बिन पानी सब सून

Submitted by birendrakrgupta on Mon, 07/28/2014 - 11:57
Source
नया ज्ञानोदय, अंक 136, जून 2014

जल में उतपति जल में बास

कबीरदास

जल में उतपति जल में बास। जल में नलिनी तोर निवास।।
ना तलि तपति न ऊपरी आगि। तोर हेतु कहु कासनि लागि।।
कहै कबीर जे उदक समान। ते नहीं मुए हंमारे जान।।

सिमटि सिमटि जल भरहिं तलावा

तुलसीदास

घन घमंड नभ गरजत घोर। प्रिया हीन डरपत मन मोरा।।
दामिन दमक रही घन माहीं। खल के प्रीति जथा थिर नाहीं।।
बरसहि जलद भूमि निअराए। जथा नवहि बुध बिद्या पाए।।
बूंद अघात सहहिं गिरि कैसे। खल के वचन संत सह जैसे।।
छुद्र नदी भरि चल इतराई। जस थोरेहुं धन खल बौराई।।
सिमटि सिमटि जल भरहिं तलावा। जिमि सद्गुन सज्जन पहिं आवा।।
सरिता जल जलनिधि महुं जाई। होई अचल जिमि जिव हरि पाई।।
हरित भूमि तृन संकुल समझि परहिं नहि पंथ।
जिमि पाखंडवाद तें गुप्त होहिं सद्ग्रंथ।।

पानी पर लिखी करुण कविता

प्रभाकर श्रोत्रिय (प्रख्यात समालोचक, चिन्तक और विचारक)

आज आत्यन्तिक स्वार्थ ने मनुष्य के चारों ओर ऐसे निष्करुण और निर्लज्ज संसार की सृष्टि कर दी है जिसने प्रकृति के भौतिक अस्तित्व को विनाश के कागार पर पहुंचा दिया है। ऐसे समय साहित्य में जल को पुकारना जीवन की पुनर्रचना का आह्वान है। क्योंकि मनुष्य ने संसार के सबसे मूल्यवान और गतिमान जीवन-तत्त्व को प्रदूषित कर दिया है। उसे उसके ठिकानों से खींचकर बंधक बनाया जा रहा है; धरती की कोख लगातार खोखली की जा रही है, उसमें उतना भर पानी भी नहीं बचा जिसमें गर्भ तैर कर रूप लेता है। पहले तो पानी में जहर मिलाया जा रहा है, फिर उसकी परिशुद्धि के नाम पर एक पूरा बाजार विकसित किया जा रहा है। अजब दुश्चक्र है। जिस जल को किसी जमाने में ऋषियों ने ‘आपो ज्योति रसोsमतम्’- ज्योति, रस और अमृत कहा था, उसे किस रूप में हम अगली पीढि़यों को सौंप रहे हैं?

पांचवें दशक के आसपास औद्योगिकता की अति और उससे होनेवाले प्रदूषण की चिन्ता, बांधों का निर्माण और विस्थापन, पानी की राजनीति, सूखे और बाढ़ के बार-बार आक्रमण से पानी संबंधी रचनाओं की दृष्टि, अनुभव और तापमान में अजब किस्म का बदलाव आया है। दूसरी ओर शहरों में जैसे-जैसे रचनाकार सघन होता गया, वैसे-वैसे उसके ऋतु संवेदन कम होने लगे और केवल समस्याओं, विचारधाराओं में वह सिमटता गया। इधर पर्यावरण और ऋतु-चक्र का अध्ययन, विज्ञान और परिस्थितिकी की तरफ चला गया और बांधों से होने वाले विस्थापन की समस्या ने मानवीय चिंता और आंदोलन का रूप ले लिया।

धरती के पास बैठ कुछ कर लें

राजेन्द्र सिंह (सुप्रसिद्ध पर्यावरणविद, सामाजिक कार्यकर्ता व विचारक)

दुनिया की जो भी बड़ी ताकतें हैं उनके जो भी अपने स्वार्थ, सोच हैं, शिक्षा है, उसको बड़ा बनाने के लिए वैज्ञानिकों के नाम विदेशों के हैं। हम भी वही कर रहे हैं। इसलिए इस सब चीज से उबरने के लिए मैं जो पिछले 20-25 साल के बराबर यह कह रहा हूं कि धरती के साथ बैठकर कुछ कर लो, धरती के लिए। वह चाहे पानी का सवाल हो या खेती का, चाहे जीवन को चलाने वाले और भी दूसरे उद्योग हों, इसमें जो गरीब समाज है उसका जीवन चलाने सम्बंधी भी कुछ शोध हो जाए।

