गाँवों के अनुकूल आवासन

Submitted by UrbanWater on Sat, 10/14/2017 - 14:01
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योजना, सितम्बर 2017

वर्ष 2022 तक सभी के लिये आवास योजना के अन्तर्गत प्रत्येक वर्ष ग्रामीण क्षेत्रों में लगभग 40 लाख घरों का निर्माण किया जाएगा। सरकार ने वर्ष 2016-17 से लेकर 2018-19 की अवधि के लिये 81,975 करोड़ रुपए की वित्तीय लागत से एक करोड़ घरों के निर्माण के लिये मंजूरी प्रदान कर दी है। सरकार का यह कदम प्रधानमंत्री के विजन वर्ष 2022 तक सभी के लिये आवास की दिशा में उठाया गया महत्त्वपूर्ण कदम है।

आवासहीनता विश्व भर में एक बढ़ती हुई समस्या है। अफ्रीका, लैटिन अमेरिका और एशिया में आवासहीनता की समस्या तेजी से बढ़ रही है। ये सभी वैसे देश भी हैं जिनमें जनसंख्या भी तेजी से बढ़ रही है। मनुष्य के लिये भोजन और कपड़े के बाद आधारभूत जरूरतों में से एक रहने के लिये स्थान है। आवासहीन व्यक्ति वह होता है जो आवास को प्राप्त नहीं कर पाता है या नियमित और सुरक्षित आश्रय को बनाए रखने के लिये सक्षम नहीं होता।

भारत का वैश्विक आर्थिक कद बढ़ने के बावजूद यहाँ 10 लाख से भी अधिक बेघर लोग रहते हैं। 2011 की जनगणना के अनुसार, भारत में 17.7 लाख या देश की कुल जनसंख्या के 0.15 प्रतिशत लोग आवासहीन थे। अर्थात वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार, भारत में आवासहीन लोगों की संख्या 17,73,040 है, जिनमें से 52.9 प्रतिशत शहरी क्षेत्रों में और 47.1 प्रतिशत ग्रामीण क्षेत्रों में रहते हैं। ये आँकड़े उस परिभाषा के आधार पर दिये गए हैं जो किसी व्यक्ति या परिवार को आवासहीन के रूप में पहचानती है, यदि वे छत वाले मकान में नहीं रहते हैं। भारत में 1 करोड़ 87 लाख घरों की कमी है जबकि भारत में कुल घरों की संख्या 5 करोड़ 20 लाख से बढ़कर 7 करोड़ 84 लाख (जनगणना 2011 के अनुसार) हो गई है।

वर्तमान में भारत के समक्ष सभी गम्भीर चुनौतियों में से सर्वाधिक गम्भीर चुनौती उचित आश्रय स्थान प्रदान करने की है। गरीबी उन्मूलन के लिये सभी के लिये आवास एक महत्त्वपूर्ण कारक है। भारत में, लगभग तीन चौथाई जनसंख्या ग्रामीण क्षेत्रों में निवास करती है। शहरी क्षेत्रों और बस्तियों में आवासहीनता की समस्या अपर्याप्त ग्रामीण आवास या ग्रामीण रोजगार के अवसरों की कमी के कारण और अधिक बढ़ जाती है। पर्याप्त आवास की समस्या ग्रामीण क्षेत्रों में बहुत अधिक है जहाँ पर बड़ी संख्या में गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले (बीपीएल) लोग रहते हैं।

स्वतंत्रता के बाद शरणार्थियों के पुनर्वास के लिये तत्काल शुरू किया गया था। वर्ष 1960 तक, भारत के विभिन्न हिस्सों में लगभग 5 लाख परिवारों को घर प्रदान किये गए हैं।

दिनांक 1 जनवरी 1996 से लागू इन्दिरा आवास योजना एक स्वतंत्र कार्यक्रम था जिसका लक्ष्य गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले (बीपीएल) गृहस्थों की आवास सम्बन्धी जरूरतों का समाधान करना था। यद्यपि इन्दिरा आवास योजना कार्यक्रम ने ग्रामीण आवास की कमी को महत्त्वपूर्ण रूप से कम किया था लेकिन इस योजना के कार्यान्वयन के 30 साल बाद भी ग्रामीण आवास मामले में कमी बनी हुई है। इसलिये, पर्याप्त संख्या में आवास की जरूरत और महत्त्व को समझते हुए, भारत सरकार ने वर्ष 2022 तक सभी के लिये आवास प्रदान करने को लेकर प्रतिबद्धता दिखाई है।

