बुन्देलखण्ड का कश्मीर है चरखारी

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'आल्हा-ऊदल और बुन्देलखण्ड' पुस्तक से साभार

पंत जी ने चरखारी को कश्मीर यूँ ही नहीं कह दिया था। राजमहल के चारों तरफ नीलकमल और पक्षियों के कलरव से आच्छादित, एक दूसरे से आन्तरिक रूप से जुड़े- विजय, मलखान, वंशी, जय, रतन सागर और कोठी ताल नामक झीलें, चरखारी को अपने आशीर्वाद के चक्रव्यूह में लपेटे कृष्ण के 108 मन्दिर- जिसमें सुदामापुरी का गोपाल बिहारी मन्दिर, रायनपुर का गुमान बिहारी, मंगलगढ़ के मन्दिर, बख्त बिहारी, बाँके बिहारी के मन्दिर तथा माडव्य ऋषि की गुफा और समीप ही बुन्देला राजाओं का आखेट स्थल टोला तालाब- ये सब मिलकर वाकई चरखारी में पृथ्वी के स्वर्ग कश्मीर का आभास देते हैं।

यूपी के पहले वजीरे आला जनाब गोविंद वल्लभ पंत जब चरखारी तशरीफ लाये तो चरखारी का वैभव एवं सौन्दर्य देखकर उनके मुँह से अचानक निकल पड़ा कि अरे यह तो बुन्देलखण्ड का कश्मीर है। चरखारी उन्हें इतना प्रिय था कि आजादी के बाद रियासतों के विलीनीकरण के समय जब चरखारी की अवाम ने म.प्र. में विलय के पक्ष में अपना निर्णय दिया तो पं. गोविंद वल्लभ पंत सिर के बल खड़े हो गए। तत्काल चरखारी के नेताओं को बुलावा भेजा, महाराज चरखारी से गुफ्तगू की और इस प्रकार बुन्देलखण्ड का कश्मीर म. प्र. में जाने से बच गया।

पंत जी ने चरखारी को कश्मीर यूँ ही नहीं कह दिया था। राजमहल के चारों तरफ नीलकमल और पक्षियों के कलरव से आच्छादित, एक दूसरे से आन्तरिक रूप से जुड़े- विजय, मलखान, वंशी, जय, रतन सागर और कोठी ताल नामक झीलें, चरखारी को अपने आशीर्वाद के चक्रव्यूह में लपेटे कृष्ण के 108 मन्दिर- जिसमें सुदामापुरी का गोपाल बिहारी मन्दिर, रायनपुर का गुमान बिहारी, मंगलगढ़ के मन्दिर, बख्त बिहारी, बाँके बिहारी के मन्दिर तथा माडव्य ऋषि की गुफा और समीप ही बुन्देला राजाओं का आखेट स्थल टोला तालाब- ये सब मिलकर वाकई चरखारी में पृथ्वी के स्वर्ग कश्मीर का आभास देते हैं। चरखारी का प्रथम उल्लेख चन्देल नरेशों के ताम्र पत्रों में मिलता है। देववर्मन, वीरवर्मन, हम्मीरवर्मन के लेखों में इसका नाम वेदसाइथा था। राजा परमाल के पुत्र रंजीत ने चरखारी को अपनी राजधानी बना चक्रधारी मन्दिर की स्थापना की। चक्रधारी मन्दिर के नाम पर ही राजा मलखान सिंह के समय वेदसाइथा का नाम चरखारी पड़ा। कुछ स्थानीय लोग इसे महराजपुर भी कहते हैं। कजली की लड़ाई में जब रंजीत मारे गए तो चरखारी उजाड़ हो गई। इन्हीं रंजीत के नाम पर किले के सामने रंजीता पर्वत है। एपीग्राफिक इंडिका के अनुसार खंदिया मुहल्ला और टोला तालाब इन्हीं रंजीत का बनवाया हुआ है। टोला ताल आज एक खुबसूरत पिकनिक स्पॉट है।

चन्देलों के गुजर जाने के सैकड़ों वर्ष बाद राजा छत्रसाल के पुत्र जगतराज के समय चरखारी का पुन: भाग्योदय होता है। आखेट करते समय जगतराज एक दिन मुंडिया पर्वत पहुँचे। वहाँ उन्हें चुनू वादे और लोधी दादा नामक दो सन्यासी मिले। उन्होंने बताया कि वो दोनों यहाँ एक हजार वर्ष से तप कर रहें हैं और मुंडिया पर्वत ही ऋषि माण्डव्य की तपोस्थली है। जगतराज को इसी समय एक बीजक मिला जिसमें लिखा था-

