भारतीय परम्पराओं में जल संरक्षण

Submitted by editorial on Tue, 08/28/2018 - 15:18
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विज्ञान प्रगति, अगस्त, 2018
परम्परागत जोहड़परम्परागत जोहड़ (फोटो साभार - ईको टिपींग प्वॉइंट)पानी को सहेजने का भाव हमारे देश की परम्पराओं में अन्तनिर्हित है इसलिये वर्तमान में जल संकट से निपटने के लिये अक्सर उन्हीं परम्परागत जल संरक्षण पद्धतियों को अपनाने की दुहाई दी जाती है। मगर वास्तविकता में इन्हें अपनाना तो दूर जल संचय के लिये हम अपने व्यवहार में मामूली बदलाव तक नहीं लाते।

अथर्ववेद में यह उल्लेख है ‘अश्विनी के देवदूतों ने इस दुनिया के सृजन के समय जलीय, स्थलीय, वायवीय और दूसरे अनेक प्रकार के जीवों का निर्माण किया तथा आइए उन सभी जीवों को पृथ्वी पर उपलब्ध पानी से जुड़ी सन्तुष्टि व वरदान प्रदान करें।’ नदियाँ पुराने समय से पानी की स्रोत रही हैं और मानव सभ्यता का विकास इनके आगोश में हुआ है।

गंगे च यमुने चैव गोदावरी सरस्वती।
नर्मदे सिन्धु कावेरी जलेટस्मिन सन्निधिं कुरु।।


भारतीय वाङ्मय के इस प्रेरक श्लोक में भारत की नदियों और पानी के महत्त्व को उकेरा गया है। इसमें कहा गया है कि गंगा, यमुना, सरस्वती, नर्मदा, सिंधु ये सब भारत की नदियाँ तभी तक पवित्र और जीवनदायिनी हैं, जब तक इनमें पानी मौजूद है। पृथ्वी पर वायुमंडल (अॉक्सीजन), सूर्य का प्रकाश और पानी वरदान स्वरूप ही तो हैं जिनकी उपस्थिति से ब्रह्मांड के इस ग्रह पर जीवन का प्रादुर्भाव हो पाया।

हम सभी इस बात से बखूबी परिचित हैं कि पृथ्वी ग्रह और इस पर जीवन के लिये पानी बेहद जरूरी है मगर हममें से बहुत लोगों को लगता है कि पानी का भण्डार असीमित है। जबकि सच्चाई यह है कि स्वच्छ पानी के स्रोत सीमित हैं और वे भी बहुत तेजी से सिकुड़ रहे हैं। भारत जैसे देश में जहाँ जैवविविधता और प्राकृतिक संसाधनों की वैसे तो भरमार है लेकिन बढ़ती आबादी, वनों के विनाश, पर्यावरण प्रदूषण, ग्लोबल वार्मिंग जैसे संकटों के कारण यहाँ प्राकृतिक सन्तुलन पटरी से उतरता जा रहा है। जीवाश्म ईंधन, ग्रीनहाउस गैस और कार्बन उत्सर्जन मिलकर जहाँ एक तरफ जलस्रोतों को सूखा रहे हैं तो दूसरी ओर शहरीकरण और जल प्रदूषण के चलते भू-सतह तथा भूजल की मात्रा और गुणवत्ता दोनों पर बुरा असर हो रहा है। अगर देश की कृषि पर नजर डालें तो यह आज भी प्राथमिक तौर पर बारिश के पानी पर निर्भर है। लेकिन खराब मानसून से पैदावार बिगड़ती है जिसका सीधा प्रभाव राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था पर होता है। इसलिये पानी के संकट को दूर करने के लिये जल संरक्षण की तमाम युक्तियाँ, परम्पराएँ, तकनीक और रणनीतियाँ मानव सभ्यता के आदि काल से आधुनिक युग तक प्रयोग में लाई जाती रही हैं।