सरकार की प्रतिबद्धता को पूरा करने और ग्रामीण आवास अन्तरालों से निपटने के लिये इन्दिरा आवास योजना को दिनांक 1 अप्रैल 2016 से प्रधानमंत्री आवास योजना-ग्रामीण (पीएमएवाई-जी) के रूप में पेश किया गया है। हाल ही में प्रधानमंत्री आवास योजना (पीएमएवाई) ने आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों (ईडब्ल्यूएस) और निम्न आय समूह (एलआईजी) के साथ-साथ मध्यम आय समूहों की आवास सम्बन्धी जरूरतों को पूरा करने के लिये अपने कार्य क्षेत्र का विस्तार किया है। सरकार की महत्त्वाकांक्षी योजना वर्ष 2022 तक सभी के लिये आवास का लक्ष्य, शहरी क्षेत्रों में दो करोड़ किफायती घरों और ग्रामीण क्षेत्रों में तीन करोड़ किफायती घरों का निर्माण करना है।

आवास योजना को मनरेगा और स्वच्छता कार्यक्रम से भी जोड़ा जाएगा जिससे कि घरों में निकासी सुविधा जैसी बेहतर सुविधाएँ भी प्रदान की जा सकें। वर्ष 2022 तक सभी के लिये आवास योजना के अन्तर्गत प्रत्येक वर्ष ग्रामीण क्षेत्रों में लगभग 40 लाख घरों का निर्माण किया जाएगा। सरकार ने वर्ष 2016-17 से लेकर 2018-19 की अवधि के लिये 81,975 करोड़ रुपए की वित्तीय लागत से एक करोड़ घरों के निर्माण के लिये अपनी मंजूरी प्रदान कर दी है। सरकार का यह कदम प्रधानमंत्री के विजन वर्ष 2022 तक सभी के लिये आवास की दिशा में उठाया गया महत्त्वपूर्ण कदम है। सामाजिक/आर्थिक जाति गणना (एसईसीसी) 2011 के अन्तिम आँकड़ों के अनुसार, भारत में लगभग चार करोड़ ग्रामीण गृहस्थ आवासहीनता की समस्या की सामना कर रहे हैं।

प्रधानमंत्री आवास योजना ग्रामीण (पीएमएवाई-जी) के अन्तर्गत वर्ष 2016-17 से लेकर 2018-19 तक की अवधि के प्रथम चरण में एक करोड़ घरों के निर्माण का लक्ष्य रखा गया है। सभी राज्यों और संघ राज्य क्षेत्रों द्वारा एसईसीसी 2011 के आँकड़ों के आधार पर स्थायी प्रतीक्षा सूचियों का सत्यापन और उन्हें अन्तिम रूप दिये जाने के बाद वर्ष 2022 तक इसके अगले चरण के लिये लक्ष्यों को निर्धारित किया जाएगा। इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिये तकनीकी सहायता प्रदान करने की खातिर राष्ट्रीय स्तर पर ग्रामीण आवास के मद्देनजर राष्ट्रीय तकनीकी सहायक एजेंसी (एनटीएसए) की स्थापना भी की जाएगी। इस कार्यक्रम के लिये बजटीय सहायता और राष्ट्रीय कृषि एवं ग्रामीण विकास बैंक (नाबार्ड) से ऋण के रूप में पर्याप्त वित्तीय संसाधनों को उपलब्ध करा दिया गया है।