उखरी पुखरी कुड़वारो वरा, दिल्ली की दौड़ मारे गुढ़ा
सो पावै नौ लाख बहत्तर करोड़ का घड़ा


चुनू वादे और लोधी दादा सिद्ध योगी थे। उन्होंने जगतराज को बीजक का भावार्थ बताया। मुंडिया पर्वत पर खुदाई की गई और जगतराज को नौ लाख बहत्तर करोड़ स्वर्ण सिक्कों की अपूर्व सम्पदा मिली। जगतराज फूले न समाए। उन्होंने तुरन्त अपने पिता छत्रसाल को पन्ना में यह खुशखबरी भेजी। किन्तु छत्रसाल कुपित हुए। उनके अनुसार क्षत्रिय केवल अपने बाहुबल से यशकीर्ति और धन सम्पदा प्राप्त करता है। उन्होंने तुरन्त सन्देश भेजा-

मृतक द्रव्य चन्देल को क्यों तुम लियो उखार?

वस्तुत: यह धन चन्देलो का था। पृथ्वीराज चौहान से पराजित होने के उपरान्त जब परमाल और रानी मल्हना ने महोबा से कालिंजर को प्रस्थान किया तो उन्होंने अपना धन चरखारी में छुपा दिया था। छत्रसाल के निर्देश पर जगतराज ने बीस हजार कन्यादान किये, बाइस विशाल तड़ाग बनवाए, चन्देलकालीन मन्दिरों और तालाबों का जीर्णोंद्धार कराया। किन्तु इस धन का एक भी पैसा अपने पास नहीं रखा।

जगतराज को एक दिन लक्ष्मी जी ने स्वप्न में आदेश दिया कि मुंडिया पर्वत सिद्धस्थल है। यहाँ मंगलवार को किले का निर्माण करो। मंगलवार को नींव का प्रारम्भ नहीं होता किन्तु लक्ष्मी जी का आदेश शिरोधार्य कर मंगलवार को किले की नींव खोदी गई। अत: इसका नाम मंगलगढ़ पड़ा। ज्येतिषी पुहुपशाह, कवि हरिकेश और मड़ियादो के पं गंगाधर के निर्देशन में किले को भव्य बनाने की कोशिशें दिन-रात चलती रहीं।

यह किला भूतल से तीन सौ फुट ऊँचा है। किले की रचना चक्रव्यूह के आधार पर की गई है। क्रमवार कई दीवालें बनाई गई हैं। मुख्यत: तीन दरवाजें हैं। सूपा द्वार- जिससे किले को रसद हथियार सप्लाई होते थे। ड्योढ़ी दरवाजा- राजा रानी के लिये आरक्षित था। इसके अतिरिक्त एक हाथी चिघाड़ फाटक भी मौजूद था।

किले के ऊपर एक साथ सात तालब मौजूद हैं- बिहारी सागर, राधा सागर, सिद्ध बाबा का कुण्ड, रामकुण्ड, चौपरा, महावीर कुण्ड, बख्त बिहारी कुण्ड। चरखारी किला अपनी अष्टधातु तोपों के लिये पूरे भारत में मशहूर था। इसमें धरती धड़कन, काली सहाय, कड़क बिजली, सिद्ध बख्शी, गर्भगिरावन तोपें अपने नाम के अनुसार अपनी भयावहता का अहसास कराती हैं। इस समय काली सहाय तोप बची है जिसकी मारक क्षमा 15 किमी है। ये तोपें 3 बार दागी जाती थीं। प्रथम- 4 बजे लोगों को जगाने के लिये, दूसरी 12 बजे लोगों के विश्राम के लिये, तीसरी रात में सोने के लिये। तीसरी तोप दागने के बाद नगर का मुख्य फाटक बन्द कर दिया जाता था और लोगों का आवागमन बन्द कर दिया जाता था।

