चंबल में सियार साफ कर रहे हैं घड़ियाल

Submitted by Hindi on Thu, 07/28/2011 - 09:46
Source
विस्फोट डॉट कॉम, 25 अप्रैल 2011

घड़ियालों के अंडे संकट मेंघड़ियालों के अंडे संकट मेंइटावा। घड़ियालों को संरक्षित करने की दिशा में केंद्र सरकार की तमाम योजनाओं को नाकारा चंबल सेंचुरी के अफसरों की लापरवाही के चलते पूरी तरह से धूल में मिल गई है। इन अफसरों की हीला-हवाली के चलते घड़ियालों के अंडे सियारों का निवाला बन रहे है और चंबल सेंचुरी के अफसर अपनी जेबों के वजन को बढ़ाने में लगे हुये है। घड़ियालों के अंडों के सियारों के निवाला बनने का यह वाक्या उत्तर प्रदेश के इटावा जिले में चंबल नदी में होता हुआ देखा जा रहा है। चंबल नदी में घड़ियालों के नेस्टों से घड़ियालों के अंडों को निकाल करके अपना निवाला बनाने का प्रत्यक्ष प्रमाण तब मिला जब चंबल नदी में भ्रमण करके घड़ियालों के अंडों की सुरक्षा की हकीकत को जाना गया तो पाया गया कि बालू से कई नेस्ट पूरी तरह से खाली मिले और जो अंडे नेस्ट के भीतर थे उनको सियारों ने अपना निवाला बना डाला। जिन अंडों को सियारों ने अपना निवाला बनाया उनके ऊपरी सफेद छिलकों को सियारों ने नही खाया जो प्रमाण के तौर पर ही दिखलाने के लिये पर्याप्त समझे जा सकते है। एक अध्ययन के अनुसार घड़ियालों के नेस्टों में 26 से लेकर 60 तक अंडे माने जाते है।

चंबल सेंचुरी में इस समय घड़ियालों के प्रजनन का काल चल रहा है ऐसे में पूरी की पूरी चंबल सेंचुरी में घड़ियालों के सैकड़ों की तादात में अंडे हुये हैं, ये अंडे फिलहाल बालू में नेस्टों के भीतर है जिनकी सुरक्षा की जिम्मेदारी चंबल सेंचुरी विभाग के अफसरों और कर्मियों के हाथों में होती है लेकिन यह अफसर चंद धन के लालच में घड़ियालों के इन अंडों के लिये जाल लगाने के बजाय खुले में डाल रखा है तभी तो आये दिन सियार और दूसरे जानवर घड़ियालों के इन अंडों को खाकर नष्ट करने में लगे हुये है। केंद्र सरकार की ओर से घड़ियालों को संरक्षित करने की दिशा में हर साल करोड़ों रुपये फूंक दिये जाते है लेकिन उसके बाबजूद घड़ियालों को किसी भी तरह से संरक्षित करने की दिशा में कोई काम नही किया जाता है। उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश और राजस्थान जैसे तीन राज्यो में चंबल सेंचुरी का प्रभाव नजर आता है। चंबल नदी को घड़ियालों,मगरमच्छ,डॉल्फिन,कछुये के अलावा बडी तादात में दुर्लभ प्रजाति के पक्षियों के संरक्षण के लिये सेंचुरी बना करके रखी गई है संरक्षण की दिशा में आये दिन कोई ना कोई वन्य जीव संस्था चंबल नदी में काम करती रहती है जिस पर कईयों लाख रुपये का खर्चा किया जाता है।

दुर्लभ प्रजाति के घड़ियालों की जान पैदा होने से पहले ही अंडों में ही सियार और दूसरे जानवर मौत के मुंह में डालने में लगे हुये है। घड़ियाल के सैकड़ों अंडों इन दिनों पूरी की पूरी चंबल में नजर आ रहे हैं लेकिन सेंचुरी अफसरों की लापरवाही के चलते घड़ियाल के अंडों के लिये कोई जाली आदि नही लगाई है जब कि इससे पहले घड़ियालों के अंडों को सुरक्षित रखने के लिये सेंचुरी के अफसर सजग हुआ करते थे। इस बार आखिरकार यह सेंचुरी अफसर ऐसा क्यों और कैसे कर रहे हैं इसका जवाब कोई आम आदमी के पास नही है लेकिन ऐसा माना जा रहा है कि सेंचुरी विभाग में काम करने वाले कर्मी चंद रुपये के लालच में घड़ियालों के नेस्टों पर जाली नही लगा रहे है इसी वजह से घड़ियालों के इन अंडों को सियार और दूसरे जानवर घड़ियाल बनने से पहले ही मौत के मुंह में डाल रहे है। इस समय एक अनुमानित गणना के अनुसार पूरी की पूरी चंबल में इन दिनों कम से कम 100 से अधिक घड़ियालों के नेस्ट देखे जा रहे हैं इन नेस्टों में मौजूद सैकड़ों की तादाद में अंडों को पूरी तरह से सुरक्षा नही मिल पा रही है तभी तो घड़ियालों के अंडों को जगह वे जगह सियार और दूसरे जानवर खा करके नष्ट करने में लगे हुये है, करीब एक सैकड़ा से अधिक घड़ियाल के अंडे पूरी तरह से खत्म हो चुके है।