विलम्बित भुगतानों की समस्याओं को सुलझाने और तेजी से परियोजना को पूरा करने के लिये प्रत्यक्ष लाभ अन्तरण (डीबीटी) के अन्तर्गत इलेक्ट्रॉनिक हस्तान्तरण के रूप में सहायता इसकी एक अन्य विशिष्टता है। एमआईएस-आवास सॉफ्ट स्कीम के माध्यम से समेकित ऑनलाइन मॉनिटरिंग भी कराई जाएगी। किसी भी प्रकार के विलम्ब को कम करने के लिये घरों का निरीक्षण और भूखण्डों की टैगिंग की सुविधा वाले एक मोबाइल एप-आवास एप की भी व्यवस्था की गई है। प्रशिक्षण, मूल्यांकन और प्रमाणीकरण का एक कार्यक्रम प्रशिक्षित ग्रामीण मजदूरों की संख्या बढ़ाने में भी मददगार साबित होगा।

पीएमएवाई-जी के अन्तर्गत, लाभार्थी को पक्के घर के निर्माण के लिये मैदानी इलाकों में 1.20 लाख रुपए, पहाड़ी राज्यों, दुर्गम इलाकों और आईएपी जिलों में 1.30 लाख रुपए की सहायता प्रदान की जाती है। जिन क्षेत्रों में सामग्रियों की उपलब्धता का अभाव, खराब कनेक्टिविटी, प्रतिकूल भू-आकृतिक और जलवायु परिस्थितियों आदि कारकों के कारण निर्माण की लागत अधिक है उन क्षेत्रों के लिये सहायता की मात्रा भिन्न है। राज्य के भीतर किसी क्षेत्र को दुर्गम घोषित करने का कार्य राज्य सरकारों द्वारा किया जाएगा।

घरों के निर्माण के लिये लाभार्थियों को वित्तीय सहायता प्रदान करने के साथ-साथ, उपलब्ध संसाधनों के भीतर गुणवत्ता वाले घरों का समयबद्ध निर्माण पूरा सुनिश्चित करने के के लिये यह अनिवार्य है कि लाभार्थियों को सामग्रियों और संसाधनों की जरूरतों का चरणबद्ध ब्यौरा, स्थानीय रूप से उचित घरों के डिजाइनों के विभिन्न विकल्प, लागत प्रभावी निर्माण प्रौद्योगिकियों की जागरुकता, निर्माण सामग्री की खरीद के लिये सुविधा, घर निर्माण के लिये प्रशिक्षित मजदूरों की पर्याप्त संख्या में उपलब्धता आदि जैसी महत्त्वपूर्ण सहायता सुविधाएँ प्रदान की जाये।

सहायता सेवा के प्रावधान के लिये निम्नलिखित क्षेत्रों में कार्यवाही की जरूरत होगी:

1. लाभार्थियों को संवेदनशील बनाना
2. आवास डिजाइन अध्ययन का विकास और प्रावधान
3. मजदूरों का प्रशिक्षण और कौशल प्रमाणीकरण
4. निर्माण सामग्री की खरीद
5. वृद्धि एवं निशक्त लाभार्थियों को सहायता
6. 70,000 तक का ऋण बैंकों से प्रदान करने की सुविधा

नवाचार रणनीतियाँ


सभी के लिये आवास में नवाचारी रणनीतियों के लिये सभी राज्यों से उम्मीद है कि वे लाभार्थियों के उनके निवास क्षेत्र के अनुकूल उचित प्रौद्योगिकी का प्रयोग करके उसे स्थानीय स्थितियों के अनुसार आवास डिजाइनों के विकल्पों का एक समूह प्रदान करेंगे। मुख्य आवास डिजाइन में स्वच्छ भोजन पकाने के लिये एक समर्पित स्थान, शौचालय के लिये स्थान और नहाने के लिये स्थान भी शामिल होना जरूरी है।

घर की दीवारें और छत इतनी मजबूत होनी चाहिए कि वे लाभार्थी के निवास क्षेत्र की जलवायु सम्बन्धित परिस्थितियों को सहन कर पाएँ और उसमें भूकम्प, चक्रवात, बाढ़ आदि सहन करने योग्य आपदा के अनुसार लचीली विशिष्टताएँ (जहाँ भी आवश्यक हो) भी शामिल हों। आवास डिजाइन में निम्नलिखित विशेषताएँ भी शामिल हों जिन्हें लाभार्थी द्वारा संसाधनों की उपलब्धता के आधार पर अपने घर में बाद में शामिल किया जा सके।

