एक नई किस्म की दुनिया थी नैनीताल

Submitted by HindiWater on Wed, 12/04/2019 - 10:15
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नैनीताल एक धरोहर

फोटो - Thrillopilia

नैनीताल एक प्रकार से नई किस्म की दुनिया थी। यहाँ प्रशासनिक अमला ऊपर से नीचे की ओर क्रमानुसार रहता था। पहाड़ की ऊँचाई के अनुसार पदानुक्रम में बंगले बनाए जाते थे। बंगलों की भौगोलिक ऊँचाई-भव्यता, उच्चता, प्रभाव और साम्राज्यिक संस्कृति की सत्ता के प्रतीक थी। औपनिवेशिक सत्ता का अभिजात्य वर्ग श्रेष्ठता कायम रखने के लिए खुद के प्रशासनिक तंत्र में अनुशासन कायम रखने के उद्देश्य से पहाड़ी की सबसे ऊँची चोटी पर लेफ्टिनेंट गवर्नर, सेना के कमाण्डर और उच्च पदस्थ अधिकारियों के निवास बनाए जाते थे। ताकि श्रेष्ठता भी बनी रहे और ऊँचाई से पहाड़ियों की सुन्दर दृश्यावलियों तथा अप्रतिम प्राकृतिक सौन्दर्य का भी भरपूर लुफ्त उठाया जा सके।

अंग्रेजों की उच्चता एवं श्रेष्ठता की भावनाएँ नैनीताल की बसावट की बुनियादी परिकल्पना में भी स्पष्ट तौर पर परिलक्षित होती हैं। अंग्रेजों ने नैनीताल को सम्पन्न एवं उच्च वर्ग के लिए बसाया। प्रारम्भ में यहाँ सामान्यतः एक व्यक्ति को सात एकड़ जमीन आवंटित करने की व्यवस्था थी। कुमाऊँ के वरिष्ठ सहायक आयुक्त (नैनीताल) को जमीन आवंटित करने के लिए अधिकृत किया गया था। अंग्रेजों द्वारा भारत के पहाड़ी नगरों के लिए खासतौर पर विकसित की गई मिश्रित स्थापत्य शैली का सवा मंजिला लॉफ्ट वाला बंगला और उस बंगले से एक निश्चित दूरी पर दो मंजिली रसोई बनानी होती थी। बंगला और रसोई एक बंद गलियारे (आर्च-वे) से जुड़े होते थे। मुख्य बंगले से थोड़ी-सी दूरी पर एक छोटा बंगला बनाया जाता था, जिसे ‘सनी साइड’ भी कहते थे। बंगले के इर्द-गिर्द फूल, सब्जी और फलों का बगीचा बनता था। फिर एक खूबसूरत टेनिस कोर्ट। मुख्य बंगले की अलग-अलग दिशाओं में विभिन्न प्रयोजनों के लिए छोटे-छोटे मकान बनाए जाते थे। घरेलू काम करने वाले ‘खिदमदगारों’, चौकीदारी करने वाले ‘बरकंदाजों’ डांडी, झम्पानी ढोने वालों, घोड़ा चालकों, सफाई कर्मी आदि के लिए आउट हाउस बनाए जाते थे। घोड़ों के लिए अस्तबल, दूसरे जानवरों के लिए मवेशीघर डांडी-झम्पानी रखने के लिए डांडी शेड बनाया जाता था। धोबी के लिए अलग से एक छोटा घर बनाया जाता था। तब नैनीताल की आधे से ज्यादा आबादी इन्हीं आउट हाउसों में आबाद थी। बंगला बनाने वाले को अपनी रोजमर्रा की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए सभी व्यवस्थाएँ खुद करनी होती थीं। अपने सभी सेवादारों की बुनियादी आवश्यकताओं को पूरा करने की जिम्मेदारी भी बंगले के मालिक की ही होती थी।

अपने परिसर की साफ-सफाई तथा बरसाती पानी को नालियों द्वारा पास के सार्वजनिक नालों तक पहुँचने की जिम्मेदारी भी भवन स्वामी की ही होती थी। स्पष्ट है कि यहाँ वही व्यक्ति बंगला बना सकता था, जिसके पास इतने संसाधन जुटाने की क्षमता हो। जिनमें खुद का बंगला बना पाने और उसके रख-रखाव की सामर्थ्य नहीं हो, उसके पास किराए पर मकान लेकर नैनीताल में रहने का विकल्प था।

अधिकांश बंगलों के अपेक्षाकृत हिस्सों में ढालदार जमीन की तल में बड़े-बड़े गड्ढे खोदकर ‘हिम कुंड’ बनाए जाते थे। जाड़ों में बर्फबारी के दौरान ढालदार जमीन की बर्फ स्वतः ही खिसककर इन हिमकुंडों में जमा हो जाती थी। इन हिमकुंडों का इस्तेमाल फ्रिज के तौर पर किया जाता था। इनमें बीयर एवं शीतल पेय को गाड़ दिया जाता था। नगर के अनेक क्षेत्रों में प्राकृतिक रूप से भी हिमकुंड बने थे, इनमें अप्रैल-मई के महीने तक बर्फ जमा रहती थी। बरसात में ये गड्ढे तालाब के लिए जल संग्रहण का काम भी करते थे। अंग्रेजो द्वारा नैनीताल में निर्मित गिरजाघर और सार्वजनिक उपयोग की इमारतों में ईसाई स्थापत्य गैथिक के नैतिक और सौन्दर्यपरक मूल्यों का प्रभाव रहा। जबकि अन्य भवनों के निर्माण में स्थानीय तौर पर उपलब्ध संसाधनों और यहाँ के मौसम तथा जलवायु के मद्देनजर एक मुक्तहस्त मिश्रित शैली अपनाई गई। जिसे ‘नैनीताल पैटर्न’ कहा गया।

भारत में अन्य हिल स्टेशनों की तरह नैनीताल भी अंग्रेजों का प्रिय ऐशगाह था। तब नैनीताल को शिक्षा एवं स्वास्थ्य लाभ के केन्द्र के रूप में जाना जाता था। अंग्रेज शासक नैनीताल की सुरक्षा, स्वास्थ्य, सफाई और पर्यावरण समेत हरेक पक्ष का बखूबी ख्याल रखते थे। पारिस्थितिकीय एवं पर्यावरण सुरक्षा को गम्भीरता से लिया जाता था। अंग्रेजों ने यहाँ वह सब व्यवस्थाएँ की, जिससे यहाँ की हवा एवं पानी साफ रह सके और नैनीताल की सुन्दरता, शान्ति तथा सुरक्षा बनी रहे।

 

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