भूमंडल में भारत : जन-स्वास्थ्य के नजरिये से

Submitted by Hindi on Mon, 08/15/2011 - 11:54
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लोकजतन

जनांदोलनों के प्रखर नायक शैलेन्द्र शैली की संकलित रचनाओं पर एक किताब प्रकाशित हुई थी ‘भूमंडल में भारत’ जिसमें भूमंडलीकरण तथा हमारे देश पर रचनाएं शामिल थीं। यह शीर्षक ‘भूमंडल में भारत’ हमें प्रेरित करता है कि भूमंडलीकरण के आज के दौर में हमारा देश कहां तक पहुंचा है, इस पर विवेचना की जाए। हम अपने इस लेख में स्वास्थ्य के क्षेत्र में हमारे देश ने कितनी प्रगति की है इसका तुलनात्मक अध्ययन करेंगे। इससे यह पता लगेगा कि पूंजीवाद की अपराजेयता का गुणगान करने वाले कहां तक सही हैं? क्या वर्तमान समाज व्यवस्था अपने नागरिकों को अच्छा स्वास्थ्य उपलब्ध करा सकती है? अच्छे स्वास्थ्य का अर्थ केवल चिकित्सक, मरीज तथा दवा ही नहीं है इसमें पीने का स्वच्छ जल, वातावरण तथा मल-मूत्र निकासी की समुचित व्यवस्था भी शामिल है।
 

स्वास्थ्य पर सरकारी खर्च


अपने नागरिकों के स्वास्थ्य पर सरकार द्वारा किये जाने वाले खर्च से यह पता चलता है कि वर्तमान समाज का राजनैतिक नेतृत्व जनस्वास्थ्य को लेकर कितना सजग है। विश्व का स्वयंभू दरोगा अमेरिका जहां अपने सकल घरेलू उत्पादन का 16 प्रतिशत स्वास्थ्य पर खर्च करता है वहीं भारत में यूपीए सरकार 0.9 प्रतिशत का ही खर्च करती है। अन्य विकसित देशों में कनाडा 10 प्रतिशत, आस्ट्रेलिया 9.2 प्रतिशत, बेल्जियम 10.1 प्रतिशत, डेनमार्क 8.9 प्रतिशत, फ्रांस 10.4 प्रतिशत, इटली 8.4, जापान 8 प्रतिशत, स्वीडन 9.3 प्रतिशत, इंग्लैंड 7.8 प्रतिशत खर्च स्वास्थ्य पर करते हैं। यहां तक कि श्रीलंका 1.8 प्रतिशत, बांग्लादेश 1.6 प्रतिशत, नेपाल 1.5 प्रतिशत खर्च करते हैं। प्रथम यूपीए सरकार ने वायदा किया था कि सरकार अपने सकल घरेलू उत्पादन का 2 से 3 प्रतिशत स्वास्थ्य पर खर्च करेगी जो आज भी कागजों की शोभा बढ़ा रहा है। अमेरिका की अंधाधुंध नकल करने वाला भारत का राजनैतिक नेतृत्व अपने बाशिंदों के स्वास्थ्य पर सरकारी खर्च क्यों नहीं बढ़ाता है?

अमेरिका में स्वास्थ्य पर प्रति व्यक्ति प्रतिवर्ष 5711 डॉलर खर्च किये जाते हैं वहीं भारत में मात्र 1377 रुपए (करीब 29 डॉलर) ही खर्च किये जाते हैं। अन्य विकसित देशों में इग्लैंड 2317 डॉलर, स्विट्जरलैंड में 3847 डॉलर, स्वीडन में 2745, जापान में 2249, जर्मनी में 2983 डॉलर तथा कनाडा में 2998 डॉलर प्रति व्यक्ति प्रतिवर्ष स्वास्थ्य पर खर्च किये जाते हैं। यह आंकड़े दर्शाते हैं कि भूमंडल में भारत स्वास्थ्य पर सबसे कम खर्च करने वाले देशों में है। भारत में स्वास्थ्य पर होने वाले खर्च का 15 प्रतिशत राज्य सरकार खर्च करती है, 4.1 प्रतिशत सामाजिक बीमा, 1.4 प्रतिशत निजी बीमा तथा 80 प्रतिशत खर्च जनता को अपनी जेब से देना पड़ता है। आज भी बीमार पड़ने पर 20 प्रतिशत जनता को अपना सामान, जमीन बेचनी पड़ती है। सन् 1985-86 में स्वास्थ्य पर सकल घरेलू उत्पादन का 1.5 प्रतिशत खर्च किया जाता था जिसे अब घटाकर 0.9 प्रतिशत कर दिया है।

 

 

जनता का स्वास्थ्य


विश्व में होने वाली बीमारियों का पांचवां हिस्सा भारत में ही होता है। कुपोषित बच्चे यहां पर अफ्रीका से भी ज्यादा हैं तथा खून की कमी (एनीमिया) के मरीज भी बड़ी संख्या में हैं। प्रसव के समय होने वाली शिशु मृत्यु दर प्रति 1000 पर श्रीलंका में 15, नेपाल में 38, भूटान में 41 तथा मालदीव में 20 है। वहीं हमारे देश में प्रसव के समय होने वाली शिशु मृत्यु दर 52 है। जन्म से लेकर मृत्यु तक की आयु श्रीलंका में पुरूष-महिला 71/74, पाकिस्तान में 66/67, बांग्लादेश में 68/68, मालदीप में 70/74 है वहीं भारत में यह 62/66 ही है। आयु का यह आंकड़ा यूनाइटेड नेशन पापुलेशन फंड द्वारा 2010 में जारी किया गया है।