1. आजीविका सम्बन्धी कार्यकलापों के लिये पर्याप्त स्थान
2. वर्षाजल संरक्षण प्रणाली
3. आँगन

वर्ष 2018-19 तक एक करोड़ घरों के निर्माण के लिये पीएमएवाई-जी कार्यक्रम की कुल लागत 1,30,075 करोड़ रुपए है। यह लागत भारत सरकार और राज्य सरकारों के बीच में 60:40 के अनुपात में साझा की जाएगी। उत्तर पूर्वी राज्यों और तीन हिमालयी राज्य जम्मू एवं कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखण्ड की स्थिति में, लागत साझा करने की संरचना का अनुपात 90:10 होगा। संघ राज्य क्षेत्रों (यूटी) के सम्बन्ध में सरकार पूर्ण लागत प्रदान करेगी।

इस कार्यक्रम की कुल लागत का केन्द्रीय हिस्सा 81,975 करोड़ रुपए बैठता है जिसमें से 60,000 करोड़ रुपए की लागत को बजटीय सहायता से पूरा किया जाएगा और 21,975 करोड़ रुपए नाबार्ड से ऋण के माध्यम से पूरे किये जाएँगे। इसे 2022 के पश्चात बजटीय अनुदानों के माध्यम से चुकाया जाएगा।

राज्य ग्राम पंचायत खण्ड अथवा जिले के रूप में एक यूनिट का उपयोग करते हुए सन्तृप्तता दृष्टिकोण को अपना सकते हैं। एसएजीवाई ग्राम पंचायतों, अर्बन क्लस्टरों, खुले में शौच मुक्त ग्राम पंचायतों और महिलाओं के लिये दीनदयाल उपाध्याय राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका योजना (डीएवाई-एनआरएलएस) स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से मजबूत सामाजिक पूँजी वाली ग्राम पंचायतों को भी प्राथमिकता दी जाएगी। सन्तृप्त का दृष्टिकोण देख-रेख, मजदूरों और सामग्रियों की उपलब्धता तथा समावेशी आवास योजना में सुधार करता है।

विकलांग (दिव्यांग) (समान अवसर, अधिकारों का संरक्षण और पूर्ण भगीदारी) अधिनियम, 1995 में विकलांगजनों के लिये सामाजिक सुरक्षा की व्यवस्था की गई है। तदनुसार, पीएमएवाई-जी स्कीम में जिन लाभार्थियों को सहायता प्रदान की जानी होगी, उन सभी के बीच पारस्परिक प्राथमिकता का निर्धारण करने में दिव्यांग सदस्य वाले गृहस्थों और निशक्त युवा सदस्य वाले गृहस्थों को वंचितता के हिसाब से अंक प्रदान किये जाएँगे जिससे कि ऐसे गृहस्थों को घरों का आवंटन करते समय प्राथमिकता प्रदान की जा सके। निशक्तजन अधिनियम, 1995 के प्रावधानों को ध्यान में रखते हुए राज्य जहाँ तक सम्भव हो, यह सुनिश्चित करेगा कि राज्य स्तर पर लाभार्थियों का 3 प्रतिशत निशक्तजनों के बीच में से हो।

सरकार ने पीएमएवाई-जी के अन्तर्गत लाभार्थियों को 1 वर्ष में निर्धारित 100 दिनों से भी अधिक कार्य दिवसों के नियम के मद्देनजर घरों के निर्माण के कार्य के लिये मनरेगा रोजगार कार्ड धारकों को संलग्न करने की भी अनुमति दी है। इससे घरों का तेजी से निर्माण पूरा हो पाएगा और ग्रामीण संकट के समय में अधिक कार्य की इच्छा रखने वाले मनरेगा कार्ड धारकों को अतिरिक्त आय भी प्राप्त हो पाएगी।

