दिल्ली में शहरीकरण के विगत 26 वर्ष - ग्राउंडवाटर रिचार्ज पर बढ़ती इम्परवियस सरफेस का प्रभाव

Submitted by HindiWater on Mon, 01/13/2020 - 23:24
Source
राष्ट्रीय जलविज्ञान संस्थान, रुड़की और भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, दिल्ली

सारांश 

शहरीकरण के हाइड्रोलॉजिक प्रभावों का आकलन एक महत्वपूर्ण विषय बन गया है क्योंकि शहरीकरण पानी की मात्रा और गुणवत्ता को प्रभावित करता है और साथ ही पानी की मांग को भी बढ़ाता है। इम्परवियस सरफेस, जो शहरी करण के साथ बढ़ता है, बाढ़ को बढ़ावा देता है और ग्राउंड वाटर रिचार्ज को घटाता है। पानी की बढ़ती मांग और गिरते भूजल स्तर को ध्यान में रखते हुए, ग्राउंडवाटर रिचार्ज पर बढ़ती इम्परवियस सरफेस के प्रभावों का आकलन अति आवश्यक हो गया है। इस स्टडी में, एक एल्गोरिथ्म विकसित किया गया है, जिसका नाम रूल-बेस्ड स्पेक्ट्रल अनमिक्सिंग एल्गोरिथम (RBSUA) है, जो सेटेलाइट, सेटेलाइट इमेज का उपयोग करके इम्परवियस सरफेस की वार्षिक समय श्रृंखला प्राप्त करता है। इस एल्गोरिथ का लैंडसैट सेटेलाइट इमेज के साथ उपयोग कर दिल्ली और आसपास के इलाकों में हुए विगत 26 सालों के शहरीकरण का आकलन किया गया है। इसके आलावा, बढे हुए इम्परवियस सरफेस का ग्राउंड वाटर रिचार्ज पर प्रभाव पता करने के लिए एक हाइड्रोलॉजिकल मॉडल, जिसका नाम Wet Spass है, का उपयोग किया गया है। विकसित एल्गोरिथम के मूल्यांकन से पता चला कि इस एल्गोरिथ्म की एक्यूरेसी 88% से 91% के बीच है। एनसीआर, भारत में RBSUA के उपयोग से पता चलता है कि इम्परवियस सरफेस इस क्षेत्र में 1992 के 377=78 km2 के प्रारंभिक क्षेत्र से बढ़कर 2017 में 708 = 64 किमी2 हो गया है। इसके अलावा, 1994 से 2012 तक छब्त्, भारत के हिस्सों में ग्राउंडवाटर रिचार्ज पर शहरीकरण के प्रभाव का आकलन किया गया। इस अध्यन से पता चला कि इन क्षेत्रों में वार्षिक ग्राउंडवाटर रिचार्ज में इम्परवियस सरफेस के बढ़ने से काफी कमी आई है। अध्ययन क्षेत्र में 1994 से 2012 के बीच कुल वार्षिक रिचार्ज 550Mm3 से 531 Mm3 तक घट गया। इस स्टडी में विकसित की गई इम्परवियस सरफेस एक्सट्रैक्शन एल्गोरिथ्म फ्यूचर स्टडीज को मॉडलिंग अनसर्टेनिटी को कम करने में मदद करेगी। इसके आलावा, अध्ययन के रिजल्ट्स बेहतर ग्राउंडवाटर प्रबंधन और शहरी विकास योजनाओं में मददगार होंगे।

Abstract

The assessemnet of the impacts of urbanization on hydrological regime is important as the urbanization affects the water quanity, quality and demand. The impervious surface which is associated with urbanization may increase the flood frequence and magnitude, and decrease groundwater recharge. With the increasing water demand and declining groundwater, the assessment of the impact of increasing impervious surface on groundwater has become important. In this study, an algorithm, named Rule-based Spectral Unmixing Algorithm (RBSUA), is developed to derive annual time series of impervious surface using satellite imagery. The developed algorithm is utilized to derive impervious surface maps for Delhi and adjoining areas during the past 26 years. The impervious surface maps were then utilized with a hydrological model, named WetSpass, to assess the impact on groundwater recharge. The evaluation of the developed algorithm shows that the overall accuracy of the extracted impervious surface varies from 88% to 91% between different years. The result shows that the impervious surface area has increased from 377±78 km2 in 1992 to 708 ±64 km2 in 2017. In addition, the groundwater recharge has declined considerably during the study period. The annual groundwater recharge has decreased from ~550 Mm3 to ~531 Mm3 between 1994 and 2012. The algorithm developed in this study will help reducing modelling uncertainnity in the future  studies. Moreover, the results obtained could be helpful in preparing management strategies for groundwater in the study area.