बच्चों के स्वास्थ्य का एक मानक उनका वजन भी है। दूसरा मानक उनकी लंबाई है। हमारे पास बच्चों के वजन का आंकड़ा उपलब्ध है जिसके अनुसार श्रीलंका में 5 प्रतिशत, भूटान में 3 प्रतिशत, नेपाल में 12 प्रतिशत, बांग्लादेश और पाकिस्तान में 13 प्रतिशत तथा भारत में सबसे ज्यादा 18 प्रतिशत बच्चों का वजन मानक से कम है। गर्भावस्था के दौरान महिलाओं का चिकित्सीय परीक्षण अनिवार्य है बावजूद इसके भारत में केवल 75 प्रतिशत गर्भवती महिलाओं को ही यह सुविधा मिल पाती है जबकि मालदीप में 99 प्रतिशत, श्रीलंका में 99 प्रतिशत तथा भूटान में 88 प्रतिशत गर्भवती महिलाओं को यह सुविधा मिलती है।

इन आंकड़ों से इंगित होता है कि हमारे देश में गर्भवती महिलाओं तथा बच्चों के स्वास्थ्य की देखभाल अपने पड़ोसी मुल्कों की तुलना में कम होती है। जबकि इसी समय सबसे ज्यादा चिकित्सीय सुविधाओं की आवश्यकता होती है। मलेरिया से होने वाली मौतों में भी भारत अपने पड़ोसी देशों से काफी आगे है। जहां नेपाल 0, श्रीलंका 0, भूटान 0.2, बांग्लादेश में 1.8, प्रति एक लाख पर मलेरिया से मौतें होती हैं वहीं भारत में 1.9 मौतें होती हैं।

 

 

 

 

चिकित्सा सुविधा


जनस्वास्थ्य के आकलन का एक जरिया देश में उपलब्ध चिकित्सकों की संख्या तथा अस्पतालों में बिस्तरों की उपलब्धता है। अमेरिका में जहां 300 व्यक्तियों पर 1 चिकित्सक उपलब्ध है वहीं भारत में 2000 व्यक्तियों पर एक चिकित्सक उपलब्ध है। सेंट्रल ब्यूरो ऑफ हेल्थ इंटेलीजेंस के एक अध्ययन के अनुसार हमारे देश में 5,40,330 बिस्तर हैं। यदि जनसंख्या को हम एक अरब भी माने तो प्रति 1850 व्यक्तियों के लिए सिर्फ एक बिस्तर उपलब्ध है। जबकि अफ्रीका में 1000 व्यक्तियों के लिए तथा यूरोप में 159 लोगों के लिए 1 बिस्तर उपलब्ध है। आज भी हमारे देश के अधिकांश जिलों में एमआरआई तथा सीटी स्केन जैसी जांच नहीं होती है। अति विशिष्ट चिकित्सक जैसे न्यूरो सर्जन, हार्ट स्पेशलिस्ट, हार्ट सर्जन, तथा नेफ्रोलाजिस्ट केवल चुनिंदा स्थानों पर ही उपलब्ध हैं।

 

 

 

 

स्वच्छ पानी तथा निस्तारी व्यवस्था


संयुक्त राष्ट्र संघ के एक अध्ययन से पता चलता है कि भारत में ज्यादा लोग मोबाइल फोन का उपयोग करते हैं बनिस्बत शौचालय के। अर्थात मोबाइल फोन तो सर्वव्यापी है लेकिन शौचालय सभी को उपलब्ध नहीं है। संयुक्त राष्ट्र संघ के ही अनुसार भारत में केवल 38 प्रतिशत नागरिकों की बसाहटों में मलमूत्र निकासी की सुविधा प्राप्त है बाकी 62 प्रतिशत नागरिक इस सुविधा से मरहूम हैं। बजबजाती नालियों तथा निस्तारी सुविधा न होने के कारण जलजनित बीमारियों से आधी से भी ज्यादा आबादी पीड़ित रहती है। स्वच्छ पानी की उपलब्धता भी सरकारी दावों के अनुसार शहरों में 96 प्रतिशत तथा गांवों में 84 प्रतिशत है। सन् 2007 में एशियन डवलपमेंट बैंक ने एक अध्ययन में पाया कि बड़े शहरों में केवल 3 से 4 घंटे ही पानी की उपलब्धता रहती है। मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों की पेयजल व्यवस्था के बारे में लोकजतन लगातार छापता रहा है। ऐसा कोई शहर नहीं है जहां हर रोज पानी आता हो। ऐसे शहर बहुमत में है जहां तीन से लेकर सात दिन में एक बार पानी मिलता है।

इस प्रकार हम पाते हैं कि भूमंडल में भारत की स्थिति विशेषकर स्वास्थ्य के मामले में अत्यंत खराब है। जाहिर है कि जनस्वास्थ्य पर सरकारी खर्च को कई गुना बढ़ाना पड़ेगा तभी जाकर जनता का स्वास्थ्य बेहतर हो सकता है। फिलहाल तो भूमंडल में भारत की स्थिति हरेक मानक पर 100वें स्थान से नीचे ही है। आंकड़े और तथ्य तो यही वास्तविकता बयान करते हैं।

(लेखक म.प्र./छग के दवा प्रतिनिधियों के त्रैमासिक एमपीएमएसआरयू समाचार के कार्यकारी संपादक हैं)

 

 

 

 

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