इसके अलावा, जहाँ तक सम्भव हो, कुल फंड में से 15 प्रतिशत फंड ग्रामसभा द्वारा मान्यता प्राप्त एसईसीसी 2011 के अनुसार कवर किये जाने वाले गृहस्थों के लिये राष्ट्रीय स्तर पर अल्पसंख्यकों की खातिर निर्धारित की जाएगी। अल्पसंख्यकों के लिये लक्ष्यों का आवंटन जनगणना 2011 के आँकड़ों के अनुसार सम्बन्धित राज्य/संघ राज्य क्षेत्र में ग्रामीण अल्पसंख्यक जनसंख्या के अनुपातिक आधार पर दिया जाएगा। यद्यपि, ग्रामसभा द्वारा एसईसीसी आँकड़े के सत्यापन के आधार पर स्थायी प्रतीक्षा सूची को अन्तिम रूप दिये जाने के पश्चात प्रत्येक राज्य/संघ राज्य क्षेत्र में अल्पसंख्यकों के लक्ष्य को उस आधार पर पुनः आकलित किया जाएगा।

राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग अधिनियम 1992 की धारा 2(ग) के अन्तर्गत अधिसूचित अल्पसंख्यक को अल्पसंख्यक अनुदान के विरुद्ध लाभ प्राप्त करने के लिये पात्र समझा जाएगा।

कार्यान्वयन सहायता प्रणाली


ग्रामीण आवास के लिये राष्ट्रीय तकनीकी सहायता एजेंसी: सभी के लिये आवास के लक्ष्य को प्राप्त करने में, तकनीकी सहायता प्रदान करने के लिये ग्रामीण आवास के लिये राष्ट्रीय स्तर पर राष्ट्रीय तकनीकी सहायता एजेंसी (एनटीएसए) की स्थापना की जा रही है। इस एजेंसी का काम गुणवत्तापूर्ण निर्माण को सुनिश्चित करना, कार्यान्वयन की निगरानी करना, अतिरिक्त बजटीय वित्त का प्रबन्धन, सूचना शिक्षा और संचार (आईईसी) गतिविधियाँ, ई-गर्वनेंस समाधान का विकास एवं प्रबन्धन करना, आँकड़ा विश्लेषण, प्रशिक्षण एवं कार्यशालाओं का आयोजन करना, राज्य/संघ राज्य सरकारों द्वारा पहचानी गई तकनीकी सुविधा में केन्द्र की कार्यप्रणाली के सम्बन्ध में निगरानी और सुविधा प्रदान करना।

योजनाओं का समेकन


घरों के निर्माण के लिये सहायता प्रदान करने के अतिरिक्त आधारभूत सुविधाएँ प्रदान करने के लिये राज्य और केन्द्र सरकारों दोनों की मौजूदा योजनाओं का समेकन सुनिश्चित किया जाना जरूरी है। विभिन्न योजनाएँ जिन्हें आधारभूत सुविधाओं को प्रदान करने के लिये समेकित रूप में लागू किया जाना जरूरी है, वे इस तरह हैं:

1. शौचालय के निर्माण को पीएमएवाई-जी के तहत घर क अभिन्न अंग बनाया गया है। लाभार्थियों को शौचालय की सुविधा स्वच्छ भारत मिशन-ग्रामीण (एसबीएम-जी) मनरेगा या किसी अन्य समर्पित वित्त संसाधन के माध्यम से प्रदान की जाएगी। इस योजना के अन्तर्गत घरों को पूरा बना हुआ तभी माना जाएगा जब उसमें शौचालय का निर्माण किया गया होगा।

2. पीएमएवाई-जी लाभार्थी को मनरेगा के साथ समेकित करने में उसके घर के निर्माण के लिये वर्तमान दरों पर 90 दिनों का (पहाड़ी राज्यों, दुर्गम क्षेत्रों और आईएपी जिलों में 95 दिन) अकुशल मजदूरी रोजगार प्रदान करना अनिवार्य है। पीएमएवाई-जी के आवास-सॉफ्ट और एमजीएनआरईजीएस के नरेगा-सॉफ्ट दोनों एमआईएस के बीच सर्वर से लेकर सर्वर तक एकीकरण कर लिया गया है जिससे आवास-सॉफ्ट पर घर की मंजूरी जारी होते ही नरेगा-सॉफ्ट पर घर के निर्माण के लिये चीजें स्वयं ही शुरू हो जाये।