परिचय

जलविज्ञान चक्र वैश्विक जलवायु तंत्र के लिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह वायुमंडलीय तंत्र को भूमि तंत्र से जोड़ता है। वाष्पीकरण और वाष्पोत्सर्जन जैसे हाइड्रोलॉजिकल घटक, भूमि की सतह पर ऊर्जा संतुलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं और वायुमंडल में कुल जल सामग्री को प्रभावित करते हैं। इसके अलावा, पीने, कृषि और औद्योगिक उद्देश्यों के लिए जल संसाधनों की उपलब्धता हाइड्रोलॉजिकल चक्र पर निर्भर करती है। हाइड्रोलॉजिकल संतुलन विभिन्न घटकों में वर्षा के विभाजन पर निर्भर करता है, जैसे कि वाष्पीकरण, ओवर लैंडफ्लो और इनफिल्ट्रेशन। विभाजन मुख्य रूप से भूमि की सतह के गुणों द्वारा नियंत्रित होता है जैसे कि वनस्पति, मिट्टी, स्थलाकृति आदि। ओवरलैंडफ्लो का जलविज्ञान चक्र में बहुत महत्व है क्योंकि यह पीक रनॉफ को नियंत्रित करता है और परिणाम स्वरूप बाढ़ को भी प्रभावित करता है। इसी तरह, इनफिल्ट्रेशन की मात्रा भूजल पुनर्भरण और base flow को निर्धारित करती है, और इसलिए सूखे के दौरान पानी की उपलब्धता को भी प्रभावित करती है। जलविज्ञान तंत्र की अत्यधिक जटिल प्रकृति और भूमि की सतह की विषमता के कारण, जलतंत्र की प्रति क्रियाओं को समझना एक चुनौतीपूर्ण कार्य है। भू-आवरण परिवर्तन, मुख्य रूप से शहरी विस्तार और वनों की कटाई, सतह और उप-सतह जलविज्ञान दोनों पर कई प्रभाव डालती हैं। वन वाष्पीकरण और स्नोमेल्ट प्रक्रियाओं को प्रभावित करता है, और इस प्रकार ओवर लैंडफ्लो और भूजल पुनर्भरण को प्रभावित करता है। घटे हुए जंगल से वाष्पीकरण कम हो जाता है जो नदी में पीक डिस्चार्ज को बढ़ाता है, जिससे बाढ़ की आवृत्ति बढ़ जाती है (Matheussen et al. 2000)। इसी तरह, बढ़ते शहरी क्षेत्र के परिणाम स्वरूप अभेद्य सतह के बढ़ने से इंफिल्ट्रेशन रेट कम हो जाता है। अभेद्य सतह को ओवर लैंडफ्लो और नदी प्रवाह को बढ़ाने और भूजल पुनर्भरण को कम करने के लिए जाना जाता है। जल संसाधनों पर शहरीकरण का प्रभाव अन्य भू-आवरण परिवर्तनों की तुलना में सबसे गंभीर है, खास कर स्थानीय स्तर पर (Patidar and Behera 2018)। जलविज्ञान पर भू-आवरण परिवर्तन के प्रभावों का आकलन करने के लिए दो तरीके हैं। पहली विधि में, माप गए हाइड्रोलॉजिकल फ्लक्स की लंबी अवधि के अवलोकन, जैसे कि स्ट्रीमफ्लो, भूजल स्तर और वाष्पीकरण की जांच की जाती है (Schilling et al. 2010)। दूसरी विधि हाइड्रोलॉजिकल मॉडल पर आधारित है जिसमें लैंड कवर मैप्स को बदल कर कई बार विभिन्न हाइड्रोलॉजिकल परिदृश्य निकाले जाते हैं (Gashaw et al. 2018)। पहली विधि की मुख्य कमी यह है कि हाइड्रोलॉजिकल फ्लक्स से निकाला गया परिवर्तन अन्य परिवर्तनों के प्रभाव को भी दर्शाता है, जैसे कि जलवायु परिवर्तन, और इन प्रभावों को अलग करना एक चुनौती पूर्ण कार्य है। दूसरी ओर, हाइड्रोलॉजिकल मॉडलिंग में, जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को आसानी से अलग किया जा सकता है। इस स्टडी में, बदले हुए भू-आवरण के कारण भूजल पुनर्भरण में आए बदलाव की जाँच की गयी है। एक एल्गोरिथ्म विकसित किया गया है, जिसका नाम रूल-बेस्डस्पेक्ट्रल अनमिक्सिंग एल्गोरिथम (RBSUA) है, जो सेटेलाइट इमेज का उपयोग करके इम्परवियस सरफेस की वार्षिक समय श्रृंखला बनाता है। इस एल्गोरिथ का लैंडसैट सेटेलाइट इमेज के साथ उपयोग कर दिल्ली और आस पास के इलाको में हुए विगत 26 सालों के शहरीकरण का आकलन किया गया है। इसके आलावा, बढे हुए इम्परवियस सरफेस का ग्राउंडवाटर रिचार्ज पर प्रभाव पता करने के लिए एक हाइड्रोलॉजिकल मॉडल, जिसका नाम Wet Spass है, का उपयोग किया गया है। 

