चंबल के बच्चे मुसीबत में

Submitted by admin on Tue, 06/22/2010 - 16:50
Source
जुलाई 2009

वन्यजीव प्रेमियों के लिए चंबल सेंचुरी क्षेत्र से एक बड़ी खुशखबरी आई है। चंबल के किनारों पर नए मेहमानों यानी घड़ियालों के सैकड़ों बच्चों की तादात देखने को मिल रही है। देश-विदेश के वन्यजीव प्रेमियों के खुशी का पारावार नहीं है। पर दुख की बात यह है कि लापरवाही और शिकार की वजह से चंबल सेंचुरी में घड़ियालों के सैकडों बच्चों की जान मुश्किल में है।

इन बच्चों को दो-दो यमराजों का मुकाबला करना पड़ रहा है एक यमराज शिकारी हैं तो दूसरा यमराज लापरवाह और भ्रष्ट सेंचुरीकर्मी। चंबल नदी के किनारे छोटे-छोटे से पानी के पांडों में घड़ियालों के बच्चे अपनी जान के लिये संघर्ष करते हुये नजर आ रहे हैं क्योंकि सेंचुरी अधिकारियों की लापरवाही के चलते इन बच्चों के भविष्य पर अंधकार ही मड़राता हुआ दिख रहा है।

उत्तर प्रदेश, राजस्थान और मध्यप्रदेश राज्य में सेंचुरी का संचालन होता है जिसके मुताबिक चंबल नदी में घड़ियालों, मगर, डाल्फिन, कछुये के अलावा करीब दौ सौ से अधिक प्रजाति के वन्य जीवों का संरक्षण मिला हुआ है लेकिन सेंचुरी अधिकारी और कर्मी वन्य जीवों के संरक्षण के नाम पर खुद का मजबूत करने में लगे हुये हैं क्योंकि इन पर किसी का कोई दबाव नहीं है। वे माफियाओं पर अंकुश लगाने में नाकामयाब तो रहे ही हैं, बल्कि कई बार ऐसा लगता है कि उनके साध मिले भी हुए हैं।

राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय कोशिशों का हमारे अधिकारियों की सेहत पर कोई असर नहीं है। घड़ियालों के अस्तित्व पर संकट के प्रति चंबल सेंचुरी क्षेत्र के अधिकारी लगातार अनदेखी करते रहे हैं। घड़ियालों की मौत की खबर भी इन अधिकारियों को हरकत में नहीं ला सकी और अब जबकि घड़ियालों के अस्तित्व को बचाए रखने के लिए इटावा जनपद से गुजरने वाली चंबल में बड़ी संख्या में घड़ियालों के बच्चों ने जन्म लिया है तो अभी तक इनकी सुरक्षा के लिए सेंचुरी क्षेत्र के अधिकारियों ने कोई उपाय नहीं किए हैं।प्रकृति का आशीर्वाद हुआ है, डायनाशोर प्रजाति के विलुप्तप्राय घड़ियालों के कुनबे में बड़ी संख्या में इजाफा हो गया है। अपने प्रजनन काल में घड़ियालों के बच्चे जिस बड़ी संख्या में चंबल सेंचुरी क्षेत्र में नजर आ रहे हैं वहीं चंबल सेंचुरी क्षेत्र के अधिकारियों की अनदेखी से घड़ियालों के इन नवजात बच्चों को बचा पानी काफी कठिन प्रतीत हो रहा है। क्या ऐसा तो नहीं कि सेंचुरीकर्मियों की लापरवाही इस खुशखबरी को दुखखबरी में बदल तो नहीं देगी।

दिसंबर-2007 से जिस तेजी के साथ किसी अज्ञात बीमारी के कारण एक के बाद एक सैकड़ों की संख्या में डायनाशोर प्रजाति के इन घड़ियालों की मौत हुई थी उसने समूचे विश्व समुदाय को चिंतित कर दिया था। ऐसा प्रतीत होने लगा था कि कहीं इस प्रजाति के घड़ियाल किसी किताब का हिस्सा न बनकर रह जाएं। घड़ियालों के बचाव के लिए तमाम अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं आगे आईं और फ्रांस, अमेरिका सहित तमाम देशों के वन्य जीव विशेषज्ञों ने घड़ियालों की मौत की वजह तलाशने के लिए तमाम शोध कर डाले।

