बंगाल से बांग्लादेश तक हिल्सा डिप्लोमेसी

Submitted by Hindi on Mon, 08/22/2011 - 15:09
Source
नई दुनिया, 21-27 अगस्त 2011

बंगाल और बांग्लादेश की नदियों में विचरतीं हिल्सा मछलियाँ स्थानीय जनमानस को गहरे स्तर पर प्रभावित करती हैं। रोजी-रोटी से लेकर कला-संस्कृति तक पर इसका गहरा प्रभाव है। ये बंगाल (भारत) और बांग्लादेश के रिश्ते तक सुधार रही हैं।

कोलकाता -केंद्र में यूनाइटेड प्रोग्रेसिव एलायंस (यूपीए) की पहली सरकार से मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) द्वारा समर्थन वापसी की घोषणा करने के कुछ दिन पहले की बात है। बंगाल के तत्कालीन मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य दिल्ली में प्रधानमंत्री निवास पर डिनर के लिए आमंत्रित थे। प्रधानमंत्री चाहते थे कि डिनर में बंगाल की डिश रखी जाएं, खासकर वे जो इस कम्युनिस्ट बाबू को पसंद हों। जाहिर है, डिनर में मुख्य डिश थी - इलिश माछेर पाटुरी (केले के पत्ते में सरसों आदि के साथ लिपटी व भाप से पकाई गई हिल्सा मछली)। हिल्सा मछली की यह डिश बुद्धदेव भट्टाचार्य की कमजोरी मानी जाती है। इस डिनर डिप्लोमेसी के बाद बुद्धदेव भट्टाचार्य खुलकर यह कहते हुए खड़े हो गए थे कि केंद्र से समर्थन वापस लेना उचित नहीं होगा। यह हिल्सा का करिश्मा था या कुछ और यह तो नहीं कहा जा सकता लेकिन तब से माकपा के कुछ नेताओं के बीच यह चुटकुला चल निकला है कि अगर हिल्सा मछली प्रकाश कारात की भी कमजोरी होती तो आज की तारीख में ममता बनर्जी का मुख्यमंत्री बनना असंभव था।

यूपीए दो सरकार के दिनों में बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना के साथ दिल्ली में अपने पुराने संबंधों को नई गर्माहट देने के लिए परिवार समेत दिल्ली पहुंची थीं - बेटा सजीव वाजेद (जॉय), बेटी साइमा वाजेद हुसैन (पुतुल), शेख हसीना की बहन शेख रेहाना और उनके बच्चे। जब ये लोग कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी से मिलने पहुंचे तो बतौर तोहफा पद्मा नदी की हिल्सा मछली साथ ले जाना नहीं भूले। पद्मा नदी की हिल्सा पश्चिम बंगाल में मिलने वाली गंगा और रूपनारायण की हिल्सा से अधिक स्वादिष्ट मानी जाती है। शेख हसीना तत्कालीन रेल मंत्री ममता बनर्जी के लिए भी हिल्सा लाई थीं। सच कहें तो उस यात्रा के बाद से भारत और बांग्लादेश के बीच नजदीकी ज्यादा बढ़ी है। पूर्वोत्तर की तिपाईमुख बांध परियोजना, जिसे लेकर बांग्लादेश ने कई बार आपत्ति उठाई थी, उनके अलावा रेल और बिजली की कुछ अन्य परियोजनाओं पर तकरार कम हुई है और माहौल सुखद बना है। प्रमाण के तौर पर हम पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को मिला बांग्लादेश का शीर्ष नागरिक सम्मान ले सकते हैं।

हिल्सा मछलियों पर आश्रित है मछुआरों का जीवनहिल्सा मछलियों पर आश्रित है मछुआरों का जीवनप्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह को अपने हालिया ढाका दौरे में तिस्ता नदी जल बंटवारे और सीमा निर्धारण को लेकर बांग्लादेश का लचीला रुख दिखा ही है। बांग्लादेश 400 एकड़ जमीन लौटाने को तैयार हो गया है और जमीन के छोटे-छोटे टुकड़ों, जो एक-दूसरे की सीमा के भीतर हैं, उनका मसला भी हल होने की ओर है। यूं तो दो देशों के बेहतर संबंधों के लिए पुख्ता राजनयिक कवायद ही बड़ी वजह होती है लेकिन जब बंगाली संवेदना की बात आती है तब हिल्सा मछली की अहम भूमिका से इनकार नहीं किया जा सकता। तभी तो बांग्लादेश से कितनी मात्रा, वजन और कीमत वाली हिल्सा मछली की आवक होगी यह तय करने के लिए हर वर्ष मानसून से पहले बाकायदा दोनों देशों के राजनयिकों की बैठक होती है। दोनों देशों के कारोबारियों से परामर्श लिया जाता। इस साल पद्मा की हिल्सा की कीमत में अच्छा-खासा उछाल था- लगभग 1,000 से 1,200 रुपए प्रति किलों इससे लोग परेशान हो रहे थे। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह को पत्र लिखा और अनौपचारिक तौर पर बांग्लादेश की प्रधानमंत्री से फोन पर बातचीत की और मसला हल हुआ। दोनों देशों के बीच संधि के अनुसार कीमतों की समीक्षा की गई। अब बांग्लादेश से 300 से 500 रुपए किलों कीमत पर हिल्सा भेजी जा रही है। जुलाई से सितंबर तक बांग्लादेश से रोजाना करीब 80 टन हिल्सा मछली भारत मंगाई जाती है।