और ये बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का दृष्टिकोण कुछ ऐसा वातावरण बनाने का है जिससे पूरा विश्व एक जैसा हो जाये। वे जो घड़ी, टेपरिकार्डर बनाते हैं वह पूरी दुनिया में चल सके। ग्लोबलाइजेशन और प्राइवेटाइजेशन का पूरा मसला यही है। उनकी कम्पनी ही सरकार है। निजीकरण, लोकतंत्र का निकृष्ट स्वरूप है। लोकतंत्र में लोक मालिक होता है, निजीकरण में एक व्यक्ति मालिक होता है। एक-दो जो बड़ी कम्पनियां है, वे पूरी दुनिया की मालिक कैसे बन सकें, यही मामला है और इसमें पानी सबसे ज्यादा खतरनाक मामला है। इस समय दुनिया में पानी का ग्लोबल माफिया है। ईस्ट इंडिया कम्पनी को हमें गुलाम बनाने में बहुत समय लगा था। लेकिन ये जो पानी की कम्पनियां हैं, जो हमारी नयी जलनीति 2002 बनी है, यदि पानी का बिल्कुल उसी तरह निजीकरण कर दिया और मालिकाना उनको दे दिया तो देखना हमको 15 साल से ज्यादा नहीं लगेंगे गुलाम होने में। पूरी दुनिया में ऐसा ही किया जा रहा है। हम गंगा को अपनी मां कहते हैं न, पंरतु जिस दिन, ‘लिंकेज ऑफ द रिवर’ होगा उस दिन ‘लिंक ऑफ द पॉल्यूशन और लिंकेज ऑफ द करप्शन’ भी होगा, और वह किसी बहुराष्ट्रीय कम्पनी के हाथ में होंगी और वह कहेगी कि ये नदी मेरी है। आपको गंगा में नहाना है तो 500 रुपये टैक्स लगेगा। जयपुर रोड पर 60 रुपये का टोल टैक्स अभी हटा है। रोड में तो चल जाएगा। परंतु नदी में ऐसा करना जिसके साथ हमारा समाज सदियों से जुड़ा हुआ है, कितना गलत होगा।

पानी पर विचार करना होगा

-अनिल कुमार (चिन्तक और विचारक)

देखिए, जल जीवन का आधार है। आज पानी का मुद्दा बहुत ही ज्वलंत है। नदियों के जोड़ने की परम्परा अमेरिका से शुरू भले ही हुई हो, लेकिन चीन भी इस बात को मानता है कि उत्तर से दक्षिण के पानी के बहाव को नियंन्त्रित कर लें तो उसका सदुपयोग किया जा सकता है। हमारे देश में केवल चार महीनों के भीतर ही 80 फीसदी पानी गिरता है। उसका वितरण इतना असमान है कि कुछ इलाके बाढ़ और बाकी इलाके सूखा झेलने को अभिशप्त हैं। इस तरह की भौगोलिक आवश्यकताएं ही हमें नदियों को जोड़ने के स्वप्न की तरफ ले जाती हैं। हरित क्रांति की बात पानी के बगैर बेमानी होगी। पानी का सवाल हमारे देश की जैविक आवश्यकता से भी जुड़ा है। 2050 तक हमारी आबादी एक सौ अस्सी करोड़ होगी। हमें खाद्यान्न और पानी दोनों पर ही विचार करना होगा। उद्योगों के लिए बिजली चाहिए होगी। कभी नदियां ही यातायात का प्रमुख मार्ग थीं। सस्ते और प्रदूषण रहित परिवहन की परिकल्पना करें तो नदियां आज भी सटीक साधन हैं। पानी की व्यवस्था किये बगैर हम विकास के किसी भी आयाम के बारे में सोच नहीं सकते।

गंगा-जमुना दोआब देश की रूह है

-अरुण कुमार (सुपरिचित लेखक व विचारक)