दिसंबर-2007 से जिस तेजी के साथ किसी अज्ञात बीमारी के कारण एक के बाद एक सैकड़ों की संख्या में डायनाशोर प्रजाति के इन घड़ियालों की मौत हुई थी उसने समूचे विश्व समुदाय को चिंतित कर दिया था। ऐसा प्रतीत होने लगा था कि कहीं इस प्रजाति के घड़ियाल किसी किताब का हिस्सा न बनकर रह जाएं। घड़ियालों के बचाव के लिए तमाम अंतर्राष्ट्रीय संस्थाएं आगे आई और फ्रांस, अमेरिका सहित तमाम देशों के वन्य जीव विशेषज्ञों ने घड़ियालों की मौत की वजह तलाशने के लिए तमाम शोध कर डाले। घड़ियालों की हैरतअंगेज तरीके से हुई मौतों में जहां वैज्ञानिकों के एक समुदाय ने इसे लीवर क्लोसिस बीमारी को एक वजह माना तो वहीं दूसरी ओर अन्य वैज्ञानिकों के समूह ने चंबल के पानी में प्रदूषण की वजह से घड़ियालों की मौत को कारण माना। वहीं दबी जुबां से घड़ियालों की मौत के लिए अवैध शिकार एवं घड़ियालों की भूख को भी जिम्मेदार माना गया। घड़ियालों की मौत की वजह तलाशने के लिए ही अंतर्राष्ट्रीय समुदाय ने करोड़ों रुपये व्यय कर घड़ियालों की गतिविधियों को जानने के लिए उनके शरीर में ट्रांसमीटर प्रत्यारोपित किए।

घड़ियालों के अस्तित्व पर संकट के प्रति चंबल सेंचुरी क्षेत्र के अधिकारी लगातार अनदेखी करते रहे हैं। घड़ियालों की मौत की खबर भी इन अधिकारियों को हरकत में नहीं ला सकी और अब जबकि घड़ियालों के अस्तित्व को बचाए रखने के लिए इटावा जनपद से गुजरने वाली चंबल में बड़ी संख्या में घड़ियालों के अंडे नजर आ रहे है जिससे मई माह में घड़ियाल के बच्चे जन्म लेंगे लेकिन अंडों की सुरक्षा के लिये माकूल इंतजाम नही किया गया है। इटावा और आसपास के इलाकों में काम कर रही पर्यावरणीय संस्था सोसायटी फार नेचर कंजर्वेसन नेचर के सचिव एवं वन्य जीव विशेषज्ञ डा. राजीव चैहान बताते हैं कि पंद्रह जून तक घड़ियालों के प्रजनन का समय होता है जो मानसून आने से आठ-दस दिन पूर्व तक रहता है। इस दौरान घड़ियाल खासी तादाद में चंबल नदी के किनारे अंडे देते है इन अंडों की रखवाली की जिम्मेदारी सेंचुरी अफसरों की होती है लेकिन यह सेंचुरी अफसर इन अंडों को सुरक्षित रखने के बजाय अंडों के दुश्मन बन गये हैं।

चंबल नदी के किनारे बसे कई गांव वालों ने दावे के साथ बताया कि शाम को हल्का अंधेरा होने के साथ ही चंबल नदी में शिकारियों का आवागमन बड़े पैमाने पर शुरू हो जाता है जो सुबह सूरज निकलने तक जारी रहता है इस दौरान बड़े पैमाने पर मछलियों का शिकार करने में शिकारी कामयाब हो जाते है लेकिन शिकारियों की बालू में चहलकदमी के कारण तमाम घड़ियालों के अंडों को भी नुकसान हो रहा है। चंबल नदी के किनारे रहने वाले अनिल सिंह ने कई बार सेंचुरी के अधिकारियों को शिकारियों की करतूत के बारे में बताया लेकिन अधिकारियों ने इस कान से इस बात को सुना उस कान से निकाल दिया। वह यह भी बताते है कि सियार और दूसरे जानवर घड़ियालों के अंडों को अपना निवाला बनाने में लगे हुये है लेकिन जिम्मेदार सेंचुरी के लोग अपनी ड्यूटी करने के बजाय मौज करने में लगे हुये है।
 

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