अध्ययन क्षेत्र और डाटा 

अध्ययन क्षेत्र, जो कि नेशनल कैपिटल रीजन (NCR), भारत का शहरी और प्रति-शहरी क्षेत्र है, 28o18’ 20” उ. से 28o52’ 41” उ. अक्षांश और 76o49’ 46” पू. से 77o 29’ 7” पू. देशांतर तक फैला हुआ है। (चित्र 1)। NCR राजधानी क्षेत्र दिल्ली (NCR) पर केंद्रित एक समन्वित योजना क्षेत्र है। यह दिल्ली, उत्तर प्रदेश और राजस्थान के राज्यों से दिल्ली और इस के आसपास के कई जिलों को शामिल करता है। अध्ययन क्षेत्र में दिल्ली, गाजियाबाद, फरीदाबाद, गुड़गांव और नोएडा जैसे एनसीआर के प्रमुख शहर शामिल हैं। यह एक ग्रामीण-शहरी क्षेत्र है जिसमें भूमि उपयोग में काफी विविधता है, इसमें मुख्य रूप से कृषि, झाड़ी, जंगल और शहरी क्षेत्र है। इसका भौगोलिक क्षेत्र 3986 Km2 है यह क्षेत्र, नजफगढ़ ड्रेन, हिंडन नदी और कई अन्य छोटे प्राकृतिक और मानव निर्मित नालों के माध्यम से यमुनानदी में पानी को ड्रेन करता है। इसके अलावा, अध्ययन क्षेत्र में एनसीआर के पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र शामिल हैं, जैसे कि वन, अरावली रिज और वन्य जीव और पक्षी अभयारण्य। अध्ययन क्षेत्र भारतीय अर्थव्यवस्था में एक महत्वपूर्ण योगदान देता है। 

इस अध्ययन में, लैंडसैट 5 (L5 TM), लैंडसैट 7 (L7 ETM+) और लैंडसैट 8 (L8 OLI) के स्तर-2 डेटा उत्पादों का उपयोग किया गया है (http://earthexplorer.usgs.gov/)।क्योंकि ये डेटा सेट वायुमंडलीय रूप से सही हैं, ये बहु-अस्थायी वर्गीकरण और परिवर्तन विश्लेषण के लिए उपयुक्त हैं। अध्ययन ने 1989 से 2017 तक के एक लैंड सैटटाइल (पंक्ति-40, पथ-144) के लिए 10% से कम क्लाउड कवर वाले कुल 244 इमेज का उपय¨ग किया गया है। इसके अलावा, इस अध्ययन में निकाले गए इम्परवियस सरफेस की सटीकता जांचने के लिए ऑर्बिटव्यू-3 सेटेलाइट इमेज का उपयोग किया गया है । यह इमेज 1 अक्टूबर 2006 को ली गई थी और इसका रेसोलुशन 1m है। इस अध्ययन में WetSpass नामक हयड्रोलॉजिकल मॉडल का उपयोग किया गया है। जिसमे 1992 से 2014 तक के उप-पिक्सेल लैंडकवर डेटा RBSUA का उपय¨ग कर के प्राप्त किया गया है। शटल रडार टोपोग्राफी मिशन (SRTM) से डिजिटल एलिवेशन मॉडल (DEM) का उपयोग किया गया है, जिसका रेसोलुशन 90 मीटर है। नेशनल ब्यूरो ऑफ़ सोइल सर्वे एंड लैंड यूज़ प्लानिंग (NBSS एंड LUP) द्वारा बनाए गए मृदा मानचित्र का उपयोग मॉडल में इनपुट के रूप किया गया है। भारत मौसम विभाग (IMD) के ग्रिडेड वर्षा (0.25° X 0.25°) और तापमान 1° x 1° डेटा सेट का भी उपयोग किया गया है। इसके साथ, 3173 ऑब्जरवेशन वेल्स के भूजल स्तर का डेटा केंद्रीय भूजल बोर्ड (CGWB) से प्राप्त किया गया है।