कुंडकुंड (फोटो साभार - हॉलीडीफाई) हमारी परम्पराओं में निहित जल संचय की भावना

पानी न केवल एक बहुमूल्य प्राकृतिक संसाधन है, बल्कि यह जीवन का प्रतीक है। हम मनुष्यों, पशु-पक्षियों और पेड़-पौधों के जीवन का आधार है। धरती पर पहले जीव की उत्पत्ति करोड़ों साल पहले पानी में ही हुई थी। मानव सभ्यता और कृषि का विकास नदियों और जलस्रोतों के पास ही हुआ है। सिंधु घाटी सभ्यता का विकास सिंधु नदी, मिस्र की सभ्यता नील नदी, चीन की सभ्यता येलो और यांगत्जे नदियों के पास हुआ है। सिंधु घाटी सभ्यता के नगरों के उत्खनन से उस जमाने में वाटर हार्वेस्टिंग और ड्रेनेज की उत्कृष्ट तकनीक मौजूद होने के प्रमाण मिलते हैं। दो जलधाराओं के मध्य स्थित ढलान पर बसे धौलावीरा की बस्ती जल अभियांत्रिकी का एक नायाब उदाहरण ही तो है। और-तो-और चाणक्य रचित अर्थशास्त्र में वाटर हार्वेस्टिंग तकनीक द्वारा सिंचाई का उल्लेख मिलता है। चोल वंश के राजा करिकला ने सिंचाई के मकसद से एक बाँध बनाकर कावेरी नदी का प्रवाह मोड़ दिया था। यह बाँध आज भी क्रियाशील है। भोपाल के राजा भोज ने देश की सबसे बड़ी कृत्रिम झील भोपाल में बनाई थी जो आज भी शहरवासियों के लिये आकर्षण का एक महत्त्वपूर्ण केन्द्र है।

भारतीय सभ्यता और संस्कृति में जल को जीवन से जोड़कर देखा गया है। इसलिये इस प्राकृतिक संसाधन को सम्मान देने की हमारी संस्कृति रही है। रामायण, महाभारत, पुराण, वृहत संहिता जैसे प्राचीन भारतीय साहित्य में जलचक्र की प्रक्रियाओं और परम्परागत जल संचय के तरीकों के बारे में उल्लेख मिलता है। महान कवि रहीम ने ‘बिन पानी सब सून’ जैसी अनमोल पंक्ति रचकर पूरी दुनिया को पानी की अहमियत का सन्देश दिया है।

वैसे तो हमारी पृथ्वी पर करीब 70 प्रतिशत पानी मौजूद है मगर यह अनोखी बात है कि इतनी बड़ी जल राशि का 1 प्रतिशत से भी कम हिस्सा मानव उपयोग के लिये उपलब्ध होता है। सीधे तौर पर समुद्र के पानी का इस्तेमाल हम पीने के लिये नहीं कर सकते। दरअसल पानी का एक प्राकृतिक चक्र होता है। बारिश का पानी जलाशयों से होता हुआ भूमि के अन्दर पहुँचता है। हम अपने दैनिक जीवन में पानी से जुड़ी जरूरतों को पूरा करने के लिये भूजल पर निर्भर होते हैं।

दुर्भाग्य से पिछले 20 वर्षों में हमने इस भूजल का इस कदर दोहन किया है कि आज देश के लगभग हर हिस्से में भूजल का स्तर बहुत नीचे लुढ़क गया है।

कुईंंकुईंं (फोटो साभार - विकल्प संगम)आज विश्व की करीब एक चौथाई आबादी को स्वच्छ पेयजल नहीं मिल रहा है। अगर भारत की बात करें तो देश के अधिकतर हिस्सों में जल संकट गहराता जा रहा है। जहाँ एक तरफ देश की आबादी बढ़ती जा रही है, वहीं लोगों की पानी से जुड़ी जरूरतें भी लगातार बढ़ रही हैं। लेकिन दूसरी ओर जलस्रोत तेजी से सिकुड़ते जा रहे हैं।

21वीं सदी में पानी सबसे बड़ा मुद्दा बन चुका है। संयुक्त राष्ट्र संघ, विश्व बैंक और विश्व मुद्रा कोष के अध्ययन बताते हैं कि दुनिया के एक चौथाई से भी अधिक हिस्से में आज पानी नहीं है। तो वहीं दुनिया के करीब 40 देशों में घोर जल संकट है।