तुगलक वंश के समय एक नहर बनी थी शिवालिक से फिरोजपुर तक। करीब सौ साल तक पंजाब के लोगों ने इसका इस्तेमाल किया। सौ साल बाद यह सामूहिक निर्णय हुआ कि यह नहर रहेगी तो लोग नहीं रहेंगे। उसके बाद उस नहर को पाट दिया गया। यह एक ऐतिहासिक उदाहरण है। दूसरा उदाहरण गंगा नहर का भी देना चाहूंगा। हरिद्वार से निकल कर मेरठ होती हुई मुरादनगर की तरफ निकलती है। मेरे ख्याल से ये पुरानी ड्रेन हैं जो दो चार दस साल में जब भी गंगा में अतिरिक्त पानी आ जाता होगा हरिद्वार के पास, तो उसको लेकर इस इलाके में बांटती होगी। लेकिन इसकी पक्की नहर तो नहीं थी। पक्की नहर तो 1850 में अंग्रेजों के समय बनायी गयी। यह जो गंगा-जमुना दोआब है यह हिन्दुस्तान की रूह है। इसमें इतनी समृद्धि है, उतनी दुनिया के किसी भी देश में नहीं है। इस दोआब में दुनिया की सबसे जानदार और विविध किस्म की फसलें और फल होते रहे हैं। लेकिन हमने पिछल डेढ़ दो सौ सालों में इस क्षेत्र की पहचान गन्ने के इलाके के रूप में कर दी। किसान जो बहुत समृद्ध था, जहां हर रोज उत्सव होते थे, उसके सारे उत्सव खत्म कर दिये गये। आज की तारीख में हमने इस इलाके के किसान को कितना गरीब बना दिया है, इसका आपको अनुमान नहीं है और यह इस नहर का कमाल है।

पानी को बांटने से बचाएं

-जया मित्रा (चिन्तक व विचारक)

पानी सार्वजनिक चीज रहा है। लेकिन पिछले कुछ वर्षो से यह वाणिज्यिक चीज होता जा रहा है। विकास की अवधारणा इस तरह की बन चुकी है कि पहले सब कुछ बुरा था, अब उसको अच्छा करना है। विकास की इस अवधारणा में सबसे अधिक पानी के बारे में सोचा जा रहा है। पानी को लेकर जब बंटवारे और विकास की बातें होती हैं तो लगता है हम लोग निर्णायक हैं। बात यह होने लगी है कि नदियों से पानी बेकार बह जाता है। नदियों में पानी बढ़ गया तो इससे बिजली बनाओ, जहां पानी नहीं है वहां पर प्रचुर पानी वाले इलाके से पानी ले जाओ। मानो जहां पानी नहीं था वहां पहले से ही लोग रहते थे। हम पिछले 15 सालों से सुनते आ रहे हैं कि नर्मदा का पानी जब सौराष्ट्र में पहुंचेगा, तब वहां के लोगों को पीने का पानी मिलेगा। सौराष्ट्र तो बहुत पुराना राज्य रहा है। कैसे रहते थे वहां के लोग? ऐसी ही बात राजस्थान के बारे में कही जाती है। मानो राजस्थान पूरी तरह से कंगाल हो चुका हो। पानी नहीं है राजस्थान में। यहां बताना चाहूंगी कि पश्चिम बंगाल में पुरुलिया और बांकुड़ा दो जिले हैं। लेकिन वहां जाकर मैंने खुद देखा है कि लोग किस तरह से बारिश के पानी का सदुपयोग करते हैं। वर्षा के पानी को रोकने की तकनीक पूरे भारतवर्ष में प्रचलित है। दुनिया के दूसरे दशों में भी जहां पुरानी कृषि सभ्यता है पानी संचित करने का अपना तरीका है। आज हम जल प्रबन्धन की बात कर रहे हैं तब भी लोग निरन्तर गरीबी रेखा से नीचे चले जा रहे हैं। पिछले 18 फीसदी, फिर 16 फीसदी और अब उससे भी अधिक और इसे हम रोक नहीं पा रहे। विकास के साथ-साथ गरीबी बढ़ती जा रही है। पानी के साथ हमारे जीवन की दूसरी समस्याएं भी जुड़ी हुई हैं।

जिन मुल्कों ने गोदावरी, गंगा और ब्रह्मपुत्र जैसी नदियां नहीं देखी होंगी वे यहां पर पानी प्लांट बिठाकर हमारे घर में पानी पहुंचा रहे हैं। और हमारी सरकार कुदरत के दिए हुए पानी को टैक्स लेकर हम तक पहुंचा रही है। यानी लोगों की तृष्णा के लिए पैसा वसूला जा रहा है। कितनी भयावह बात है। नया सिलसिला नदियों के जोड़ने का है। गंगा को कावेरी से, कावेरी को गोदावरी से आदि। लेकिन इससे जिस तरह की समस्याएं होंगी उस पर गौर नहीं किया जा रहा है जितने बांध बनाये गये हैं उसमें मिट्टी के जमाव से एक-एक नदी को खत्म किया गया है। आप देख सकते हैं कि अधिकांश नदियों में कोई गहराई नहीं रही। सूखे मैदान की तरह दिखती हैं वो।

पूरी विरासत दांव पर

-उमेन्द्र दत्त (सामाजिक कार्यकर्ता, लेखक, विचारक)