चित्र 1.अध्ययन क्षेत्र: राजधानी क्षेत्र (NCR) का हिस्सा, जिसमें दिल्ली और इससे जुड़ा हरियाणा और उत्तर प्रदेश का क्षेत्र शामिल हैं। 

3. प्रक्रिया 

इस अध्ययन के उपयोग में लायी गई प्रक्रिया को मुख्य दो भागों में बांटा जा सकता है। प्रथम भाग में सन 1992 से 2017 तक के इम्परवियस सरफेस का आकलन किया गया। इसके लिए RBSUA को लैंडसैट इमेज पर लगाया गया और इम्पेरवियस सरफेस में आए पिछले 26 वर्षों के बदलाव का पता लगाया गया। दूसरे भाग में, WetSpass हाइड्रोलॉजिकल मॉडल का उपयोग करके ग्राउंडवाटर रिचार्ज निकाला गया और इम्परवियस सरफेस के प्रभाव का अध्ययन किया गया। सम्पूर्ण प्रक्रिया चित्र 2 में दिखाई गई है।

3.1 RBSUA का उपय¨ग करते हुए सतह की अभेद्यता का पता करना 

रूल-बेस्ड स्पेक्ट्रल अनमिक्सिंग एल्गोरिथ्म (RBSUA) को वार्षिक स्तर पर उप-पिक्सेल इम्परवियस सरफेस की मात्रा निर्धारित करने के लिए विकसित किया गया है। यह लैंडसैट उपग्रह से प्राप्त डाटा की समय श्रृंखला का उपयोग करता है। प्रत्येक वर्ष के लिए, भू-आवरण के वर्गीकरण की सटीकता को बेहतर बनाने के लिए कई इमेज का उपयोग एक साथ किया जाता है। यह एल्गोरिथम, वर्ण क्रमीय प्रासंगिक जानकारी को स्पेक्ट्रल अनमिक्सिंग में एकीकृत करके सटीकता में सुधार करता है। यह जानकारी NDVI के टेम्पोरल वेरिएशन का उपयोग कर के ली जाती है। इसके अलावा यह एल्गोरिथम एक टेम्पोरल फ़िल्टरिंग रूटीन को भी स्पेक्ट्रल अनमिक्सिंग के साथ जोड़ता है ताकि भू-आवरण मैप्स में कंसिसटेंसी को प्राप्त कर सके। इसके लिए कुछ नियमों को लागू करके अतार्किक भू-बदलावों को ठीक किया जाता है। RBSUA कोच्चौगचचिहगणी जरचैि (2019) द्वारा विस्तृत रूप से समझाया गया है। इस स्टडी में, RBSUA का उपयोग करके 1992 से 2017 तक के इम्परवियस सरफेस का आकलन किया गया है। इसके लिए कुल 224 लैंडसैट इमेज का उपयोग किया गया है। 