एक अनुमान के अनुसार पानी की माँग हर 20 साल में दोगुनी हो जाती है और वहीं इसकी उपलब्धता एक चौथाई घट जाती है। पहली अहम बात तो यह है कि हमारी धरती पर पानी बहुत कम बचा है और जो बचा है उसमें गम्भीर प्रदूषण है। दूसरी चुनौती भूजल से जुड़ी हुई है। धरती के नीचे का पानी धीरे-धीरे और नीचे खिसकता जा रहा है।

गुजरात, मध्य प्रदेश और राजस्थान के 100 से अधिक जिलों में भूजल पचास मीटर तक नीचे जा चुका है। सौराष्ट्र में करीब 1800 फीट की गहराई पर पानी मौजूद है। हमारे समाज में इस भूजल की अहम भूमिका है। भारत जैसे कृषि प्रधान देश में करीब 70 प्रतिशत खेतों की सिंचाई भूजल से होती है। वहीं दूसरी ओर घरेलू काम-काज में होने वाली पानी की खपत का 80 प्रतिशत हिस्सा इसी भूजल से प्राप्त होता है।

जहाँ एक तरफ भूजल का अनियंत्रित दोहन हो रहा है तो दूसरी ओर पेड़-पौधों और पर्यावरण को भी नुकसान पहुँचाया जा रहा है। नतीजे के तौर पर बारिश में भी कमी आई है। बरसात के पानी से भूजल प्राकृतिक रूप से रिचार्ज होता है। मगर पर्यावरण की हानि से मानसून और बारिश का लय बुरी तरह बिगड़ गया है जिस कारण भूजल की आवश्यक भरपाई नहीं हो पा रही है।

थार रेगिस्तान और पश्चिमी भारत की परम्परागत जल संरक्षण तकनीक

अतीत की बात करें तो प्राचीन भारत में बाढ़ और सूखे की घटनाएँ अक्सर होती थीं। हिस्सा रेगिस्तान है, वहाँ पानी के संरक्षण की परम्परा रही है। चित्तौड़ और रणथम्बोर के किलों के निर्माण में इस बात का ध्यान रखा गया और ऐसी जलागम तकनीक विकसित की गई कि पहाड़ियों पर भी पानी की उपलब्धता बनी रहे।

जोहड़

राजस्थान में ही पानी सहेजने की एक और तकनीक पाई जाती थी जिसका नाम है जोहड़। ये साधारण पत्थर और मिट्टी के अवरोध होते थे। जिनका निर्माण ढलान वाली भूमि पर वर्षाजल को रोकने के उद्देश्य से किया जाता था। जोहड़ के तीन ओर पुश्ते बनाए जाते जबकि चौथा सिरा वर्षाजल के प्रवेश के लिये खुला छोड़ा जाता था। राजस्थान जल संचय की इस पम्परागत तकनीक को वर्तमान में कुछ गैर सरकारी संगठनों ने पुनर्स्थापित किया है और इसकी सहायता से आज राज्य के 700 से अधिक गाँवों की पानी की जरूरत पूरी की जा रही है।

खडीनखडीन (फोटो साभार - इण्डिया रेनवाटर)इन जोहड़ के द्वारा वर्षाजल भूमि को रिचार्ज करता है और वहाँ की भूजल सन्तुलन स्थिर बना रहता है। राजस्थान के अलवर जिले में 6500 वर्ग किलोमीटर के इलाके में जलपुरुष राजेन्द्र सिंह के नेतृत्व में कुल 8600 जोहड़ बनाए गए हैं। इस प्रयोग ने आधुनिक युग में जल संचय का एक द्वार खोल दिया है। जोहड़ के कारण अलवर में भूजल स्तर 100-200 मीटर से उठकर 3 से 13 मीटर तक पहुँच गया है। जोहड़ की सबसे बड़ी उपलब्धि है अलवर से होकर बहने वाली दो नदियों अरवरी और रूपारेल को मिला पुनर्जीवन। इन दोनों नदियों को 1990 के दौरान जोहड़ निर्माण कर जीवनदान दिया गया और आज ये अलवर और आस-पास के सैकड़ों गाँवों के जल संकट को दूर कर रहे हैं। साथ ही इनसे सिंचाई के लिये पूरे वर्ष पानी उपलब्ध रहता है।

