बरसा सौ कोस....

Submitted by admin on Tue, 01/20/2009 - 07:42

`घाघ´ कहें, बरसा सौ कोस....


अगर चींटियां नन्हें कदमों से बड़ी तेजी से चलते हुए अपने अंडों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचा रहीं हों, कौवे भी महफूज स्थानों पर घौसलें खोज रहे हो, मोर मस्त होकर झूम रहे हों, टिटिहरी टी...टी..टी...करती घूम रही हो तो समझ लीजिए कि मानसून आने वाला है।

जीव जंतुओं की ये गतिविधियां मानसून के आने के प्रचलित और लोकप्रिय पूर्वानुमान हैं। उत्तर भारत में बरखा रानी के आने का समय कवि `घाघ´ कुछ इस तरह बताते हैं -

दिन में बद्दर, रात निबद्दर
बहे पुरवइया,झब्बर-झब्बर
दिन में गरमी,रात में ओस
`घाघ´ कहें, बरसा सौ कोस

अर्थात अगर दिन में बादल छाएं और रात में बादल नहीं छाएं, पुरवाई हवा चले, दिन में खूब गरमी रहे और रात में ओस पड़े तो बरसात सौ कोस की दूरी पर है।

यूं तो मौसम विज्ञानी हर दिन मानसून पर नजर रखते हैं। लेकिन भारत के हर हिस्से में मानसून की चाल पर नजर रखने के लिए अलग अलग पद्वतियां और धारणाएं प्रचलित हैं। उत्तर भारत में कवि घाघ की काव्य से परिपूर्ण भविष्यवाणी हैं तो दक्षिण भारत में मान्यता है कि यदि काली मिर्च से फूल निकल आएं तो पंद्रह दिन में बरसात होने वाली है।

कहा जाता है कि प्रकृति से ज्यादा नजदीक होने के नाते जीव जंतुओं को मानसून आने की भनक काफी पहले से ही हो जाती है। ऐसे में जीव जंतु अपने अपने हिसाब में इंतजाम करने लगते हैं। कौवों का प्रजनन काल मानसून के आस-पास होता है इसलिए वे घौंसले का काम शुरू करते हैं। बरसात में उनके अंडे क्षतिग्रस्त न हों इसलिए वे मानसून आने से पहले ही घौंसले बना लेते हैं। ऐसे ही चीटियां भी अपने अंडों को मानसून आने से पहले सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाने का मिशन चलाती हैं। मौसम विज्ञानियों भले ही हर पल आसमान पर नजर टिकाएं रहे लेकिन पुराने और ग्रामीण लोग अब भी जीव जंतुओं की कारगुजारियों से मानसून के संकेत पाते हैं। ऐसा कई बार हुआ है जब मौसम विज्ञानियों की भविष्यवाणियां गलत हो गई है लेकिन जीव जंतुओं के दिए संकेत झूठे साबित नहीं हुए। वर्ष 2002 में ऐसा ही हुआ जब मौसम विभाग के सामान्य मानसून की भविष्यवाणी गलत साबित हो गई और देश के कई हिस्सों में सूखा पड़ गया। जानकार बताते हैं कि जीव जंतुओं की गतिविधियों को देख कर गांव के बड़े बूढों ने सूखा पड़ने की भविष्यवाणी कर दी थी।

साभार – अमर उजाला

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