दिल्ली में पानी समस्या की जड़ कहाँ

Submitted by Hindi on Thu, 04/02/2015 - 12:10
Source
नया इंडिया, 02 अप्रैल 2015

आंकड़े बताते हैं कि दिल्ली में लगे सीवेज ट्रीटमेन्ट प्लाण्ट अपनी कुल क्षमता का सिर्फ 60 फीसदी ही काम कर पाते हैं। ये ढाँचागत दिक्कतें हैं, जिनमें सुधार के लिए दीर्घकालिक कदम उठाने होंगे।

आम आदमी पार्टी ने दिल्ली में बिजली-पानी को मुद्दा बनाकर चुनाव जीता है तो उसे दिल्ली में जल व्यवस्था सुधारने के ढाँचागत दिर्घकालिक कदम उठाने के लिए तैयार रहना चाहिए। मगर अब तक संकेत यही है कि दिल्ली सरकार लोक-लुभावन घोषणाओं में ज्यादा यकीन करती है।

राजधानी दिल्ली में आम आदमी पार्टी सरकार ने अपनी हालिया घोषणाओं से यह दिखाने की कोशिश की है कि पानी का महँगा या सस्ता होना ही बड़ा मुद्दा है, जबकि वास्तविकता इसके उलट है। राजधानी में पानी की आपूर्ति के लिए पर्याप्त मात्रा में पानी उपलब्ध ही नहीं हो पाता। राजधानी पानी की दैनिक खपत एक अरब गैलन है, लेकिन इसके मुकाबले आपूर्ति के लिए सिर्फ 80 करोड़ गैलन पानी ही उपलब्ध रहता है। इस पर भी पाइपलाइन लिकेज के जरिए लगभग 40 फीसदी पानी बर्बाद हो जाता है। इस लिकेज का मुख्य कारण दिल्ली में पाइपलाइन नेटवर्क का जर्जर होना है। 2012 का दिल्ली आर्थिक सर्वेक्षण बताता है कि इस समय लगभग पानी आपूर्ति के ज्यादातर पाइप 40 साल या उससे ज्यादा पुराने हैं।

इन सब कारणों के चलते होने वाली पानी की कमी की भरपाई बर्बाद होने वाले पानी को रिसाइकल कर की जाती है, लेकिन आंकड़े बताते हैं कि दिल्ली में लगे सीवेज ट्रीटमेन्ट प्लाण्ट अपनी कुल क्षमता का सिर्फ 60 फीसदी ही काम कर पाते हैं। ये ढाँचागत दिक्कतें हैं, जिनमें सुधार के लिए दीर्घकालिक कदम उठाने होंगे। लेकिन दिल्ली सरकार मानती है कि इन सभी समस्याओं का हल लोगों को मुफ्त पानी देने जैसी घोषणाओं में है!

जानकार मानते हैं कि आम आदमी पार्टी सरकार ऐसी घोषणा करते समय राजधानी दिल्ली में पानी के वितरण की देख-रेख और व्यवस्था करने वाले दिल्ली जल बोर्ड की आर्थिक हालत की भी भारी उपेक्षा करती है। 2013 में प्रकाशित हुई सीएजी की रिपोर्ट ने बताया था कि 2009-2012 के बीच बोर्ड को 4,000 करोड़ रुपए का नुकसान हुआ।

सीएजी के आंकलन में यह भी साफ हुआ कि दिल्ली जल बोर्ड को 60 फीसदी पानी की आपूर्ति पर कोई शुल्क नहीं मिलता। जबकि शहरी विकास मन्त्रालय के नियमों के अनुसार पानी की मात्रा अधिकतम 20 फीसदी हो सकती है। जाहिर है कि पानी का सस्ता या महँगा होना कोई मुद्दा होता तो ऐसी स्थिति में पानी के उपभोक्ता नाखुश नहीं होते। लेकिन पानी का पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध नहीं होना सबसे बड़ी समस्या रही है।

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