3.2 भूजल पुनर्भरण का आकलन

भूजल पुनर्भरण का आकलन करने के लिए WetSpass हाइड्रोलॉजिकल मॉडल का उपयोग किया गया है। विभिन्न सेटेलाइट डाटा और इन-सीटू डाटा का उपयोग करके वेटस्पेस के लिए इनपुट तैयार किये गए हैं। WetSpass को स्थानिक रूप से वितरित भूमि उपयोग, मिट्टी का प्रकार, ढलान, वर्षा, वाष्पीकरण, हवा की गति और भूजल की गहराई जैसे डाटा की आवश्यकता होती है। मॉडल के लिए रिमोट सेंसिंग डेटा, जैसे ऑप्टिकल रिमोट सेंसिंग इमेज और क्म्ड, और इन-सीटू डेटा, जैसे कि वर्षा और तापमान दोनों का उपयोग करके प्राप्त किया गया है। 1992 से 2014 तक उप-पिक्सेल लैंड कवर डेटा त्ठैन्। का उपयोग करके प्राप्त किया गया है। शटल रडार टोपोग्राफी मिशन (SRTM) से डिजिटल एलिवेशन मॉडल (DEM) का उपयोग किया गया है, जो 90 मीटर के रेसोलुशन का है। मॉडल का ग्रिड साइज 90 मीटर ग 90 मीटर था, जिसे स्थानिक विविधता और गणना समय के आधार पर चुना गया था। इसके अलावा, कई उपलब्ध डेटा लेयर जो क्म्ड पर आधारित थीं, 90 मीटर के रिज़ॉल्यूशन वाली थीं, जैसे कि ऊँचाई और ढलान। मॉडल के लिए समय का पैमाना मौसमी (सीजन 1: जन-मार्च, सीजन 2: अप्रैल-जून, सीजन 3: जुलाई-सितंबर, सीजन 4: अक्टूबर-दिसंबर) था, जो भूजल स्तर के डेटा के समय के पैमाने पर आधारित था। हालांकि, परिणामों का वार्षिक पैमाने पर विश्लेषण किया गया है।

अध्ययन क्षेत्र में भूजल पुनर्भरण पर शहरीकरण के प्रभावों का आकलन करने के लिए, मॉडल को 1992 से 2014 तक चलाया गया था, जिसमें त्ठैन्। से प्राप्त भूमि कवर की वार्षिक समय श्रृंखला का उपयोग किया गया था। अन्य परिवर्तनों के प्रभावों को अलग करने के लिए मिट्टी, ढलान, तापमान और वर्षा सहित अन्य इनपुट को अपरिवर्तित रखा गया था। 1992 और 2014 के बीच वर्षा और तापमान का अनुमान लगाकर वर्षा और तापमान के लिए एक औसत परिदृश्य का अनुमान लगाया गया ताकि जलवायु परिवर्तन से होने वाले परिवर्तनों को अलग रखा जा सके। 

परिणाम और चर्चा 

प्रस्तुत अध्ययन में, विगत 26 वर्षों मे दिल्ली और आस-पास के क्षेत्र में बढ़े इम्परवियस सरफेस का आकलन किया गया है और इसके परिणाम स्वरुप ग्राउंडवाटर रिचार्ज में हुए बदलाव का भी पता लगाया गया है। इसके लिए सालाना स्तर पर इम्परवियस सरफेस मैप्स तैयार किये गए और हर वर्ष के लिए WetSpass मॉडल का इस्तेमाल करके ग्राउंडवाटर एस्टीमेट किया गया है। 

पिछले 26 वर्षों के दौरान बढ़ी अभेद्य सतह

अध्ययन क्षेत्र में सन 1992 से 2017 तक अभेद्य सतह की वार्षिक स्तर पर जाँच से पता चला कि कुल अभेद क्षेत्र 1992 में 377 Km2 के प्रारंभिक क्षेत्र से बढ़कर 2017 में 708 Km2 हो गया है। यह पाया गया कि अवधि 1992-1999, 2000-2008 and 2009-2017 में औसत वृद्धि दर क्रमशः 7.44 Km2, 21.12 Km2 और 5.602 थी। अभेध सतह के वार्षिक अनुमानों से पता चलता है कि अन्य अवधियों की तुलना में 2000 और 2008 के बीच शहरी विकास दर काफी अधिक थी। चित्र 3 इन बदलावों के विभिन्न आयामों को दर्शाता है। चित्र 3अ सन 1992 और 2017 के बीच प्रत्येक पिक्सेल के भीतर हुए बदलाव को दिखाता है। चित्र 3ब में परिवर्तन समय को दिखाता है जो उस वर्ष को दिखाता है जिसमे अभेध सतह की वृद्धि शुरू हुई थी। इसी तरह चित्र 3स परिवर्तन की अवधि क¨ दर्शाता है ज¨ कि वह साल है जिसमें पिक्सेल पूरी तरह से अभेध सतह में परिवर्तित हो गया हो। मानचित्र से पता चलता है कि शहरी घनत्व में काफी वृद्धि हुई है और परिवर्तन पुराने शहरी क्षेत्रों की परिधि की ओर अधिक है, जो इंगित करता है कि इन क्षेत्रों में कई नए क्षेत्र विकसित हुए हैं। दूसरी ओर, केंद्रीय क्षेत्र मुख्य रूप से अभेध सतह में थोड़ा ही परिवर्तन प्रदर्शित करता है क्योंकि यह क्षेत्र 1992 से पहले ही विकसित हो चुका था। इसके अलावा मानचित्र बताता है कि निर्माण का अधिकांश भाग 2011 से पहले शुरू हुआ था, जबकि हाल के वर्षों (2012 से 2017 के बीच) में बहुत कम परिवर्तन हुआ है। यह परिवर्तन समय का एक स्पष्ट स्थानिक पैटर्न भी दिखाता है, परिधीय क्षेत्रों में विकास शहरी केंद्रों की तुलना में बाद में शुरू हुआ। अधिकांश परिवर्तन 3 वर्ष से कम की अवधि के भीतर हुए हैं, जबकि पूर्वी और पश्चिमी क्षेत्रों में कुछ पिक्सेल 5 वर्ष से अधिक की परिवर्तन अवधि दिखाते हैं।

