बुंदेलखंड में यमुना व बेतवा का पानी हुआ प्रदूषित

Submitted by admin on Mon, 06/30/2014 - 11:57
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जनसत्ता, 29 जून 2014
बेतवा के एक दर्जन से अधिक स्थानों पर पानी की सैम्पलिंग की गई थी। सभी नमूनों में पानी प्रदूषित पाया गया। यहां फैक्ट्रियों का दूषित पानी नहीं मिलता, लेकिन अत्यधिक खनन के कारण इस नदी का पानी प्रदूषित हो रहा है। उन्होंने बताया कि कई जगह बेतवा में मछलियां व अन्य जंतु मरे मिल। यहां के पानी में डाईल्यूड ऑक्सीजन बेहद कम हो गया, जिसके चलते जंतु मरने लगे हैं।बुंदेलखंड की सबसे बड़ी नदी बेतवा में अत्यधिक खनन के कारण इसका पानी पीने योग्य नहीं बचा। इसी प्रकार आरटीआइ से मांगी सूचना के अनुसार यमुना में 68 फैक्टरियों का दूषित पानी जाने से इसका भी जल प्रदूषित हो गया। उद्योग बंधुओं की बैठक में जिलाधिकारी ने उद्योगपतियों को चेतावनी भी दी कि फैक्टरियों का दूषित पानी यमुना में न जाने पाए।

पर्यावरण विभाग की सहायक वैज्ञानिक अधिकारी डॉ. माधवी कमलहसन ने बताया कि सीटू के जिला संयोजक कमलाकांत वर्मा ने सूचना के अधिकार के तहत एक सूचना मांगी थी जिसके जवाब में यह पाया गया कि यमुना में 68 फैक्टरियों का दूषित पानी नालों से यमुना में जा रहा है। यह पानी बेहद जहरीला होता है। जिसमें यमुना का पानी स्वच्छता में पांच से छह डाईल्यूड ऑक्सीजन पाया गया।

यदि पानी में बीओडी (बायो ऑक्सीजन डायल्यूड) चार से कम होता है तो पानी में रहने वाले जंतु मरने लगते हैं। अप्रैल में बीओडी 43 था। जबकि मई 45 रहा। डॉ. माधवी के अनुसार कम से कम पानी से बीओडी 5 से 7 होनी चाहिए जितना बीओडी ज्यादा रहेगा पानी उतना डाईल्यूड ऑक्सीजन बढ़ेगा।

उन्होंने बताया कि बीओडी बढ़ने से डाईल्यूड ऑक्सीजन भी बढ़ता है जिसमें पानी में रहने वाले जंतु मरते नहीं है और पानी में स्वच्छता बढ़ती है। इसी प्रकार बेतवा के बारे मे उन्होंने बताया कि आंकड़े नही हैं लेकिन बेतवा के एक दर्जन से अधिक स्थानों पर पानी की सैम्पलिंग की गई थी।

सभी नमूनों में पानी प्रदूषित पाया गया। यहां फैक्ट्रियों का दूषित पानी नहीं मिलता, लेकिन अत्यधिक खनन के कारण इस नदी का पानी प्रदूषित हो रहा है। उन्होंने बताया कि कई जगह बेतवा में मछलियां व अन्य जंतु मरे मिल।

यहां के पानी में डाईल्यूड ऑक्सीजन बेहद कम हो गया, जिसके चलते जंतु मरने लगे हैं। उन्होंने बताया कि जिला शासन को दोनों के अस्तित्व बचाने के लिए हमने रिपोर्ट दे दी है। कई बार बैठकों में कहा गया कि कालपी के कागज उद्योग लगाने वालों को चेतावनी दी लेकिन इसके बावजूद वह मानने को तैयार नहीं।

उन्होंने बताया कि बेतवा में खनन सरकारी मानकों के अनुसार होने से पर्यावरण को खतरा नहीं, लेकिन एक दर्जन से अधिक मौरंग के खंडों पर मानक से गहरी खुदाई करने से पानी की स्वच्छता कम हो गई है। उन्होंने कहा कि एनओसी के उद्योग नहीं लगना चाहिए। वहीं दूसरी ओर समाजसेवी केपी सिंह का मानना है कि बेतवा में प्रत्येक मौरंग खंड में पर्यावरण विभाग की एनओसी अनिवार्य है।

इसके बावजूद मानकों अनदेखी हो रही है। पर्यावरण विभाग क्यों एनओसी रद्द नहीं करता और न ही उन स्थानों पर जाकर यह देखता है कि पर्यावरण विभाग को एनओसी देखते समय जो शर्तें ठेकेदार को दी गई थी, उनका पालन किया जा रहा या नहीं?

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