कुंड और कुईं

राजस्थान के पश्चिमी शुष्क क्षेत्र में सीमेंट या स्थानीय सामग्रियों से कुंड बनाया जाता है। इन इलाकों में अधिकतर भूजल की उपलब्धता सीमित और पानी क्षारीय होता है। कुंड तश्तरी जैसी रचना होती है जिसके केन्द्र में कुआँ होता है। बाल्टी की मदद से इसमें से पानी बाहर निकालते हैं। कुंड का व्यास और गहराई उसके उपयोग पर निर्भर करती है। ज्यादातर कुंड किसी एक परिवार द्वारा निजी उपयोग के लिये बनाया जाता है। एक अनुमान के अनुसार जिस कुंड का तटबन्ध क्षेत्रफल 100 वर्ग मीटर है और उस इलाके में यदि 100 मिलीमीटर वार्षिक वर्षा होती है तो उस कुंड में 10 हजार लीटर पानी आसानी से इकट्ठा हो जाता है।

कुंड के अलावा पश्चिमी राजस्थान में कुईं नामक एक परम्परागत पानी संचायक प्रणाली है जो 10 से 12 मीटर गहरा गड्ढा होता है। इसका निर्माण किसी टंकी या हौज के समीप उससे रिसने वाले पानी को इकट्ठा करने के लिये किया जाता है। यह राजस्थान की जल परम्परा है कि पानी बहुमूल्य है और इसके एक बूँद को भी बर्बाद नहीं होने देना है। बहुत कम बारिश वाले राजस्थान के क्षेत्रों में वर्षा के पानी को संचय करने के उद्देश्य से भी कुईं का निर्माण किया जाता है। कुईं का मुँह सामान्यतः बहुत संकरा बनाया जाता है ताकि संचित पानी का वाष्पीकरण कम हो। कुईं के भीतरी हिस्से में धीरे-धीरे पानी अवशोषित होकर व्यापक क्षेत्र को नमी प्रदान करता है। कई बार गाँव के लोग कुईं के मुँह को लकड़ी से ढँककर रखते हैं और पानी की कमी की दशा में इसमें संचित पानी को अन्तिम विकल्प के तौर पर इस्तेमाल करते हैं।

खडीन और टाँका

राजस्थान के जैसलमेर जिले में खडीन नामक जल संरक्षण प्रणाली को सदियों से अपनाया जा रहा है। इसका आरम्भ पन्द्रवी सदी में जैसलमेर के पालीवाल ब्राह्मण समुदाय ने किया था। स्थानीय राजा ने यहाँ की भूमि पालीवाल समुदाय को देते हुए इसमें खडीन विकसित करने को कहा था। राजस्थान के जोधपुर, बीकानेर और बाड़मेर जिलों में भी खडीन पाये जाते हैं। खडीन जल संरक्षण तकनीक में पथरीले तटबंध से वर्षाजल बहता हुआ समीपस्थ घाटी में पहुँचता है और वहाँ की भूमि को नमी और मिट्टी को उर्वरता प्रदान करता है। खडीन तकनीक ईसा पूर्व साढ़े चार हजार साल पहले इराक में अपनाई जाने वाली सिंचाई विधि से मेल खाती है।

जल संरक्षण हेतु छोटी भूमिगत टंकी टांकाजल संरक्षण हेतु छोटी भूमिगत टंकी टांका (फोटो साभार - विकिपीडिया)राजस्थान के बीकानेर, पोखरण और जैसलमेर जिलों में घर और आँगन में जल संरक्षण के उद्देश्य से छोटी भूमिगत टंकियों के निर्माण की परम्परा बरसों से पाई जाती है। इस संरचना को ‘टाँका’ कहते हैं। ये टाँके गोलाकार और चौकोर होते हैं जिनमें वर्षाजल को एकत्र किया जाता है। इस पानी को केवल पीने के काम लाया में जाता है। टाँका के अलावा आजकल सीमेंट की बनी चौकोर भूमिगत टंकियाँ भी इन इलाकों के घरों में बनाई जाती हैं।

