भारतीय रेल का पानी अब ‘प्रभू’ भरोसे

Submitted by RuralWater on Tue, 11/17/2015 - 08:38

. आरके एसोसिएट्स और वृंदावन फुड प्रोडक्ट के नाम सम्भव है कि आपने नहीं सुना होगा लेकिन इसके मालिक श्याम बिहारी अग्रवाल 2012 से लगभग सभी राजधानी और शताब्दी ट्रेनों में कैटरिंग का काम करते रहे हैं। इन पर आरोप है कि इन्होंने रेल नीर के नाम पर ट्रेन में सस्ता पानी बाँट कर मोटी कमाई की।

देश के महत्त्वपूर्ण ट्रेनों में रेल नीर के आपूर्ति से जुड़े भ्रष्टाचार का पर्दाफ़ाश करने के लिये की गई छापेमारी में 27 करोड़ की नकदी बरामद हुई थी। जिसमें चार लाख रुपए जाली निकले थे। अग्रवाल छत्तीसगढ़ के दुर्ग का रहने वाला है, 2004 के आस-पास वह छोटा-मोटा ठेकेदार था और धीरे-धीरे उसकी कम्पनी 500 करोड़ की हो गई।

अब अग्रवाल नवी मुम्बई, नोएडा गाज़ियाबाद में कई आलीशान होटलों का मालिक है। यह मामला पिछले महीने का है। इसका जिक्र आज करने की एक वजह है, वजह जानने से पहले हम यह जान लें कि रेलवे को रेल नीर की आपूर्ति कौन करता है? रेल नीर का उत्पादन और रेल में इसकी आपूर्ति आइआरसीटीसी करती है।

आइआरसीटीसी ने दिल्ली, पटना, चेन्नई और अमेठी समेत कई अन्य जगहों पर रेल नीर के लिये संयंत्र स्थापित किये हैं। चेन्नई संयंत्र से प्रतिदिन 15,000 पेटी, दिल्ली से 11,000 पेटी और पटना से लगभग 8,000 पेटी का प्रतिदिन उत्पादन होता है। एक पेटी में रेल नीर की 12 बोतलें होती हैं।

रेल नीर यह कहते हुए सस्ते पानी के ट्रेनों में वितरण से पल्ला झाड़ रहा है कि वह सिर्फ उन ट्रेनों में रेल नीर की आपूर्ति सुनिश्चित करता है, जिन ट्रेनों में केटरिंग की जिम्मेवारी वह सम्भालता है। मतलब दूसरी ट्रेनों में रेल नीर प्रभू भरोसे है। एक यात्री के तौर पर आप जिस ट्रेन में यात्रा कर रहे हैं, उसमें आपको रेल नीर मिल रहा है या नहीं? जरूर गौर कीजिए, या फिर आप किसी नए ठेकेदार को एक और बड़े घोटाले का अवसर दे रहे होंगे।

रेल नीर का जिक्र इसलिए क्योंकि भारतीय रेल ने उत्तरी रेलवे के तमाम स्टेशनों पर नल में उपलब्ध पानी की जाँच में पाया है कि लगभग 54 प्रतिशत जगहों पर पीने के पानी का क्लोरिफिकेशन नहीं हो रहा है। लखनऊ में यह 70 फीसदी पानी का क्लोरीफिकेशन नहीं हुआ पाया गया। गाजियाबाद में यह मात्रा बढ़कर 94 प्रतिशत हो गया।

जहाँ क्लोरीफिकेशन नहीं हो पा रहा है, ऐसे कुछ जगहों पर ज़मीन के अन्दर से आने वाले पानी को ट्रीट किया जा रहा है। रेलवे के आन्तरिक सर्वेक्षण में पाया गया कि लखनऊ का 11 प्रतिशत पानी बिल्कुल पीने के योग्य नहीं है। अम्बाला में 20 प्रतिशत रेलवे का पानी ऐसा पाया गया। दिल्ली में पानी को पीने लायक बनाने के लिये टेरी की मदद ली जा रही है।

माँगने पर भारतीय रेलवे ने स्टेशन पर उपलब्ध पानी का नमूना दिल्ली न्यायालय को सौंपा है। दिसम्बर के पहले सप्ताह में न्यायालय द्वारा क्या निर्देश आता है इस मामले पर सबकी नजर अटकी हुई है।

बड़ा सवाल यह है कि देश के खास आदमी को रेल नीर की जगह जो पानी ट्रेन में पीने के लिये दिया जा रहा है, उस पानी की सुरक्षा की गारंटी रेलवे भी नहीं ले रहा। फिर किस भरोसे पर कोई रेल नीर की जगह उसी कीमत पर ट्रेन में मिलने वाला सस्ता बोतलबन्द पानी पीये?

रेल यात्रा करने वाले जानते हैं कि चलती ट्रेन में रेल नीर की जगह कोई भी पानी का बोतल देकर वेंडर इस अन्दाज में यात्रियों से बात करता है, मानों कह रहा हो कि लेना हो तो लो वर्ना रास्ता खाली करो। ऐसी स्थिति में रेल यात्री कहाँ जाएँ? दूसरी तरफ देश का एक आम आदमी, एक गरीब मज़दूर जो रेलवे स्टेशन पर पीने के पानी के लिए लगाए गए नल पर निर्भर है।

वह ऐसी स्थिति में क्या करे जब रेलवे की आन्तरिक रिपोर्ट कह रही है कि रेलवे स्टेशनों पर मौजूद नलों से निकलने वाला पानी अधिकांश स्टेशनों पर सुरक्षित नहीं है। दुख की बात यह है कि ऐसे नलों के साथ इस तरह की चेतावनी भी नहीं लगाई गई। ऐसे में इस पानी को पीकर यदि कोई बीमार पड़ता है तो उसके लिए जिम्मेवार कौन होगा?

जिस देश के रेल मंत्री खुद (सुरेश) ‘प्रभू’ हों उस देश के रेल यात्री किसकी तरफ उम्मीद से देखें?
 

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