किले में बड़े-बड़े गोदाम बने हुए हैं जिसमें कोदों भरा रहता था। यह अनाज कई वर्षों तक खराब नहीं होता। दुश्मन के घेरे के समय यह अनाज काम आता था। चरखारी के किले का पहला घेरा नोने अर्जुन सिंह ने और दूसरा तात्या टोपे ने 1857 में डाला था। किन्तु किले में रसद और जल की पर्याप्त व्यवस्था होने के कारण तात्या किले को फतह नहीं कर सके। उन्होंने कानपुर में नाना साहब को लिखा- ‘‘ऊँचे पर्वत पर होने के कारण किले पर कब्जा करना मेरे लिये बेहद मुश्किल है। हमारे सैनिक अभी बहुत शेखी बघार रहें हैं किन्तु कुछ दिनों बाद वो हताश हो जाएँगे। कृपया कुछ अफगानी सैनिक मेरे लिये भेज दीजिए ताकि हमें कुछ ताकत मिले।’’

किन्तु किस्मत तात्या के साथ नहीं थी। वह किला फतह नहीं कर सका। तब उसने चरखारी की जनता पर अपना गुस्सा उतारना शुरू किया। राजा जो अभी तक किले में कैद था, से क्रुद्ध होकर क्रान्तिकारियों ने राजमहल के कीमती सामान, यहाँ तक कि फर्नीचर और कालीन भी लूट लिये।

जगतराज के पश्चात विजयबहादुर सिंहासन पर बैठे। साहित्य प्रेमी विजय बहादुर ने विक्रमविरुदावली की रचना की, मौदहा का किला और राजकीय अतिथिगृह- ताल कोठी का निर्माण कराया। यह कोठी एक झील में बनी है। बहुमंजिली यह कोठी अपनी रचना में नेपाल के किसी राजमहल का आभास देती है। इसकी गणना बुन्देलखण्ड की सर्वाधिक खुबसूरत इमारतों में की जाती है। विजय सागर नामक तालाब पर बनी ताल कोठी सरोवर के चहुंदिश फैली प्राकृतिक सुषमा के कारण अधिक आकर्षक प्रतीत होती है। महाराज जयसिंह के काल में नौगाँव के सहायक पोलिटिकल एजेंट मि. थामसन को चरखारी का प्रबन्धक नियुक्त किया गया। इसकी सुन्दरता देखकर थामसन ने इसी तालकोठी को सन 1862 ई. से 1866 ई. तक अपना आवास बनाया था। विजयबहादुर के समय में रियासत को ब्रिटिश साम्राज्ञी की ओर से 1804 और 1811 में सनद मिली और उसके भौगोलिक क्षेत्र में वृद्धि की गई। विक्रमशाहि और विक्रमादित्य विजय बहादुर की उपाधियाँ हैं।

विजय बहादुर के सात पुत्र थे। उनमें एक थे पूरनमल। खाने-पीने और पहलवानी के बड़े शौकीन। सवा मन भोजन करते लेकिन जब सोकर उठते तो रसोइए से पूछते कि मैंने सोने से पहले खाना खाया था कि नहीं? लोग उन्हें चरखारी का महमूद बेगड़ा कहते हैं। पूरनमल की तलवार बत्तीस शेर की थी। इस तलवार से वो एक ही वार में चार पैर वाले पशु को काट देते थे। इसलिये उनकी तलवार का नाम पड़ा- चौरंग। एक बार बांदा के नवाब ने ऊँट काटने की शर्त लगाई किन्तु ऊँट के गले में धोखे से लोहे की जंजीर डाल दी। पूरनमल ने ऊँट का गला एक झटके में काट तो दिया लेकिन उनकी आँखों में खून उतर आया। इस घटना से महाराज विजयबहादुर इतने कुपित हुए कि उन्होंने बांदा के ऊपर आक्रमण कर दिया।

एक बार दंगल हो रहा था, जिसमें बतौर दर्शक राजा और प्रजा सब मौजूद थे। अचानक एक हाथी भड़क गया और उसने लोगों को कुचलना और पटकना शुरू कर दिया। पूरनमल ने उस हाथी के दाँत पकड़ लिये। हाथी के जोर से पूरनमल अखाड़े में धँस गए, लेकिन उन्होंने हाथी का दाँत नहीं छोड़ा। अन्त में हाथी के दाँत से खून निकल आया और वह चिंघाड़ मारता भाग गया।

पूरनमल 18 नारियल एक साथ अपने अंग-प्रत्यंगों में दबाकर फोड़ देते थे। चरखारी के उनके महल वासुदेव मन्दिर में उनकी आज भी सशरीर उपस्थिति मानी जाती है और उनके लिये बिस्तर लगाया जाता है। लोकगीतों में लिखा है कि पूरनमल अपनी चुटकियों से जब सिक्का मसलते थे तो सिक्के के अक्षर मिट जाते थे-