बावड़ी

बावड़ी पुराने समय में निर्मित कुएँ या तालाब हैं जिन तक पहुँचने के लिये कई मंजिल सीढ़ियाँ नीचे उतरना होता है। पानी भी इन्हीं सीढ़ियों से होते हुए नीचे स्थित कुएँ या तालाब में इकट्ठा होता है। ये बावड़ी ऊपर से ढँके हुए होते हैं और इन्हें वास्तुकला की दृष्टि से बहुत आकर्षक बनाया गया था।

वास्तुकला की दृष्टि से आकर्षक संरचना बावड़ीवास्तुकला की दृष्टि से आकर्षक संरचना बावड़ीपश्चिमी भारत में अधिकतर गुजरात और राजस्थान में इनका निर्माण सूखे के दौरान पानी की आपूर्ति के उद्देश्य से किया गया था। शीतलता के प्रतीक ये बावड़ी प्राचीन काल में सामाजिक और धार्मिक समारोह स्थल भी हुआ करते थे। बावड़ी का एक स्थानीय नाम ‘झालरा’ भी है। जोधपुर में आठ झालरा हैं जिनमें से सबसे पुराना महामन्दिर झालरा है जिसका निर्माण 1660 में किया गया था।

हिमालय और देश के दूसरे हिस्सों की परम्परागत जल संरक्षण तकनीक बाँस और अपातानी

पूर्वी हिमालय क्षेत्रों में बाँस पाइप की सहायता से सिंचाई की जाती है। पहाड़ी चोटियों से निकलने वाले झरनों की जलधारा में बाँस के पाइप लगाकर इन्हें निचले इलाकों में भेजा जाता है। इस परम्परागत तकनीक के स्थान पर आजकल लोहे के पाइप इस्तेमाल में लाये जाने लगे हैं। पूर्वी हिमालय की पहाड़ियों से निकलने वाले जलस्रोतों की अनेक जलधाराओं के बीच अस्थायी दीवार बनाकर पानी की दिशा घाटियों में मोड़ दी जाती है। इस तकनीक को ‘अपातानी’ कहते हैं। इसे अरुणाचल प्रदेश के सुबनसिरी जिले के अपातानी जनजाति द्वारा अपनाया जाता है इसलिये इसे यह नाम दिया गया है।

कूह्ल

कूह्लकूह्ल (फोटो साभार - निवेदिता खांडेकर) समस्त पश्चिमी हिमालय के ऊँचाई वाले क्षेत्र में कूह्ल तकनीक से पहाड़ों की ढलान से बहते पानी को संचित किया जाता है।

कूह्ल का निर्माण करते समय झरने के बीच एक कट लगाया जाता है और वहाँ से पत्थर के ढेर से बंध लगा दिये जाते हैं। ये कूह्ल फिर कई किलोमीटर तक पसरते हुए भूमि और वनस्पतियों को नमी प्रदान करते हैं।

जाबो, डोंग, तालाब और कुएँ

नागालैंड की परम्परागत जल संरक्षण तकनीक जाबोनागालैंड की परम्परागत जल संरक्षण तकनीक जाबोजाबो नामक जल संरक्षण की परम्परागत तकनीक का प्रयोग उत्तरपूर्वी भारत के नागालैंड राज्य में किया जाता है। यह ‘रूजा प्रणाली’ के नाम से भी जाना जाता है। इसमें न केवल जल संरक्षण होता है बल्कि यह तकनीक वानिकी, कृषि, पशुपालन और पर्यावरण सुरक्षा के लिये भी बेहद उपयोगी होती है। नागालैंड में भारी बारिश होने के बावजूद पानी की कमी एक बड़ी समस्या है। इस समस्या का एक बेहतर विकल्प यानी कि जाबो यहाँ की परम्परागत जल संरक्षण तकनीक है। इसमें ऊँची पहाड़ियों पर बारिश का पानी बहकर ढलान के साथ वाली भूमि को नमी पहुँचाने का काम करता है। यह पानी ढलान से उतरकर अन्त में तालाब जैसी संरचना में एकत्र होता है जिसका उपयोग चावल की खेती और पशुपालन के लिये किया जाता है।