पंजाब देश का एकमात्र राज्य है जिसके नाम के साथ पानी जुड़ा रहा है। लेकिन इस प्रदेश का अस्सी फीसदी इलाका डार्क जोन या ग्रे जोन में बदल चुका है। यानी जमीन के नीचे का पानी या तो खत्म हो गया या खत्म होने जा रहा है। तीन नदियां विभाजन में पाकिस्तान के हिस्से में चली गयीं। सतलज और व्यास यहां बहती हैं लेकिन इनमें भी पानी धीरे-धीरे कम होता जा रहा है। इनको बड़ा स्वरूप देने वाली जो छोटी-छोटी धाराएं थीं पंजाब में, वे समाप्त हो चुकी हैं। शिवालिक की पहाडि़यों से निकलने वाली जयन्ती, बुदकी, सिसुआं नदी पूरी तरह से सूख चुकी हैं। तांगरी नदी में साल में सिर्फ दस दिन ही पानी आता है, वह भी बाढ़ की तरह। कालीबेई नदी जो गुरुनानक की स्मृति से जुड़ी है, इस नदी की स्थिति भी काफी खराब थी। अब उसमें बाहर से पानी डालकर जीवित किया जा रहा है। बुड्ढा दरिया था पंजाब में वह नाला कहलाने लगा है। किस तरह से कोई नदी अपना स्वरूप गंवाती है यह इसका उदाहरण है। उसकी संज्ञा तक चली गयी। सतलज को सबसे ज्यादा प्रदूषित करने वाला वह नाला ही है। सबसे ज्यादा मात्रा में सेलेनियम, क्रोमियम इसमें हैं यह उस पंजाब का हश्र है, जहां जगह-जगह पर पानी था। प्याऊ की परम्परा तो प्रायः पूरे देश में है लेकिन पंजाब में हर त्योहार पर जगह-जगह रोककर मीठा पानी पिलाने की परम्परा है। एक तरह से इस प्रदेश की तो पूरी विरासत ही दांव पर लगी हुई है।

ग्लोबल वार्मिंग एक बड़े संकट ही तरह है

-योगेन्द्र प्रसाद (चिन्तक व विचारक)

भारत के लिए जलवायु परिवर्तन का मुद्दा मुख्यतः चार कारणों से महत्त्वपूर्ण है। पहला, यहां की अर्थव्यवस्था पूर्णतः कृषि पर निर्भर है। तेजी से बदलते मौसम के मिज़ाज और पिघलते ग्लेशियरों ने किसानों की समस्याओं को बढ़ा दिया है। दूसरा, भारत का काफी बड़ा क्षेत्र समुद्र तट से लगा है। इसलिए मुम्बई, चेन्नई जैसे शहरों में इसका व्यापक असर पड़ने की सम्भावना है। तीसरा, ग्लोबल वार्मिंग का स्वास्थ्य सुरक्षा से भी अमिट संबंध है- लू, तूफान, बाढ़ और सूखे जैसी आपदाओं से लोगों को जानमाल की हानि तो होती ही है, ओजोन परत में छेद के बढ़ते जाने से अल्ट्रा-वायलट किरणों की मात्रा बढ़ने से मोतियाबिंद, इन्फेक्शन, सांस की बीमारियां, पेचिस, हैजा, मलेरिया, डेंगू चिकनगुनिया, फाइलेरिया और कुपोषण से भी प्रतिवर्ष हजारों लोग असमय काल-कवलित हो जाते हैं। चौथा, सूचना क्रांति के दौर में ई-कचरा भी भारत के लिए गम्भीर चिंता का विषय है। ई-कचरा यानी मोबाईल, आईपैंड, कम्प्यूटर और दूसरे तमाम इलेक्ट्रॉनिक गैजेट के तेजी से कबाड़ में परिवर्तन होने से उत्पन्न होता है। इस कचरे में सीसा, कैडमियम, पारा, निकिल, लीथियम, प्लास्टिक और एल्यूमीनियम, आदि धातुएं शामिल होती हैं जो पर्यावरण के साथ ही स्वास्थ्य के लिए भी खतरा है। इससे निपटने के लिए रिसाइक्लिंग टेक्नोलॉजी में सुधार तथा कठोर नियमों और कानून की सख्त जरूरत है। आज ग्लोबल वार्मिंग 21 वीं सदी की प्रमुख समस्याओं में से एक है। यद्यपि राष्ट्रीय और अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर इस समस्या के समाधान हेतु लगातार प्रयास जारी है। पृथ्वी सम्मेलन 1992, क्योटो प्रोटोकाल 1997 जैसे अन्तरराष्ट्रीय शिखर सम्मेलन आयोजित हुए हैं। हालांकि अभी तक कुछ ठोस परिणाम हासिल नहीं हो सका है।

नया ज्ञानोदय मार्च-2004 से साभार

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