हिल्सा ने बंगाल के जनमानस को गहरे प्रभावित किया है। बांग्ला के मशहूर लेखक माणिक बंद्योपाध्याय का उपन्यास ‘पद्मा नदीर मांझी’ तो इतना चर्चित हुआ कि इस पर एक फिल्म भी बनी। यह फिल्म बांग्ला फिल्मों के महानायक उत्तम कुमार के जमाने में बंगाल में ब्लॉकबस्टर साबित हुई- एक मछुआरे कुबेर को हमेशा इसका डर रहता है कि कहीं पद्मा नदी में हिल्सा मछली की आवक कम न हो जाए। यदि ऐसा हुआ तो कहीं उसे भूखों मरना न पड़े। पद्मा नदीर मांझी, उन मछुआरों की रोचक कहानी है जो पद्मा नदी (गंगा नदी ही बंगाल में हुगली और बांग्लादेश में पद्मा के नाम से जानी जाती हैं) में मानसून के दौरान हिल्सा पकड़कर साल भर की रोजी जमा कर लेते हैं। बहरहाल, आज की तारीख में यह मछली कम से कम तीन देशों के बीच राजनयिक संबंधों का आधार है। इस बेहद स्वादिष्ट मछली को लेकर भारत-बांग्लादेश व बांग्लादेश-म्यांमार के बीच अंतर्राष्ट्रीय संधियां भी हो चुकी हैं।

हिल्सा मछली की एक डिश इलिस माछेर पाटुरीहिल्सा मछली की एक डिश इलिस माछेर पाटुरीहुगली और पद्मा की हिल्सा सबसे स्वादिष्ट मानी जाती है। हुगली में इसकी आवक घटते जाने के साथ ही बांग्लादेश की हिल्सा की मांग भारत में बढ़ रही है। जुलाई के आखिरी हफ्ते में जब बांग्लादेश के बरीशाल और पेट्रापोल बॉर्डर से यह मछली कोलकाता के बाजारों में पहुंची तो दो ट्रक या यूं कहें कि तीन टन हिल्सा का आना अखबारों की सुर्खियां बनी। निर्यात के चलते स्थानीय बाजारों में हिल्सा की कीमत बढ़ने के बाद बांग्लादेश ने पिछले साल इसके निर्यात पर रोक लगा दी थी। इस साल मई में भारत और बांग्लादेश के बीच चली राजनयिक कवायद में कीमतों का मसला तय किया गया और अब वहां से छह डॉलर प्रति किलो की कीमत पर मछलियां आ रही हैं, हालांकि बंगाल के मछली विक्रेता इसे घटाकर चार डॉलर प्रति किलोग्राम करने की मांग कर रहे हैं।

मानसून में बंगाल में हुगली, रूपनारायण और बांग्लादेश से सटे इलाकों में बहने वाली पद्मा नदी में हिल्सा मछली की विभिन्न प्रजातियों की आवक मछुआरों के चेहरे खिला देती है। हावड़ा जिले के झुमझुमी और अनंतपुर गांवों, मेदिनीपुर के कोलाघाट और दीघा एवं उत्तर 24 परगना के पेट्रापोल इलाके में बसे मछुआरे गंगा, रूपनारायण, दामोदर नदी की हिल्सा लाते हैं। लगातार शिकार के चलते इस मछली की प्रजाति प्रभावित होने लगी थी, ऐसे में पश्चिम बंगाल, बांग्लादेश और म्यांमार में हिल्सा पकड़ने के लिए मछलियों का आकार निर्धारित कर दिया गया। जाल की बुनावट कुछ ऐसी तय की गई कि उसमें छोटी हिल्सा न फंसे। बांग्लादेश के अलावा म्यांमार भी हिल्सा का बड़ा उत्पादक देश है। कल्याणी स्थित कृषि विश्वविद्यालय में मछली पालन विभाग के प्रोफेसर विकास बनर्जी के अनुसार, 'बांग्लादेश और म्यांमार में मछुआरों को ऐसे जाल दिए गए हैं, जिसमें सात सौ ग्राम से कम वजन की मछली नहीं फंस सकती। पश्चिम बंगाल में भी इस साल से ऐसा किया गया है।' जाहिर है, बंगाल की नदियों में इस बार कम हिल्सा मिली हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, अगर छोटे आकार की हिल्सा पकड़ ली जाएगी तो अगले सीजन के लिए मछलियों की ब्रीडिंग कैसे हो पाएगी?

हिल्सा मछली का स्वाद बंगाल के लोगों के दिलों पर राज करता हैहिल्सा मछली का स्वाद बंगाल के लोगों के दिलों पर राज करता हैबुजुर्ग मछुआरे भी विशेषज्ञों की राय से इत्तेफाक रखते हैं। झुमझुमी गांव की 75 साल की बुजुर्ग पांचुबाला दास याद करती हैं कि किस प्रकार मानसून के दौरान उनके गांव के लोग बड़ी मछलियां पकड़ने पर ध्यान देते थे। तब नदियों में हिल्सा की बहार होती थी। दिन भर गाँवों के मर्द मछलियां पकड़ते और औरतें व्यापारियों के साथ मोलभाव करतीं। झुमझुमी और अनंतपुर गांव मछुआरों के बड़े गांव हैं। नदी किनारे 35 किलोमीटर तक बसे गांव। ये गांव गेंओखाली के बिल्कुल पास हैं, जहां दामोदर और रूपनारायण नदियां मिलती हैं। तीन किलोमीटर तक फैले मुहाने में हिल्सा की खूब आवक रही है। विशेषज्ञों के द्वारा तय पैमानों का मछुआरे पालन कर रहे हैं और बंगाल की नदियों में धीरे-धीरे हिल्सा मछलियों की संख्या बढ़ रही है लेकिन जहां तक स्वाद का सवाल है, पश्चिम बंगाल में खपत के लिए बांग्लादेश पर निर्भरता बनी ही रहेगी।

Email:- Deepak.rastogi@naidunia.com

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