असम की बोडो जनजाति सिंचाई के लिये डोंग जैसे तालाबों में पानी का संरक्षण करती है। इनमें से पानी को लहोनी नामक यंत्र से उठाकर खेतों में भेजा जाता है। देश के मैदानी इलाकों में तालाब पानी संचय के महत्त्वपूर्ण प्रहरी होते हैं जो बारिश के पानी को धरती के गर्भ में रोकने का महत्त्वपूर्ण काम करते हैं। दुर्भाग्यवश, विकास की दौड़ में हमने भारत के ग्रामीण से लेकर शहरी इलाकों तक इन तालाबों के अस्तित्व को लगभग समाप्त कर दिया। अगर दिल्ली की ही बात करें तो यहाँ पर एक जमाने में सैकड़ों तालाब, कुएँ और बावड़ी पाये जाते थे। लेकिन आज एक-एक करके ये सभी जलाशय सूख गए या विकास के नाम पर उन्हें पाट दिया गया।

दिल्ली के वजीराबाद में यमुना बायोडायवर्सिटी पार्क में कृत्रिम तालाब विकसित किया गया है जो पर्यावरण संरक्षण का एक नायाब उदाहरण बना हुआ है।

तालाब की एक अहम विशेषता है कि इसका पूरा या कुछ हिस्सा पूरे साल पानी से भरा रहता है। ये बारिश के पानी को सोखने का काम करते हैं और आस-पास की भूमि में पानी की कमी नहीं होने देते। इसकी वजह से उन इलाकों का भूजल स्तर स्थिर बना रहता है। तालाब की एक और विशेषता है कि वे वायुमंडल में मौजूद कार्बन डाइअॉक्साइड और दूसरी हानिकारक ग्रीन हाउस गैसों को सोख लेते हैं। इस तरह ये वायु प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन में कमी लाकर हमारी सहायता करते हैं।

बाँस पद्धति सिंचाईबाँस पद्धति सिंचाईकुआँ भी भारत में जल संरक्षण का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। आज से लगभग 50 साल पहले यह देश के अधिकांश गाँव में पाया जाता था। आज भी गाहे बगाहे किसी गाँव से गुजरते हुए इन्हें देखा जा सकता है। उत्तरी कर्नाटक के रावुर नामक गाँव प्रत्येक घर में आज भी एक कुआँ मौजूद है। घरवालों के द्वारा इनकी अच्छी तरह देखभाल की जाती है और इसका पानी पीने के काम में लाया जाता है। ये कुएँ भूजल स्तर को स्थिर रखने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। मगर विगत कुछ दशकों के दौरान बोरवेल तकनीक के व्यापक प्रयोग के चलते इन कुओं का महत्त्व क्षीण हो गया है।

पानी से हमारी बेरुखी ठीक नहीं

हमारी परम्पराओं, उत्सव और मान्यताओं का रिश्ता मौसम और पानी से जुड़े होने के कारण पानी के संरक्षण को लेकर हम चिन्ता करते थे। आज परिवेश बदल गया और हमने अपनी सोच भी बदल डाली। हमने पानी का सम्मान करना छोड़ दिया जिसका खामियाजा भी हम भुगत रहे हैं। विकास के नाम पर उद्योग और शहरीकरण के दबाव में तालाबों और जलाशयों को पाट दिया गया। इस कारण पानी की किल्लत झेलने को हम विवश हैं।

हमारे आज और आने वाले कल के लिये पानी को सहेजना जरूरी है। पानी का हमें समझदारी से प्रबन्धन और इस्तेमाल करना होगा। कृषि क्षेत्र में पानी का उचित प्रयोग जरूरी है। मगर दुरुपयोग सरासर गलत। वैज्ञानिकों से उम्मीद है कि वे शोध द्वारा कम पानी में वृद्धि करने वाली और पर्याप्त पैदावार देने वाली फसलों को तैयार करेंगे।

