बर्फबारी से गुलजार हुआ उत्तराखण्ड

Submitted by RuralWater on Tue, 01/24/2017 - 16:00

एक तरफ बर्फ के कारण राज्य में शीत लहर बढ़ गई तो दूसरी तरफ लोगों में खुशी इस बात को लेकर है कि इस साल फसल की अच्छी उपज होगी। क्योंकि बर्फ के कारण नीचले हिस्सों के जलस्रोत लगातार रिचार्ज होते रहेंगे। ग्रामीणों का कहना है कि पिछले 40 वर्षों में बर्फ ने अपने मौसम का मिजाज बदल दिया था। साल-दर-साल बर्फ ऊपर-ऊपर खिसक रही थी और बर्फबारी की मात्रा भी कम ही हो रही थी। जिस कारण पहाड़ों में जल संकट बड़ी मात्रा में बढ़ रहा था। इस साल के बर्फ ने पानी के स्रोतों को जिन्दगी दे दी है। साल की शुरुआत अच्छी हुई है, ऐसा उत्तराखण्ड राज्य के किसानों के चेहरों पर दिखाई देने वाली खुशी बता रही है। क्योंकि इस वर्ष ऐसे जगहों पर बर्फ गिरी जहाँ कभी 40 वर्ष पूर्व लोगों ने बर्फ देखी थी। इस वर्ष साल के आरम्भ में ही 1500मी. की ऊँचाई वाले इलाकों में बर्फ आ गई है।

ग्रामीण किसानों का कहना है कि इस साल गेहूँ सहित सभी फसलें अच्छी होंगी और पानी के सभी स्रोत जीवित रहने की सम्भावना है। इस बार पहाड़ों पर हो रही बर्फबारी से हिम रेख नीचे खिसक गई है। इधर कई वर्षों से इन क्षेत्रों के पहाड़ों को निर्जन कहा जा रहा था। सो बर्फबारी के कारण निचले हिस्से में रह रहे लोगों को गर्मी नहीं सताएगी।

ज्ञात हो कि लगभग 10 हजार फिट की ऊँचाई पर स्थित औली में ‘स्नो स्कीइंग गेम’ रद्द करने पड़ रहे थे। इस बर्फबारी से औली बर्फ का धनी हो गया है और स्नो स्कींग गेम्स के शौकीन औली पहुँच रहे हैं। उधर मसूरी, धनौल्टी जैसे हिल स्टेशन भी बर्फ के लिये कई वर्षों से तरस रहे थे। परन्तु इस दौरान लकदक बर्फ से भरी पहाड़ियों ने राज्य के पहाड़ी क्षेत्र के निवासियों के चेहरे खिला दिये हैं। जबकि जलवायु परिवर्तन से जुड़े विज्ञानी घबराए हुए थे कि हिमरेखा ऊपर-ऊपर खिसक रही है, जो भविष्य के लिये बड़े खतरे को इशारा कर रही थी। अलकनन्दा, अपर भागीरथी बेसिन और हिन्दूकुश क्षेत्र में हिमरेखा ऊपर जाने से कई वनस्पतियाँ और कीट संसार प्रभावित हो रहा था।

बर्फबारी से पहाड़ के किसानों का चेहरा खिल उठा हैइस दौरान की बर्फबारी ने हिमरेखा को कई मीटर नीचे ला दिया है। अब हुई बर्फबारी से विज्ञानियों के चेहरे भी खिल उठे हैं। वन अनुसन्धान संस्थान के विज्ञानी हुकुम सिंह का कहना है कि इस बर्फबारी से इस क्षेत्र की जैवविविधता को काफी फायदा इस मायने में होगा कि वनस्पतियों के लिये अब पर्याप्त जल उपलब्ध होगा। वाडिया हिमालय भू-विज्ञान संस्थान के वरिष्ठ विज्ञानी डॉ. अमित कुमार का कहना है कि बर्फबारी की निरन्तरता और हिमरेखा का टिके रहना जरूरी है। क्योंकि यह पहाड़ों की सेहत के लिये भी अच्छा है।