अंक रुपैयन के मल डारे औ फारी गयंदन की हाय
बत्तीस सेर का तेगा लेकर चौरंग काटी बादा जाय


किन्तु महाराज विजयबहादुर के जीवन काल में ही उनके सातों पुत्रों का निधन हो गया। पूरनमल की मौत पर उन्होंने जो दोहा लिखा, वह आज भी हृदय को वेध देता है-

नहिं सूर्य, शशि है नहीं, नहिं उड़गन को दोष
निशि पावक चलने परो, मग जुगनू को दोष


महाराज विजय बहादुर के पश्चात जय सिंह सिंहासन पर बैठे। उन्होंने 1857 के दिल्ली दरबार में भाग लिया। अपने जीवन के अन्तिम समय में उन्हें राज-काज से घृणा हो गई और उनका अधिकांश समय प्रवचन में बीतता था। एक दिन वृन्दावन के मन्दिर में उन्होंने धतूरा खाकर जान दे दी।

इसके पश्चात मलखान सिंह आये। मलखान सिंह एक श्रेष्ठ कवि थे। उन्होंने गीता का काव्यानुवाद किया। उनकी पत्नी रुपकुंवरि एक धार्मिक महिला थीं। रामेश्वरम से लेकर चरखारी तक उन्होंने रियासत के मन्दिर बनवाए जो आज भी चरखारी की गौरव गाथा कह रहे हैं। गीत मंजरी, विवाह गीत मंजरी और भजनावली उनकी प्रसिद्ध रचनाएँ हैं। उनके लिखे भजन बुन्देलखण्ड में आज भी महिलाओं द्वारा गाये जाते हैं।

चरखारी का ऐतिहासिक ड्योढ़ी दरवाजा इन्ही मलखान सिंह के कार्यकाल में बना जिसे महाराष्ट्र के अभियन्ता एकनाथ ने बनवाया। राजमहल और सदर बाजार उन्हीं की देन है। मलखान सिंह के एक हाथी से प्रसन्न होकर वायसराय ने उसे ‘इन्द्रगज’ की उपाधि दी थी।

किन्तु मलखान सिंह की सर्वाधिक प्रसिद्धि उनके द्वारा प्रारम्भ किये गए 1883 ई. में गोवर्धन जू के मेले को लेकर है। यह मेला उस क्षण की स्मृति है जब श्रीकृष्ण ने इन्द्र से कुपित होकर गोवर्धन पर्वत धारण किया था। दीपावली के दूसरे दिन अन्नकूट पूजा से प्रारम्भ होकर यह मेला एक महीना चलता है। यह बुन्देलखण्ड का सबसे बड़ा मेला है। पंचमी के दिन चरखारी के 108 मन्दिरों से देवताओं की प्रतिमाएँ गोवर्धन मेला स्थल लाई जाती हैं। इसी दिन सम्पूर्ण देव समाज ने प्रकट होकर श्रीकृष्ण से गोवर्धन पर्वत उतारने की विनती की थी। सप्तमी को इन्द्र की करबद्ध प्रतिमा गोवर्धन जू के मन्दिर में लाई जाती है। इस एक महीने में चरखारी वृन्दावन हो जाती है-

कार्तिक मास धरम का महीना, मेला लगत उते भारी
जहाँ भीड़ भई भारी, वृंदावन भई चरखारी


एक मास तक चलने वाले इस विशाल मेले में कवि सम्मेलन एवं मुशायरे का आयोजन होता है, जिसमें हिन्दुस्तान के नामचीन शोरा हजरात तशरीफ फरमा होते हैं। चरखारी के मशहूर शायद उजबक चरखारी की वजह से नामचीन शोरा मुफ्त में अपनी सेवाएँ इस मुशायरे को देते थे, किन्तु उजबक चरखारी के इन्तकाल के बाद इस राष्ट्रीय मुशायरे एवं कवि सम्मेलन पर जरूर ग्रहण लगा है। गोवर्धन नाथ जू की झाँकी में जहाँ मुसलमान अपना कंधा देते हैं, वहीं मोहर्रम की सातवी तारीख को घोड़े के जुलूस में हिन्दू भाई बढ़ चढ़ कर भाग लेते हैं। रामदत्त तिवारी ‘अजेय’ इस मेले के बारे में लिखते हैं-