जल संरक्षण की वैज्ञानिक व्यवस्था हमारे प्राचीन काल के समाज में भी रही है। भारत में जल प्रबन्धन का इतिहास बहुत पुराना है। बढ़ती आबादी और इससे जुड़ी जरूरतों की पूर्ति के लिये हमने पानी का दोहन तथा बेपरवाह इस्तेमाल किया है। पृथ्वी के पर्यावरण और सुखद भविष्य के हित में हमें अनिवार्य रूप से पानी को सहेजना होगा।

भारत में जल संरक्षण और प्रबन्धन के लिये प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में सदियों पुराने परम्परागत ज्ञान पर निर्भर होना पड़ता है। यह ज्ञान हमें पर्यावरण और जीवन के मूल्यों से जोड़ता है। पानी से सम्बद्ध हमारा परम्परागत ज्ञान समाज में सभी के लिये पानी की पर्याप्त मात्रा में उपलब्धता को सुनिश्चित करता था। पानी के संरक्षण का यह ज्ञान प्राचीन भारतीय समाज के सभी स्तरों पर विकास और समृद्धि का आधार बना।

आज पर्यावरण की सुरक्षा के लिये, हमें पानी के संरक्षण से जुड़ी प्राचीन परम्पराओं और तकनीक को आधुनिक समाज में अपनाना होगा, तब जाकर वर्तमान समय की पानी से जुड़ी समस्याओं से छुटकारा पाया जा सकता है। इसकी पहली सीढ़ी है कि हम सब मिलकर समाज सुधार के लिये पानी बचाएँ और उसका आदर करें। बच्चों में भी इस भावना का विकास करें जिससे वे पानी का महत्त्व आत्मसात कर सकें और उनके साथ भविष्य का पर्यावरण सुरक्षित रहे।

जरूरत भर पानी करें खर्च

पानी को सहेजने के लिये केवल हमें अपनी सोच में बदलाव लाना होगा। लोगों में पानी के महत्त्व से जुड़ी हुई जागरुकता लाकर यह काम पूरा किया जा सकता है। अपने रोजमर्रा के जीवन में छोटे-छोटे आसान कदम उठाकर हम बड़े बदलाव ला सकते हैं। हमें पानी की जितनी जरूरत हो, उतना ही पानी इस्तेमाल करें, घर हो या बाहर कहीं भी नल खुला न छोड़ें। कोई ऐसा करे तो उसे वहीं पर टोकें। स्कूटर-कार की धुलाई में कम-से-कम पानी खर्च करें। और इसके लिये साफ पानी के बजाय इस्तेमाल हुए पानी का प्रयोग करें तो बेहतर होगा। नहाने के लिये उपकरणों के स्थान पर बाल्टी का इस्तेमाल करना कुछ ऐसे उपाय हैं जिन्हें हम अपने जीवन में अपनाकर हर दिन पानी की बचत कर सकते हैं। सोचिए, अगर हम हर दिन थोड़ा ध्यान देकर अगर 5 लीटर पानी की बचत करें तो इस पूरे साल हम 1825 लीटर पानी बचा सकते हैं।

उद्योगों में पानी का जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल रोकना होगा। यहाँ पानी को एक से अधिक बार प्रयोग यानी रिसाइक्लिंग करने वाली टेक्नोलॉजी का सहारा लेना जरूरी कदम है। शहरों में पानी के परिवहन और वितरण के दौरान भी बड़ी मात्रा में पानी रिसकर बर्बाद हो जाता है। इस ओर गम्भीरता से ध्यान दिये जाने की जरूरत है। वहीं दूसरी ओर राष्ट्रहित में औद्योगिक और व्यावसायिक क्षेत्रों के साथ-साथ घरों में भी पानी की बर्बादी पर अंकुश लगाना हमारा परम कर्तव्य बनता है। सरकार के साथ-साथ सभी नागरिकों का भी दायित्व है कि हम मिलकर पानी की हिफाजत करें। इसी तरह अगर देश के सभी नागरिक पानी बचाएँ तो कितना बड़ा परिवर्तन आ सकता है। आइए, पानी का संरक्षण करके और पर्यावरण को सुन्दर बनाकर हम अपनी धरती का शृंगार करें।