3. जीवन की जरूरतों में सबसे महत्त्वपूर्ण जरूरत स्वच्छ पेयजल है। पीएमएवाई-जी के लाभार्थी को पेयजल एवं स्वच्छता मंत्रालय के राष्ट्रीय ग्रामीण पेयजल कार्यक्रम या किसी अन्य समतुल्य स्वच्छ पेयजल तक पहुँच प्रदान की जानी चाहिए।

4. बिजली मंत्रालय की दीनदयाल उपाध्याय ग्राम ज्योति योजना (डीडीयूजीजेवाई) पीएमएवाई-जी लाभार्थी को बिजली का कनेक्शन प्रदान करने के लिये प्रभावी होगी। राज्य/संघ राज्य क्षेत्र को यह सुनिश्चित करना होगा कि पीएमएवाई-जी के लाभार्थियों को सौर लालटेन, सौर गृह लाइटिंग प्रणाली, सौर स्ट्रीट लाइटिंग प्रणालियों सहित नवीन एवं अक्षय ऊर्जा मंत्रालय द्वारा कार्यान्वित की जा रही योजनाओं तथा राष्ट्रीय बायोगैस एवं खाद प्रबन्धन कार्यक्रम के अन्तर्गत लाभार्थी परिवार को बायोगैस यूनिट और स्वच्छ भोजन पकाने की ऊर्जा के लिये नेशनल बायोमास कुकस्टोव कार्यक्रम (एनबीसीपी) से लाभ मिले।

5. पीएमएवाई-जी के लाभार्थियों को स्वच्छ और अधिक प्रभावी भोजन पकाने का ईंधन प्रदान करने के लिये राज्यों/संघ को पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय की प्रधानमंत्री उज्जवला योजना के अन्तर्गत उनके लिये एलपीजी कनेक्शन को प्राप्त करने का प्रयास करना चाहिए।

6. गृहस्थों के लिये स्वच्छ एवं स्वस्थ पर्यावरण को सुनिश्चित करने के लिये गृहस्थों द्वारा तैयार किये गए कठोर एवं तरल अपशिष्ट का उपचार किया जाना जरूरी है। तद्नुसार, सरकार स्वच्छ भारत मिशन-जी या किसी राज्य/संघ राज्य क्षेत्र सरकार की किसी अन्य योजना के साथ समेकन के माध्यम से ठोस एवं तरल अपशिष्ट के प्रबन्धन को सुनिश्चित करेगी।

7. भवन निर्माण सामग्री की जरूरत को पूरा करने के लिये, राज्य/संघ राज्य क्षेत्र भवन निर्माण सामग्री का उत्पादन शुरू कर सकता है जैसे ईंटें, स्टेबलाइज्ड मड ब्लॉक, फ्लाई ऐश की ईंटे आदि को मनरेगा के समेकन के माध्यम से निर्मित करवा सकता है। इस प्रकार उत्पादन की गई सामग्री को पीएमएवाई-जी के लाभार्थियों को आपूर्ति की जाएगी।

8. राज्य/संघ राज्य क्षेत्रों को मनरेगा के साथ समेकन के माध्यम से आवास स्थलों का विकास, बायो फेन्सिंग, सड़क मार्ग, सम्पर्क, सड़क या घरों तक सम्पर्क, मृदा संरक्षण और सिविल निर्माण संरक्षण आदि जैसी सामूहिक/व्यक्तिगत सुविधाओं का विकास करना होगा।

ग्रामसभा द्वारा मान्यता प्राप्त एसईसीसी 2011 डाटाबेस, पीएमएवाई-जी में लाभार्थियों के चयन के लिये आधार हैं और इस डाटा को कई अन्य कार्यक्रमों द्वारा प्रयोग किया जा रहा है। यदि इसे नियमित रूप से अपनाया गया, तो लाभों का समेकन बहुत अधिक आसान हो जाएगा।