भू-आवरण का वर्गीकरण विभिन्न आवरणों के समान स्पेक्ट्रम की वजह से एक चुनौती पूर्ण कार्य है, जो शहरी क्षेत्रों में भूमि कवर की स्थानिक और वर्ण क्रमीय विषमता के कारण और भी जटिल हो जाता है। क्योंकि सेटेलाइट इमेज में मिट्टी और इम्परवियस सरफेस पिक्सलों में काफी समानता होती है, इनके बीच भ्रान्ति निश्चित है। अतः शहरी क्षेत्रों में केवल एक तारीख की सेटेलाइट इमेज के आधार पर किये गए विश्लेषण से प्राप्त भू-आवरण मैप्स में गलतियां हो सकती हैं। अगर भू-आवरण का वर्गीकरण करते समय सामयिक बदलावों से सम्बंधित जानकारी को भी classifier के साथ जोड़ा जाये तो परिणामों में सुधार किया जा सकता है। प्रस्तावित पद्धति RBSUA उप-पिक्सेल वर्गीकरण में सामयिक बदलावों से सम्बंधित जानकारी को शामिल करती है जो सटीकता को बढ़ाती है। इसके अलावा, परिणाम बताते हैं कि प्रस्तावित विधि लगभग 89.57 एक्यूरेशी प्रदान करती है।

चित्र 3 - विगत 26 सालों में (1992-2017) में आए इम्परवियस सरफेस में बदलाव-परिवर्तन परिणाम (a), परिवर्तन समय (b) और परिवर्तन अवधि (c) 

4.2 भूजल पुनर्भरण पर बढ़ी हुई अभेद्य सतह का प्रभाव 

सन 1992 से 2014 तक NCR, भारत, में भूजल पर भू-परिवर्तन के प्रभाव का आकलन किया गया है। वार्षिक पैमाने पर उप-पिक्सेल लैंड कवर डेटा का उपयोग करके भूजल पुनर्भरण का अनुकरण किया गया। चित्र 4 वर्ष 1992, 2003 और 2014 के लिए वार्षिक पुनर्भरण दर्शाता है। इस आंकड़े से यह स्पष्ट है कि शहरी क्षेत्र में पुनर्भरण की मात्रा सबसे कम है, जबकि खुले और कृषि क्षेत्रों से पुनर्भरण अधिक होता है। वार्षिक रिचार्ज खुले क्षेत्रों में लगभग 499 mm तक और अधिक घनत्व वाले शहरी क्षेत्रों में 0 mm तक होता है। इसके अलावा, पुनर्भरण पर मिट्टी के प्रकार का प्रभाव भी दिखाई देता है, उदाहरण के लिए, रेतीली मिट्टी के पैच अपेक्षाकृत उच्च रिचार्ज (200 और 240 mm के बीच) दिखाते हैं। यहां यह ध्यान दिया जा सकता है कि, खुले पानी के लिए, WetSpass मॉडल शून्य रिचार्ज दिखाता है। मानचित्रों की तुलना से पता चलता है कि शहरी क्षेत्रों में रिचार्ज में एक महत्वपूर्ण गिरावट आई है, जो कि बढ़ी हुए अभेद्य सतह के कारण है। कई मॉडल ग्रिड हैं जो 1992 में 40-120 mm की सीमा में रिचार्ज दिखाते हैं, जो शहरीकरण के कारण 2014 में घटकर 0-40 mm हो गए हैं। 1992 से 2014 तक के वार्षिक पुनर्भरण में परिवर्तन की प्रविर्ती को चित्र 4 में दिखाया गया है। पुनर्भरण में, अध्ययन क्षेत्र में 1994 से 2012 के बीच 366.00 km2 से 684.16 km2 तक अभेद्य सतह की वृद्धि के कारण 550.93 Mm3 से 531.80 Mm3 (जैसा कि 5-वर्षीय मूविंग एवरेज द्वारा दिखाया गया है ) में कमी देखी गई है।

