम भी दरिया हैं हमें अपना हुनर मालूम है,
जिस तरफ भी चल पड़ेंगे रास्ता हो जाएगा।'


नासिर काजमी कहते हैं,

'अपनी लहर है अपना रोग, दरिया हूं और प्यासा हूं।'

ये कैसी विकट स्थिति है। सब तरफ पानी है मगर पीने के लिए साफ जल की एक बूंद उपलब्ध नहीं है। ये किसने हमारे जलाशयों में जहर घोल दिया है। नल पर खड़े लोग लड़ रहे हैं। जल के लिए जिले लड़ रहे हैं, प्रांत दांत पीस रहे हैं, मामला सुप्रीम कोर्ट तक जा पहुंचा है। देशों में नदियों के जल के बंटवारे को लेकर तनाव बढ़ रहे हैं। कहीं यह विश्वयुद्ध की तैयारी तो नहीं हो रही। गौर से देखें तो सूरतेहाल यहीं हैं। धरती पर मीठे पानी का जखीरा बढ़ती हुई आबादी, लापरवाही और कुप्रबंधन के कारण खत्म हो रहा है। आदमी अंतरिक्ष में सुख ढूंढ़ रहा है मगर धरती पर उसे साफ पानी उपलब्ध नहीं है। कतील शिफाई ने बरसों पहले कहा था,

'सूरज के हमसफर जो बने हो तो सोच लो,
इस रास्ते में प्यास का दरिया भी आएगा।'


जल रहेगा तो जीवन खुशहाल रहेगा। गांधीजी ने कहा था कि कुदरत के पास हमारी आवश्यकता के लिए तो बहुत है मगर हमारे लालच के आगे कुदरत भी विवश है। इन्सान पानी को बहुत लापरवाही से खर्च कर रहा है। शावर के नीचे घंटों नहाता है तथा पीने योग्य पानी से गाड़ियों की जमकर धुलाई करता है। शहरों के जंगल उगते जा रहे हैं। शायर पूछता है,

'कैसे पता चले कि यह पतझर है या बहार,
ए दोस्त कोई पेड़ नहीं आसपास में।'


जल का संरक्षण और सुप्रबंधन हमारी पहली प्राथमिकता होनी चाहिए। मगर हम पानी की समस्या नहीं सुलझाएंगे और अपनी वसीयत में आने वाली पीढ़ियों के लिए प्यास छोड़ जाएंगे तो मानवता के हत्यारे कहलाएंगे। निदा फाजली के शब्दों में-

'मैं एक सिरफिरा बादल, मेरा सफर पानी,
उछालकर कोई मौसम नया, निचोड़ मुझे।'

 

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