रिपोर्टिंग और मॉनीटरिंग


पीएमएवाई-जी में कार्यक्रम का कार्यान्वयन और मॉनीटरिंग पूर्ण रूप से ई-गर्वनेंस मॉडल के माध्यम से इस स्कीम में सेवा सुपुर्दगी के आधार पर ई-गर्वनेंस के लिये दो प्रणालियाँ होंगी:

1. पीएमएवाई-जी एमआईएस आवास-सॉफ्ट, और
2. पीएमएवाई-जी मोबाइल एप्लीकेशन आवास-सॉफ्ट

पीएमएवाई-जी के अन्तर्गत कार्य प्रदर्शन की निगरानी और प्रक्रियाओं की निगरानी के लिये एक व्यापक मॉनीटरिंग तंत्र अपनाया गया है। कार्य प्रदर्शन की मॉनीटरिंग आवास-सॉफ्ट में कार्यप्रवाह सक्षम ट्रांजेक्शनल डेटा का उपयोग करके प्रगति को रियल टाइम पर देखकर किया जाता है। आवास सॉफ्ट में ट्रांजेक्शनों से तैयार डाटा को कार्य प्रदर्शन के विभिन्न पूर्व निर्धारित मापदण्डों पर मॉनीटरिंग करने के लिये सिस्टम जनरेटेड रिपोर्टों के रूप में एकत्रित किया जाएगा। कार्य प्रक्रिया मॉनीटरिंग तंत्र में जैसे केन्द्रीय दलों द्वारा निरीक्षण (क्षेत्र अधिकारियों और एनएलएम), संसद सदस्यों द्वारा नेतृत्व की जाने वाली जिला विकास समन्वय एवं मॉनीटरिंग (दिशा) समिति, सामाजिक लेखा परीक्षा और राष्ट्रीय राज्यस्तरीय पीएमयू के माध्यम को अपनाया गया है।

आवास-सॉफ्ट रियल टाइम ट्रांजेक्शनल डाटा के आधार पर विभिन्न मापदण्डों पर कई रिपोर्टों को करता है। पीएमएवाई-जी के अन्तर्गत सभी रिपोर्टिंग आवास-सॉफ्ट में तैयार की गई रिपोर्टों के माध्यम से की जाती है। इस स्कीम के अन्तर्गत राज्यों/संघ राज्य क्षेत्रों की कार्य प्रगति को आवास सॉफ्ट से तैयार की गई रिपोर्टों के माध्यम से ही मॉनीटर किया जाएगा।

आवास-सॉफ्ट


आवास-सॉफ्ट पीएमएवाई-जी में ई-गर्वनेंस को सुविधाजनक बनाने के लिये वेब आधारित इलेक्ट्रॉनिक सेवा सुपुर्दगी मंच है। भूमि की उपलब्धता और अपेक्षित संरचनात्मक सुविधाओं के साथ इसका समयबद्ध तरीके से विकास और सेवा आवास कार्यकलाप के सन्तुलित विकास को सुविधाजनक बनाने के लिये सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है। मजबूत भू-नीति का निर्माण और कार्यान्वयन अत्यधिक महत्त्वपूर्ण है। पीएमएवाई के दोनों अंग शहरी एवं ग्रामीण केवल एक ही समाधान पर ध्यान केन्द्रित करना जारी रखेंगे, यह समाधान आवास का स्वामित्व प्रदान करना है। इसके लिये पर्याप्त भूमि को ढूँढना बहुत बड़ी समस्या है, विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में जहाँ आवास के लिये भूमि में सार्वजनिक भूमि क्षेत्र कई प्रकार की चुनौतियाँ प्रस्तुत करता है। नए भवन निर्माण सामग्री की लागत प्रभावी प्रौद्योगिकियों को प्रस्तुत करके और निर्माण में उचित प्रौद्योगिकी का उपयोग और उत्पादन प्रक्रियाओं तथा भवन निर्माण सामग्री का पुनः प्रयोग करना निर्माण कार्य की लागत को कम करने की दिशा में महत्त्वपूर्ण प्रयास है। इस प्रकार निर्माण कार्य में स्थानीय रूप से उपलब्ध कच्चे माल, कच्ची सामग्रियों का उपयोग करने की जरूरत है। सीमित आय तथा निम्न आय ऋणियों के लिये गृह वित्त तक न्यूनतम पहुँच होने के साथ-साथ आवास विकल्पों की उपलब्धता के अभाव में, करोड़ों भारतीय गृहस्थ स्वच्छता, स्वच्छ जल, सीवर और बिजली जैसी आधारभूत सुविधाओं की पहुँच से बाहर रह जाते हैं।

