चिंता में शामिल नहीं पानी

Submitted by admin on Wed, 06/16/2010 - 23:10
Source
राजस्थान पत्रिका, 14 जून 2010

मानसून के आगमन से पहले ही राजस्थान व अन्य राज्यों के कुछ इलाकों में बारिश हुई। यह पुरानी बात है कि जैसे ही बारिश शुरू होती है, लोग पानी के बारे में सोचना छोड देते हैं और भूल जाते हैं कि पानी का संकट स्थाई है। वास्तव में राजस्थान में सूखे के हालात हैं। राज्य के 33 प्यासे जिलों मेें ट्रेनों और टैंकरों से पानी की आपूर्ति हो रही है। रिपोर्ट के अनुसार, भीलवाडा और पाली जिलों में पेयजल की आपूर्ति रोज ट्रेनों द्वारा की जा रही है। इसके अलावा 77 शहरों, कस्बों और 15,287 गांवों में रहने वाले लोगों की प्यास पानी के टैंकर बुझा रहे हैं।

यह स्थिति वाकई चेतावनी है, लेकिन यह हालत एक दिन में नहीं पैदा हुई है। वर्ष 2009 में भी 10,918 गांवों और कस्बों की प्यास बुझाने के लिए पानी ले जाने के वास्ते ट्रेनों और टैंकरों का सहारा लिया गया था। वास्तव में, पानी का संकट हर साल गहराता ही जा रहा है। रोजाना पानी से भरी ट्रेन कोटा से भीलवाडा जाती है और अन्य ट्रेन पानी लेकर पाली जिले के सोजत रोड पहुंचती है।

इतिहास गवाह है कि पानी के अकाल जैसी स्थिति अब उत्पन्न हुई है, वैसी पहले कभी नहीं थी। कुछ समय पहले मेरे मित्र अनुपम मिश्र (गांधी शांति प्रतिष्ठान, नई दिल्ली) ने एक बहुत ही सारगर्भित पुस्तक -आज भी खरे हैं तालाब- लिखी थी। यह पुस्तक पानी संचय और पानी बचाने के राजस्थान के परम्परागत उपायों और ढांचे पर आधारित है। यह पुस्तक पिछले कई सालों में बेस्ट-सेलर रही है और विश्व में इसकी पहचान है। लेकिन दुर्भाग्यवश राजस्थान की सरकारों और नीति-निर्माताओं ने इस पुस्तक को पढने की तकलीफ नहीं उठाई और इसके स्थान पर सिंचाई के बारे में जानकारी हासिल करने के लिए इजराइल की यात्राएं कीं।

राजस्थान में पानी का जो संकट गहराया है, उसके पीछे कई तरह की मानव गतिविधियां भी जिम्मेदार हैं। इस संकट के 70 फीसदी कारण मानव निर्मित हैं। सूखे के लिए प्रारम्भिक तौर पर हम ही जिम्मेदार हैं, क्योंकि सालों से हम लोग भू-जल का अंधाधुंध दोहन कर रहे हैं। लेकिन क्या हमने कोई सबक सीखा क्या हममें इसमें सुधार के प्रति कोई इच्छाशक्ति है उत्तर मिलता है - नहीं।

राजस्थान जैसे सूखे से त्रस्त राज्य गोल्फ कोर्स को बढावा क्यों देते हैं 18-होल वाले एक गोल्फ कोर्स में रोजाना इतने पानी का इस्तेमाल होता है, जितने से लगभग बीस हजार घरों की जरूरत पूरी की जा सकती है। हर पांच सितारा होटल एक दिन में एक व्यक्ति पर 600 लीटर पानी का अतिरिक्त व्यय करता है। रीयल एस्टेट परियोजनाएं तो बहुत नुकसान कर रही हैं। इसका अन्त यहीं नहीं होता। मैंने अल्प शुष्क क्षेत्रों में गन्ना और कपास की खेती को अनुमति देने की इच्छा का समर्थन कभी नहीं किया। गेहूं और चावल दोनों की खेती की अपेक्षा गन्ने की फसल में तीन गुना ज्यादा पानी की जरूरत होती है। आम धारणा है कि हमें सूखी भूमि में ऎसी फसलों पर ध्यान केन्द्रित करना चाहिए, जिनमें पानी कम खर्च होता हो। राजस्थान में बडे पैमाने पर ज्वार और बाजरे की खेती क्यों नहीं की जा सकती दालें उत्पादित की जा सकती हैं। इनमें पानी कम लगता है।

अर्थव्यवस्था के सुदृढ संचालन के लिए राजस्थान को ऎसी कृषि नीति अपनानी चाहिए, जिससे मोटे अनाजों और दालों को बढावा मिले और उसके लिए बाजार उपलब्ध हो। मूल्यों के निर्धारण पर भी ध्यान देने की जरूरत है, ताकि जो किसान दालों और ज्वार-बाजरा जैसी फसलों को उत्पादित करें, उन्हें नुकसान न हो। वास्तव में, राजस्थान आसानी से दाल के क्षेत्र में पूरे देश में परचम लहरा सकता है। भारत में दालों के उत्पादन में निरन्तर कमी आई है। ठीक, इसी समय मुझे यह जानकर आघात लगा कि राजस्थान में संकर फसलों-संकर चावल, संकर मक्का, संकर कपास और संकर सब्जियों को बढावा दिया जा रहा है, जिसमें डेढ से दो गुना ज्यादा पानी की खपत होती है। उच्च स्तर पर, सरकार अब बीटी कपास को बढावा देने में जुटी हुई है, जिसमें कपास की संकर प्रजातियों की अपेक्षा 10 से 20 फीसदी अघिक पानी की जरूरत होती है।

आप अपने जोखिम पर इन सुझावों को नजरअंदाज कर सकते हैं। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि नासा की एक रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि पंजाब, हरियाणा और राजस्थान में छह सालों में 109 क्यूबिक किलोमीटर पानी की खपत हुई है। नासा ने यह भी बताया है कि नब्बे के दशक के मुकाबले इस दशक में 70 फीसदी ज्यादा भू-जल का दोहन किया गया है। यही हालात रहे, तो राजस्थान सबसे बुरी तरह प्रभावित होगा। राजस्थान सरकार और जनता को अब तो चेतना होगा, वरना वह दिन दूर नहीं, जब राज्य से बडी संख्या में पलायन होगा। लोगों के पास विस्थापित होने के अलावा कोई विकल्प नहीं रह जाएगा।
 
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