जल संरक्षण के भारतीय मसीहा

अनुपम मिश्र

अनुपम मिश्रअनुपम मिश्र1948 में जन्मे पर्यावरणविद, लेखक, पत्रकार और भारत में जल संरक्षण के आधुनिक पुरोधा श्री अनुपम मिश्र वैसे तो आज हमारे बीच नहीं हैं (निधन 19 दिसम्बर, 2016) लेकिन पानी और तालाब को सहेजने की उनकी पुकार आज भी भारतीय जनमानस में गूँज रही है। उनकी कालजयी पुस्तकें, ‘आज भी खरे हैं तालाब’ और ‘राजस्थान की रजत बूँदें’ पीढ़ियों तक लोगों को पर्यावरण सुरक्षा की प्रेरणा देती रहेंगी। गाँधीवादी अनुपम जी गाँधी शान्ति प्रतिष्ठान, नई दिल्ली से जुड़े रहे और जीवन पर्यन्त जल संरक्षण, जल प्रबन्धन और परम्परागत रेनवाटर हार्वेस्टिंग तकनीकों का सन्देश समाज में फैलाते रहे। अपने सम्पूर्ण जीवन काल में वे भारत के गाँवों में जाकर जल संरक्षण से जुड़े परम्परागत ज्ञान और तकनीकों का महत्त्व लोगों को समझाते रहे। प्रख्यात पर्यावरणविद चंडी प्रसाद भट्ट के साथ भी अनुपम जी ने काम किया था और उत्तराखण्ड की महिलाओं द्वारा पेड़ों की सुरक्षा के लिये चलाए गए चिपको आन्दोलन पर अनुपम जी ने सत्येन्द्र त्रिपाठी के साथ मिलकर एक महत्त्वपूर्ण पुस्तक (चिपको मूवमेंट - उत्तराखण्ड विमेन्स विड टू सेव फारेस्ट वेल्थ) भी लिखी, जो वर्ष 1978 में प्रकाशित हुई थी। भारत सरकार के पर्यावरण और वन मंत्रालय ने उन्हें वर्ष 1996 में महत्त्वपूर्ण इंदिरा गाँधी पर्यावरण पुरस्कार से सम्मानित किया था।

राजेन्द्र सिंह

राजेन्द सिंहराजेन्द सिंह (फोटो साभार - विकिपीडिया)जलपुरुष के नाम से प्रसिद्ध राजेन्द्र सिंह (जन्म 6 अगस्त, 1959) के जीवन का उद्देश्य जल संरक्षण और पर्यावरण सुरक्षा से जुड़े काम करना है। इन उद्देश्यों को अंजाम देने के लिये उन्होंने 1975 में एक संस्था तरुण भारत संघ स्थापित की। इस संस्था के जरिए उन्होंने सुस्त नौकरशाही और खनन लॉबी से संघर्ष करके अलवर जिले में पानी को सहेजने के लिये जोहड़ तकनीक को बढ़ावा दिया। इसके फलस्वरूप आस-पास के लगभग एक हजार गाँवों तक पानी पहुँच सका और राजस्थान की पाँच नदियों (अरवरी, रूपारेल, सारसा, भागनी और जहाजवाली) को नया जीवन मिला। जल संरक्षण और जल प्रबन्धन में उनके अहम योगदान के लिये वर्ष 2001 में राजेन्द्र सिंह को रेमन मैग्सेसे अवार्ड से सम्मानित किया जा चुका है। इसके अलावा, वर्ष 2015 में उन्हें स्टाकहोम वाटर प्राइज से विभूषित किया गया। इस पुरस्कार को ‘जल संरक्षण के लिये नोबेल पुरस्कार’ का दर्जा प्राप्त है। राजेन्द्र सिंह आज भी जल संरक्षण के अपने अभियान में सक्रिय हैं।

डॉ. मनीष मोहन गोरे
विज्ञान प्रसार
विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग, भारत सरकार
ए-50, इंस्टीट्यूशनल एरिया, सेक्टर 62 नोएडा 201309 (उ.प्र.)
ई- मेलः mmgore@vigyanprasar.gov.in.


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