घड़ियालों की हैरतअंगेज तरीके से हुई मौतों में जहां वैज्ञानिकों के एक समुदाय ने इसे लीवर-क्लोसिस बीमारी को एक वजह माना तो वहीं दूसरी ओर अन्य वैज्ञानिकों के समूह ने चंबल के पानी में प्रदूषण की बजह से घड़ियालों की मौत को कारण माना। वहीं कई दबी जुबां से घड़ियालों की मौत के लिए अवैध शिकार एवं घड़ियालों की भूख को भी जिम्मेदार माना गया। घड़ियालों की मौत की बजह तलाशने के लिए ही अंतर्राष्ट्रीय समुदाय ने करोड़ों रुपये व्यय कर घड़ियालों की गतिविधियों को जानने के लिए उनके शरीर में ट्रांसमीटर प्रत्यारोपित किए।

पर इन राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय कोशिशों का हमारे अधिकारियों की सेहत पर कोई असर नहीं है। घड़ियालों के अस्तित्व पर संकट के प्रति चंबल सेंचुरी क्षेत्र के अधिकारी लगातार अनदेखी करते रहे हैं। घड़ियालों की मौत की खबर भी इन अधिकारियों को हरकत में नहीं ला सकी और अब जबकि घड़ियालों के अस्तित्व को बचाए रखने के लिए इटावा जनपद से गुजरने वाली चंबल में बड़ी संख्या में घड़ियालों के बच्चों ने जन्म लिया है तो अभी तक इनकी सुरक्षा के लिए सेंचुरी क्षेत्र के अधिकारियों ने कोई उपाय नहीं किए हैं। उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश को जोड़ने वाली चंबल नदी में घड़ियालों के बच्चों को नदी के किनारे बालू पर रेंगते हुए और नदी में अठखेलियां करते हुए आसानी से देखा जा सकता है। इतनी बड़ी संख्या में घड़ियालों के प्रजनन के बारे में जानकर अंतर्राष्ट्रीय वन्य जीव प्रेमियों में उत्साह है तो वहीं इनकी सुरक्षा को लेकर चिंता भी जताई जा रही है। वन्य जीव प्रेमियों को आशंका है कि आने वाले दिनों में मानसून में चंबल के बढ़ते वेग में कहीं यह बच्चे बह कर मर न जाएं।

नेचर कंजर्वेसन सोसायटी फार नेचर के सचिव एवं वन्य जीव विशेषज्ञ डा. राजीव चौहान बताते हैं कि पंद्रह जून तक घड़ियालों के प्रजनन का समय होता है जो मानसून आने से आठ-दस दिन पूर्व तक रहता है। घड़ियालों के प्रजनन का यह दौर ही घड़ियालों के बच्चों के लिए काल के रूप में होता है क्योंकि बरसात में चंबल नदी का जलस्तर बढ़ जाता है। परिणामस्वरूप घड़ियालों के बच्चे नदी के वेग में बहकर मर जाते हैं। इन बच्चों को बचाने के बारे में वह उपाय बताते हैं कि यदि इन बच्चों को कृत्रिम गर्भाधान केंद्र और “नदिया-तालाब” में संरक्षित कर तीन साल तक बचा लिया जाए तो इन बच्चों को फिर खतरे से टाला जा सकता है। वे कहते हैं कि महज दस फीसदी ही बच्चे बच पाते हैं जबकि 90 फीसदी बच्चों की पानी में बह जाने से मौत हो जाती है।

वहीं डा.चौहान यह जानकर चौंकते हैं कि घड़ियालों के बच्चों की संख्या हजारों में है। वह संभावना जताते हैं कि विगत दिनों इस प्रजाति को बचाने के लिए 840 बच्चों को नदी के ऊपरी हिस्से में छोड़ा गया था। कहीं ऐसा न हो कि यह वही बच्चे नीचे उतर आए हों परंतु नदी के तट पर जिस प्रकार से टूटे हुए अंडे नजर आते हैं उससे साफ है कि इन बच्चों ने अभी हाल ही में जन्म लिया है।

चंबल नदी के किनारे बसे कई गांव वालों ने दावे के साथ बताया कि “शाम को हल्का अंधेरा होने के साथ ही चंबल नदी में शिकारियों का आवागमन बड़े पैमाने पर “शुरू हो जाता है जो सुबह सूरज निकलने तक जारी रहता है इस दौरान बडे पैमाने पर मछलियों का शिकार करने में शिकारी कामयाब हो जाते हैं लेकिन शिकारियों के जाल में फंसने के कारण तमाम घडियालों के बच्चे भी अपनी जान गंवा जाते हैं। चंबल नदी के किनारे रहने वाले अलिखेश भदौरिया ने कई बार सेंचुरी के अधिकारियों को शिकारियों की करतूत के बारे में बताया लेकिन अधिकारियों ने ध्यान नहीं दिया।

Disqus Comment