बुन्देलखण्ड का है प्रसिद्ध पावन गोवर्धन मेला
प्रतिवर्ष यही कह जाता है मलखान सिंह नृप अलबेला


मलखान सिंह के पश्चात जुझार सिंह गद्दी पर बैठे। उन्होंने बुन्देलखण्ड के ऐतिहासिक और काव्य ग्रंथों का प्रकाशन करवाया। महाराज अरिमर्दन सिंह अपने नाट्य प्रेम के लिये जाने जाते हैं। कलकत्ता की कोरथियन कम्पनी के कलाकारों को वो चरखारी लाये। आगा हश्र कश्मीरी इसी नाटक कम्पनी से जुड़े थे। वो रोज एक नाटक लिखते और नाट्यशाला में इसका मंचन होता। इस नाट्यशाला में 4000 दर्शकों के बैठने की क्षमता थी। अब नगरपालिका द्वारा इसका उपयोग एक गोदाम के रूप में हो रहा है। अरिमर्दन सिंह ने नेपाल नरेश की पुत्री से विवाह किया और उनके लिये राव बाग महल का निर्माण कराया जिसमें चरखारी का राजपरिवार आज भी रहता है।

अरिमर्दन सिंह के पश्चात जयेन्द्र सिंह शासक हुए। ये चरखारी के अन्तिम शासक थे। इसके पश्चात रियासत का विलय भारत संघ में हुआ। पं. राम सहाय तिवारी ने स्टेट का चार्ज लिया। चन्दला, जुझार नगर, ईसानगर मप्र. में और शेष का विलय उप्र. में हुआ। चरखारी की वंश परम्परा इस दोहे से स्पष्ट है-

छत्रसाल, जगतेशुजू, कीरत, पृथ्वी, मान
विजयबहादुर, रतनसिंह, जयसिंह अरु मलखान


इस समय महाराज जयन्त सिंह और रानी उर्मिला सिंह रावबाग महल में रहते हैं। राजा छत्रसाल की वंश परम्परा चरखारी में इन्हीं से चिरागे-रोशन है। रानी उर्मिला सिंह सदरे रियासत कश्मीर कर्ण सिंह के खानदान से ताल्लुक रखतीं हैं और कश्मीर के पुंछ सेक्टर की रहने वाली हैं। कुछ दिनों तक वो चरखारी नगरपालिका की चेयरमैन भी रहीं। जब मैं राजमहल में गया तो उन्होंने पूरी शालीनता से मेरी मदद की। अपने पूर्वज राजाओं के चित्र दिये, 1857 में चरखारी रियासत को लार्ड कैनिंग ने जो सनद दी थी, उसका चित्र उपलब्ध कराया।

चरखारी अपनी साहित्यिक प्रतिभाओं के लिये भी जानी जाती है। हरिकेश जी महाराज जगतराज के राजकवि थे। जगतराज इनकी पालकी में कन्धा देते थे। इनकी लिखी पुस्तक ‘दिग्विजय’ बुन्देलों का जीवन्त इतिहास है। खुमान कवि तथा आगा हश्र कश्मीरी ने चरखारी में रहकर अपनी चमक बिखेरी। आगा हश्र कश्मीरी ने कुल 44 पुस्तकें लिखीं जिनमें 18 नाटक है। नाथूराम, ख्यालीराम तथा मिर्जा दाउद बेग- जिन्होंने कौटिल्य के अर्थशास्त्र का हिन्दी अनुवाद किया, सुप्रसिद्ध पखावज व मृदंग वादक कुंवर पृथ्वी सिंह दाउ, विख्यात कव्वाल फैज अहमद खां, संगीतज्ञ उम्मेद खां, सारंगी वादक स्वामी प्रसाद चरखारी की अन्यतम विभूतियाँ हैं।

चरखारी हिन्दी फिल्मों की मशहूर अदाकारा ट्रेजडी क्वीन मीना कुमारी के लिये भी जानी जाती है, जो आगा हश्र कश्मीरी के खानदान से ताल्लुक के कारण बचपन में कुछ वर्षों चरखारी में रहीं। चरखारी के वैभव एवं सौन्दर्य पर जो अन्धकार छाया है, वह मीना कुमारी के इस शेर से प्रतिबिम्बित होता है-

कई उलझे हुए खयालात का मजमा है मेरा ये वजूद
कभी वफा से शिकायत, कभी वफा मौजूद


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