निष्कर्ष


पीएमएवाई-जी कार्यक्रम स्किल इण्डिया, डिजिटल इण्डिया, मेक इन इण्डिया, सूचना प्रौद्योगिकी, प्रत्यक्ष लाभ अन्तरण, आधार प्लेटफार्म और प्रधानमंत्री जन धन योजना को एक साथ लाने में एक बहुत बड़ा कदम है। यह कार्यक्रम वर्ष 2019 तक 5 लाख ग्रामीण मजदूरों को कौशल विकास प्रशिक्षण प्रदान करने की व्यवस्था करता है और इस कार्यक्रम के माध्यम से आवास अध्ययनों, पर्यावरण सम्बन्धी खतरों और गृहस्थों की जरूरतों के विस्तृत अध्ययन के आधार पर देश भर में 200 से भी अधिक आवास डिजाइन उपलब्ध कराए जाएँगे। समेकन के माध्यम से भोजन बनाने के स्थान, बिजली की सुविधा, एलपीजी, शौचालय, नहाने का स्थान, स्वच्छ जल आदि के साथ पूर्ण घर सहित बड़े स्तर पर स्थानीय सामग्रियों के उपयोग की परिकल्पना की गई है। इस कार्यक्रम का लक्षित वर्ग गरीब गृहस्थ हैं और यह लाभार्थियों के सटीक चयन को सुनिश्चित करने और कार्य की प्रगति को सुनिश्चित करने के लिये सूचना संचार प्रौद्योगिकी (आईसीटी) और अन्तरिक्ष प्रौद्योगिकी का उपयोग करता है।

भारत में निर्माण क्षेत्र दूसरे नम्बर पर सबसे अधिक संख्या में रोजगार तैयार करता है। इस क्षेत्र का प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से 250 से भी अधिक अनुषांगिक उद्योगों से मजबूत सम्बन्ध है। ग्रामीण आवास का विकास करने से ग्रामीण समुदाय में रहने वाले लोगों के लिये रोजगार सृजन होंगे, जिससे कि निर्माण सम्बन्धी व्यवसायों में नई माँग को पूरा करने के लिये ग्रामीण समुदाय में रहने वाले लोगों के लिये नए रोजगारों का सृजन होगा। भवन निर्माण सामग्री की खरीद, कुशल और अकुशल श्रमिकों की सेवाओं का उपयोग, ट्रांसपोर्ट सेवाओं का उपयोग और इसके परिणामस्वरूप वित्तीय संसाधनों का प्रवाह आर्थिक गतिविधियों का सकारात्मक चक्र बनाता है और यह गाँव में माँग भी बढ़ाता है। इसका दो चरणों में प्रभाव पड़ता है- पहला प्रभाव निर्माण के दौरान और दूसरा प्रभाव घर ऑक्यूपेंसी के दौरान सकारात्मक प्रभावों में बढ़ी हुई सामाजिक पूँजी और सन्तुलित समुदायों सहित सामाजिक एकीकरण शामिल है। आवास स्थिति में सुधार से होने वाला अगोचर लाभ श्रम उत्पादकता और सकारात्मक स्वास्थ्य लाभों को बढ़ाता है। यह पोषण, स्वच्छता, मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य के मानव विकास मापदण्डों को सकारात्मक रूप से प्रभावित करता है। घर एक आर्थिक परिसम्पत्ति होता है और यह स्वास्थ्य एवं शिक्षा की प्राप्ति में लाभदायक रूप से प्रभाव के साथ सामाजिक गतिशीलता में योगदान करता है। स्थायी आवास से अनेक गोचर एवं अगोचर लाभ प्राप्त होते हैं और ये लाभ परिवारों तथा स्थानीय अर्थव्यवस्था दोनों के लिये अमूल्य होते हैं।

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