जल संसाधनों के प्रबंधन के लिए भू-आवरण में हुये परिवर्तन के हाइड्रोलॉजिक प्रभावों का आकलन महत्वपूर्ण है। बढ़ते हुए विकास के कारण शहरी क्षेत्रों में प्रभाव का मूल्यांकन और भी महत्वपूर्ण है। इस अध्ययन में, हाइड्रोलॉजिकल मॉडलिंग में उच्च-आवृत्ति (वार्षिक) उप-पिक्सेल लैंड कवर डेटा का उपयोग प्रस्तुत किया गया है। प्रस्तुत पद्धति WetSpass मॉडल के साथ एक उप-पिक्सेल classifier (RBSUA) को जोड़ती है। इसलिए, यह पारंपरिक तरीकों की तुलना में शहरी विषमता को अधिक सटीक रूप से दर्शाती है, और इस प्रकार अधिक विश्वसनीय हाइड्रोलॉजिकल सिमुलेशन प्रदान करती है। इस अध्ययन के परिणाम बताते हैं कि अध्ययन क्षेत्र में शहरीकरण के कारण भूजल पुनर्भरण में काफी गिरावट आई है। घटे रिचार्ज ने भूजल स्तर को भी प्रभावित किया है। अध्ययन क्षेत्र में घटते भूजल स्तर पर भूमि कवर परिवर्तन के सापेक्ष योगदान की जांच के लिए इस अध्ययन में निकले गए वार्षिक भूजल पुनर्भरण डाटा का उपयोग भविष्य के अध्ययन में किया जा सकता है। 

5. निष्कर्ष 

रिमोट सेंसिंग डेटा हाइड्रोलॉजिकल अध्ययन में उपयोगी है और इनका उपयोग तेजी से बढ़ रहा हैं। बड़े पैमाने पर भूमि कवर परिवर्तनों की पहचान, जैसे कि वनों की कटाई और शहरी विस्तार, मध्यम रिज़ॉल्यूशन डेटा उत्पादों से अपेक्षाकृत आसान है। हालांकि, शहरी भूमि की उच्चतर स्थानिक विषमता और वर्ण क्रमीय समानता के कारण शहरी गतिशीलता का आकलन एक चुनौतीपूर्ण कार्य है। इस अध्ययन में, एक उन्नत उप-पिक्सेल वर्गीकरण एल्गोरिदम को WetSpass मॉडल के साथ जोड़ा गया है। परिणाम दिखाते हैं कि हाइड्रोलॉजिकल मॉडलिंग में उप-पिक्सेल लैंड कवर डेटा का उपयोग अनिश्चितता को कम करने में मदद कर सकता है और विशेष रूप से स्थानीय स्तर पर हाइड्रोलॉजिकल सिमुलेशन की विश्वसनीयता में सुधार कर सकता है। इसके अलावा अध्ययन से पता चला कि NCR, भारत में 1992 से 2014 तक भूजल पुनर्भरण में शहरीकरण की वजह से काफी कमी आयी है। जिन क्षेत्रों में अभेद्य सतह में वृद्धि हुई है, वहां वार्षिक भूजल पुनर्भरण में अपेक्षाकृत अधिक कमी देखी गई। अध्ययन क्षेत्र में 1994 से 2012 के बीच 366 km2 से 684 km2 तक की अभेध सतह की वृद्धि के कारण कुल वार्षिक रिचार्ज 550 Mm3 से 531 Mm3 तक घट गया है। भूमि आवरण परिवर्तन के प्रभाव का आकलन करने के लिए उप-पिक्सेल लैंड कवर डेटा की वार्षिक श्रृंखला इस अध्ययन में लाभकारी सिद्ध हुई है। इस अध्ययन से प्राप्त परिणाम अध्ययन क्षेत्र में बेहतर जल संसाधन प्रबंधन के लिए निर्णय लेने में महत्वपूर्ण होंगे।

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