उल्लेखनीय हो कि जनवरी माह के प्रथम सप्ताह में ही लगातार दो बार और तीन-तीन दिन तक गिरने वाली बर्फ ने गढ़वाल मण्डल में तीन प्रमुख हाईवे (बद्रीनाथ-गंगोत्री-यमुनोत्री) समेत कई छोटे मार्ग और सम्पर्क मार्ग बन्द कर दिये थे। उधर कुमाऊँ मण्डल में भी बर्फबारी के चलते थल-मुनस्यारी स्टेट हाईवे सात घंटे के लिये बन्द रहा।

बद्रीनाथ, हेमकुंड साहिब, रुद्रनाथ, औली सहित ऊँची चोटियों ने एक लम्बे समय के बाद सफेद चादर ओढ़ी है। इसके अलावा हनुमान चट्टी से आगे बद्रीनाथ तक हाईवे एकदम बर्फ से ढँक गया। जिस कारण चीन सीमा क्षेत्र में स्थित माणा में आईटीबीपी और सेना की आवाजाही कुछ दिनों के लिये ठप पड़ गई। और बद्रीनाथ धाम में रह रहे जवान भी निचले क्षेत्रों में नहीं आ पाये।

निजमुला घाटी के पाणा और ईराणी गाँव के लिये सप्लाई हो रही बिजली लाइन बर्फबारी के कारण क्षतिग्रस्त हो गई, पाणा-ईराणी तक जाने वाला पैदल रास्ता भी बर्फ से ढँक गया। औली में बर्फबारी के बीच ही पर्यटकों की आवाजाही एकदम बढ़ गई। वहीं जोशीमठ-औली मोटर मार्ग कवांण बैंड से आगे बर्फ जमने से बन्द हो गया था, पर पर्यटक रोपवे से औली के दीदार को पहुँच रहे हैं। मलारी, नीती, बांपा और चीन सीमा क्षेत्र की चोटियों ने बर्फ की चादर ओढ़ ली है।

केदारनाथ धाम में सवा पाँच फीट से अधिक बर्फ जमा है। तुंगनाथ, मद्महेश्वर, हरियाली डांडा क्षेत्र की रौनक बर्फ के कारण देखते ही बनती है। गंगोत्री व यमुनोत्री हाईवे पर बर्फबारी के कारण यातायात बन्द हो गया। यमुनोत्री हाईवे फूलचट्टी से आगे भारी बर्फबारी के चलते बाधित है। गंगोत्री हाईवे पर हर्षिल धराली से आगे यातायात ठप हो गया है। खरसाली, बीफ, निषणी सहित आधा दर्जन से अधिक गाँवों का सम्पर्क कुछ दिनों के लिये बर्फ के कारण देश-दुनिया से कट गया।

बर्फबारी का आनन्द लेते लेखक प्रेम पंचोलीकाबिलेगौर यह है कि एक तरफ बर्फ के कारण राज्य में शीत लहर बढ़ गई तो दूसरी तरफ लोगों में खुशी इस बात को लेकर है कि इस साल फसल की अच्छी उपज होगी। क्योंकि बर्फ के कारण नीचले हिस्सों के जलस्रोत लगातार रिचार्ज होते रहेंगे। ग्रामीणों का कहना है कि पिछले 40 वर्षों में बर्फ ने अपने मौसम का मिजाज बदल दिया था।

साल-दर-साल बर्फ ऊपर-ऊपर खिसक रही थी और बर्फबारी की मात्रा भी कम ही हो रही थी। जिस कारण पहाड़ों में जल संकट बड़ी मात्रा में बढ़ रहा था। इस साल के बर्फ ने पानी के स्रोतों को जिन्दगी दे दी है। उद्यानपति अमर सिंह कफोला का कहना है कि जबसे बर्फ का गिरना कम हो गया था तब से उनके सेब के बगीचों की फलोत्पादन की क्षमता कम होती जा रही थी।

वर्तमान की बर्फ ने उन्हें फिर से सेब के बगीचों पर आस बँधवा दी है। प्रगतिशील किसान युद्धवीर सिंह रावत का कहना है कि पिछले कई वर्षों से बर्फ का गिरना कम हो गया था। इस कारण निचले स्तर के जलस्रोत सूखने के कगार पर आ चुके थे। अब शायद ये जलस्रोत पुनर्जीवित हो जाएँगे तो उनके सिंचाई के साधन भी पर्याप्त मात्रा में बढ़ जाएँगे।

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